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Tuesday, July 10, 2012

समानता का अधूरा सपना


अनेक ऐसी बातें हैं जो महात्मा गांधी को उनके समकालीन स्वतंत्रता सेनानियों तथा नेताओं से अलग करती हैं। इनमें से एक बात यह है कि उन्होंने आजादी के संघर्ष के साथ-साथ एक अन्य चीज को बराबर का महत्व दिया और यह थी समाज में नीचे के स्तर पर समझी जाने वाली जातियों के लोगों को बराबरी पर लाने का प्रयास। अस्पृश्यता के खिलाफ गांधीजी का कार्य हमारी आजादी के पांच दशक पहले दक्षिण अफ्रीका से ही आरंभ हो गया था। जब वह भारत लौटे तो उनसे जुड़ी एक घटना ही यह बताने के लिए काफी है कि उन्होंने समानता के विचार को कितना महत्व दिया। यह वर्ष 1915 की बात है। गांधीजी के एक निकट सहयोगी ठक्कर बप्पा ने एक दलित दुधा भाई को आश्रम में रहने के लिए भेजा। कस्तूरबा समेत हर कोई उन्हें आश्रम में रखने के खिलाफ था। गांधीजी ने यह साफ कर दिया कि दुधा भाई आश्रम नहीं छोड़ेंगे और जो लोग इससे सहमत नहीं हैं वे खुद आश्रम छोड़कर जाने के लिए स्वतंत्र हैं। उन्हें यह भी बताया गया कि कोई भी उनकी बात से सहमत नहीं होगा और यहां तक कि आश्रम को मिलने वाली आर्थिक सहायता भी बंद हो सकती है। इसका भी गांधीजी पर कोई असर नहीं पड़ा। गांधीजी ने कहा कि वह अपने आश्रम को किसी दलित बस्ती में ले जाने के लिए तैयार हैं-भले ही इसका यह अर्थ हो कि आश्रम में केवल दो लोग-गांधीजी और दुधा भाई ही बचें। अंतत: गांधीजी की बहन गोकीबेन को छोड़कर सभी लोग राजी हो गए। गोकीबेन आश्रम छोड़कर चली गईं और फिर कभी नहीं लौटीं। क्यों गांधीजी ने अस्पृश्यता अथवा जातिगत आधार पर होने वाले भेदभाव को मिटाने के काम को इतना अधिक महत्व दिया? मुझे लगता है कि वह जिस आजादी के लिए लड़ रहे थे उसका अर्थ केवल राजनीतिक आजादी नहीं था। वह केवल यह नहीं चाहते थे कि अंग्रेज भारत छोड़कर चले जाएं और दूसरी तरह के लोग सत्ता के गलियारों में आकर जम जाएं। उनके लिए आजादी का अर्थ था-देश के प्रत्येक नागरिक की वास्तविक आजादी। एक ऐसी आजादी जो केवल मौलिक समानता और प्रत्येक नागरिक की गरिमा की रक्षा के जरिये आ सकती है। अस्पृश्यता निश्चित ही उनके इस महान उद्देश्य में बाधक थी। आज हममें से अनेक लोगों के पास यह दृष्टि है कि हमारा देश किस तरह का होना चाहिए, यह क्या हो सकता है और विश्व में इसका सही स्थान क्या है? हममें से अनेक लोग यह सपना देखते हैं कि भारत विश्व की महाशक्ति बनेगा, लेकिन क्या एक ऐसा देश यह स्थान पा सकता है जहां समाज विभाजित हो, दीवारें हमें अपने ही लोगों से अलग करती हों? अगर हम एक साझी सामाजिक संपत्ति पर विश्वास नहीं करते हैं तो क्या हम अपने उद्देश्य को हासिल कर सकते हैं? साझी सामाजिक संपत्ति से मेरा आशय सार्वजनिक संपत्ति से है। एक गली या सड़क साझी सामाजिक संपत्ति है। हमारा सरकारी स्वास्थ्य ढांचा साझी सामाजिक संपत्ति है। दुर्भाग्य से हम इतने विभाजित हैं कि इस सबको हम अपनी