देश में भ्रष्टाचार सचमुच बढ़ गया है, तभी तो प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे। भ्रष्टाचारियों को बख्शा नहीं जाएगा। इस दिशा में सरकार ने सख्त कदम उठाने के संकेत दिए हैं। मसलन, हर तीन वर्ष बाद सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के कार्यो की समीक्षा की जाएगी। इसके अलावा अगर वे बार-बार अपने कार्य को सही रूप से अंजाम देने में पीछे रहते हैं तो उन्हें 15 वर्ष पहले ही सेवानिवृत्त किया जा सकता है। यह एक सराहनीय कदम है, पर इस पर सख्ती से अमल हो, तभी यह कारगर सिद्ध होगा। वैसे देखा जाए तो भ्रष्टाचार हमारी देन है ही नहीं। यही वजह है कि देश के नेता इससे निपटने में अक्षम साबित हो रहे हैं। यह तो अंग्रेजों से हमें विरासत में मिला है। आज अगर देश की जनता अपना सही काम करवाने के लिए भी रिश्वत का सहारा लेती है तो उसके पीछे बेशुमार अधिकार के स्वामी देश के सरकारी अधिकारी, कर्मचारी और नेता हैं। रिश्वत न देने वाले आम आदमी को परेशान करने के लिए इनके पास इतने अधिकार हैं कि वह अपने सही काम को कराने के लिए लाख एडि़यां रगड़ ले, उसका काम कभी नहीं होगा। इस दौरान वह कई नियम-कायदों से बंधा होगा, लेकिन रिश्वत देते ही वह सारे कायदों से मुक्त हो जाता है। यह देश की विडंबना है। हमारे देश में भ्रष्टाचार कितना फैल चुका है, यह जानने के लिए किसी सर्वेक्षण की जरूरत नहीं है। इसके लिए तो अमेरिका की गेलप नामक कंसल्टेंसी फर्म की रिपोर्ट ही पर्याप्त है। इसने भारत में फैले भ्रष्टाचार के मामले पर एक सर्वेक्षण किया, जिसमें देश के विभिन्न शहरों के करीब छह हजार लोगों से बात की। 47 प्रतिशत लोगों ने माना कि देश में भ्रष्टाचार एक महामारी की तरह फैल गया है। यह स्थिति पिछले 5-10 वर्ष पहले से ज्यादा गंभीर है। अन्य 27 प्रतिशत लोगों ने भ्रष्टाचार को एक गंभीर समस्या निरुपित किया। इन लोगों का मानना था कि 5 साल पहले भी यही स्थिति थी। हाल ही में अन्ना हजारे के आंदोलन को जिस तरह से लोगों ने अपना नैतिक समर्थन दिया, उससे यह स्पष्ट है कि देश का आम आदमी इस भ्रष्टाचार से आजिज आ चुका है। देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने के लिए अब वह उथल-पुथल के मूड में दिखाई दे रहा है। इस सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि देश के 78 प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि भ्रष्टाचार सरकारी तंत्र में अधिक फैला हुआ है। 71 प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि देश के उद्योगपति भी भ्रष्टाचार के लिए जवाबदार हैं। टाइम मैग्जीन कि सर्वे के अनुसार, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में लिप्त ए. राजा को विश्व को दूसरा सबसे बड़ा भ्रष्टाचारी माना है। इसके पहले कॉमनवेल्थ गेम्स का जो घोटाला सामने आया, उसने देश के नागरिकों की सहिष्णुता को एक तरह से खत्म ही कर दिया। टेलीकॉम घोटाले ने उस पर अपनी मुहर ही लगा दी। भारतीय जनता यह मानती है कि भ्रष्टाचार के लिए सबसे बड़ा कारण सरकारी तंत्र है। गेलप के सर्वेक्षण के मुताबिक भ्रष्टाचारियों को दंड देने में सरकार पूरी तरह से विफल साबित हुई है। इन भ्रष्टाचारियों से सबसे अधिक परेशान बेरोजगार युवा हैं। 