Monday, February 27, 2012

केंद्रीय नीति में राज्यों की सहमति जरूरी

हम एक राष्ट्र के रूप में आतंकवाद को समाप्त करने के बारे में गंभीर क्यों नहीं, जबकि सब जानते हैं कि आतंक का साया आज देश के लगभग हर राज्य पर मंडराने लगा है? जब कभी आतंकवाद का सामना करने के लिए कोई कदम उठाया जाता है तो क्यों वह किसी न किसी विवाद का मुद्दा बन जाता है? इस विसंगति के विभिन्न कारणों में एक बड़ा कारण यह भी है कि केंद्र और राज्यों के बीच न तो लक्ष्य में सहमति होती है और न ही कार्यशैली में। मौजूदा विवाद राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र के गठन पर आरंभ हुआ है। अनेक राज्यों ने आरोप लगाया है कि इस कदम से केंद्र सरकार राज्यों के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रही है और देश के संघीय ढांचे को बिगाड़ रही है। सबसे पहले इस बात को जानना जरूरी है कि क्या किसी ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें आतंकवाद के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई की जा सके? हम जानते हैं कि हमारे पास कई नियम कायदे हैं, जिनके माध्यम से आज आतंकवाद जैसे अपराधों का सामना किया जाता है। यह भी साफ है कि केंद्र के अतिरिक्त राज्यों के पास भी कई व्यवस्थाएं हैं और इन पर अमल करने के लिए कई संगठन हैं। ये संगठन जांच गिरफ्तारी और दंड- सबके बारे में हैं लेकिन अक्सर तालमेल के अभाव में कार्रवाई या तो समय पर नहीं होती या आरम्भ होने पर भी बीच में अटक जाती है। आतंकवाद संगठित अपराध होता है जो जितना जमीन के ऊपर होता है, उतना ही जमीन के नीचे। आतंकवादी कोई सिरफिरा नहीं होता जो किसी प्रतिशोध की भावना से या किसी व्यक्तिगत जुनून के वश मारकाट मचाता हो। ऐसे अपराध मानव सभ्यता के आरम्भिक दौर से ही होते रहे हैं। आतंकवाद के पीछे एक विचारधारा होती है और जिससे प्रेरित कुछ संगठन सुनियोजित तरीके से आतंकवाद का इस्तेमाल अपने राजनैतिक या साम्प्रदायिक लक्ष्यों को पाने के लिए लिए समर नीति के रूप में करते हैं। हमारे देश में आतंकवाद अलगाववादी लक्ष्य पाने के लिए आरम्भ हुआ लेकिन पूवोर्ंत्तर और कश्मीर के आरम्भिक दौर में आतंकवाद के स्वरूप में अब गुणात्मक अंतर आया है। अब यह देशों की प्रतिरक्षा समरनीति का भी अंग बन गया है। हमारे देश में आतंकवाद पाकिस्तान की भारत विरोधी समरनीति बन चुका है। यानी इसके बाकायदा अंतरराष्ट्रीय आयाम खुल गए हैं। एक चिंताजनक आयाम विभिन्न आतंकवादी गुटों के बीच व्यापक तालमेल के कारण खुल गया है। भारत जैसे विशाल देश में आंचलिक क्षेत्रों में अलगाव की प्रवृत्ति अस्वाभाविक नहीं है। पूवोर्ंत्तर, पंजाब और कश्मीर के आतंकवादी गुटों के लक्ष्यों में समानता न होते हुए भी एक समानता है कि सबका लक्ष्य भारत राष्ट्र को कमजोर करना है क्योंकि कमजोर भारत में ही उनके उद्देश्य पूरे होने की आशा की जा सकती है। इस एक उद्देश्य के लिए इन संगठनों में समरनीतिक तालमेल पैदा हो गया है। इस तालमेल में विदेशी एजेंसियो की भूमिका भी स्पष्ट है। विदेशी सहयोग और आथिर्क सहायतासे लैस संगठित तंत्र के रूप में आज आतंकवाद भारत संघ के सामने बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। आतंकवाद राज्यों की सीमाएं नहीं मानता और न ही उसे भारत के संघीय और राज्यों के अधिकारों की चिंता है। ऐसे राष्ट्रव्यापी खतरे का सामना टुकड़ों में नहीं हो सकता है। सवाल उठता है कि क्या ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, जयललिता या नरेंद्र मोदी को नहीं मालूम कि आतंकवाद की पहुंच कहां तक है और उससे निबटने के लिए एक अखिल भारतीय पहल कीआवश्यकता है? अगर मालूम है तो क्या यह मान लें कि ये मुख्यमंत्री, जो आतंकवाद विरोधी केंद्र का विरोध कर रहे हैं नहीं चाहते कि राष्ट्र शक्तिशाली रहे? ये सभी राज्य किसी न किसी