Saturday, February 18, 2012

निजी हाथों में न सौंपें आईसीडीएस


यह वाकई विचित्र है कि हमारे देश में बाल कुपोषण के अस्वीकार्य रूप से ज्यादा बने रहने पर प्रधानमंत्री का विक्षोभ तभी जागा, जब एक गैर सरकारी संगठन की रिपोर्ट में इस सचाई को रेखांकित किया गया है। इससे पहले भी अनेक रिपोटरे में, जिनमें सरकारी एजेंसियों की रिपोर्टे भी शामिल हैं, इस सचाई को रेखांकित किया गया था कि सकल घरेलू वृद्धि दर के आंकड़े के विपरीत देश के स्वास्थ्य की स्थिति काफी निराशाजनक है। क्या वाकई प्रधानमंत्री को इन सचाइयों की खबर ही नहीं थी?
बाल विकास कार्यक्रम की दशा
देश में नवजात शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर, बाल कुपोषण, खून की कमी आदि के असहनीय रूप से ऊंचे स्तर पर बने रहने की समस्या से निपटने के लिए सरकार के एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में, समेकित बाल विकास परियोजना (आईसीडीएस) 1975 में एक तजुब्रे के रूप में की गई थी और इस कार्यक्रम ने अपनी कारगरता साबित की है। लेकिन सरकार समुचित वित्तीय संसाधन आवंटित करने के जरिए इस कार्यक्रम की पूरी संभावनाओं का दोहन करने के लिए जरूरी कदम उठाने में विफल ही रही है। 28 नवम्बर 2001 को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया था कि आईसीडीएस को सार्वभौम बनाया जाए और उसकी सभी सेवाएं, छह वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों को तथा सभी गर्भवती महिलाओं व नव-प्रसूताओं को मुहैया कराई जाएं। इसके बावजूद, 2004 तक तो इस मामले में संतोषजनक कुछ भी नहीं किया गया। कथित रूप से सार्वभौम बनाए जाने के बावजूद खुद सरकार के ही रिकाडरे के अनुसार, देश में छ: वर्ष से कम आयु के जो 16 करोड़ बच्चे हैं उनमें से, आधे से भी कम ही आईसीडीएस के दायरे में आते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन सेवाओं को सार्वभौम बनाने के लिए आंगनवाड़ियों की संख्या बढ़ाकर 14 लाख करने का आदेश दिया था। इनमें 1,10,000 से ज्यादा आंगनवाड़ी केंद्र तो नाकारा ही बने हुए हैं। दूसरी ओर काम कर रहे माने जाने वाले केंद्रों में से भी 73,000 हजार में कोई आंगनवाड़ीकर्मी ही नियुक्त नहीं किए गए हैं। आंगनवाड़ी सुपरवाइजरों के तो करीब एक-तिहाई पद खाली ही पड़े हुए हैं।
सार्वभौम सिर्फ नाम के वास्ते
इसके अलावा आंगनवाड़ी केंद्रों का फैलाव भी एक जैसा नहीं है। एक ओर तो ऐसे इलाकों में जहां पहले से आंगनवाड़ी केंद्र मौजूद हैं, नये-नये केंद्र खोले जा रहे हैं। दूसरी ओर अनुसूचित जाति/ जनजाति-बहुल इलाकों में दूर-दूर तक कोई आंगनवाड़ी केंद्र ही नहीं हैं। ज्यादातर आंगनवाड़ी केंद्रों के पास अपनी कोई जगह नहीं है और इनमें से अनेक तो अब भी खुली जगहों पर ही चल रहे हैं। सामुदायिक भागीदारी के नाम पर आंगनवाड़ी केंद्रों के लिए भोजन की आपूर्ति, भोजन तैयार करने तथा भोजन के वितरण के कामों का निजीकरण किया जा रहा है। इसका नतीजा यह हो रहा है कि इनके लिए खाद्य की आपूर्ति बहुत बार अनियमित तरीके से होती है और वितरित होने वाला भोजन अक्सर मात्रा में अपर्याप्त व गुणवत्ता में खराब होता है, जिसे बच्चे खाना ही पसंद नहीं करते हैं।
अजीबोगरीब दलील
