देर आए दुरुस्त आए हमारे यहां पुरानी कहावत है। संभवत: इसी पर चलते हुए सरकार की ख्वाहिश है कि अब सरकारी बाबुओं के कामकाज की समीक्षा होगी। सरकारी समीक्षा की कसौटी पर जो कमजोर साबित होंगे, उनकी सेवा समाप्त कर दी जाएंगी। हाल के दौर में जिस तरह से शीर्ष सरकारी बाबुओं के भ्रष्टाचार में आकंठ डूबने से लेकर अपने राजनीतिक आकाओं के लिए किसी भी हद तक जाने के मामले सामने आ रहे हैं, आम पब्लिक के साथ-साथ सरकार भी इससे हलकान है। दरअसल, लोकतंत्र में जो कानून संसद बनाती है या जिन कल्याणकारी योजनाओं को वह लेकर आती है, उन्हें लागू करने का दायित्व इन्हीं बाबुओं पर होता है। पर 2जी घोटाले में तिहाड़ जेल की हवा खा रहे पूर्व टेलीकॉम सेके्रटरी सिद्धार्थ बेहुरा से लेकर मध्य प्रदेश के आइएएस दंपती और कई अन्य आला अफसरों ने जिस तरह से अपने पद का दुरुपयोग करके धन अर्जित किया, उससे साफ है कि हमारे यहां नौकरशाह बेलगाम होते जा रहे हैं। मध्य प्रदेश के आइएएस जोशी दंपती के ठिकानों पर छापेमारी में करीब 250 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्ति का पता चला है। इस रोशनी में सरकार का बाबुओं के कामकाज पर नजर रखने का कोई भी स्वागत करेगा। पर इसी व्यवस्था में कुछ ऐसे भी नौकरशाह हुए हैं, जिनकी मिसाल दी जाती है। ऐसे एक डिप्लोमेट थे एके दामोदरन, जिनका कुछ हफ्ते पहले ही दिल्ली में निधन हो गया। 1953 बैच के आइएफएस अफसर रहे दामोदरन ने ही भारत और सोवियत संघ के बीच वर्ष 1971 हुई ऐतिहासिक संधि का मसौदा तैयार किया था। आजादी के बाद भारत की विदेश नीति की रूपरेखा को दिशा देने में दामोदरन की अहम भूमिका थी। हालांकि उन्होंने अपनी लंबी सरकारी सेवा के दौरान तमाम प्रधानमंत्रियों और दूसरे अहम मंत्रियों के साथ काम किया, पर उन्हें कभी किसी का आदमी नहीं माना गया। अगर वर्तमान की बात करें तो अब दामोदरन, जेएन दीक्षित, जगमोहन, पीए हक्सर, बीके नेहरू जैसे बेहतरीन नौकरशाहों का टोटा शिद्दत के साथ महसूस हो रहा है। अब सिविल सेवा के माध्यम से आए तमाम आला अफसर नौकरी पर रहते हुए ही किसी बड़े नेता के खासम-खास बन जाते हैं, जिससे कि रिटायर होने के बाद भी उन्हें कोई बढि़या-सी पोस्टिंग मिल जाए। कुछ ऐसे भी अफसर हैं, जो सेवा में रहते हुए ही किसी दल विशेष का आदमी बनने का गौरव हासिल करके अपने बाकी भविष्य को सुरक्षित कर लेते हैं। उदाहरण के तौर पर पंजाब में पिछले महीने हुए विधानसभा चुनावों में शिरोमणि अकाली दल ने प्रदेश के पूर्व डीजीपी परमदीप सिंह गिल और राज्य के पूर्व सचिव दरबारा सिंह गुरु को टिकट देकर उनके अहसानों का बदला चुकाया। कहने की जरूरत नहीं है कि गिल और गुरु को अकाली दल ने यह सौगात क्यों दी होगी। अकालियों ने भी इनके अहसानों का ख्याल रखते हुए उन पार्टी कार्यकर्ताओं को टिकट नहीं दिया, जो सालों-दशकों से पार्टी की खिदमत कर रहे थे या जो पार्टी के नेताओं की सभाओं में दरियां बिछाते थे। हालांकि कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने अपने प्रचार के दौरान शिरोमणि अकाली दल की निंदा की कि उसने दो अफसरों को अपने पाले में इसलिए लिया, क्योंकि वे उसकी सेवा कर रहे थे। पर सच्चाई यह है कि पंजाब और महाराष्ट्र पुलिस के डीजीपी रहे जीएस विर्क कांग्रेस की तरफ से टिकट की चाहत रखते थे। वह अमरिंदर सिंह के खासम-खास हैं। यह बात दीगर है कि पार्टी ने उन्हें उपकृत नहीं किया। विर्क को दोनों प्रदेशों का डीजीपी रहने का अवसर मिला है। सीमा सुरक्षा बल के पूर्व डीजीपी प्रकाश चंद्रा ने अपने एक हालिया इंटरव्यू में कहा कि जब तक सरकार की तरफ से इस तरह का कोई कठोर नियम नहीं बनाया जाता कि भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के अफसर सेवा से मुक्त होने के कम से कम तीन-चार साल तक किसी पार्टी या कॉरपोरेट घराने से नहीं जुड़ेंगे, तब हमारे यहां गिल और गुरु सरीखे