संपत्ति नहीं मानते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि हम अपनी सड़कों पर कूड़ा-करकट फेंक देते हैं, क्योंकि इन्हें हम अपनी संपत्ति नहीं मानते हैं। हम अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे के प्रति इसलिए इच्छुक नहीं, क्योंकि उसे हम अपनी संपत्ति के रूप में नहीं देखते। हम तभी एक साझा लक्ष्य तय कर सकते हैं या साझा दृष्टिकोण उत्पन्न कर सकते हैं जब हम सभी खुद को एक मानते हों। डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में संविधान की रचना करने वाले हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने हमारे लिए अपना दृष्टिकोण एकदम स्पष्ट कर दिया था। वह दृष्टिकोण था सभी को बराबरी के साथ देखने का और बराबरी वाला व्यवहार करने का। हमारे नेताओं ने हमें राह दिखा दी है और उस पर चलना अब हमारी जिम्मेदारी है। उन्होंने ऐसे कानूनों की रचना की है जो हमें निर्देश देते हैं कि जातिगत और मजहबी आधार पर भेदभाव करना अपराध है। हमें यह भी समझना होगा कि लोगों के बीच भेदभाव करना मानवता के मूल विचार के खिलाफ है। साझा दृष्टिकोण रखने, सभी को एक रूप में देखने का अपना मकसद पूरा करने के लिए हमें सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि हमारे बीच मतभेद हैं, दीवारें हैं। फिर इसके बाद हमें इन मतभेदों और दीवारों को मिटाने की दिशा में काम करना होगा। उदाहरण के लिए पूरे देश में ऐसी अनगिनत हाउसिंग सोसाइटी हैं जो दलितों अथवा मुस्लिमों या हिंदुओं या इसाइयों अथवा सिखों को घर नहीं बेचती हैं। इस प्रकार की संकीर्ण सोच को पूरी तरह समाप्त करना होगा। शायद सुधार का सबसे अच्छा तरीका होगा इस संदर्भ में अपने बच्चों को शिक्षित करना। आइए हम अपने बच्चों में विभाजन के बीज न बोएं। हम उन्हें भेदभाव के वे पाठ न पढ़ाएं जो हमें पढ़ाए गए हैं। हम अपने सामान्य जीवन में कई तरह से भेदभाव की इस प्रवृत्ति को समाप्त कर सकते हैं और इसका हमारे बच्चों पर बहुत सही असर होगा। मुझे भेदभाव के मामले में अपनी कमजोरियों की भी याद आ रही है। अपने शो में मैं बेजवादा विल्सन की बातों को सुनकर स्तब्ध रह गया जो बता रहे थे कि किस तरह आज भी लोगों को दूसरों की गंदगी साफ करने के लिए विवश होना पड़ता है। 46 साल की उम्र में आकर मैं यह जान और समझ सका कि अपने देश में इस प्रथा का अस्तित्व है। कितना अमानवीय है यह सब। मैं 46 साल तक यह सब क्यों स्वीकार करता रहा। शायद इसलिए कि अपने आसपास यह सब देखने की आदत हो गई है। मैं खुद को भयभीत और दोषी महसूस कर रहा हूं। अपनी असंवेदनशीलता के लिए मुझे ग्लानि हो रही है। आइए अस्पृश्यता, भेदभाव और अमानवीयता को मिटाने के लिए हम सब संकल्प लें। जय हिंद, सत्यमेव जयते। 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

दिल्ली में मोदी की दावेदारी


