Tuesday, February 14, 2012

संपत्ति पर अधिकार


योजना आयोग एक ऐसा प्रस्ताव ले कर आया है जो भारत में पति-पत्नी के रिश्तों में रेडिकल परिवर्तन ला सकता है, लेकिन पुरुष मानसिकता को देखते हुए कम से कम अगले बीस साल तक ठंडा घर में पड़ा रहेगा। आयोग चाहता है कि विवाह के बाद पति और पत्नी जो भी संपत्ति हासिल करें, उस पर दोनों का समान अधिकार हो। यह प्रस्ताव नया भले ही लगे पर विवाह की अवधारणा में हमेशा मौजूद रहा है। यथार्थ तो यही है कि विवाह के बाद पति-पत्नी एक हो जाते हैं, लेकिन उनकी आर्थिक हैसियत एक नहीं हो जाती। पति राजा है तो वह राजा बना रहता है और पत्नी रंक है तो वह रंक बनी रहती है। राजा के साथ विवाह होने पर वह रानी की तरह रहने लगती है, लेकिन तभी तक जब तक राजा उस पर मेहरबान रहे। विवाह को जो ऊंचा स्थान सभी धर्मो और समुदायों में दिया गया है और विवाह के मंत्र जो कहते हैं उसके साथ इस आर्थिक विषमता का कोई मेल नहीं है। परिणाम यह होता है कि विवाह होते तो स्वर्ग में हैं पर वैवाहिक जीवन नरक में बिताया जाता है। अगर विवाह संस्था को एक मानवीय संस्था बनाना है तो हमें सब तरह की बराबरी पर विचार करना ही होगा। जिस विवाह में स्त्री और पुरुष की आर्थिक हैसियत अलग-अलग हो, वह कभी सफल नहीं हो सकता। इस तरह के जो विवाह सफल दिखाई देते हैं वे स्त्री की पराधीनता पर आधारित होते हैं। अधिकतर मामलों में चूंकि स्त्री का अपना कोई स्वतंत्र आर्थिक आधार नहीं होता इसलिए वह अपने को पति से नीचे मान कर चलती है। वह जानती है कि पति को अप्रसन्न करने के नतीजे कितने भयावह हो सकते हैं। इस तरह विवाह के भीतर किसी तरह का लोकतंत्र नहीं रह जाता। हर मामले में पुरुष की ही मर्जी चलती है, क्योंकि पैसा उसके ही पास होता है और कुछ खर्च करना हो तो पत्नी को उससे पैसा मांगना होता है। इससे पारिवारिक जीवन में उसकी भूमिका बहुत सीमित हो जाती है। अक्सर तो उसका मानसिक विकास भी नहीं हो पाता क्योंकि वह वास्तविक दुनिया की कारगुजारियों से नावाकिफ रहती है। परिवार की आर्थिक स्थिति में किसी प्रकार की सच्ची साझेदारी के अभाव में पत्नियों का अस्तित्व तक उनके अपने हाथ में नहीं रहता। चूंकि उनके पास अपनी मर्जी से खर्च करने के लिए पैसा नहीं होता इसलिए वे अपनी मर्जी का इस्तेमाल करना भी भूल जाती हैं। उन्हें डर होता है कि पति छोड़ देगा तो वे कहां जाएंगी? पिता के परिवार में लौटना कोई सच्चा विकल्प नहीं है। वहां उसका स्वागत करने के लिए शायद ही कोई उत्सुक रहता हो। इसलिए स्त्री की मजबूरी हो जाती है कि वह किसी भी शर्त पर विवाह को टूटने न दे। इस बेबसी का सारा फायदा पुरुष को मिलता है और वह परिवार के सभ्य जंगल में शेर की तरह जीवन बिताता है। इसका असर बेटे-बेटियों पर भी पड़ता है। बेटियां जानती हैं कि परिवार की संपत्ति में उनकी कोई कानूनी हिस्सेदारी नहीं है। विवाह के समय माता-पिता से जो मिल जाए वही उनका धन है और इस धन पर भी उस परिवार का कब्जा हो जाता है जहां वह ब्याह करके जाती है। इससे बेटियों के व्यक्तित्व में एक बेसहारापन अपने आप विकसित हो जाता है। दूसरी ओर बेटे जानते हैं कि परिवार की संपत्ति में उन सबका बराबर हिस्सा है इसलिए उनके व्यक्तित्व में अधिकार चेतना होती है जो उन्हें स्वतंत्र और स्वाभिमानी बनाती है। इसका असर पूरे सामाजिक ढांचे पर पड़ता है। एक आधी आबादी का दूसरी आधी आबादी से रिश्ता बिगड़ा रह जाता है। कह सकते हैं कि स्त्री-पुरुष की भौतिक विषमता हमारी सबसे सबसे तगड़ी आदत है। दूसरी आदतें टूट चुकी हैं या टूट रही हैं, राजतंत्र नहीं रहा, जातियों की ऊंच-नीच को चुनौती मिल रही है, सभी को शिक्षा हासिल करने का अधिकार मिल चुका है, अछूतपन के समर्थन में कोई चूं तक नहीं कर सकता, दलित सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश बन सकता है। स्त्री-पुरुष को बराबरी का हक न देने की हजारों वर्ष पुरानी आदत अभी भी हमें जकड़े हुए है। इस अस्वस्थ आदत को पारिवारिक संपत्ति में बराबरी का अधिकार जरूर धक्का पहुंचाएगा। सच पूछिए तो इससे पुरुष समाज को भी कम फायदा नहीं है। विशेषाधिकार आदमी को बड़ा नहीं, छोटा बनाता है। परिवार में लोकतंत्र नहीं होने से समाज में भी लोकतंत्र नहीं हो पाता। चूंकि पुरुष परिवार के भीतर आर्थिक विषमता को पालता है, इसलिए सामाजिक स्तर पर मौजूद आर्थिक विषमता को चुनौती देने की बात उसके मन में ही नहीं आती। परिवार में पुरुष और स्त्री के बीच जो असमान संबंध होता है वह असमान संबंध समाज में पुरुषों के बीच भी कायम रहता है। जब स्त्री अपनी दिखाई पड़ने वाली जंजीरों से आजाद हो जाएगी तब पुरुष भी अपनी न दिखने वाली जंजीरों से मुक्त हो सकेगा, लेकिन यह समस्या का पूरा हल नहीं है। पूरा हल इसलिए नहीं है कि भारत में संपत्ति है कितने परिवारों के पास? अधिकांश स्ति्रयां अपने पुरुषों की दरिद्रता में ही साझा कर रही हैं। इसलिए योजना आयोग के इस प्रस्ताव से जो सुविधा उच्च और मध्य वर्ग को मिल जाएगी, वह गरीब परिवारों तक नहीं पहुंचेगी। इसलिए योजना बना कर बड़े पैमाने पर संपत्ति का निर्माण और उसका साझा वितरण ही नए समाज की नींव बन सकता है। व्यापक समस्याओं के आंशिक समाधान नहीं होते।

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