देश में भ्रष्टाचार सचमुच बढ़ गया है, तभी तो प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे। भ्रष्टाचारियों को बख्शा नहीं जाएगा। इस दिशा में सरकार ने सख्त कदम उठाने के संकेत दिए हैं। मसलन, हर तीन वर्ष बाद सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के कार्यो की समीक्षा की जाएगी। इसके अलावा अगर वे बार-बार अपने कार्य को सही रूप से अंजाम देने में पीछे रहते हैं तो उन्हें 15 वर्ष पहले ही सेवानिवृत्त किया जा सकता है। यह एक सराहनीय कदम है, पर इस पर सख्ती से अमल हो, तभी यह कारगर सिद्ध होगा। वैसे देखा जाए तो भ्रष्टाचार हमारी देन है ही नहीं। यही वजह है कि देश के नेता इससे निपटने में अक्षम साबित हो रहे हैं। यह तो अंग्रेजों से हमें विरासत में मिला है। आज अगर देश की जनता अपना सही काम करवाने के लिए भी रिश्वत का सहारा लेती है तो उसके पीछे बेशुमार अधिकार के स्वामी देश के सरकारी अधिकारी, कर्मचारी और नेता हैं। रिश्वत न देने वाले आम आदमी को परेशान करने के लिए इनके पास इतने अधिकार हैं कि वह अपने सही काम को कराने के लिए लाख एडि़यां रगड़ ले, उसका काम कभी नहीं होगा। इस दौरान वह कई नियम-कायदों से बंधा होगा, लेकिन रिश्वत देते ही वह सारे कायदों से मुक्त हो जाता है। यह देश की विडंबना है। हमारे देश में भ्रष्टाचार कितना फैल चुका है, यह जानने के लिए किसी सर्वेक्षण की जरूरत नहीं है। इसके लिए तो अमेरिका की गेलप नामक कंसल्टेंसी फर्म की रिपोर्ट ही पर्याप्त है। इसने भारत में फैले भ्रष्टाचार के मामले पर एक सर्वेक्षण किया, जिसमें देश के विभिन्न शहरों के करीब छह हजार लोगों से बात की। 47 प्रतिशत लोगों ने माना कि देश में भ्रष्टाचार एक महामारी की तरह फैल गया है। यह स्थिति पिछले 5-10 वर्ष पहले से ज्यादा गंभीर है। अन्य 27 प्रतिशत लोगों ने भ्रष्टाचार को एक गंभीर समस्या निरुपित किया। इन लोगों का मानना था कि 5 साल पहले भी यही स्थिति थी। हाल ही में अन्ना हजारे के आंदोलन को जिस तरह से लोगों ने अपना नैतिक समर्थन दिया, उससे यह स्पष्ट है कि देश का आम आदमी इस भ्रष्टाचार से आजिज आ चुका है। देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने के लिए अब वह उथल-पुथल के मूड में दिखाई दे रहा है। इस सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि देश के 78 प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि भ्रष्टाचार सरकारी तंत्र में अधिक फैला हुआ है। 71 प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि देश के उद्योगपति भी भ्रष्टाचार के लिए जवाबदार हैं। टाइम मैग्जीन कि सर्वे के अनुसार, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में लिप्त ए. राजा को विश्व को दूसरा सबसे बड़ा भ्रष्टाचारी माना है। इसके पहले कॉमनवेल्थ गेम्स का जो घोटाला सामने आया, उसने देश के नागरिकों की सहिष्णुता को एक तरह से खत्म ही कर दिया। टेलीकॉम घोटाले ने उस पर अपनी मुहर ही लगा दी। भारतीय जनता यह मानती है कि भ्रष्टाचार के लिए सबसे बड़ा कारण सरकारी तंत्र है। गेलप के सर्वेक्षण के मुताबिक भ्रष्टाचारियों को दंड देने में सरकार पूरी तरह से विफल साबित हुई है। इन भ्रष्टाचारियों से सबसे अधिक परेशान बेरोजगार युवा हैं। 