नरेंद्र मोदी का उल्लेख होते ही विवाद खड़े हो जाते हैं। उनके प्रशंसकों की मानें तो आज भारत को नरेंद्र मोदी जैसे नेता की ही जरूरत है। निर्णय लेने की क्षमता, उद्देश्यपरक नेतृत्व, अपने राज्य में बेहद लोकप्रिय और ईमानदार मोदी को गुजरात को विकास के रास्ते पर ले जाने का श्रेय जाता है। उनके विरोधियों के लिए मोदी अधिसत्तात्मक प्रवृत्ति वाले और विभाजनकारी हैं तथा भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए सर्वथा अनुपयुक्त हैं। मोदी और उनके नेतृत्व के तौर-तरीकों पर बहस गुजरात के संदर्भ में उठती है। हालांकि अब जब भारतीय जनता पार्टी उन्हें 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में उतारने पर गंभीरता से विचार कर रही है, मोदी की क्षमता पर विवाद राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींच रहा है। दिल्ली की गद्दी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता हासिल करने के लिए मोदी को पहले तो अपने गृह राज्य में मजबूती दिखानी होगी। गुजरात में इस साल के अंत में होने वाले चुनाव का महत्व इस बात से पता चलता है कि इस पर भारत ही नहीं, पूरे विश्व की निगाहें लगी हैं। अगर मोदी तीसरी बार गुजरात का चुनाव जीत ले जाते हैं तो देश के शीर्ष पद के लिए दावेदारी में भाजपा नेतृत्व के लिए उनकी अनदेखी करना असंभव हो जाएगी। अगर वह हार जाते हैं तो भारत के प्रमुख विपक्षी दल में नेतृत्व का सवाल नए सिरे से खड़ा हो जाएगा। 2002 और 2007 में गुजरात विधानसभा चुनाव में दो बिंदुओं पर मोदी का विरोध हुआ था-2002 के दंगों से निपटने में उनकी भूमिका और शक्तिशाली पटेल समुदाय से तथाकथित मनमुटाव। मोदी ने क्षेत्रीय गौरव के मुद्दे पर अपने विरोधियों को किनारे कर दिया और 2007 में अपनी उपलब्धियों के नाम पर जीत हासिल की। आगामी चुनाव के लिए उनके विरोधियों ने पैंतरा बदल लिया है। पटेल समुदाय की शिकायतें एक बार फिर सतह पर आ रही हैं। केशुभाई पटेल ने मोदी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और तीसरे मोर्चे की बात करनी शुरू कर दी है। दूसरी तरफ कांग्रेस भी उन्हें घेरने के नए तरीके खोज रही है। वह विकास के नए मसीहा की मोदी की छवि पर चोट कर रही है। लगता है कि इस बार के चुनाव में 2002 के दंगे और सांप्रदायिकता का मुद्दा खड़ा नहीं होगा। कांग्रेस गुजरात के दंगों के घाव कुरेदना नहीं चाहती। इससे मोदी को घाटा होने के बजाय फायदा होता है। लगता है कि गुजरात दो कारणों से 2002 के दु:स्वप्न को भूलना चाहता है। एक तो यह मुद्दा एक दशक पुराना हो चुका है और दूसरे समृद्धि के कारण गुजरात में स्थिरता और सुशासन की स्थापना हो गई है। मोदी पर दो बिंदुओं पर हमला होने की संभावना है। एक तो यह कहा जा रहा है कि नाजुक मोर्चो पर गुजरात का प्रदर्शन कमजोर रहा है। विकास के नाम पर मोदी हवा ज्यादा बांधते हैं, जबकि जमीनी धरातल पर काम बहुत कम हुआ है। दूसरा हमला अधिक जटिल है और इसके माध्यम से मतदाताओं को आश्वस्त किया जाएगा कि मोदी के हटने के बाद गुजरात में विकास की गति तेज होगी। कहा जा रहा है कि गुजरात में विकास का मोदी से कोई संबंध नहीं है। मुख्यमंत्री तो पहले से ही विकास की राह पर अग्रसर गुजरात की पीठ पर सवार हो गए हैं। गुजरात की उच्च विकास दर का श्रेय इसकी भौगोलिक स्थिति और गुजरातियों की उद्यमिता को जाता है। मोदी सत्ता में हों या नहीं हों, गुजरात विकास के पथ पर आगे बढ़ता रहेगा। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल ही में कहा था कि पहले से विकसित राज्य के विकास में कोई बड़ी बात नहीं है। गुजरात में विकास की गति को आंकड़ों में नापा जा सकता है। योजना आयोग के आंकड़ों के आधार पर 1990 के बाद से गुजरात की औसत विकास दर में बढ़ोतरी हुई है, किंतु समान रूप से नहीं। 1985-90 के बीच गुजरात की विकास दर 6.1 फीसदी, 1992-97 के बीच 12.9 फीसदी, 1997-02 के बीच 2.8 फीसदी, 2002-07 के बीच 10.9 प्रतिशत तथा 2007-12 के बीच अनुमानित 11.2 फीसदी है। यद्यपि इससे राजनीतिक निष्कर्षो पर पहुंचना गलत होगा, फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं कि मोदी के कार्यकाल में गुजरात की विकास दर दोहरे अंकों में बनी हुई है। कर्नाटक को छोड़कर, जिसकी 11वीं पंचवर्षीय योजना में विकास दर गुजरात के बराबर रही, भारत के बड़े राज्यों में से किसी ने भी पिछले दशक में गुजरात जितना विकास नहीं किया है। मोदी के आलोचक कहते हैं कि विकास दर के मुद्दे पर बिहार, दिल्ली और पांडिचेरी ने गुजरात को पछाड़ दिया है, किंतु यह तो ऐसा ही हुआ कि कोई यह कहे कि भारत की छह फीसदी की लड़खड़ाती विकास दर अमेरिका के दो फीसदी विकास से बेहतर है। सवाल उठता है कि पिछले एक दशक में गुजरात में हुए विकास का क्या राजनीति और सुशासन से कोई लेना-देना नहीं है? अगर यह सही है तो इससे प्रतीत होगा कि मोदी राजनीतिक अर्थव्यवस्था को नई दिशा में ले गए हैं और अर्थव्यवस्था को राजनीति के कलुषित प्रभाव से बचाने में भी सफल रहे हैं। यह स्वायत्तता तो भारतीय उद्योग जगत का पुराना सपना रही है। सार्वजनिक जीवन का यह नियम है कि किसी राज्य के जैसे लोग होंगे वैसा ही वह प्रदर्शन करेगा। मोदी ने छोटे-छोटे लक्ष्य निर्धारित किए और उनके सफल क्रियान्वयन पर पूरा जोर लगा दिया। यह गुजरातियों की उद्यमिता के अनुरूप है। हालांकि यह सवाल अब भी अनुत्तरित है कि क्या केवल उद्यमिता के बल पर तीव्र विकास हो सकता है या फिर आर्थिक संवृद्धि में राज्य उत्प्रेरक की भूमिका निभाते हैं? पिछले दशक में गुजरात ने ढांचागत सुविधाओं के विकास पर ध्यान केंद्रित किया, खासतौर पर सड़कों और बंदरगाहों के निर्माण पर। साथ ही सरकार ने बेहतर सुविधाओं और शर्तो के बल पर उद्योगपतियों को राज्य में निवेश करने के लिए आकर्षित किया है। यह टाटा मोटर्स के पश्चिम बंगाल के सिंगुर से हटकर गुजरात में कारखाना लगाने के प्रसंग से स्पष्ट हो जाता है, किंतु यह संभव नहीं था अगर राज्य में भ्रष्टाचार का स्तर कम नहीं होता, त्वरित निर्णय नहीं लिए जाते और ढांचागत सुविधाएं न होतीं। यह सही है