एक ओर आतंकवाद जहां जटिल समस्या का रूप लेता जा रहा है वहीं हमारे रणनीतिकारों के पास इससे निपटने के लिए प्रभावी नीति और उस पर अमल की इच्छाशक्ति का अभाव दिखता है। इस क्रम में भारत सरकार ने अब आतंकवाद को देशव्यापी समस्या मानते हुए इससे निपटने के लिए एनसीटीसी यानी राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र के गठन का निर्णय लिया है, लेकिन इसके अमल में आने से पहले ही कई राज्यों द्वारा इसका विरोध शुरू होना कई सवाल खड़े करता है। इन सवालों में पहला सवाल यही है कि जब हमारे पास मल्टी एजेंसी सेंटर और राष्ट्रीय जांच एजेंसी जैसी संस्थाएं पहले से मौजूद हैं तो ऐसे में एक और नई एजेंसी एनसीटीसी के गठन का औचित्य क्या है? सरकार संस्थाओं के ऊपर संस्थाएं बनाती जा रही है, लेकिन इन्हें प्रभावी बनाने और जमीनी स्तर पर मजबूत करने के लिए कोई कदम नहीं उठा रही। इसका परिणाम यह हुआ है कि हमारे पास राज्यों के पुलिस बल के अलावा दूसरे कई सशस्त्र बल और खुफिया एजेंसियां मौजूद होने के बावजूद अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही। आतंकवादी हमलों के न रुकने पर अपनी विफलता को ढकने के लिए और राजनीतिक लाभ लेने के लिए सरकार हर बार किसी न किसी नई संस्था का गठन करके जनता में संदेश देने की कोशिश करती है कि वह सतर्क है और प्रभावी उपाय किए जा रहे हैं, लेकिन वस्तुस्थिति यही है कि कहीं कुछ नहीं हो रहा होता है। यदि ऐसा होता तो इसका वास्तविक परिणाम कुछ न कुछ अवश्य दिखता। उदाहरण के तौर पर वर्ष 2001 में प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली कैबिनेट समिति ने मल्टी एजेंसी सेंटर को मंजूरी दी थी, जिसे वर्ष 2009 में गठित भी कर दिया गया, लेकिन इस संस्था के अस्तित्व में आने के तीन वर्ष बाद भी स्थिति जस की तस है। कुछ ऐसा ही हाल एनआइए यानी राष्ट्रीय जांच एजेंसी का भी है। इस क्रम में अब कहा जा रहा है कि अमेरिका की तर्ज पर हमें भी एफबीआइ जैसी संघीय पुलिस की आवश्यकता है, लेकिन हम भूल जाते हैं कि भारत की तुलना अमेरिका से नहीं हो सकती। अमेरिका की आबादी जहां करीब 31 करोड़ है वहीं भारत की आबादी 120 करोड़ से भी ज्यादा है। प्रति एक हजार आबादी पर पुलिस बलों की संख्या के मामले में भी हम अमेरिका से काफी पीछे हैं और सबसे बड़ा सवाल कि अमेरिका जितना पैसा अपनी संघीय पुलिस पर खर्च करता है, क्या हम उतना पैसा खर्च करने की स्थिति में हैं और क्या वैसे दूसरे तमाम संसाधन हमारे पास मौजूद हैं। यदि एनसीटीसी की ही बात की जाए तो इसका बजट लगभग ढाई हजार करोड़ रुपये का होगा। मेरा मानना है कि हमारे पास जो भी संस्थाएं पहले से हैं यदि उन्हें ही ठीक तरह से उपयोग किया जाए तो आतंकवाद समेत दूसरी तमाम चुनौतियों से निपटा जा सकता है। आखिर हम क्यों आइबी और रॉ को कमतर आंकने की भूल कर रहे हैं। जयपुर विस्फोट के बाद महाराष्ट्र एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे से जयपुर में मेरी मुलाकात हुई थी। उस दौरान मैंने उनसे पूछा था कि क्या अलग-अलग राज्यों में आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करने में उन्हें किसी तरह की परेशानी होती है और क्या उन्हें मिलने वाली खुफिया सूचनाएं पक्की होती हैं? इसके प्रत्युत्तर में उनका कहना था कि आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई में उन्हें अलग-अलग राज्यों से तालमेल बनाने में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होती