जिस एनजीओ के अध्ययन ने बाल कुपोषण के सवाल पर प्रधानमंत्री की आत्मा को झकझोर कर जगा दिया है, उसके प्रतिनिधि ने रिपोर्ट जारी किए जाने के मौके पर एक अजीबोगरीब दलील पेश की है। उसने दावा किया कि भारत में बाल कुपोषण की वजह न तो गरीबी है और न भूख। बाल कुपोषण की वजह तो, ‘खाने व खिलाने की आदतोंमें छुपी है! यह तब है जबकि योजना आयोग की मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार पूरे 31 करोड़ भारतीय गरीब हैं। सचाई यह है कि नवउदारवादी नीतियों के बोलबाले के पिछले दशकों में, कुल मिलाकर प्रति व्यक्ति कैलोरी व प्रोटीन आहार में गिरावट ही आई है। वि भूख सूचकांक (जीएचआई) में भारत को, इसके तहत आने वाले 84 देशों में से 67 वें स्थान पर रखा गया है। भूख सूचकांक में देशों को, उनकी कुपोषित आबादी के अनुपात, पांच वर्ष की आयु तक के कम वजन के बच्चों के अनुपात तथा पांच वर्ष की आयु तक के शिशुओं की मृत्यु दर के हिसाब से, आंका जाता है। 2008 में भारत के लिए अलग से जो सव्रे किया गया था, उसमें 15 राज्यों को गिनती में लिया गया था, जिनमें भारत की कुल आबादी का 95 फीसद हिस्सा रहता है। इसका मतलब कोई भी राज्य भूख की मार से बरी नहीं है। इस सव्रे के अनुसार, 12 राज्यों में भूख के पहलू से हालात चिंताजनकथे और मध्य प्रदेश के मामले में तो अति-चिंताजनक। ऐसे मामलों में यह और भी जरूरी हो जाता है कि उपयुक्त रोजगार मुहैया कराने के जरिए लोगों को गरीबी की दलदल से बाहर निकाला जाए। पीडीएस को मजबूत कर, सस्ती दरों पर खाद्यान्न मुहैया कराने तथा इसके तहत क्रम में गेहूं-चावल के साथ दालें व खाने-पकाने का तेल आदि भी सस्ती दरों पर दिया जाना चाहिए। इसके साथ, सभी बच्चों, गर्भवती महिलाओं तथा प्रसूताओं को पर्याप्त मात्रा में पोषक आहार मुहैया कराया जाना भी जरूरी है।
आईसीडीएस का निजीकरण नहीं इलाज
बहरहाल, अंत में बिल्ली थैले से बाहर आ ही गई। प्रधानमंत्री ने यह कहकर अपना छुपा हुआ एजेंडा उजागर कर दिया अब हम कुपोषण का मुकाबला करने के लिए सिर्फ आईसीडीएस के ही भरोसे नहीं रह सकते हैं। नवउदारवादी नीतियों के अपनाए जाने के बाद से ही सरकार इसकी कोशिशों में लगी रही है कि आईसीडीएस का निजीकरण किया जाए और किसी तरह से अपने कंधों पर से यह जिम्मेदारी उतार दी जाए। सामुदायिक हिस्सेदारी के नाम पर पूरक आहार की आपूर्ति, उसे तैयार करने तथा उसके वितरण के काम और आंगनवाड़ी केंद्रों के प्रबंधन का काम पंचायतों को, स्वयं सहायता ग्रुपों को, माता कमेटियों को, एनजीओ को (जिनमें उक्त अध्ययन करने वाला नैगम भी शामिल है) और वेदांत जैसे भीमकाय नैगम घरानों को भी सौंपे जा रहे हैं। कई राज्यों में तो आंगनवाड़ी केंद्रों के ऐन बगल में, उन्हीं बच्चों को लक्ष्य बनाकर सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा अस्थायी आधार पर पोषण केंद्र, नर्सरी केंद्र आदि खोले जा रहे हैं और उन्हीं लाभार्थियों के लिए एक अस्वस्थ्य प्रतियोगिता शुरू की जा रही है। इसके चलते सार्वजनिक धन की बर्बादी भी हो रही है। आंगनवाड़ी सेविकाओं और सहायकों के साथ सरकार बहुत ही बुरा सलूक कर रही है। उन्हें महज सामाजिक कार्यकर्तामानने की आड़ में सरकार ग्रेच्युटी, पेंशन आदि सामाजिक लाभ भी देने के लिए तैयार नहीं है।
समुचित संसाधन से मिलेंगे नतीजे
महिला व बाल कल्याण मंत्री ने आईसीडीएस का पुनर्गठनकी बात कही है। किसी भी पुनर्गठन में पर्याप्त बजट आवंटन के जरिए उसे मजबूत किए जाने का प्रयास होना चाहिए न कि उसके निजीकरण का। खेदजनक है कि जहां 11 वीं योजना में आईसीडीएस के लिए 72,877.52 करोड़ रुपये की संशोधित योजना थी। वहीं पूरी योजना अवधि में करीब आधी राशि ही आवंटित की गई। महिला तथा बाल कल्याण मंत्री ने आईसीडीएस के लिए अगले पांच साल में 2 लाख करोड़ रुपये के आवंटन की मांग की है ताकि उसके कामकाज तथा उसके लिए ढांचागत सुविधाओं में बढ़ोतरी की जा सके। अगर हम मुट्ठीभर नैगम कम्पनियों व अमीरों पर विभिन्न कर रियायतों के जरिए पूरे 14,28,028 करोड़ रुपये का राजस्व लुटाया है तो देश के 16 करोड़ बच्चों और करोड़ों गर्भवती व नव-प्रसूताओं के लिए, इतना खर्चा करने से वित्त मंत्रालय को इनकार नहीं करना चाहिए।

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