21 प्रतिशत नागरिकों ने स्वीकार किया कि वे अपने काम को करवाने के लिए रिश्वत का सहारा लेते हैं। ट्रेक डॉट इन नामक एक वेबसाइट ने भारत में भ्रष्टाचार विषय पर एक रोचक तथ्य जारी किया है। उसके अनुसार भारत में सरकारी तंत्र की रग-रग में भ्रष्टाचार व्याप्त है। नागरिकों को जिन्हें रिश्वत देनी पड़ती है, उनमें 91 प्रतिशत सरकारी अधिकारी हैं। इसमें भी 33 प्रतिशत केंद्रीय कर्मचारी हैं। 30 प्रतिशत पुलिस अधिकारी और 15 प्रतिशत राज्य के कर्मचारी हैं। दस प्रतिशत नगर पालिका, नगर निगम या ग्राम पंचायतों के कर्मचारी हैं। भारतीय प्रजा के माथे पर तीन प्रकार की गुलामी लिखी हुई है। पहली गुलामी केंद्र सरकार की, जिसमें आयकर, आबकारी, कस्टम आदि विभाग आते हैं। दूसरी गुलामी राज्य सरकार की है, जिसके हाथ में बिक्रीकर, शिक्षा, स्वास्थ्य और पुलिस विभाग आते हैं। तीसरी गुलामी स्थानीय संस्थाओं की है, जिसके पास पानी, गटर, जमीन, मकान, संपत्ति कर आदि दस्तावेज बनाने के अधिकार हैं। इस तीन प्रकार की संस्थाओं को इतने अधिक अधिकार प्रदान किए गए हैं कि वे प्रजा को कायदा-कानून बताकर इतना अधिक डरा देते हैं कि न चाहते हुए भी प्रजा को रिश्वत देनी ही पड़ती है। वास्तव में अधिकारियों को मिलने वाले असीमित अधिकारों पर अंकुश लगाया जाए तो शायद देश भ्रष्टाचारमुक्त हो सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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Monday, February 27, 2012
कैसे सुधरे हमारी नौकरशाही कैसे सुधरे हमारी नौकरशाही कैसे सुधरे हमारी नौकरशाही
देर आए दुरुस्त आए हमारे यहां पुरानी कहावत है। संभवत: इसी पर चलते हुए सरकार की ख्वाहिश है कि अब सरकारी बाबुओं के कामकाज की समीक्षा होगी। सरकारी समीक्षा की कसौटी पर जो कमजोर साबित होंगे, उनकी सेवा समाप्त कर दी जाएंगी। हाल के दौर में जिस तरह से शीर्ष सरकारी बाबुओं के भ्रष्टाचार में आकंठ डूबने से लेकर अपने राजनीतिक आकाओं के लिए किसी भी हद तक जाने के मामले सामने आ रहे हैं, आम पब्लिक के साथ-साथ सरकार भी इससे हलकान है। दरअसल, लोकतंत्र में जो कानून संसद बनाती है या जिन कल्याणकारी योजनाओं को वह लेकर आती है, उन्हें लागू करने का दायित्व इन्हीं बाबुओं पर होता है। पर 2जी घोटाले में तिहाड़ जेल की हवा खा रहे पूर्व टेलीकॉम सेके्रटरी सिद्धार्थ बेहुरा से लेकर मध्य प्रदेश के आइएएस दंपती और कई अन्य आला अफसरों ने जिस तरह से अपने पद का दुरुपयोग करके धन अर्जित किया, उससे साफ है कि हमारे यहां नौकरशाह बेलगाम होते जा रहे हैं। मध्य प्रदेश के आइएएस जोशी दंपती के ठिकानों पर छापेमारी में करीब 250 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्ति का पता चला है। इस रोशनी में सरकार का बाबुओं के कामकाज पर नजर रखने का कोई भी स्वागत करेगा। पर इसी व्यवस्था में कुछ ऐसे भी नौकरशाह हुए हैं, जिनकी मिसाल दी जाती है। ऐसे एक डिप्लोमेट थे एके दामोदरन, जिनका कुछ हफ्ते पहले ही दिल्ली में निधन हो गया। 