और न ही इसमें कोई और समस्या आड़े आती है। जहां तक खुफिया सूचनाओं की बात है तो अपने नेतृत्व में सुलझाए गए कुल 13 आतंकवादी मामलों में 9 मामले आइबी की सूचना के आधार पर और 2 मामले राज्य पुलिस की मदद से और एक मामला औचक रूप से हल होने की बात उन्होंने स्वीकार की। इससे साफ है कि केंद्र सरकार द्वारा दिया जा रहा यह तर्क कि एकीकृत राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी न होने से आतंकवादियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करने में दिक्कत होती है और इसमें राज्य की पुलिस अथवा दूसरे संगठनों की मदद देर से मिलती है, एक झूठ के अलावा और कुछ नहीं। कुछ लोगों का तर्क है कि टाडा और पोटा जैसे आतंकवाद निरोधक कानून अब अस्तित्व में नहीं हैं, जिसका फायदा आतंकवादियों को मिल रहा है और वे बेधड़क अपने मंसूबों को अंजाम दे रहे हैं। मैं इससे सहमत नहीं हूं। जब ये कानून अस्तित्व में थे तो इनका उपयोग किसके खिलाफ किया गया? टाडा और पोटा के अंतर्गत आतंकवादियों से कहीं ज्यादा आम लोगों को कैद किया गया और बाद में इसका इस्तेमाल राजनीतिक दुश्मनी निकालने के लिए होने लगा। आतंकवाद के खिलाफ सिर्फ कठोर कानून बना देने से क्या होगा जब तक कि हम ऐसा प्रभावी तंत्र और राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं विकसित करते जिससे आतंकवाद का उन्मूलन हो सके। एनसीटीसी पर राज्यों के विरोध को खारिज नहीं किया जा सकता। यदि यह संस्था अस्तित्व में आती है तो राज्यों की अपनी निजी स्वतंत्रता और अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इस बात की क्या गारंटी है कि केंद्र से संचालित यह संस्था स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से काम कर पाए, जबकि दूसरी तमाम ऐसी संस्थाओं के दुरुपयोग के उदाहरण सामने हों। इनमें सीबीआइ का उदाहरण भी एक है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि सीबीआइ भी किसी राज्य में बिना संबंधित राज्य सरकार की अनुमति से जांच कार्य शुरू नहीं कर सकती। एक बार उसे जांच की अनुमति मिल जाती है तो ही वह मिले सबूतों के आधार पर किसी से पूछताछ कर सकती है, गिरफ्तारी कर सकती है और अभियोजन का काम शुरू कर सकती है, जबकि एनसीटीसी के मामले में ऐसा नहीं है। एनसीटीसी के गठन के लिए हवाला दिया जा रहा है कि गैरकानूनी गतिविधि निवारक कानून, 1967 के 43 ए के तहत केंद्र को यह अधिकार है कि वह आवश्यक महसूस होने पर देश के विभिन्न हिस्सों में किसी की भी गिरफ्तारी कर सकती है और इसके लिए राज्यों की अनुमति आवश्यक नहीं। इस कानून की यह व्याख्या सही नहीं, क्योंकि संविधान में राज्यों को केंद्र के अनुचित हस्तक्षेप से संरक्षण मिला हुआ है। यहां तक कि सीआरपीएफ अथवा अर्द्धसैनिक बलों को भी राज्यों की अनुमति के बिना तैनात नहीं किया जा सकता। जाहिर है ऐसा होने पर राज्यों के पास संघीय ढांचे को कमजोर करने और उससे छेड़छाड़ करने के लिए अदालत में जाने का रास्ता खुला हुआ है। कुल मिलाकर राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को राजनीतिक अहम का शिकार बनाया जा रहा है, जो किसी भी तरह ठीक नहीं। यह आवश्यक है कि एनसीटीसी पर तार्किक बहस के बाद आम सहमति तक पहुंचा जाए और इसके बाद ही इस पर फैसला हो। (लेखक आतंकवाद प्रतिरोधी नीतियों के विश्लेषक हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
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