भूख और कुपोषण पर रिपोर्ट हंगामा जारी करते हुए, जो कुछ गैरसरकारी संगठनों (एनजीओ) तथा नैगम कम्पनियों द्वारा कराए गए सव्रे पर आधारित है, प्रधानमंत्री ने पछतावे के स्वर में कहा, कुपोषण की समस्या, राष्ट्रीय शर्म का विषय है। बेशक, यह राष्ट्रीय शर्म का विषय है। लेकिन जैसी कि उम्मीद की जा सकती थी, इस मौके पर प्रधानमंत्री अपनी ही सरकार के इस आशय के हवाई दावों पर चुप ही लगा गए कि भारत ने एक उदित अर्थव्यवस्था का दर्जा हासिल कर लिया है। प्रधानमंत्री जी, अपने शुरू किए कथित आर्थिक सुधारों के 20 वर्ष की तथाकथित भव्य कामयाबियों पर भी चुप लगा गए। याद रहे कि अब तक तो पूरे देश को यही समझाने की कोशिशें की जाती रही थीं कि इन कामयाबियों से हमारे देश की जनता की जिंदगी खुद ब खुद बेहतर हो जाने वाली है। लेकिन खुद प्रधानमंत्री द्वारा जारी की गई रिपोर्ट तो यही बता रही थी कि हमारे देश में 5 वर्ष से कम आयु के 42 फीसद बच्चे अपनी आयु के लिहाज से सामान्य से काफी कम वजन के हैं और 59 फीसद बच्चे मठुराए हुए यानी अपनी आयु के लिहाज से काफी कम लंबाई के हैं। 2011 के दौरान, देश के 112 ग्रामीण जिलों में यह सव्रे किया गया है, जिनमें देश के करीब 20 फीसद बच्चे रहते हैं। इनमें 100 जिले यूनीसेफ द्वारा 2009 में विकसित बाल विकास सूचकांक में सबसे नीचे के पायदान के जिलों में से लिए गए थे।
चौंकाने वाले नहीं पीएम के खुलासे
हालांकि, प्रधानमंत्री का स्वर ऐसा था, जैसे वे देश को कोई बहुत ही चौंकाने वाले जानकारी दे रहे हों, वास्तव में सव्रेक्षण के इन नतीजों में नया कुछ भी नहीं है। खुद सरकार की अपनी एजेंसियां, जिनके अध्ययन का दायरा मौजूदा अध्ययन से कहीं व्यापक है, पहले ही यह साबित करती रही हैं कि मौजूदा नव-उदारवादी आर्थिक सुधारों ने, जो अब से दो दशक पहले तत्कालीन वित्त मंत्री की हैसियत से मनमोहन सिंह ने ही शुरू किए थे, हमारे एक देश में दो देशों का निर्माण करने का ही काम किया है और इन दो देशों के बीच आर्थिक खाई चौड़ी से चौड़ी ही होती गई है। आइए ! हम कुछ सरकारी एजेंसियों की ही आधिकारिक रिपोटरे पर एक नजर डाल लें। गरीबी के आकलनों से जुड़े विवादों को अगर हम कुछ देर के लिए उठाकर परे भी रख दें, तब भी योजना आयोग द्वारा पिछले ही दिनों जारी की गई मानव विकास रिपोर्ट ही यह दिखाती है कि करीब 31 करोड़ भारतवासी, आधिकारिक रूप से परिभाषित गरीबी की रेखा के नीचे जी रहे हैं। यह भी कि खुद सरकारी