21 प्रतिशत नागरिकों ने स्वीकार किया कि वे अपने काम को करवाने के लिए रिश्वत का सहारा लेते हैं। ट्रेक डॉट इन नामक एक वेबसाइट ने भारत में भ्रष्टाचार विषय पर एक रोचक तथ्य जारी किया है। उसके अनुसार भारत में सरकारी तंत्र की रग-रग में भ्रष्टाचार व्याप्त है। नागरिकों को जिन्हें रिश्वत देनी पड़ती है, उनमें 91 प्रतिशत सरकारी अधिकारी हैं। इसमें भी 33 प्रतिशत केंद्रीय कर्मचारी हैं। 30 प्रतिशत पुलिस अधिकारी और 15 प्रतिशत राज्य के कर्मचारी हैं। दस प्रतिशत नगर पालिका, नगर निगम या ग्राम पंचायतों के कर्मचारी हैं। भारतीय प्रजा के माथे पर तीन प्रकार की गुलामी लिखी हुई है। पहली गुलामी केंद्र सरकार की, जिसमें आयकर, आबकारी, कस्टम आदि विभाग आते हैं। दूसरी गुलामी राज्य सरकार की है, जिसके हाथ में बिक्रीकर, शिक्षा, स्वास्थ्य और पुलिस विभाग आते हैं। तीसरी गुलामी स्थानीय संस्थाओं की है, जिसके पास पानी, गटर, जमीन, मकान, संपत्ति कर आदि दस्तावेज बनाने के अधिकार हैं। इस तीन प्रकार की संस्थाओं को इतने अधिक अधिकार प्रदान किए गए हैं कि वे प्रजा को कायदा-कानून बताकर इतना अधिक डरा देते हैं कि न चाहते हुए भी प्रजा को रिश्वत देनी ही पड़ती है। वास्तव में अधिकारियों को मिलने वाले असीमित अधिकारों पर अंकुश लगाया जाए तो शायद देश भ्रष्टाचारमुक्त हो सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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Monday, February 27, 2012
कैसे सुधरे हमारी नौकरशाही कैसे सुधरे हमारी नौकरशाही कैसे सुधरे हमारी नौकरशाही
देर आए दुरुस्त आए हमारे यहां पुरानी कहावत है। संभवत: इसी पर चलते हुए सरकार की ख्वाहिश है कि अब सरकारी बाबुओं के कामकाज की समीक्षा होगी। सरकारी समीक्षा की कसौटी पर जो कमजोर साबित होंगे, उनकी सेवा समाप्त कर दी जाएंगी। हाल के दौर में जिस तरह से शीर्ष सरकारी बाबुओं के भ्रष्टाचार में आकंठ डूबने से लेकर अपने राजनीतिक आकाओं के लिए किसी भी हद तक जाने के मामले सामने आ रहे हैं, आम पब्लिक के साथ-साथ सरकार भी इससे हलकान है। दरअसल, लोकतंत्र में जो कानून संसद बनाती है या जिन कल्याणकारी योजनाओं को वह लेकर आती है, उन्हें लागू करने का दायित्व इन्हीं बाबुओं पर होता है। पर 2जी घोटाले में तिहाड़ जेल की हवा खा रहे पूर्व टेलीकॉम सेके्रटरी सिद्धार्थ बेहुरा से लेकर मध्य प्रदेश के आइएएस दंपती और कई अन्य आला अफसरों ने जिस तरह से अपने पद का दुरुपयोग करके धन अर्जित किया, उससे साफ है कि हमारे यहां नौकरशाह बेलगाम होते जा रहे हैं। मध्य प्रदेश के आइएएस जोशी दंपती के ठिकानों पर छापेमारी में करीब 250 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्ति का पता चला है। इस रोशनी में सरकार का बाबुओं के कामकाज पर नजर रखने का कोई भी स्वागत करेगा। पर इसी व्यवस्था में कुछ ऐसे भी नौकरशाह हुए हैं, जिनकी मिसाल दी जाती है। ऐसे एक डिप्लोमेट थे एके दामोदरन, जिनका कुछ हफ्ते पहले ही दिल्ली में निधन हो गया। 