Monday, February 27, 2012

अधिकारों पर अंकुश लगाना होगा


देश में भ्रष्टाचार सचमुच बढ़ गया है, तभी तो प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे। भ्रष्टाचारियों को बख्शा नहीं जाएगा। इस दिशा में सरकार ने सख्त कदम उठाने के संकेत दिए हैं। मसलन, हर तीन वर्ष बाद सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के कार्यो की समीक्षा की जाएगी। इसके अलावा अगर वे बार-बार अपने कार्य को सही रूप से अंजाम देने में पीछे रहते हैं तो उन्हें 15 वर्ष पहले ही सेवानिवृत्त किया जा सकता है। यह एक सराहनीय कदम है, पर इस पर सख्ती से अमल हो, तभी यह कारगर सिद्ध होगा। वैसे देखा जाए तो भ्रष्टाचार हमारी देन है ही नहीं। यही वजह है कि देश के नेता इससे निपटने में अक्षम साबित हो रहे हैं। यह तो अंग्रेजों से हमें विरासत में मिला है। आज अगर देश की जनता अपना सही काम करवाने के लिए भी रिश्वत का सहारा लेती है तो उसके पीछे बेशुमार अधिकार के स्वामी देश के सरकारी अधिकारी, कर्मचारी और नेता हैं। रिश्वत न देने वाले आम आदमी को परेशान करने के लिए इनके पास इतने अधिकार हैं कि वह अपने सही काम को कराने के लिए लाख एडि़यां रगड़ ले, उसका काम कभी नहीं होगा। इस दौरान वह कई नियम-कायदों से बंधा होगा, लेकिन रिश्वत देते ही वह सारे कायदों से मुक्त हो जाता है। यह देश की विडंबना है। हमारे देश में भ्रष्टाचार कितना फैल चुका है, यह जानने के लिए किसी सर्वेक्षण की जरूरत नहीं है। इसके लिए तो अमेरिका की गेलप नामक कंसल्टेंसी फर्म की रिपोर्ट ही पर्याप्त है। इसने भारत में फैले भ्रष्टाचार के मामले पर एक सर्वेक्षण किया, जिसमें देश के विभिन्न शहरों के करीब छह हजार लोगों से बात की। 47 प्रतिशत लोगों ने माना कि देश में भ्रष्टाचार एक महामारी की तरह फैल गया है। यह स्थिति पिछले 5-10 वर्ष पहले से ज्यादा गंभीर है। अन्य 27 प्रतिशत लोगों ने भ्रष्टाचार को एक गंभीर समस्या निरुपित किया। इन लोगों का मानना था कि 5 साल पहले भी यही स्थिति थी। हाल ही में अन्ना हजारे के आंदोलन को जिस तरह से लोगों ने अपना नैतिक समर्थन दिया, उससे यह स्पष्ट है कि देश का आम आदमी इस भ्रष्टाचार से आजिज आ चुका है। देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने के लिए अब वह उथल-पुथल के मूड में दिखाई दे रहा है। इस सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि देश के 78 प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि भ्रष्टाचार सरकारी तंत्र में अधिक फैला हुआ है। 71 प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि देश के उद्योगपति भी भ्रष्टाचार के लिए जवाबदार हैं। टाइम मैग्जीन कि सर्वे के अनुसार, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में लिप्त ए. राजा को विश्व को दूसरा सबसे बड़ा भ्रष्टाचारी माना है। इसके पहले कॉमनवेल्थ गेम्स का जो घोटाला सामने आया, उसने देश के नागरिकों की सहिष्णुता को एक तरह से खत्म ही कर दिया। टेलीकॉम घोटाले ने उस पर अपनी मुहर ही लगा दी। भारतीय जनता यह मानती है कि भ्रष्टाचार के लिए सबसे बड़ा कारण सरकारी तंत्र है। गेलप के सर्वेक्षण के मुताबिक भ्रष्टाचारियों को दंड देने में सरकार पूरी तरह से विफल साबित हुई है। इन भ्रष्टाचारियों से सबसे अधिक परेशान बेरोजगार युवा हैं। 21 प्रतिशत नागरिकों ने स्वीकार किया कि वे अपने काम को करवाने के लिए रिश्वत का सहारा लेते हैं। ट्रेक डॉट इन नामक एक वेबसाइट ने भारत में भ्रष्टाचार विषय पर एक रोचक तथ्य जारी किया है। उसके अनुसार भारत में सरकारी तंत्र की रग-रग में भ्रष्टाचार व्याप्त है। नागरिकों को जिन्हें रिश्वत देनी पड़ती है, उनमें 91 प्रतिशत सरकारी अधिकारी हैं। इसमें भी 33 प्रतिशत केंद्रीय कर्मचारी हैं। 30 प्रतिशत पुलिस अधिकारी और 15 प्रतिशत राज्य के कर्मचारी हैं। दस प्रतिशत नगर पालिका, नगर निगम या ग्राम पंचायतों के कर्मचारी हैं। भारतीय प्रजा के माथे पर तीन प्रकार की गुलामी लिखी हुई है। पहली गुलामी केंद्र सरकार की, जिसमें आयकर, आबकारी, कस्टम आदि विभाग आते हैं। दूसरी गुलामी राज्य सरकार की है, जिसके हाथ में बिक्रीकर, शिक्षा, स्वास्थ्य और पुलिस विभाग आते हैं। तीसरी गुलामी स्थानीय संस्थाओं की है, जिसके पास पानी, गटर, जमीन, मकान, संपत्ति कर आदि दस्तावेज बनाने के अधिकार हैं। इस तीन प्रकार की संस्थाओं को इतने अधिक अधिकार प्रदान किए गए हैं कि वे प्रजा को कायदा-कानून बताकर इतना अधिक डरा देते हैं कि न चाहते हुए भी प्रजा को रिश्वत देनी ही पड़ती है। वास्तव में अधिकारियों को मिलने वाले असीमित अधिकारों पर अंकुश लगाया जाए तो शायद देश भ्रष्टाचारमुक्त हो सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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