कि मोदी को पहले से ही मजबूत गुजरात का लाभ मिला, किंतु अगर मुख्यमंत्री गैरजिम्मेदार, लापरवाह और नासमझ होता तो क्या आज भारत गुजरात के चमत्कार की बात कर रहा होता? भारत में बहुत से लोगों की मोदी को लेकर जायज आपत्ति है। उनका मानना है कि भावी प्रधानमंत्री को समग्र भारत की भावनाओं के प्रति समान रूप से संवेदनशील होना चाहिए। कुछ लोगों का कहना है कि प्रधानमंत्री को अधिक सहमतिजन्य होना चाहिए, किंतु इन आपत्तियों के आधार पर यह दावा नहीं किया जा सकता है कि नरेंद्र मोदी की सफलता फर्जी है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

ई-बुक्स के बाजार में पिछड़ते हिंदी लेखक


पिछले करीब तीन महीनों से ईएल जेम्स की फिफ्टी शेड्स ट्रायोलॉजी यानी तीन किताबें- फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे, फिफ्टी शेड्स डार्कर, फिफ्टी शेड्स फ्रीड अमेरिका में प्रिंट और ई एडीशन दोनों श्रेणी में बेस्ट सेलर बनी हुई हैं। जेम्स की इन किताबों ने अमेरिका और यूरोप में इतनी धूम मचा दी है कि कोई इस पर फिल्म बना रहा है तो कोई उसके टेलीविजन अधिकार खरीद रहा है । फिफ्टी शेड्स ट्रायोलॉजी लिखे जाने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। टीवी की नौकरी छोड़कर पारिवारिक जीवन और बच्चों की परवरिश के बीच एरिका ने शौकिया तौर पर फैनफिक्शन नाम के वेबसाइट पर मास्टर ऑफ यूनिवर्स के नाम से एक सिरीज लिखना शुरू किया। एरिका ने पहले तो स्टीफन मेयर की कहानियों की तर्ज पर प्रेम कहानियां लिखना शुरू किया जो काफी लोकप्रिय हुआ। लोकप्रियता के दबाव और ई-रीडर्स की मांग पर उसे बार-बार लिखने को मजबूर होना पड़ा। इस तरह शौकिया लेखन पेशेवर लेखन में तब्दील हो गया। पाठकों के दबाव में एरिका ने अपनी कहानियों का पुनर्लेखन किया और उसे फिर से ई-रीडर्स के लिए पेश कर दिया। पात्रों के नाम और कहानी के प्लॉट में बदलाव करके उसकी पहली किश्त वेबसाइट पर प्रकाशित हुई तो वह पूरे अमेरिका में वायरल बुखार की तरह फैल गई। चंद हफ्तों में एरिका लियोनॉर्ड का भी नाम बदल गया और वह बन गई ईएल जेम्स। उसकी इस लोकप्रियता को भुनाते हुए उसने ये ट्रायोलॉजी प्रकाशित करवा ली। इसके प्रकाशन के पहले ही प्री लांच बुकिंग से प्रकाशकों ने लाखों डॉलर कमाए। यह सब हुआ सिर्फ साल भर के अंदर। इस पूरे प्रसंग को लिखने का उद्देश्य यह बताना था कि ई-बुक्स की बढ़ती लोकप्रियता और उसके फायदों के मद्देनजर यूरोप और अमेरिका में लेखकों ने ज्यादा लिखना शुरू कर दिया है। उनकी पहली कोशिश यह होने लगी है कि वह अधीर ऐसे पाठकों की क्षुधा को शांत करें जो कि अपने प्रिय लेखक की कृतियां एक टच से या एक क्लिक से डाउनलोड कर पढ़ना चाहता है। ई-रीडिंग और ई-राइटिंग के पहले के दौर में लेखक साल में एक कृति की रचना कर लेते थे तो उसे बेहद सक्रिय लेखक माना जाता था। जॉन ग्रीशम जैसा लोकप्रिय लेखक भी साल में एक ही किताब लिखता था। पाठकों को भी साल भर अपने प्रिय लेखकों