1953 बैच के आइएफएस अफसर रहे दामोदरन ने ही भारत और सोवियत संघ के बीच वर्ष 1971 हुई ऐतिहासिक संधि का मसौदा तैयार किया था। आजादी के बाद भारत की विदेश नीति की रूपरेखा को दिशा देने में दामोदरन की अहम भूमिका थी। हालांकि उन्होंने अपनी लंबी सरकारी सेवा के दौरान तमाम प्रधानमंत्रियों और दूसरे अहम मंत्रियों के साथ काम किया, पर उन्हें कभी किसी का आदमी नहीं माना गया। अगर वर्तमान की बात करें तो अब दामोदरन, जेएन दीक्षित, जगमोहन, पीए हक्सर, बीके नेहरू जैसे बेहतरीन नौकरशाहों का टोटा शिद्दत के साथ महसूस हो रहा है। अब सिविल सेवा के माध्यम से आए तमाम आला अफसर नौकरी पर रहते हुए ही किसी बड़े नेता के खासम-खास बन जाते हैं, जिससे कि रिटायर होने के बाद भी उन्हें कोई बढि़या-सी पोस्टिंग मिल जाए। कुछ ऐसे भी अफसर हैं, जो सेवा में रहते हुए ही किसी दल विशेष का आदमी बनने का गौरव हासिल करके अपने बाकी भविष्य को सुरक्षित कर लेते हैं। उदाहरण के तौर पर पंजाब में पिछले महीने हुए विधानसभा चुनावों में शिरोमणि अकाली दल ने प्रदेश के पूर्व डीजीपी परमदीप सिंह गिल और राज्य के पूर्व सचिव दरबारा सिंह गुरु को टिकट देकर उनके अहसानों का बदला चुकाया। कहने की जरूरत नहीं है कि गिल और गुरु को अकाली दल ने यह सौगात क्यों दी होगी। अकालियों ने भी इनके अहसानों का ख्याल रखते हुए उन पार्टी कार्यकर्ताओं को टिकट नहीं दिया, जो सालों-दशकों से पार्टी की खिदमत कर रहे थे या जो पार्टी के नेताओं की सभाओं में दरियां बिछाते थे। हालांकि कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने अपने प्रचार के दौरान शिरोमणि अकाली दल की निंदा की कि उसने दो अफसरों को अपने पाले में इसलिए लिया, क्योंकि वे उसकी सेवा कर रहे थे। पर सच्चाई यह है कि पंजाब और महाराष्ट्र पुलिस के डीजीपी रहे जीएस विर्क कांग्रेस की तरफ से टिकट की चाहत रखते थे। वह अमरिंदर सिंह के खासम-खास हैं। यह बात दीगर है कि पार्टी ने उन्हें उपकृत नहीं किया। विर्क को दोनों प्रदेशों का डीजीपी रहने का अवसर मिला है। सीमा सुरक्षा बल के पूर्व डीजीपी प्रकाश चंद्रा ने अपने एक हालिया इंटरव्यू में कहा कि जब तक सरकार की तरफ से इस तरह का कोई कठोर नियम नहीं बनाया जाता कि भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के अफसर सेवा से मुक्त होने के कम से कम तीन-चार साल तक किसी पार्टी या कॉरपोरेट घराने से नहीं जुड़ेंगे, तब हमारे यहां गिल और गुरु सरीखे अफसर सामने आते रहेंगे। चंद्रा मानते हैं कि अब अफसर पैसे कमाने को लेकर इतने व्याकुल रहते हैं कि वे अपने मूल काम की अनदेखी करते हुए बड़े नेताओं की सेवा में लगे रहते हैं। जाहिर है यह गंभीर स्थिति है। यहां बात