1953 बैच के आइएफएस अफसर रहे दामोदरन ने ही भारत और सोवियत संघ के बीच वर्ष 1971 हुई ऐतिहासिक संधि का मसौदा तैयार किया था। आजादी के बाद भारत की विदेश नीति की रूपरेखा को दिशा देने में दामोदरन की अहम भूमिका थी। हालांकि उन्होंने अपनी लंबी सरकारी सेवा के दौरान तमाम प्रधानमंत्रियों और दूसरे अहम मंत्रियों के साथ काम किया, पर उन्हें कभी किसी का आदमी नहीं माना गया। अगर वर्तमान की बात करें तो अब दामोदरन, जेएन दीक्षित, जगमोहन, पीए हक्सर, बीके नेहरू जैसे बेहतरीन नौकरशाहों का टोटा शिद्दत के साथ महसूस हो रहा है। अब सिविल सेवा के माध्यम से आए तमाम आला अफसर नौकरी पर रहते हुए ही किसी बड़े नेता के खासम-खास बन जाते हैं, जिससे कि रिटायर होने के बाद भी उन्हें कोई बढि़या-सी पोस्टिंग मिल जाए। कुछ ऐसे भी अफसर हैं, जो सेवा में रहते हुए ही किसी दल विशेष का आदमी बनने का गौरव हासिल करके अपने बाकी भविष्य को सुरक्षित कर लेते हैं। उदाहरण के तौर पर पंजाब में पिछले महीने हुए विधानसभा चुनावों में शिरोमणि अकाली दल ने प्रदेश के पूर्व डीजीपी परमदीप सिंह गिल और राज्य के पूर्व सचिव दरबारा सिंह गुरु को टिकट देकर उनके अहसानों का बदला चुकाया। कहने की जरूरत नहीं है कि गिल और गुरु को अकाली दल ने यह सौगात क्यों दी होगी। अकालियों ने भी इनके अहसानों का ख्याल रखते हुए उन पार्टी कार्यकर्ताओं को टिकट नहीं दिया, जो सालों-दशकों से पार्टी की खिदमत कर रहे थे या जो पार्टी के नेताओं की सभाओं में दरियां बिछाते थे। हालांकि कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने अपने प्रचार के दौरान शिरोमणि अकाली दल की निंदा की कि उसने दो अफसरों को अपने पाले में इसलिए लिया, क्योंकि वे उसकी सेवा कर रहे थे। पर सच्चाई यह है कि पंजाब और महाराष्ट्र पुलिस के डीजीपी रहे जीएस विर्क कांग्रेस की तरफ से टिकट की चाहत रखते थे। वह अमरिंदर सिंह के खासम-खास हैं। यह बात दीगर है कि पार्टी ने उन्हें उपकृत नहीं किया। विर्क को दोनों प्रदेशों का डीजीपी रहने का अवसर मिला है। सीमा सुरक्षा बल के पूर्व डीजीपी प्रकाश चंद्रा ने अपने एक हालिया इंटरव्यू में कहा कि जब तक सरकार की तरफ से इस तरह का कोई कठोर नियम नहीं बनाया जाता कि भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के अफसर सेवा से मुक्त होने के कम से कम तीन-चार साल तक किसी पार्टी या कॉरपोरेट घराने से नहीं जुड़ेंगे, तब हमारे यहां गिल और गुरु सरीखे अफसर सामने आते रहेंगे। चंद्रा मानते हैं कि अब अफसर पैसे कमाने को लेकर इतने व्याकुल रहते हैं कि वे अपने मूल काम की अनदेखी करते हुए बड़े नेताओं की सेवा में लगे रहते हैं। जाहिर है यह गंभीर स्थिति है। यहां बात सिर्फ आला अफसरों के सियासत की दुनिया में आने तक ही सीमित नहीं है। ये अफसर कॉरपोरेट दुनिया में भी जा रहे हैं। दो साल पहले भारत सरकार के वित्त सचिव पद पर आसीन एक वरिष्ठ आइएएस अफसर ने रिटायर होने के चंद माह बाद ही एक बड़ी ऑटो कंपनी के सीईओ के पद को संभाल लिया। जाहिर है, उन्होंने उस ऑटो कंपनी की भरपूर सेवा की होगी, तब ही तो उन्हें इतने बड़े ओहदे पर रखा गया। भारत की एक प्रमुख रीयल एस्टेट कंपनी ने भी कुछ साल पहले एक वरिष्ठ आइएएस अफसर को अपने यहां बड़े पद पर रखा। कहने वाले दावा करते हैं कि उन सज्जन को सालाना दो करोड़ रुपये पगार मिलती थी। जाहिर है, हमें या किसी को इस बात से रत्ती भर भी लेना-देना नहीं है कि किसी को कितनी पगार मिलती है। सवाल तो नैतिकता का है। इस सवाल का तो जवाब उन तमाम अफसरों को देना होगा, जो सेवा में रहते हुए किसी खास नेता, राजनीतिक जमात या कॉरपोरेट घराने के लिए खुलकर काम करने लगते हैं। बदले में उन्हें इनसे रेवडि़यां मिलती हैं। कभी नौकरशाह रहे यशवंत सिन्हा और अजीत जोगी ने तो अपनी सेवा से रिटायर होने का फैसला तभी कर लिया, जब इन्हें रिटायर होने में 10-15 साल शेष थे। 