डा. विमल शिक्षाविद हैं। तीन साल प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में रहने के बाद उन्होंने पीएचडी किया और जोधपुर में 21 साल हिन्दी के लेक्चरर-रीडर रहे। फिर वर्धमान विविद्यालय (पश्चिम बंगाल) को जमाया। रिसर्च सेंटर स्थापित किया। हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया। वहीं 13 साल प्रोफेसर रहे और प्रोवाइस चांसलर के रूप में रिटायर हुए। उन्होंने 13 किताबें लिखी हैं। आजकल आदिवासी व पिछड़े क्षेत्रों में सामाजिक-विकास कार्य कर रहे हैं। 71 वर्षीय डा. विमल ने लोहिया और जेपी को भी राजनीति करते देखा है। वीपी सिंह और चंद्रशेखर से उनकी नजदीकी रही है। बुद्धदेव और ममता की सादगी, ईमानदारी और कर्मठता के वह गवाह हैं। मेधा पाटेकर और अरुंधति राय के सामाजिक कायरे में वह सहयोगी हैं, उनके प्रशंसक हैं। डा. विमल छह महीने की छुट्टी लेकर जेपी के आन्दोलन में उनके साथ रहे। इसके बाद भी प्रत्यक्ष राजनीति में नहीं आये। हां, विचारक रहे। सलाहकार रहे। वह आज की सबसे बड़ी समस्या राजनीति में नैतिक गिरावट को मानते हैं। उन्हें 1952 और 57 के इलेक्शन भी खूब याद हैं। उनके अनुसार 1962 से राजनीति में तेजी से नैतिकता की कमी होनी शुरू हुई। इसकी वजह रही राजनीति का सत्ता आधारित हो जाना। इससे पहले राजनीति दर्शन (फिलासफी) थी। असल में 1947 में देश आजाद नहीं हुआ, सत्ता परिवर्तन हुआ। गुलाम देश को चलाने वाली व्यवस्था ही स्वीकार कर ली गयी। स्वाधीन देश को चलाने वाली व्यवस्था नहीं बनायी गयी। देश में केवल दो व्यक्तियों - गांधी और भगत सिंह के दिमाग में स्वाधीन भारत की सही परिकल्पना थी। जब देश आजाद हुआ तो इटली के नेता ग्राैनसी ने महात्मा गांधी को पत्र लिखा था कि अगर स्वाधीनता को बरकरार रखना है तो पूरी टीम के साथ राजनीति से हट जाइये। स्वाधीनता मिली है, राष्ट्रीयता की लहर है। आप सभी लोग समाज को बदलने में लगिये और सत्ता युवाओं को सौंप दीजिए। नहीं तो, स्वाधीनता केवल राजनीतिक और आर्थिक आजादी बनकर रह जाएगी। गांधीजी ने इसी दौरान कांग्रेस को भंग करने की बात भी कही थी। पर उनकी बात कांग्रेसियों ने नहीं मानी। बात वही राजनीति के दर्शन या सत्ता पर आधारित होने की आ जाती है। नेहरूजी की जीवनी मार्क्स के दर्शन से शुरू होती है और उसी के दर्शन से, पंक्ति से समाप्त होती है। जेपी ने पुस्तक लिखी थी- ‘समाजवाद ही क्यों’। राहुल सांकृत्यायन की किताब थी- ‘साम्यवाद क्यों’। राहुल जी जब देवली (राजस्थान) जेल में थे तो उन्होंने एक किताब ‘दर्शन दिग्दर्शन’ लिखी थी। इसमें लिखा था कि हमें आजादी पाने के लिए तो कुर्बानियां देनी पड़ रही हैं, कहीं आजादी बचाने के लिए भी कुर्बानियां न देनी पड़ें। आज लोकतंत्र की हालत देखिए। बड़े-बड़े घोटाले और भ्रष्टाचार। अन्ना नेता नहीं हैं, पर गांधीवादी हैं उन्हें आन्दोलन चलाना पड़ा। तब कहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल बना। अगर राजनीति दर्शन है तो आचार पर आधारित समाज रच सकती है। जिस जाति में समाज में प्रतिरोध की क्षमता खत्म हो जाती है, वह मिट जाता है। देश में आज एक वर्ग, यों कहें एक भारत बड़े अमीरों, बड़े नेताओं और बड़े अधिकारियों का है। दूसरा भारत छोटे अमीरों, छोटे नेताओं और छोटे अधिकारियों-बाबुओं का है। तीसरा भारत