की कृति का इंतजार रहता था। पुस्तक छपने की प्रक्रिया में भी वक्त लगता था। पहले लेखकों के लिखे को टाइप किया जाता फिर उसकी दो-तीन बार प्रूफरीडिंग होती थी। कवर डिजायन होता था। कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि लेखन से लेकर पाठकों तक पहुंचने की प्रक्रिया में काफी वक्त लग जाता था। यह वह दौर था जब पाठकों और किताबों के बीच एक भावनात्मक रिश्ता होता था। पाठक जब एकांत में हाथ में लेकर किताब पढ़ता था तो किताब के स्पर्श से वह उस किताब के लेखक और उसके पात्रों से एक तादात्म्य बना लेता था। कई बार तो लेखक और पाठक के बीच का भावनात्मक रिश्ता इतना मजबूत होता था कि पाठक वर्षो तक अपने प्रिय लेखक की कृति के इंतजार में बैठा रहता था और जब उसकी कोई किताब बाजार में आती थी तो उसे वह हाथों हाथ खरीद लेता था, लेकिन वक्त बदला, स्टाइल बदला, लेखन और प्रकाशन की प्रक्रिया बदली। अब तो ई-लेखन का दौर आ गया है। ई-लेखन और ई-पाठक के इस दौर में पाठकों की रुचि में आधारभूत बदलाव देखने को मिल रहा है। पश्चिम के देशों में पाठकों की रुचि में इस बदलाव को रेखांकित किया जा सकता है। अब तो इंटरनेट के दौर में पाठकों का लेखकों से भावनात्मक संबंध की बजाय सीधा संवाद संभव हो गया है। लेखक ऑनलाइन रहते हैं तो पाठकों के साथ बातें भी करते हैं। ट्विटर पर सवालों के जवाब देते हैं। फेसबुक पर अपना स्टेटस अपडेट करते हैं। ईएल जेम्स की सुपरहिट ट्रायोलॉजी तो पाठकों के संवाद और सलाह का ही नतीजा है। दरअसल हमारे या विश्व के अन्य देशों के समाज में जो इंटरनेट पीढ़ी सामने आ रही है उनके पास धैर्य की कमी है। कह सकते हैं कि वह सब कुछ इंस्टैंट चाहते हैं। उनको लगता है कि इंतजार का विकल्प समय की बर्बादी है। अमेजोन या किंडल पर किताबें पढ़ने वाला यह पाठक समुदाय बस एक क्लिक या एक टच पर अपने पसंदीदा लेखक की नई कृति चाहता है। इससे लेखकों पर जो दबाव बना है उसका नतीजा यह है कि बड़े से बड़ा लेखक अब साल में कई कृतियों की रचना करने लगा है। कई बड़े लेखक तो साल में दर्जनभर से ज्यादा किताबें लिखने लगे है, जो कि ई-रीडिंग और ई-राइटिंग के दौर के पहले असंभव हुआ करता था। जेम्स पैटरसन जैसे बड़े लेखकों की रचनाओं में बढ़ोतरी साफ देखी की जा सकती है। पिछले साल पैटरसन ने बारह किताबें लिखी और एक सहलेखक के साथ यानी कुल तेरह किताबें। एक अनुमान के मुताबिक अगर पैटरसन के लेखन की रफ्तार कायम रही तो इस साल वह तेरह किताबें अकेले लिख ले जाएंगें। पैटरसन की साल भर में इतनी किताबें बाजार में आने के बावजूद ई-पाठकों और सामान्य पाठकों के बीच उनका आकर्षण कम नहीं हुआ है, बल्कि उनकी लोकप्रियता में और इजाफा ही हुआ है, लेकिन जेम्स पैटरसन की इस रफ्तार से कई साथी लेखक सदमे में हैं। ई-रीडर्स की बढ़ती तादाद का फायदा प्रकाशक भी उठाना चाहते हैं, लिहाजा वह भी लेखकों पर ज्यादा से ज्यादा लिखने का दबाव बनाते हैं। प्रकाशकों को लगता है कि जो भी लेखक इंटरनेट की