रामलीला मैदान में की गई कार्रवाई को दूरगामी परिणाम की दृष्टि से सरकार की हार मान रहे हैं…
स्वामी रामदेव के सत्याग्रह में भाग लेने के लिए दिल्ली के रामलीला मैदान में जमा हुए हजारों निहत्थे और सोए हुए लोगों पर पुलिस द्वारा रात के एक बजे अश्रु गैस और डंडों से की गई बर्बरतापूर्ण कार्रवाई अंग्रेजों के शासनकाल की याद दिलाती है। इस कार्रवाई को यदि रावणलीला कहा जा रहा है तो यह ठीक ही है, क्योंकि इसमें सरकार ने जितनी चुस्ती दिखाई उससे आधी अगर उसने विदेशों से काला धन वापस लाने और भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए दिखाई होती तो सत्याग्रह की नौबत ही न आती। सरकार अपनी इस कार्रवाई के साथ विजय भले मना ले, लेकिन इसे लोकतांत्रिक भारत के इतिहास में काले दिवस से अधिक की संज्ञा नहीं दी जा सकेगी। सरकार द्वारा की गई इस कार्रवाई से पहले न तो सत्याग्रहियों ने कोई उपद्रव किया था और न ही करने वाले थे। सरकार ने इससे पहले उन सत्याग्रहियों को वहां से चले जाने का कोई आदेश भी नहीं दिया था, जिसके उल्लंघन का उन पर आरोप लगाया जाए। सोए हुए बच्चों, औरतों और मर्दो पर पुलिस ने चढ़ाई करके क्या हासिल किया और अगर स्वामी रामदेव का आरोप सही है कि पुलिस उनकी हत्या करना चाहती थी तो सरकार को उन्हें मरवाकर क्या मिल जाता? इस बल प्रयोग से सरकार की क्षणिक विजय भले ही हो गई हो और दिल्ली में उसकी आंखों का कांटा बन रही भीड़ छंट गई, लेकिन दूरगामी परिणाम की दृष्टि से इसे सरकार की हार ही माना जाएगा। इस कार्रवाई से सरकार ने अपने दोमुंहेपन और छल का सुबूत दिया है। कहां तो एक दिन पहले उसके चार-चार मंत्री दिल्ली हवाई अड्डे पर स्वामी रामदेव का स्वागत कर रहे थे और उनसे पांच सितारा होटल में बातचीत कर रहे थे और कहां अब उन्हें वह रावण दिखाई दे रहे हैं। आखिर बाबा रामदेव और सरकार, दोनों क्या चाहते हैं, भ्रष्टाचार का उन्मूलन ही न। तब सरकार को इसमें आपत्ति क्या है, क्या वह भ्रष्टाचार का उन्मूलन नहीं चाहती? क्या वह विदेशों में जमा काले धन को स्वदेश लाने की इच्छुक नहीं है। यदि है तो वह शांतिपूर्वक सत्याग्रह कर रहे साधारण लोगों पर बलप्रयोग क्यों करती है? वह शायद भूल रही है कि दुनिया में विकिलीक्स जैसी संस्थाएं मौजूद हैं जो स्विस बैंकों में खाते रखने वालों का भंडाफोड़ कर सकती हैं। यदि कल को यह सूची प्रकाशित हो जाए तब सरकार क्या करेगी? क्या तब भी सरकार उन संस्थाओं पर डंडे बरसाएगी और प्रतिबंध लगाएगी या उस सूची को ही गलत मानेगी? कई लोग बाबा रामदेव को सलाह दे रहे हैं कि वह योग सिखाने तक सीमित रहें और राजनीति में न कूदें, लेकिन योग क्या है, यह जानना भी जरूरी है। योग शीर्षासन, सर्वागासन, मयूर आसन जैसे आसनों का नाम ही नहीं है और न ही केवल प्राणायाम, नेती और न्योली आदि मात्र क्रियाएं हैं। योग से शरीर के साथ-साथ मन को भी स्वस्थ बनाया जाता है। यह आध्यात्मिक, बौद्धिक और भौतिक यानि सर्वागीण प्रकार की उन्नति के पवित्र दृष्टिकोण का नाम है। योग की एक परिभाषा है-योगश्चित्तवृत्ति निरोध:। यानी योग से चित्तवृत्तियों का निरोध किया जाता है। मन और इंद्रियों को वश में किया जाता है। दूसरी परिभाषा है-योग: कर्म सुकौशलम। कर्म