हम लोगों का है जो समस्याएं झेल रहे हैं और चौथा भारत उन लोगों का है जिन पर आजाद होने से कोई फर्क ही नहीं पड़ा। उनके लिए पहले भी खाने, पीने, रहने, पढ़ने और लिखने की व्यवस्था नहीं थी, आज भी नहीं है। उनके लिए थाना पहले जैसा था, आज भी वैसा ही है। जिस दिन यह भारत खड़ा हो गया, उस दिन तीनों भारत खत्म हो जाएंगे। जब यह भारत खड़ा होता है तो इसे उग्रवाद कहा जाता है। अपने लोग क्यों गुस्से में हैं जानिये तो। जस्टिस सरकारिया पी. चिदम्बरम से यही बात तो कहते हैं। ये क्यों कानून हाथ में ले रहे हैं, समझिए तो। हम तो अभी तक यह भी नहीं समझ पाए हैं कि देश में राष्ट्रीयता पैदा करने के लिए हिन्दी कितनी जरूरी है। 1930 में जब दयानंद सरस्वती ने पश्चिम बंगाल में संस्कृत में अपना व्याख्यान दिया था तो नवजागरण के विचारक केशवचंद सेन ने उनसे कहा था, राष्ट्रीयता पैदा करने के लिए हिन्दी में भाषण दीजिए। हम सरकारी कामकाज में, संसद में पढ़ाई-लिखाई में कहां हिन्दी को स्थापित कर पा रहे हैं। अपने लोगों द्वारा, अपने लोगों के लिए अपने लोगों की सरकार। फिर काहे का डर। नेता और मंत्री कमांडो के बीच में चलते हैं। पहले के नेता निर्भीक थे। 1946 की बात है। मौलाना आजाद सरदार पटेल और नेहरू मध्य प्रदेश के जंगल से गुजर रहे थे। पहले से जानकारी थी कि यहां डाकू लूट लेते हैं। डाकू दूर से दिखे तो पटेल कुछ विचलित हुए, पर नेहरू ने कार रुकवा ली। आजाद के हाथ का सहारा लेकर कार के बोनट पर चढ़ गये। चिल्लाकर बोले, मैं जवाहरलाल नेहरू बोल रहा हूं। हम आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमें पैसे की जरूरत है। लाओ हमें पैसा दो। चमत्कार हो गया। डाकू चुपचाप पास आये। बन्दूकें जमीन पर डाल दीं। लूटी गयी दौलत कार में डाल दी। घोड़े पर दो आदमी साथ कर दिये कि इन्हें जंगल की सीमा से बाहर छोड़ आओ। आज है इतना साहस है किसी नेता में। आज असल में नेता नहीं उसकी कमाई दौलत की ही सुरक्षा करते हैं कमांडो। ममता के पास तो न कोई कमांडो है और न कोई सुरक्षा व्यवस्था है। पर्ची भेजिए, सीएम से मिल लीजिए। बुद्धदेव भी ऐसे ही सीएम थे। राइटर्स बिल्डिंग के नंदन लान में विकलांग बेटी को टहलाते थे। न कोई चपरासी, न सिपाही। जो चला गया, मिल लिया। छोटे-छोटे कुल्हड़ों में चाय पीते पिलाते थे। ईएमएस नम्बूदरीपाद, हरकिशन सिंह सुरजीत कितने बड़े नेता-विचारक थे। एक कमरे में जिन्दगी कट गयी। सोमनाथ चटर्जी की बंगाल में इज्जत केंद्र में मंत्री या लोकसभा अध्यक्ष बनने से नहीं बल्कि उनकी शख्सियत से है। क्या हम उनकी सादगी, इनकी सरलता, उनकी ईमानदारी को नहीं अपना सकते। क्या इसलिए नहीं अपना सकते कि ये कल्चर कम्युनिस्टों की देन है। बात वही है सत्ता आधारित राजनीति की। वीपी सिंह ने भाजपा और वामपंथियों दोनों का समर्थन लिया था। इस पर नक्सली नेता विनोद मिश्र ने पूछा था, ऐसे क्या चला पाएंगे सरकार। वह बोले थे, न चले। सत्ता ही सब कुछ थोड़े ही है। लेकिन आज सत्ता के लिए ही सब कुछ हो रहा है। कमाई, सुरक्षा, अलगाव और आडम्बर। फिर भी विमलजी को उम्मीद है सब कुछ ठीक होगा। अगर अन्ना हजारे भ्रष्टाचार को बहस के केन्द्र में ला सकते हैं, भ्रष्टाचार को राजनीतिक मुद्दा बनवा सकते हैं तो और भी होगा।
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