1960 बैच के आइएएस अफसर यशवंत सिन्हा ने 1984 में सरकारी नौकरी को छोड़कर जनता पार्टी का दामन थामा। आइपीएस और आइएएस रहे अजीत जोगी ने भी अपने करियर के शिखर पर रहते हुए सरकारी नौकरी को छोड़कर राजनीति करने का फैसला किया। वह संभवत: पहले और एक मात्र आइएएस अफसर हैं, जो किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। देश के किसी भी अन्य नागरिक की तरह इन्हें भी किसी भी पेशे को चुनने का अधिकार है। इन्होंने किसी पार्टी में शामिल होकर कोई गलत नहीं किया। इन्होंने रिटायर होने से कुछ साल या महीने पहले नौकरी नहीं छोड़ी। भारत की सबसे बड़ी बिजली उत्पादन कंपनी एनटीपीसी के भी एक सीएमडी ने हाल के सालों में रिटायर होने के कुछ ही समय के बाद निजी क्षेत्र की बिजली उत्पादन करने वाली कंपनी में शीर्ष पद पर नौकरी कर ली। भले ही उन्होंने उस कंपनी को एनटीपीसी में रहते हुए कोई लाभ नहीं पहुंचाया हो, पर इस बात को मानेगा कौन। लंबे समय तक गांधी-नेहरू परिवार के करीबी रहे नटवर सिंह सेवा में रहते हुए आइएफएस अफसर से अधिक देश के पहले राजनीतिक परिवार के प्रति अपनी निष्ठा साबित करते थे। कहने वाले तो कहते हैं कि 1953 बैच के आइएफएस अफसर नटवर सिंह को गांधी-नेहरू परिवार से घनिष्ठता के चलते हमेशा बेहतर पोस्टिंग मिलती रही। जनता पार्टी के शासनकाल के दौरान उनके सितारे गर्दिश में आए, क्योंकि तब प्रधानमंत्री बने मोराजी देसाई उन्हें कसते रहते थे। उन्होंने जनता पार्टी के शासनकाल में अपनी परेशानियों के संस्मरण हाल ही में एक अंग्रेजी दैनिक में लिखे थे। अपने लाभ के लिए सियासत का रुख करने वाले अफसरों पर लगाम लगाने के लिए एक सुझाव यह भी आ रहा है कि इन्हें खुद ही रिटायर होने के बाद तीन साल बाद तक किसी पार्टी या कॉरपोरेट घराने से नहीं जुड़ना चाहिए। बेशक, यह सुझाव तो काम का है। पर बड़ा सवाल यह है कि इसे मानेगा कौन? वैसे भी अब दामोदरन जैसे बुद्धिमान और साफ-सुथरी छवि वाले अफसर की किसे जरूरत है। हताशा के इस माहौल में उम्मीद की किरण इसलिए नजर आ रही है कि अब सरकार को समझ आ गया है कि बिना इन अफसरों पर नजर रखे बात नहीं बनेगी। इसीलिए उसने उन अफसरों को स्थायी रूप से सेवा से रिटायर करने का मन बना लिया है, जो अपने दायित्वों का निर्वाह करने के मामले में कमजोर साबित होंगे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
एनसीटीसी पर बेजा हड़बड़ी
