भूख और कुपोषण पर एक सव्रे रिपोर्ट ने देश के विकास के तिलस्म को चूर-चूर कर दिया। रिपोर्ट के नतीजों ने देश के आलाकमान की नींद उड़ा दी है। यहां तक कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को स्वीकार करना पड़ा कि देश में भुखमरी और कुपोषण की स्थिति चिंताजनक है। जिन 100 जिलों को केंद्रित किया गया, वे थे-बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश। इन राज्यों के जिलों में पाया गया कि 40 प्रतिशत बच्चों का वजन कम था यानी वे अंडरवेट थे और 60 प्रतिशत का कद सामान्य से कम था यानी उनका विकास रुका हुआ था। कम आय वाले, यानी गरीब परिवारों में कुपोषण अधिक पाया गया और इनमें भी मुस्लिम, अनुसूचित जाति व जनजाति वाले परिवारों में पोषण के संकेतक काफी चौंकाने वाले थे। हम जानते हैं कि बाल कुपोषण को मापने का एक महत्त्वपूर्ण आधार है जन्म के समय शिशु का वजन तो यह भी पाया गया कि 50 प्रतिशत वच्चों का वजन जन्म के समय 2.5 किलो से कम था और यह कि 92 प्रतिषत् माताओं को कुपोषण के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी। कुछ और नतीजे भी सामने आए, मसलन कन्याओं के प्रति लापरवाही का रुख रहता है, साथ ही उन्हें बाल्यावस्था में पोषण का जो भी लाभ मिलता है, वह उम्र के साथ पलट जाता है। कुछ राज्यों में जन्म के समय कम वजन वाले शिशुओं का प्रतिशत इस प्रकार है-
सरकारी दावा था कि पिछले 7 वष्रों में बाल कुपोषण में 20.3 प्रतिशत कमी आई है। फिर भी आंकड़े बताते हैं कि कम वजन वाले वच्चे 42 प्रतिशत हैं और कम कद वाले 59 प्रतिशत; इनमें भी आधे बौने हैं। एक और तथ्य सामने आया कि निरक्षर माताओं के बच्चों में कम वजन वालों की संख्या अधिक थी-लगभग 45 प्रतिशत जबकि 10 साल तक शिक्षा प्राप्त माताओं में यह तादाद घटकर 27 प्रतिशत हो गई
तो पूरा हो चुका सहस्रब्दि विकास लक्ष्य
इस रिपोर्ट का जिक्र प्रधानमंत्री के भाषण में महत्व ग्रहण कर गया क्योंकि भारत को सहस्रब्दि विकास लक्ष्य को हासिल करना है और अभी हम काफी पीछे चल रहे हैं। सिंह ने अपने भाषण में कहा-‘हमारे देश में 6 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों की संख्या 6 करोड़ है और हमारी अर्थव्यवस्था और हमारे समाज के स्वास्थ्य की कुंजी इस पीढ़ी के हाथ में है। उन्हें स्वीकारना पड़ा, ‘हमारे देश में कुपोषण की समस्या राष्ट्रीय शर्म का विषय है’। फिर क्या यह हैरानी की बात नहीं कि गरीबी और भूख से लड़ने के लिए जो खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित किया जाना था, उसके लिए इच्छाशक्ति का अभाव ही नहीं दीखा बल्कि विधेयक पोषण की समस्या को छूता तक नहीं है। क्या इस बात को नजरअंदाज किया जा सकता है कि 7 वर्षों के अंतराल में प्रत्येक पांच बच्चों में से केवल एक बच्चा स्वस्थ वजन तक पहुंच सका। प्रधानमंत्री आगाह करते हैं कि इस समस्या का समाधान केवल आईसीडीएस पर निर्भर रहकर नहीं हो सकता बल्कि ‘नीति निर्माताओं और योजनाओं को लागू करवाने वालों को तमाम मसलों के अंतरसंबंधों को समझना होगा, मसलन शिक्षा और स्वास्थ्य, साफ-सफाई, पेय जल और पोषण के आपसी संबंधों को।’
खाद्यान्न सुरक्षा में दें पोषण को महत्त्व
पर प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक वितरण पण्राली को व्यापक बनाने, कृषि के विकास को पोषण से जोड़ने, मिड-डे मील योजना और आईसीडीएस को मजबूत करने या फिर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को गरीबों की पहुंच में लाने के बारे में कुछ भी नहीं कहा और न ही खाद्य सुरक्षा विधेयक में पोषण के पक्ष को महत्त्व देने के बारे में चर्चा की। वे कहते हैं कि स्वस्थ रखने योग्य स्वास्थ्य पर केंद्रित करने से कुछ हासिल नहीं होगा। यह सच है कि बीमारी से बचाव महत्त्वपूर्ण है पर क्या यह संभव होगा, जब देश में एनएचआरएम और जननी सुरक्षा योजना में व्यापक भ्रष्टाचार दिखाई पड़ा है, यहां तक कि बड़े-बड़े घोटाले तक सामने आए हैं पर कोई ऑडिट की व्यवस्था नहीं की गई है। उत्तर प्रदेश में हज़ारों करोड़ रुपयों का घोटाला सामने है। मनमोहन जी का वादा कि 200 चुनिंदा जिलों में वे ‘मल्टीसेक्टोरल’ योजनाएं लागू करवाएंगे और कुपोषण के खिलाफ पूरे देश में अभियान चलवाएंगे; आकषर्क जरूर है पर जमीनी सचाई घोषणाओं से काफी दूर होती है। यह सूरत तब तक नहीं बदलेगी जब तक योजनाओं को लागू करने वाली एजेंसियों पर लापरवाही के बदले सख्त कानूनी सजा़ की नीति नहीं अपनाई जाती और लाभार्थियों के कानूनी अधिकार नहीं बढ़ाए जाते। इस बात का सबूत हमको आंकड़ों में मिलता है, मसलन 6 सबसे अच्छे बाल-विकास सूचकांक वाले जिलों में भी 33 प्रतिशत कम वजन वाले और 43 प्रतिशत कम कद वाले बच्चे पाए गए। आंगनवाड़ी स्कीम के बावजूद भारतीय महिलाओं का एक-तिहाई हिस्सा कम वजन वाला और आधे से अधिक हिस्सा, लगभग 56 प्रतिशत रक्ताल्पता से ग्रस्त पाया गया। 80 प्रतिशत बच्चे भी रक्ताल्पता से पीड़ित पाए गए। यदि भारत इसी रफ्तार से विकास करता रहा तो उसे मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स को हासिल करने में अभी 32 वर्ष और लगेंगे। देश के 8.2 की जीडीपी दर को देखते हुए क्या यह हमारे लिए अशोभनीय नहीं है ?