दुनिया में जितना ज्यादा चर्चित होगा वह उतना ही बड़ा स्टार होगा। जिसके नाम को किताबों की दुनिया में भुनाकर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है। इसके मद्देनजर प्रकाशकों ने अपनी तरह एक अलग ही रणनीति भी बनाई हुई है। अगर किसी बड़े लेखक की कोई अहम कृति प्रकाशित होने वाली होती है तो प्रकाशक लेखकों से आग्रह कर पुस्तक प्रकाशन के पहले ई-रीडर्स के लिए छोटी छोटी कहानियां लिखवाते हैं। जो कि सिर्फ डिजिटल फॉर्मेट में ही उपलब्ध होता है। इसका फायदा यह होता है कि छोटी कहानियों की लोकप्रियता से लेखक के पक्ष में एक माहौल बनता है और उसकी आगामी कृति के लिए पाठकवर्ग में एक उत्सुकता पैदा होती है। जब वह उत्सुकता अपने चरम पर होती है तो प्रकाशक बाजार में उक्त लेखक की किताब पेश कर देता है। उत्सुकता के उस माहौल का फायदा परोक्ष रूप से प्रकाशकों को होता है और वह मालामाल हो जाता है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है, क्योंकि कारोबार करने वाले अपने फायदे की रणनीति बनाते ही रहते हैं। मशहूर और बेहद लोकप्रिय ब्रिटिश थ्रिलर लेखक ली चाइल्ड ने भी अपने उपन्यास के पहले कई छोटी-छोटी कहानियां सिर्फ डिजिटल फॉर्मेट में लिखी। उन्होंने साफ तौर पर माना कि ये कहानियां वह अपने आगामी उपन्यास के लिए पाठकों के बीच एक उत्सुकता का माहौल बनाने के लिए लिख रहे हैं। इससे साफ पता चलता है कि प्रकाशक के साथ-साथ अब लेखक भी ज्यादा से ज्यादा लिखकर खुद को कारोबारी रणनीति का हिस्सा बना रहे हैं। चाइल्ड ने माना है कि पश्चिम की दुनिया में सभी लेखक कमोबेश ऐसा ही कर रहे हैं और उनके मुताबिक दौड़ में बने रहने के लिए ऐसा करना बेहद जरूरी भी है। इन स्थितियों की तुलना में अगर हम हिंदी लेखकों की बात करें तो उनमें से कई वरिष्ठ लेखकों को अब भी सोशल नेटवर्किग साइट्स से परहेज है। उनकी अपनी कोई वेबसाइट नहीं है। दो-चार प्रकाशकों को छोड़ दें तो हिंदी के प्रकाशकों की भी कोई वेबसाइट अभी तक नहीं है। हिंदी के वरिष्ठ लेखक अब भी फेसबुक और ट्विटर से परहेज करते नजर आते हैं। नतीजा यह कि हिंदी में लेखकों पर अब भी पाठकों का कोई दबाव नहीं और वह अपनी धीमी रफ्तार से लेखन करते आ रहे हैं। हालांकि वह रोना यही रोते हैं कि पाठक नहीं हैं। वक्त के साथ अगर नहीं चलेंगे तो वक्त भी आपका इंतजार नहीं करेगा और आगे निकल जाएगा। हिंदी के लेखकों के लिए यह वक्त चेतने का है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

नापाक इरादों की झलक


मायावती के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला कई सवाल खड़े करता है। केंद्रीय जांच ब्यूरो के अनुसार उसने ताज कॉरीडोर परियोजना में भ्रष्टाचार को लेकर 2003 में मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति रखने का मामला भी दर्ज किया था। नौ साल बाद सर्वोच्च न्यायालय ने यह पाया कि सीबीआइ को ऐसा करने का अधिकार ही नहीं था। शीर्ष अदालत की मानें तो उसने