आंकड़ों के ही अनुसार, 1973-74 से लगाकर अब तक, इस संख्या में सिर्फ 1 करोड़ 90 लाख की कमी हुई है। गरीबी के आकलनों की घोर अपर्याप्तता को अगर भूल भी जाएं तब भी, हालात कितने दयनीय हैं; इनका पता इस तथ्य से लगता है कि 1983 से 2005 के बीच, कैलोरी (काबरेहाइड्रेट) आहार तथा दालों (प्रोटीन) के औसत प्रति व्यक्ति उपभोग में, ग्रामीण इलाकों में पूरे 8 फीसद की और शहरी इलाकों में 3 फीसद की गिरावट ही दर्ज हुई है। भूख के पहलू से हालात किस कदर चिंताजनक हैं, इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि पूरे देश में एक भी राज्य नहीं है, जहां गरीबी का आंकड़ा 10 फीसद से नीचे हो। भारत में तीन वर्ष से कम आयु के आधे बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, जो उप- सहारावी अफ्रीकी देशों से भी बदतर हैं। आधे बच्चों का पूर्ण टीकाकरण तक नहीं हुआ है और इसके चलते उनमें कितने ही ऐसी बीमारियों के चलते काल के गाल में समा जाते हैं, जिन्हें पूरी तरह से रोका जा सकता है। जहां तक देश की जनता के लिए स्वास्थ्य-सुविधाओं का सवाल है, स्वास्थ्य पर हमारे देश का कुल खर्च, जिसमें सार्वजनिक तथा निजी, हर तरह के खच्रे शामिल हैं, सकल घरेलू उत्पाद के हिस्से के तौर पर, समूचे अफ्रीका के खच्रे के अनुपात से भी कम है। स्वतंत्रता के साठ साल बाद भी, हमारे यहां सफाई आदि की व्यवस्था की हालत दयनीय है और करीब 50 फीसद घरों में शौचालय तक नहीं हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सव्रे (एनएफएचएस)-3 में, जो छह वर्ष के अंतराल पर किया गया था, एनएफएचएस-2 में दर्ज हालात के मुकाबले, बहुत ही चिंताजनक गिरावट दर्ज की गई थी। 6 से 35 वर्ष तक आयु के बच्चों में, खून की कमी के शिकार बच्चों का हिस्सा 74.2 फीसद से बढ़कर 79.2 फीसद हो गया। 15 से 49 वर्ष तक आयु की विवाहिताओं के लिए, यही अनुपात 51.8 से बढ़कर 56.2 फीसद हो गया। इसी आयु वर्ग में गर्भवती महिलाओं के मामले में खून की कमी की शिकार महिलाओं का अनुपात 49.7 फीसद से बढ़कर 57.9 फीसद हो गया। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सव्रे-3 के ही अनुसार तीन वर्ष से कम आयु के 38.4 फीसद बच्चे मठुराए हुए यानी अपनी आयु के लिहाज से काफी कम लंबे हैं और 46 फीसद बच्चे अपनी आयु के मुकाबले काफी कम वजन के हैं। इस आयु श्रेणी के 79.2 फीसद बच्चे खून की कमी के शिकार हैं। हमारे देश में माताओं और बच्चों की ऐसी हालत है!