एक ओर आतंकवाद जहां जटिल समस्या का रूप लेता जा रहा है वहीं हमारे रणनीतिकारों के पास इससे निपटने के लिए प्रभावी नीति और उस पर अमल की इच्छाशक्ति का अभाव दिखता है। इस क्रम में भारत सरकार ने अब आतंकवाद को देशव्यापी समस्या मानते हुए इससे निपटने के लिए एनसीटीसी यानी राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र के गठन का निर्णय लिया है, लेकिन इसके अमल में आने से पहले ही कई राज्यों द्वारा इसका विरोध शुरू होना कई सवाल खड़े करता है। इन सवालों में पहला सवाल यही है कि जब हमारे पास मल्टी एजेंसी सेंटर और राष्ट्रीय जांच एजेंसी जैसी संस्थाएं पहले से मौजूद हैं तो ऐसे में एक और नई एजेंसी एनसीटीसी के गठन का औचित्य क्या है? सरकार संस्थाओं के ऊपर संस्थाएं बनाती जा रही है, लेकिन इन्हें प्रभावी बनाने और जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए कोई कदम नहीं उठा रही। इसका परिणाम यह हुआ है कि हमारे पास राज्यों के पुलिस बल के अलावा दूसरे कई सशस्त्र बल और खुफिया एजेंसियां मौजूद होने के बावजूद अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही। आतंकवादी हमलों के न रुकने पर अपनी विफलता को ढकने के लिए और राजनीतिक लाभ लेने के लिए सरकार हर बार किसी न किसी नई संस्था का गठन करके जनता में संदेश देने की कोशिश करती है कि वह सतर्क है और प्रभावी उपाय किए जा रहे हैं, लेकिन वस्तुस्थिति यही है कि कहीं कुछ नहीं हो रहा होता है। यदि ऐसा होता तो इसका वास्तविक परिणाम कुछ न कुछ अवश्य दिखता। उदाहरण के तौर पर वर्ष 2001 में प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली कैबिनेट समिति ने मल्टी एजेंसी सेंटर को मंजूरी दी थी, जिसे वर्ष 2009 में गठित भी कर दिया गया, लेकिन इस संस्था के अस्तित्व में आने के तीन वर्ष बाद भी स्थिति जस की तस है। कुछ ऐसा ही हाल एनआइए यानी राष्ट्रीय जांच एजेंसी का भी है। इस क्रम में अब कहा जा रहा है कि अमेरिका की तर्ज पर हमें भी एफबीआइ जैसी संघीय पुलिस की आवश्यकता है, लेकिन हम भूल जाते हैं कि भारत की तुलना अमेरिका से नहीं हो सकती। अमेरिका की आबादी जहां करीब 31 करोड़ है वहीं भारत की आबादी 120 करोड़ से भी ज्यादा है। प्रति एक हजार आबादी पर पुलिस बलों की संख्या के मामले में भी हम अमेरिका से काफी पीछे हैं और सबसे बड़ा सवाल कि अमेरिका जितना पैसा अपनी संघीय पुलिस पर खर्च करता है, क्या हम उतना पैसा खर्च करने की स्थिति में हैं और क्या वैसे दूसरे तमाम संसाधन हमारे पास मौजूद हैं। यदि एनसीटीसी की ही बात की जाए तो इसका बजट लगभग ढाई हजार करोड़ रुपये का होगा। मेरा मानना है कि हमारे पास जो भी संस्थाएं पहले से हैं यदि उन्हें ही ठीक तरह से उपयोग किया जाए तो आतंकवाद समेत दूसरी तमाम चुनौतियों से निपटा जा सकता है। आखिर हम क्यों आइबी और रॉ को कमतर आंकने की भूल कर रहे हैं। जयपुर विस्फोट के बाद महाराष्ट्र एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे से जयपुर में मेरी मुलाकात हुई थी। उस दौरान मैंने उनसे पूछा था कि क्या अलग-अलग राज्यों में आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करने में उन्हें किसी तरह की परेशानी होती है और क्या उन्हें मिलने वाली खुफिया सूचनाएं पक्की होती हैं? इसके प्रत्युत्तर में उनका कहना था कि आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई में उन्हें अलग-अलग राज्यों से तालमेल बनाने में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होती और न ही इसमें कोई और समस्या आड़े आती है। जहां तक खुफिया सूचनाओं की बात है तो अपने नेतृत्व में सुलझाए गए कुल 13 आतंकवादी मामलों में 9 मामले आइबी की सूचना के आधार पर और 2 