अफसर सामने आते रहेंगे। चंद्रा मानते हैं कि अब अफसर पैसे कमाने को लेकर इतने व्याकुल रहते हैं कि वे अपने मूल काम की अनदेखी करते हुए बड़े नेताओं की सेवा में लगे रहते हैं। जाहिर है यह गंभीर स्थिति है। यहां बात सिर्फ आला अफसरों के सियासत की दुनिया में आने तक ही सीमित नहीं है। ये अफसर कॉरपोरेट दुनिया में भी जा रहे हैं। दो साल पहले भारत सरकार के वित्त सचिव पद पर आसीन एक वरिष्ठ आइएएस अफसर ने रिटायर होने के चंद माह बाद ही एक बड़ी ऑटो कंपनी के सीईओ के पद को संभाल लिया। जाहिर है, उन्होंने उस ऑटो कंपनी की भरपूर सेवा की होगी, तब ही तो उन्हें इतने बड़े ओहदे पर रखा गया। भारत की एक प्रमुख रीयल एस्टेट कंपनी ने भी कुछ साल पहले एक वरिष्ठ आइएएस अफसर को अपने यहां बड़े पद पर रखा। कहने वाले दावा करते हैं कि उन सज्जन को सालाना दो करोड़ रुपये पगार मिलती थी। जाहिर है, हमें या किसी को इस बात से रत्ती भर भी लेना-देना नहीं है कि किसी को कितनी पगार मिलती है। सवाल तो नैतिकता का है। इस सवाल का तो जवाब उन तमाम अफसरों को देना होगा, जो सेवा में रहते हुए किसी खास नेता, राजनीतिक जमात या कॉरपोरेट घराने के लिए खुलकर काम करने लगते हैं। बदले में उन्हें इनसे रेवडि़यां मिलती हैं। कभी नौकरशाह रहे यशवंत सिन्हा और अजीत जोगी ने तो अपनी सेवा से रिटायर होने का फैसला तभी कर लिया, जब इन्हें रिटायर होने में 10-15 साल शेष थे। 1960 बैच के आइएएस अफसर यशवंत सिन्हा ने 1984 में सरकारी नौकरी को छोड़कर जनता पार्टी का दामन थामा। आइपीएस और आइएएस रहे अजीत जोगी ने भी अपने करियर के शिखर पर रहते हुए सरकारी नौकरी को छोड़कर राजनीति करने का फैसला किया। वह संभवत: पहले और एक मात्र आइएएस अफसर हैं, जो किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। देश के किसी भी अन्य नागरिक की तरह इन्हें भी किसी भी पेशे को चुनने का अधिकार है। इन्होंने किसी पार्टी में शामिल होकर कोई गलत नहीं किया। इन्होंने रिटायर होने से कुछ साल या महीने पहले नौकरी नहीं छोड़ी। भारत की सबसे बड़ी बिजली उत्पादन कंपनी एनटीपीसी के भी एक सीएमडी ने हाल के सालों में रिटायर होने के कुछ ही समय के बाद निजी क्षेत्र की बिजली उत्पादन करने वाली कंपनी में शीर्ष पद पर नौकरी कर ली। भले ही उन्होंने उस कंपनी को एनटीपीसी में रहते हुए कोई लाभ नहीं पहुंचाया हो, पर इस बात को मानेगा कौन। लंबे समय तक गांधी-नेहरू परिवार के करीबी रहे नटवर सिंह सेवा में रहते हुए आइएफएस अफसर से अधिक देश के पहले राजनीतिक परिवार के प्रति अपनी निष्ठा साबित करते थे। कहने वाले तो कहते हैं कि 1953 बैच के आइएफएस अफसर नटवर सिंह को गांधी-नेहरू परिवार से घनिष्ठता के चलते हमेशा बेहतर पोस्टिंग मिलती रही। जनता पार्टी के शासनकाल के दौरान उनके सितारे गर्दिश में आए, क्योंकि तब प्रधानमंत्री बने मोराजी देसाई उन्हें कसते रहते थे। उन्होंने जनता पार्टी के शासनकाल में अपनी परेशानियों के संस्मरण हाल ही में एक अंग्रेजी दैनिक में लिखे थे। अपने लाभ के लिए सियासत का रुख करने वाले अफसरों पर लगाम लगाने के लिए एक सुझाव यह भी आ रहा है कि इन्हें खुद ही रिटायर होने के बाद तीन साल बाद तक किसी पार्टी या कॉरपोरेट घराने से नहीं जुड़ना चाहिए। बेशक, यह सुझाव तो काम का है। पर बड़ा सवाल यह है कि इसे मानेगा कौन? वैसे भी अब दामोदरन जैसे बुद्धिमान और साफ-सुथरी छवि वाले अफसर की किसे जरूरत है। हताशा के इस माहौल में उम्मीद की किरण इसलिए नजर आ रही है कि अब सरकार को समझ आ गया है कि बिना इन अफसरों पर नजर रखे बात नहीं बनेगी। इसीलिए उसने उन अफसरों को स्थायी रूप से सेवा से रिटायर करने का मन बना लिया है, जो अपने दायित्वों का निर्वाह करने के मामले में कमजोर साबित होंगे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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