सिर्फ आला अफसरों के सियासत की दुनिया में आने तक ही सीमित नहीं है। ये अफसर कॉरपोरेट दुनिया में भी जा रहे हैं। दो साल पहले भारत सरकार के वित्त सचिव पद पर आसीन एक वरिष्ठ आइएएस अफसर ने रिटायर होने के चंद माह बाद ही एक बड़ी ऑटो कंपनी के सीईओ के पद को संभाल लिया। जाहिर है, उन्होंने उस ऑटो कंपनी की भरपूर सेवा की होगी, तब ही तो उन्हें इतने बड़े ओहदे पर रखा गया। भारत की एक प्रमुख रीयल एस्टेट कंपनी ने भी कुछ साल पहले एक वरिष्ठ आइएएस अफसर को अपने यहां बड़े पद पर रखा। कहने वाले दावा करते हैं कि उन सज्जन को सालाना दो करोड़ रुपये पगार मिलती थी। जाहिर है, हमें या किसी को इस बात से रत्ती भर भी लेना-देना नहीं है कि किसी को कितनी पगार मिलती है। सवाल तो नैतिकता का है। इस सवाल का तो जवाब उन तमाम अफसरों को देना होगा, जो सेवा में रहते हुए किसी खास नेता, राजनीतिक जमात या कॉरपोरेट घराने के लिए खुलकर काम करने लगते हैं। बदले में उन्हें इनसे रेवडि़यां मिलती हैं। कभी नौकरशाह रहे यशवंत सिन्हा और अजीत जोगी ने तो अपनी सेवा से रिटायर होने का फैसला तभी कर लिया, जब इन्हें रिटायर होने में 10-15 साल शेष थे। 1960 बैच के आइएएस अफसर यशवंत सिन्हा ने 1984 में सरकारी नौकरी को छोड़कर जनता पार्टी का दामन थामा। आइपीएस और आइएएस रहे अजीत जोगी ने भी अपने करियर के शिखर पर रहते हुए सरकारी नौकरी को छोड़कर राजनीति करने का फैसला किया। वह संभवत: पहले और एक मात्र आइएएस अफसर हैं, जो किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। देश के किसी भी अन्य नागरिक की तरह इन्हें भी किसी भी पेशे को चुनने का अधिकार है। इन्होंने किसी पार्टी में शामिल होकर कोई गलत नहीं किया। इन्होंने रिटायर होने से कुछ साल या महीने पहले नौकरी नहीं छोड़ी। भारत की सबसे बड़ी बिजली उत्पादन कंपनी एनटीपीसी के भी एक सीएमडी ने हाल के सालों में रिटायर होने के कुछ ही समय के बाद निजी क्षेत्र की बिजली उत्पादन करने वाली कंपनी में शीर्ष पद पर नौकरी कर ली। भले ही उन्होंने उस कंपनी को एनटीपीसी में रहते हुए कोई लाभ नहीं पहुंचाया हो, पर इस बात को मानेगा कौन। लंबे समय तक गांधी-नेहरू परिवार के करीबी रहे नटवर सिंह सेवा में रहते हुए आइएफएस अफसर से अधिक देश के पहले राजनीतिक परिवार के प्रति अपनी निष्ठा साबित करते थे। कहने वाले तो कहते हैं कि 1953 बैच के आइएफएस अफसर नटवर सिंह को गांधी-नेहरू परिवार से घनिष्ठता के चलते हमेशा बेहतर पोस्टिंग मिलती रही। जनता पार्टी के शासनकाल के दौरान उनके सितारे गर्दिश में आए, क्योंकि तब प्रधानमंत्री बने मोराजी देसाई उन्हें कसते रहते थे। उन्होंने जनता पार्टी के शासनकाल में अपनी परेशानियों के संस्मरण हाल ही में एक अंग्रेजी दैनिक में लिखे थे। अपने लाभ के लिए सियासत का रुख करने वाले अफसरों पर लगाम लगाने के लिए एक सुझाव यह भी आ रहा है कि इन्हें खुद ही रिटायर होने के बाद तीन साल बाद तक किसी पार्टी या कॉरपोरेट घराने से नहीं जुड़ना