जीवन-जीविका के स्तर से जुड़ा कुपोषण
तमाम रिपोर्टे इसी तथ्य की पुष्टि करती हैं कि हमारे बच्चों का स्वास्थ्य, उनके परिवारों के जीवन तथा जीविका के स्तर से सीधे-सीधे जुड़ा हुआ है। ऊंची वृद्धि दर की पटरी पर देश को दौड़ाने के सारे शोर-शराबे के बावजूद, राष्ट्रीय नमूना सव्रेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के आकलन के अनुसार हमारे देश में बेरोजगारी की दर, 2007 के 2.8 फीसद के स्तर से तेजी से बढ़कर, 2009-10 में 9.4 फीसद पर पहुंच गई। यहां तक कि जो रोजगारशुदा दर्ज किए गए हैं, उनमें से भी सिर्फ 16 फीसद का काम नियमित वेतन देता है जबकि 43 फीसद तथाकथित स्वरोजगार में लगे हुए हैं और 39 फीसद एकदम अस्थायी (कैजुअल) श्रमिक हैं। बहरहाल, हंगामा रिपोर्ट के बहुत ही विवादास्पद निष्कर्ष को पकड़कर कि 2004 से 2011 के बीच, कम वजन के बच्चों का अनुपात 53 फीसद से घटकर 42 फीसद पर आ गया है, प्रधानमंत्री यह दावा करते हैं, पिछले सात साल में कुपोषण में 20 फीसद की यह गिरावट, एनएफएचएस-3 में प्रदर्शित गिरावट की दर से बेहतर है। बहरहाल, इसके साथ ही वह यह भी जोड़ते हैं, मुझे जिस चीज की चिंता है और जिसकी चिंता सभी जागरूक नागरिकों को होनी चाहिए, वह यह है कि हमारे देश के 42 फीसद बच्चे अब भी सामान्य से कम वजन के हैं। यह अस्वीकार्य रूप से ऊंची दर है। यह विडंबनापूर्ण है कि भारत के सामने पोषण संबंधी चुनौतियों से संबंधित राष्ट्रीय परिषद के अध्यक्ष, खुद प्रधानमंत्री जी ही हैं। इस समस्या से निपटने के लिए जो अनेकानेक कदम सुझाए गए हैं, उनमें एक कदम समेकित बाल विकास परियोजना (आइसीडीएस) का सार्वभौम बनाया जाना भी है। इसके बावजूद, सरकार इस क्षेत्र की उपेक्षा करना जारी रखे हुए है और उसने देश में आइसीडीएस को सार्वभौम बनाने के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधनों का वितरण तक नहीं किया है। भारत, अपने सकल घरेलू उत्पाद का एक फीसद से भी कम सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च करता है जो कि दयनीय है। वास्तव में 22,300 करोड़ रुपये के स्वास्थ्य बजट के दयनीय आंकड़े से, आठ गुना बड़ा तो 2-जी घोटाला ही था।
प्राथमिक स्वास्थ्य बने सार्वभौम
अगर प्रधानमंत्री वाकई देश के भविष्य की इस दयनीय तस्वीर को बदलना चाहते हैं तो सबसे पहला काम तो प्राथमिक स्वास्थ्य रक्षा को सार्वभौम बनाना ही होना चाहिए। इसके लिए हमारे सकल घरेलू उत्पाद का कम से कम 3 फीसद स्वास्थ्य रक्षा पर खर्च करने की जरूरत होगी। लेकिन इससे कहीं कई गुनी राशि तो सरकार इस समय अपने वैध कर दावों में से ही माफ कर देती है। पिछले तीन वर्षो में इस तरह छोड़ा गया कर राजस्व, पूरे 14,28,028 करोड़ रुपये का बैठता है। इसमें से 3,63,875 करोड़ रुपये तो नैगम कम्पनियों तथा धनी तबकों को कर रियायतों के रूप में ही पकड़ाए गए हैं। इसलिए, जब तक नव-उदारवादी सुधारों के मौजूदा रास्ते को नहीं छोड़ा जाता है, जो अमीर को और अमीर तथा गरीब को और गरीब बनाने का ही काम करता है, हमारी जनता के स्वास्थ्य में और इस तरह हमारे देश के ही स्वास्थ्य में कोई महत्त्वपूर्ण सुधार संभव नहीं होगा। एक देश में बसे दो देशों-भारत तथा इंडिया-के बीच की खाई को बढ़ाने वाले रास्ते को छोड़ने और संपन्न तबकों को रियायतों के जरिए पकड़ाए जाने वाले संसाधनों का सार्वजनिक निवेशों के जरिए, बहुत ही जरूरी ढांचागत सुविधाओं का निर्माण करने तथा इस क्रम में बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने की जरूरत है। इसी तरह से, जनता के जीवन स्तर तथा उसके स्वास्थ्य में सुधार किए जा सकता है ताकि हम एक बेहतर भारत का निर्माण कर सकें।
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