मामले राज्य पुलिस की मदद से और एक मामला औचक रूप से हल होने की बात उन्होंने स्वीकार की। इससे साफ है कि केंद्र सरकार द्वारा दिया जा रहा यह तर्क कि एकीकृत राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी न होने से आतंकवादियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करने में दिक्कत होती है और इसमें राज्य की पुलिस अथवा दूसरे संगठनों की मदद देर से मिलती है, एक झूठ के अलावा और कुछ नहीं। कुछ लोगों का तर्क है कि टाडा और पोटा जैसे आतंकवाद निरोधक कानून अब अस्तित्व में नहीं हैं, जिसका फायदा आतंकवादियों को मिल रहा है और वे बेधड़क अपने मंसूबों को अंजाम दे रहे हैं। मैं इससे सहमत नहीं हूं। जब ये कानून अस्तित्व में थे तो इनका उपयोग किसके खिलाफ किया गया? टाडा और पोटा के अंतर्गत आतंकवादियों से कहीं ज्यादा आम लोगों को कैद किया गया और बाद में इसका इस्तेमाल राजनीतिक दुश्मनी निकालने के लिए होने लगा। आतंकवाद के खिलाफ सिर्फ कठोर कानून बना देने से क्या होगा जब तक कि हम ऐसा प्रभावी तंत्र और राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं विकसित करते जिससे आतंकवाद का उन्मूलन हो सके। एनसीटीसी पर राज्यों के विरोध को खारिज नहीं किया जा सकता। यदि यह संस्था अस्तित्व में आती है तो राज्यों की अपनी निजी स्वतंत्रता और अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इस बात की क्या गारंटी है कि केंद्र से संचालित यह संस्था स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से काम कर पाए, जबकि दूसरी तमाम ऐसी संस्थाओं के दुरुपयोग के उदाहरण सामने हों। इनमें सीबीआइ का उदाहरण भी एक है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि सीबीआइ भी किसी राज्य में बिना संबंधित राज्य सरकार की अनुमति से जांच कार्य शुरू नहीं कर सकती। एक बार उसे जांच की अनुमति मिल जाती है तो ही वह मिले सबूतों के आधार पर किसी से पूछताछ कर सकती है, गिरफ्तारी कर सकती है और अभियोजन का काम शुरू कर सकती है, जबकि एनसीटीसी के मामले में ऐसा नहीं है। एनसीटीसी के गठन के लिए हवाला दिया जा रहा है कि गैरकानूनी गतिविधि निवारक कानून, 1967 के 43 ए के तहत केंद्र को यह अधिकार है कि वह आवश्यक महसूस होने पर देश के विभिन्न हिस्सों में किसी की भी गिरफ्तारी कर सकती है और इसके लिए राज्यों की अनुमति आवश्यक नहीं। इस कानून की यह व्याख्या सही नहीं, क्योंकि संविधान में राज्यों को केंद्र के अनुचित हस्तक्षेप से संरक्षण मिला हुआ है। यहां तक कि सीआरपीएफ अथवा अर्द्धसैनिक बलों को भी राज्यों की अनुमति के बिना तैनात नहीं किया जा सकता। जाहिर है ऐसा होने पर राज्यों के पास संघीय ढांचे को कमजोर करने और उससे छेड़छाड़ करने के लिए अदालत में जाने का रास्ता खुला हुआ है। कुल मिलाकर राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को राजनीतिक अहम का शिकार बनाया जा रहा है, जो किसी भी तरह ठीक नहीं। यह आवश्यक है कि एनसीटीसी पर तार्किक बहस के बाद आम सहमति तक पहुंचा जाए और इसके बाद ही इस पर फैसला हो। (लेखक आतंकवाद प्रतिरोधी नीतियों के विश्लेषक हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
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