कृषि को वैीकरण से मुक्त कीजिए
कृषि विकास का प्रश्न हमारे देश के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि ग्रामीण आय का 50 प्रतिशत कृषि क्षेत्र से आता है और हमने पहले ही कहा है कि आय से पोषण का गहरा ताल्लुक है। महिला श्रमिकों का 80 प्रतिशत हिस्सा भी कृषि क्षेत्र में कार्यरत है। इसलिए उनकी स्थिति को बदले बिना बच्चों के बेहतर पोषण की गारंटी करना संभव नहीं है। पर कृषि पर वैीकरण का ऐसा कुप्रभाव पड़ा है कि साल भर इस क्षेत्र में काम मिल पाना संभव नहीं है। कृषि में जो परिवर्तन किए जा रहे हैं, वे न ही आम किसान के हक में हैं, न ही खेतिहर मजदूर के और न ही खाद्यान्न के उपभोक्ताओं के हित में। निर्यात के लिए नकदी फसल उत्पादन पर अधिक जोर है और बड़ी परियोजनाओं, विशेष आर्थिक क्षेत्रों और बांधों व पर्यटन केंद्रों आदि के लिए कृषि भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है। इस संदर्भ में क्या कानूनी परिवर्तन होंगे यह अभी देखना बाकी है। दूसरी ओर, कृषि लागत सामग्री पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष व वि वैंक के इशारे पर सब्सिडी घटाई जा रही है, जिसके चलते कृषि न ही व्यवहार्य न लाभकर साबित हो रहा है। क्रेडिट कार्ड देकर और गाहे-बगाहे उनके कर्ज माफ करके किसानों की खुदकुशी पर रोक नहीं लगाई जा सकती। जहां गेहूं-चावल के स्टाक सड़ जाते हैं, कुपोषण का मुकाबला करने के लिए दाल, दूध, अंडे और मांस की खपत बढ़ानी चाहिए पर इनका उत्पादन ही जरूरत से कम रह जाता है। सार्वजनिक वितरण पण्राली भी इन वस्तुओं का वितरण नहीं करती। राशन पण्राली को व्यापक बनाने की जगह उसे टाग्रेटेड बनाकर व बीपीएल सूची को छोटे से छोटा बनाने की नित नई तरकीबों से गरीबी के आंकड़ों को छिपाया जा रहा है। महिला उत्पादकों को सशक्त बनाने की जगह उन्हें स्वयं सहायता समूहों की सदस्यता देकर अधिकारों से वंचित और व्यापक भ्रष्टाचार का शिकार बनाया जा रहा है। यही नहीं मनरेगा के जरिये ग्रामीण रोजगार में जिस तरह इज़ाफा हो सकता है, उसे भी सीमित करने की नीति बनाई जा रही है। यदि हम कुपोषण और भुखमरी के अन्य कारकों को देखें तो समझ सकेंगे कि वृहद् संरचनात्मक मुद्दे भी मुंह बाएं हल तलाश रहे हैं-मसलन गैरबराबरी-सामाजिक या लैंगिक व आर्थिक, निम्न जीवन स्तर, शिक्षा और स्वास्थ्य का निजीकरण, रोजगार का अभाव, श्रम की कठोर व विपरीत स्थितियां, विस्थापन, भूमि सुधार न होना आदि। ऐसे में गरीब जनता स्थायी विपन्नता के कुचक्र में फंस जाती है, जिससे निकल पाना आसान नहीं होता। अनूसूचित जाति व जनजाति के लोग इसके सबसे अधिक शिकार होते हैं। विपन्नता का सीधा प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है और अस्वस्थ माताओं के बच्चे भी स्थायी गरीबी के कुचक्र में जकड़ जाते हैं, क्योंकि उनकी उत्पादन क्षमता कम हो जाती है। यह भी देखा गया है कि ग्रामीण इलाकों में कृषि मजदूर व शहरी क्षेत्रों में अस्थायी श्रमिक सबसे कम आय में जीवनयापन को बाध्य होते हैं। ऐसे परिवारों को केंद्र में रखकर नीति निर्माण पर बल देना होगा वरना आंकड़ों की जादूगरी देश को विकास के रास्ते पर नहीं ले जा सकेगी।
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