चाहिए। बेशक, यह सुझाव तो काम का है। पर बड़ा सवाल यह है कि इसे मानेगा कौन? वैसे भी अब दामोदरन जैसे बुद्धिमान और साफ-सुथरी छवि वाले अफसर की किसे जरूरत है। हताशा के इस माहौल में उम्मीद की किरण इसलिए नजर आ रही है कि अब सरकार को समझ आ गया है कि बिना इन अफसरों पर नजर रखे बात नहीं बनेगी। इसीलिए उसने उन अफसरों को स्थायी रूप से सेवा से रिटायर करने का मन बना लिया है, जो अपने दायित्वों का निर्वाह करने के मामले में कमजोर साबित होंगे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Wednesday, February 15, 2012
ब्रिटेन की मदद के मोहताज क्यों
पिछले दिनों ब्रिटेन में सत्तारूढ़ कंजरवेटिव पार्टी के कुछ सांसदों की भारत को आर्थिक सहायता बंद करने की मुहिम शुरू होने से यहां एक नई बहस छिड़ गई है। किसी का कहना है कि इसके लिए खुद भारत जिम्मेदार है तो कहीं कहा जा रहा है कि भारत को उसकी आर्थिक सहायता ठुकरा देनी चाहिए। दूसरी ओर खुद भारत सरकार ने भी कह दिया है कि वह ब्रिटेन से आर्थिक सहायता नहीं चाहता है। बता दें कि ब्रिटेन से भारत को वर्तमान में 26 करोड़ पाउंड की आर्थिक सहायता हर वर्ष मिलती है। हाल ही में ब्रिटेन के विकास सचिव ने भारत के तीन सबसे गरीब राज्यों को केंद्रित करते हुए अगले चार साल में 110 करोड़ पाउंड की सहायता देने का अनुमोदन किया है। हालांकि ब्रिटेन द्विपक्षीय सहायता के संदर्भ में भारत के लिए सबसे ज्यादा सहायता देने वाला देश है, लेकिन इसके बाद भी वह 1 अरब डॉलर का महज एक तिहाई ही भारत को आर्थिक सहायता के रूप में देता है। वास्तव में देखा जाए तो भूमंडलीकरण के बाद विदेशों से मिलने वाली सहायता राशि निरंतर घटती ही जा रही है। अगर भारत को मिलने वाली कुल सहायता की बात करें तो भारत को वर्ष 2010-11 में दुनिया के दूसरे मुल्कों से 7.8 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता प्राप्त हुई, जबकि भारत ने अफ्रीका सहित अन्य अल्प विकसित देशों को 2.84 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता प्रदान की। ब्रिटेन में भारत को सहायता देने के मसले पर आलोचना करने वालों का कहना है कि जब भारत में 7 प्रतिशत से भी अधिक गति से आर्थिक विकास हो रहा है, क्रय शक्ति समता के आधार पर भारत आर्थिक रूप से दुनिया का तीसरा सबसे ज्यादा शक्तिशाली देश बन चुका है, अपने बलबूते पर अंतरिक्ष कार्यक्रम संचालित कर रहा है, हजारों किलोमीटर दूर मारक क्षमता वाले प्रक्षेपास्त्र बना रहा है, स्वयं का परमाणु कार्यक्रम करने में सक्षम है तो ऐसे राष्ट्र को सहायता लेने की क्या जरूरत है। यही नहीं, भारत में अरबपतियों की संख्या भी अच्छी खासी है और खुद भारत अफ्रीका सरीखे देशों को विकास के लिए भारी आर्थिक सहायता दे रहा है। ऐसे में भारत को आर्थिक देने का कोई औचित्य नहीं है। दूसरी ओर ब्रिटेन सरकार ने इस विवाद को विराम देने का प्रयास करते हुए यह कहा है कि वह भारत को दी जाने वाली आर्थिक सहायता वहां की केंद्र सरकार