को कौशलपूर्वक करने का नाम योग है। स्वामी रामदेव यही करना तो सिखा रहे हैं। वे लोगों को वास्तविक योग सिखा रहे हैं। उनकी मानसिक और भौतिक उन्नति के उपाय बता रहे हैं। उन्हें सदाचारी और सच्चरित्र बना रहे हैं। जब उन्हें सलाह देने वाले स्वयं ही नहीं जानते कि योग का असली अर्थ क्या है तो स्वामीजी क्या करें? अगर स्वामी रामदेव के राजनीति में पड़ने की बात को देखें तो यह मत भूलिए कि राजनीति में नीति शब्द शामिल है और नीति का अर्थ केवल पॉलिसी और स्कीम ही नहीं है, बल्कि न्याय, नैतिकता और ईमानदारी भी है। समस्या यह है कि पंथनिरपेक्षता की दुहाई देने वाले राजनीतिज्ञ वोट के लालच में नैतिकता, सदाचार और सच्चरित्रता पर भी धर्म जो आज मजहब का द्योतक है और सांप्रदायिकता का ठप्पा लगा रहे हैं। इस अर्थ में इस पाखंडपूर्ण पंथनिरपेक्षता के कारण भारत में चरित्र का जितना ह्रास हुआ है उतना किसी और के कारण नहीं। इसने लोगों को धर्म यानी कर्तव्यपरायणता, मानवता और नैतिकता के सच्चे अर्थो से ही दूर कर दिया है। बहुत से लोगों का स्वामी रामदेव की कई बातों से मतभेद हो सकता है, लेकिन इससे नहीं हो सकता कि वह देश से भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हैं। आज जनसामान्य के लिए भ्रष्टाचार एक सर्वग्रासी राक्षस का रूप ले चुका है, जिसका शिकार सभी हो रहे हैं। स्वामी रामदेव के इस लक्ष्य से भी किसी का मतभेद नहीं हो सकता कि वह विदेशी बैंकों में जमा लाखों करोड़ रुपयों के काले धन को देश के विकास के लिए वापस लाना चाहते हैं। आज भारत आर्थिक दृष्टि से प्रशंसनीय और अभूतपूर्व तरक्की कर रहा है, लेकिन फिर भी उसे दुनिया के भ्रष्टतम देशों में शुमार किया जाता है। उसकी इस तरक्की का लाभ देश के सबसे निचले और दीनहीन लोगों को नहीं मिल रहा। अगर विदेशों में छुपाए गए इस काले धन को वापस लाया जाएगा तो उससे क्या इन दीन-हीन और वंचित लोगों का भला नहीं होगा? क्या वह देश में सर्वत्र व्याप्त आर्थिक विषमता को दूर करने में सहायक नहीं होगा और देश की एक तिहाई से भी अधिक उस जनसंख्या का उद्धार नहीं करेगा जो आज भी गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी में रह रहे हैं? सरकार असली समस्या को हल करने की बजाय स्वामी रामदेव पर कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंट होने का आरोप लगाती है तो कभी भाजपा के एजेंट का। वह उन पर तो अश्रु गैस और डंडे बरसाती है, लेकिन राजधानी आए उन पृथकतावादियों पर नहीं जो देश को खंडित करना चाहते हैं। स्वामी रामदेव संघ के या भाजपा के दूत और राजनीतिज्ञ नहीं हैं। अगर होते तो लाखों की संख्या में विभिन्न धर्मावलंबी और अलग-अलग पार्टियों के लोग उनके समर्थन में न खड़े होते। इसलिए सरकार को उन्हें कुचलने या उनका हौवा खड़ा करने की बजाय जल्दी से जल्दी और पूरी निष्ठा के साथ भ्रष्टाचार की असली समस्या को हल करने के उपाय करने चाहिए। उसे सुशासन देने वाली निष्पक्ष सरकार बनकर दिखाना चाहिए, न कि ऐसी सरकार जो निहत्थे और शांत सत्याग्रहियों पर आंसू गैस और डंडे बरसाने में समस्या का हल देख रही है। (लेखक बीबीसी के पूर्व प्रसारक हैं)
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