Wednesday, June 1, 2011

जाति जनगणना में पर्दादारी


काफी टाल मटोल के बाद अंतत: केंद्र सरकार ने जाति जनगणना के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। उसने साल भर पहले संसद को दिया आश्वासन पूरा कर दिखाया है। यादव त्रयी शरद, लालू, मुलायम की मांग थी कि जनगणना में जाति भी शामिल हो। बाद में कई विपक्षी दलों ने भी उनके सुर में सुर मिलाते हुए जाति आधारित जनगणना की मांग उठायी। बहरहाल, सरकार यह निर्णय लेने में दुविधाग्रस्त रही जिससे वह अब जाकर उबर पाई है। 3500 करोड़ खर्च करके इस वर्ष के जून से दिसम्बर के मध्य सम्पादित होने वाली इस जनगणना में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले बीपीएल परिवारों की जाति और धर्मं आधारित जनगणना होगी। इसमें ग्रामीण आबादी तीन श्रेणियों में बांटी जाएगी। जो बीपीएल से ऊपर हैं, उन्हें इस श्रेणी से बाहर निकाला जाएगा और बीपीएल श्रेणी के नए परिवार उसमे खुद जाएंगे। नई जनगणना में पहली बार शहरी गरीबों का भी आकलन होगा। गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों से जुड़े आंकड़ो को अंतिम चरण में भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण से जोड़ दिया जाएगा लेकिन सरकार फिलहाल सिर्फ सर्वेक्षण कराएगी। इस जनगणना में जातियों की गिनती व्यक्तिगत घोषणा पत्रों के आधार पर होगी और जाति साबित करने के लिए लोगों से कोई प्रमाणपत्र पेश करने को नहीं कहा जाएगा। इसमें ग्राम सभाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होगी क्योंकि गणना के बाद तैयार सूची ग्रामसभा के समक्ष रखी जाएगी और विवरणों के खिलाफ अपील के प्रावधान भी होंगे। इस जनगणना में एक बात साफ है कि लोगों की जाति और धर्म संबंधी सूचनाएं गोपनीय रखी जाएंगी। यही नहीं, यह जनगणना कागज विहीन होगी जिसे विशेष टेबलेट कंप्यूटर के जरिये अंजाम दिया जाएगा। इस प्रक्रिया को ग्रामीण विकास मंत्रालय और आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय अंजाम देंगे। बहरहाल जाति आधारित जनगणना को लेकर तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं। कुछ का कहना है कि यह जातियों का सर्वे मात्र है। सही जाति जनगणना के लिए जनगणना अधिनियम 1948 का अनुसरण करते हुए शिक्षकों से गिनती कराना जरूरी था जबकि इसकी गिनती मनरेगा योजना में डाटा संग्रह करने वाले कर्मचारियों से कराने की तैयारी चल रही है। जनता का मानना है कि सरकार समय रहते निर्णय ले लेती तो इसकी प्रक्रिया पर अलग से होने वाले खर्च से बचा जा सकता था। इसी तरह बीपीएल परिवारों की गिनती कराए जाने को लेकर भी कइयों को आपत्ति है। यही कारण है शरद यादव ने गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों की गिनती अलग से बीपीएल कमीशन द्वारा करवाने की मांग की है। बीपीएल की अधिकतम सीमा 46 प्रतिशत तय करने का भी औचित्य लोगों को समझ से परे लग रहा है। अधिकतम सीमा निर्धारण पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही सवाल उठा चुका है। सबसे ज्यादा हैरानी इससे हो रही है कि सरकार गरीबी रेखा से नीचे की आबादी के जाति और धर्मं संबंधी पहलुओं की जानकारी सार्वजनिक नहीं करेगी। ऐसे में कैसे जाना जा सकेगा कि विभिन्न सामाजिक समूहों में कितने लोग गरीबी रेखा से नीचे गुजर कर रहे है। सवाल है कि सरकार को बीपीएल के एक महत्वपूर्ण आयाम पर पर्दा डालने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है। कु मिलाकर लोगों को जाति आधारित जनगणना में सरकार की नीयत पर संदेह होने लगा है। लगता है सरकार ने संसद में किये गए वादे के दबाव में जाति जनगणना को मंजूरी तो दे दी, पर अब वह सामाजिक विविधता में व्याप्त विषमता पर परदा डालने की हर मुमकिन कोशिश करती दिख रही है। यही कारण है कि