को न देते हुए, उन राज्यों को सीधा प्रदान करेगी, जो सबसे ज्यादा गरीब और पिछड़े हैं। ब्रिटिश सरकार का कहना है कि भारत के तीन ऐसे सबसे गरीब राज्यों को चिह्नित करते हुए वहां के गरीबों खासतौर पर महिलाओं और बच्चों के आर्थिक उत्थान पर यह आर्थिक सहायता केंद्रित रहेगी। ब्रिटेन के विकास सचिव द्वारा अनुमोदित 1.1 अरब पाउंड की अगले चार वर्षो के लिए सहायता का आवंटन भी इसी तर्ज पर होगा। तर्क कुछ भी दिए जाएं, वास्तविकता यह है कि ब्रिटेन द्वारा भारत को दी जाने वाली आर्थिक सहायता के बारे में यह विवाद भारत और ब्रिटेन के बीच रिश्तों में आई कड़वाहट के कारण पैदा हुआ है। दरअसल, पिछले दिनों भारत ने ब्रिटेन में बने लड़ाकू विमान टाइफून की जगह फ्रांस में बने रफेल जेट के साथ रक्षा सौदा करने को ज्यादा तवज्जो दी। इस बहस में नया मोड़ तब आया, जब ब्रिटेन के अखबार संडे टेलीग्राफ ने भारतीय विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी के एक बयान का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने राज्यसभा में यह कहा था कि भारत को ब्रिटेन द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह राशि भारत के लिहाज से बहुत ही कम है। इस पूरे प्रकरण के कारण ब्रिटेन के कुछ सांसद भड़के हुए हैं। ऐसा लगता है कि ब्रिटेन भारत में लगभग 180 साल शासन करने के कारण अपनी औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर नहीं आ पा रहा है। ब्रिटेन को यह नहीं भूलना चाहिए कि आज परिस्थितियां अलग हैं। भारत का पहले जहां दुनिया के विदेशी व्यापार में भारत का हिस्सा मात्र आधा प्रतिशत होता था, वह अब बढ़कर 1.5 तक पहुंच चुका है। आज भारत से लगभग 250 अरब डॉलर से भी अधिक की वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात होता है। इसी तरह भारत 370 अरब डॉलर की वस्तुओं का आयात भी करता है। आज से करीब 10 साल पहले राजग के शासन काल में वित्तमंत्री जसवंत सिंह ने पहली बार सरकार के बजट में गरीब मुल्कों को भारत से आर्थिक सहायता देने के लिए प्रावधान रखा था। वर्ष 2003 में भारत सरकार ने यह निर्णय लिया कि अब वह केवल छह देशों अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, यूरोपीय समुदाय और रूस से ही आर्थिक सहायता लेगी और उस समय सरकार ने 7,491 करोड़ रुपये के द्विपक्षीय ऋणों को वापस भी कर दिया। हालांकि यह सही है कि आज भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक सेवाओं के लिए अधिक से अधिक धन राशि की जरूरत है ताकि देश की गरीब जनता के लिए अधिकाधिक सुविधाएं जुटाई जा सकें। यहां यह ध्यान देने योग्य है कि यह आर्थिक सहायता अधिकतर ऋणों के रूप में होती है और उसके साथ ब्याज सहित देनदारी भी जुड़ी होती है। यही नहीं, विदेशों से मिलने वाली सहायता में बहुत-सी शर्ते भी साथ में जुड़ी होती हैं, जिसका असर देश की संप्रभुता और आर्थिक विकास की दिशा पर पड़ता है। आज हमारा देश सॉफ्टवेयर