सीबीआइ को कभी भी मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज करने का आदेश नहीं दिया। इसका अर्थ है कि जांच एजेंसी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया। सीबीआइ की ओर से गफलत किए जाने से इन्कार नहीं, लेकिन आखिर इस भूल को पकड़ने में नौ साल कैसे लग गए? इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि सीबीआइ ने गलत एफआइआर दर्ज कर ली थी तो फिर सुप्रीम कोर्ट उसकी प्रगति रिपोर्टो पर विचार क्यों करता रहा? यह उल्लेखनीय है कि सीबीआइ ने इस मामले की जांच से जुड़ी एक-दो नहीं, छह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को दीं। सीबीआइ के मुताबिक इन सभी रिपोर्टो को स्वीकार करते हुए शीर्ष अदालत ने ताज कॉरीडोर और आय से अधिक संपत्ति के केस को अलग-अलग करने का फैसला सुनाया। आखिर यह क्या पहेली है और इसे कौन सुलझाएगा? मायावती ने समय-समय पर खुद ही अपनी आय घोषित की है। इसके अनुसार 2007 में 52 करोड़ की आय 2012 में 111 करोड़ रुपये हो गई। यह कोई नया-अनोखा अथवा इकलौता मामला नहीं। देश में ज्यादातर नेताओं की आय इसी तरह दिन-दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ती है। क्या कोई यह बताएगा कि नेताओं के साथ ही ऐसा क्यों होता है? हमारे ज्यादातर नेता न तो किसी लाभ के पद पर होते हैं और न ही किसी व्यवसाय को सीधे संचालित कर रहे होते हैं, लेकिन उनकी आय में इजाफा बाजार के सभी नियमों को मुंह चिढ़ाते हुए होता रहता है। क्या भारत की राजनीति किसी अलग किस्म के अर्थशास्त्र से चलती है? यह ठीक नहीं कि नेतागण अपनी आय में असामान्य वृद्धि दर्शाते रहें और फिर भी हमारे नीति-नियंताओं में कहीं कोई हलचल न हो। यदा-कदा वे तब संकट में आते हैं जब किसी विवाद या घोटाले के चलते उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज हो जाता है। इसके बावजूद बहुत कुछ सीबीआइ और उसे कठपुतली की तरह नियंत्रित करने वाली केंद्रीय सत्ता पर निर्भर करता है। इसकी ताजा मिसाल आंध्र प्रदेश के सांसद जगनमोहन रेड्डी हैं। जगनमोहन ने कांग्रेस से निकलकर जैसे ही नई पार्टी बनाई, केंद्रीय सत्ता को यह नजर आ गया कि उन्होंने अनुचित तरीके से करोड़ों की संपत्ति बनाई है। वर्तमान में उनके खिलाफ सीबीआइ एवं अन्य केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता देखते ही बनती है। यह किसी से छिपा नहीं कि मायावती के मामले में सीबीआइ ने किस तरह समय-समय पर सक्रियता और निष्कि्रयता दिखाई। मौजूदा राजनीतिक माहौल में यह लगभग तय है कि यदि मायावती के प्रकरण में सीबीआइ चाहेगी तो भी उसे पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की अनुमति नहीं मिलने वाली। यदि इस मामले में भाजपा को सफाई देनी पड़ रही है तो इसके लिए एक हद तक वह भी जिम्मेदार है। यदि उसने केंद्रीय सत्ता का नेतृत्व करते समय सीबीआइ को वास्तव में स्वायत्त बनाने के लिए कोई ठोस पहल की होती तो आज दूसरी ही स्थिति होती।