उसने जाति और धर्म संबंधी सूचनाएं गोपनीय रखने के साथ ही जनगणना को कागज पर करने के बजाय टेबलेट कंप्यूटर के जरिए अंजाम देने का निर्णय लिया है। यह बात काबिले गौर है कि दुनिया के तमाम देशों ने जहां लोकतंत्र परिपक्व समुन्नत दशा में है, आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे के लिए शक्ति के केन्द्रों में सामाजिक और लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन का ठोस उपाय किया ताकि सभी क्षेत्रों में सभी तबकों और उनकी महिलाओं को वाजिब हिस्सेदारी मिल सके। इसके लिए उन्होंने अपने यहां होने वाली जनगणना को माध्यम बनाया। उन्होंने अपने यहां सामाजिक-सामुदायिक संतुलन बनाये रखने और आर्थिक विकास के बेहतर मॉडल के क्रियान्वयन के लिए जनगणना के दौरान विभिन्न समुदायों, एथिनक समूहों और नस्लों की गिनती का सिलसिला जारी रखा। इन सूचनाओं का उपयोग विभिन्न नस्लीय समूहों के मध्य शक्ति के न्यायोचित बंटवारे में किया। शक्ति के विभिन्न सामाजिक समूहों के मध्य सम्यक बंटवारे के कारण ही पश्चिम का लोकतंत्र औरों के लिए मिसाल बना। लेकिन पश्चिम से लोकतंत्र की अवधारणा उधार लेने के बावजूद हमारे शासक दलों ने शक्ति के केन्द्रों में सामाजिक और लैंगिक विविधता को सम्मान देने का काम नहीं किया। परिणाम सामने है। आज विश्व में सर्वाधिक आर्थिक और सामाजिक गैर बराबरी भारत में है। आर्थिक विषमता ने देश को अतुल्य और बहुजन भारत में बांट कर रख दिया है। अतुल्य भारत में तेजी से लखपतियों, करोड़पतियों और अरबपतियों की संख्या बढ़ती जा रही है। विपरीत इसके जो 84 करोड़ लोग 20 रुपये रोजाना पर जीवन यापन करने के लिए मजबूर हैं, वे मुख्यत: बहुजन भारत के लोग हैं। रोजगार के नाम पर बहुजन भारतीयों के लिए अवसर मुख्यत: असंगठित क्षेत्र में है जहां प्रोविडेंट फंड, वार्षिक छुट्टी चिकित्सा सुविधा नहीं है और ही रोजगार की सुरक्षा। सच्चर रिपोर्ट में उभरी मुस्लिम समुदाय की बदहाली और महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर हमारी बांग्लादेश से भी बदतर स्थिति शक्ति के केन्द्रों में सामाजिक और लैंगिक विविधता की अनदेखी का ही परिणम है। आर्थिक गैर-बराबरी का स्वाभाविक परिणाम अब सामने रहा है। देश के दो सौ से अधिक जिले नक्सलवाद की चपेट में हैं। माओवादियों ने 2050 तक लोकतंत्र के मंदिर पर कब्जे की खुली घोषणा कर दी है। बहरहाल, विषम परिस्थितियों में सरकार का जाति आधारित जनगणना का निर्णय स्वागतयोग्य कदम है। इससे निश्चय ही इस कठिन स्थिति से उबरने में मदद मिलेगी लेकिन सरकार इसे ईमानदारी से अंजाम दे तथा पारदर्शिता बरते ताकि भारत की सामाजिक विविधता के मध्य व्याप्त विषमता की सही तस्वीर जनता के सामने सके। इससे समताकामी शक्तियों को विषमता के खात्मे के लिए सरकारों पर दबाव बनाने का अवसर मिलेगा। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने कहा था, ‘26 जनवरी 1950 को हम लोग एक विपरीत जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति के क्षेत्र में हम लोग एक नागरिक को एक वोट एवं प्रत्येक वोट के लिए एक ही मूल्य की नीति को स्वीकृति देने जा रहे हैं। हम लोगों को अवश्य ही निकटतम समय के बीच इस विपरीतता को दूर कर लेना होगा अन्यथा यदि यह असंगति कायम रही तो विषमता से पीड़ित जनता इस राजनीतिक गणतंत्र की व्यवस्था को विस्फोटित कर सकती है।लंबे समय से सरकारों द्वारा डॉ. अम्बेडकर द्वारा दी गई उक्त चेतावनी की अवहेलना की गई। बहरहाल, अब सरकार को अविलंब इस असंगति को दूर करने में जुट जाना चाहिए। ताकि देश के संसाधनों और अवसरों का सवर्ण, ओबीसी, एससी-एसटी और धार्मिंक अल्पसंख्यकों के मध्य न्यायोचित बंटवारे का मार्ग प्रशस्त हो सके।


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