सीमा तक आतंकवाद के भुक्तभोगी हैं और इन में से कुछ तो आतंकवाद के विरुद्ध शून्य सहनशीलता के पक्षधर हैं। फिर भी अगर वे केंद्र सरकार के इस कदम का विरोध कर रहे हैं तो क्या माना जाए कि केंद्रीय कार्रवाई में ही कोई खोट है? दरअसल राज्यों को केंद्र सरकार की नीयत पर ही शक है। अपनी विसनीयता खोने के लिए केंद्र सरकार स्वयं उत्तरदायी है। केंद्र सरकार स्वयं आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में ईमानदार नहीं दिखती। महत्वपूर्ण मामलों में भी सरकार ने ऐसी धारणा बनाई है कि वह आतंकवादी घटनाओं को दलगत राजनीति के आईने से ही देखती है और कभी- कभी आतंकवादी घटनाओं का राजनीतिक इस्तेमाल भी करती है। बाटला हाउस कांड के बारे में दोमुंही नीति के कारण लोगों का असमंजस बढ़ गया है कि कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता सही हैं कि सरकार के गृहमंत्री। अफजल गुरु की याचिका पर जिस तरह सरकार टालमटोल करती रही है, उससे आतंकवाद के प्रति सरकारी गंभीरता पर संदेह स्वाभाविक है। राज्यों के साथ भी केंद्र का रवैया राजनीति प्रेरित रहा है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकारी कदम का विरोध करते हुए कहा कि आतंकवाद हमारे लिए बहुत अहम मुद्दा है, लेकिन जब हमने राज्य में आतंकवाद विरोधी विधेयक पारित करवाना चाहा तो केंद्र के इशारे पर कई बार राज्यपाल ने उसे अस्वीकार कर दिया । अगर राज्य भरोसे लायक नहीं है तो राज्य केंद्र पर कैसे भरोसा कर सकते हैं। बात अगर केवल नरेंद्र मोदी की ही होती तो गोधरा कांड के बाद दंगों में राज्य सरकार के संदेह के घेरे में आने के कारण केंद्र के व्यवहार को तर्कसंगत ठहराया जा सकता था लेकिन केंद्र की कार्रवाई पर सबसे पहले तो बगावत का झंडा उन ममता बनर्जी ने उठाया जिनकी पार्टी केंद्र सरकार में सहयोगी पार्टी है। उनका साथ दिया ओडिशा के नवीन पटनायक ने, जिन्होंने पिछले चुनाव में ही भाजपा से नाता तोड़ दिया था। नीतीश कुमार, मोदी और जयललिता तो बाद में शामिल हो गए। सबका कहना है कि यह राज्यों के अधिकार क्षेत्र में दखल है और इसका केंद्र दुरुपयोग कर सकता है। सवाल है कि क्या नई व्यवस्था का राजनीतिक दुरुपयोग हो सकता है? इस केंद्र के गठन का उद्देश्य आतंकवाद के बारे में सारी जानकारियां एक स्थान पर केंद्रित करना है ताकि उचित समय पर इसका उपयोग हो सके। कुछ विदेशी जासूस संगठनों की तरह यह ऐसा संगठन है जिसके पास न केवल जानकारियां हों, अपितु जो आने वाले खतरे को समय रहते भांप भी सके। लेकिन जानकारी संकलन का माध्यम केंद्रीय खुफिया ब्यूरो है। फिर इस संगठन को बिना किसी से पूछे गिरफ्तारी की भी छूट है। इस व्यवस्था के विरोधियों का कहना है कि दुनिया में जानकारी संग्रह करने वाला ऐसा कोई जासूसी संगठन नहीं जिसे अपने आप गिरफ्तारी का अधिकार भी हासिल हो। इस व्यवस्था का बेजा इस्तेमाल हो सकता है। इस मामले में जयललिता का आरोप है कि अनुभव बताता है कि इस संगठन का भी उसी तरह इस्तेमाल हो सकता है जिस तरह केंद्रीय खुफिया ब्यूरो का किया जा रहा है। जयललिता तो इसके खिलाफ अदालत तक पहुंच गई हैं। केंद्र और केंद्रीय सरकार चलाने वाली पार्टी में भरोसे का यह अभाव वर्तमान व्यवस्था लागू करने के बारे में दिखाई देता है। जिस कदम से राज्यों के अधिकार क्षेत्र में दखल का संदेह पैदा होता हो, उसमें भी राज्यों से बातचीत किए बिना घोषणा करने के पीछे उसी एकतरफा कार्रवाई की प्रवृत्ति दिखाई देती है जिसके कारण राज्य और केंद्र सरकार में विास की इतनी बड़ी खाई पैदा हो गई है। आश्चर्य है कि केंद्र अक्सर विवाद पैदा होने के बाद ही बातचीत आरम्भ करता है। लेकिन देर से ही सही, वार्ता सहभगिता के आधार पर होनी चाहिए ताकि आतंकवाद से लड़ाई दलगत राजनीति का विवाद न बने।

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