प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पूरी दुनिया में अपना एक मुकाम बना चुका है। भारत की अकेली एक कंपनी टीसीएस द्वारा अकेले ही 7.5 अरब डॉलर के सॉफ्टवेयर का निर्यात किया जाता है। अपार व्यावसायिक अवसरों के कारण भारत को अप्रैल 2000 से लेकर नवंबर 2011 तक 390 अरब डॉलर का विदेशी निवेश (प्रत्यक्ष एवं संस्थागत) प्राप्त हो चुका है। दुनिया भर में फैले भारतीयों द्वारा वर्ष 2010 में 5.4 अरब डॉलर से भी अधिक भारत को भेजे गए। भारत अपने प्रवासियों द्वारा दुनिया से राशि प्राप्त करने वाला सबसे बड़ा देश है। चीन को भी अपने प्रवासियों से भारत से कम राशि प्राप्त होती है। ऐसे में ब्रिटेन की 26 करोड़ पाउंड यानी कोई दो हजार करोड़ रुपये की सहायता राशि कोई ऐसा बड़ा मुद्दा नहीं है, जिसके कारण भारत के आर्थिक विकास या गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों में कोई विशेष अंतर आएगा। भारत में चार बड़े फ्लाई ओवर बनाने में ही इतनी धन राशि खप जाती है। केंद्रीय सरकार का वर्ष 2011-12 का बजट ही 12 लाख 57 हजार करोड़ रुपये का था। ऐसे में देश के सम्मान के साथ समझौता करते हुए मात्र 26 करोड़ पाउंड की वार्षिक सहायता (जो अधिकतर ऋण के रूप में ही है) लेने की कोई जरूरत देश को नहीं है। आज भारत को आर्थिक सहायता (ऋण) देने वाले देश भारत में ऐसे कानूनी, प्रशासनिक और वैधानिक परिवर्तन कराने का प्रयास कर रहे हैं, जिससे देश अपनी प्राथमिकताओं से अलग उनके हित साधने वाली आर्थिक नीतियां बनाने को बाध्य हो जाए। विश्व बैंक द्वारा सामाजिक सेवाओं में विदेशी कंपनियों की दावेदारी बढ़ाते हुए विविध प्रकार के दबाव बनाने के कई मामले सामने आए हैं। ऐसे में भारत को विदेशों पर अपनी निर्भरता को समाप्त करते हुए आत्मनिर्भरता के आधार पर देश के विकास को आगे बढ़ाने का काम करना होगा। ब्रिटेन से आने वाली सहायता को वापस भेजते हुए इसकी शुरुआत की जा सकती है। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)
Tuesday, February 14, 2012
संपत्ति पर अधिकार
योजना आयोग एक ऐसा प्रस्ताव ले कर आया है जो भारत में पति-पत्नी के रिश्तों में रेडिकल परिवर्तन ला सकता है, लेकिन पुरुष मानसिकता को देखते हुए कम से कम अगले बीस साल तक ठंडा घर में पड़ा रहेगा। आयोग चाहता है कि विवाह के बाद पति और पत्नी जो भी संपत्ति हासिल करें, उस पर दोनों का समान अधिकार हो। यह प्रस्ताव नया भले ही लगे पर विवाह की अवधारणा में हमेशा मौजूद रहा है। यथार्थ तो यही है कि विवाह के बाद पति-पत्नी एक हो जाते हैं, लेकिन उनकी आर्थिक हैसियत एक नहीं हो जाती। पति राजा है तो वह राजा बना रहता है और पत्नी रंक है तो वह रंक बनी रहती है। राजा के साथ विवाह होने पर वह रानी की तरह रहने लगती है, लेकिन तभी तक जब तक राजा उस पर मेहरबान रहे। विवाह को जो ऊंचा स्थान सभी धर्मो और समुदायों में दिया गया है और विवाह के मंत्र जो कहते हैं उसके साथ इस आर्थिक विषमता का कोई मेल नहीं है। परिणाम यह होता है कि विवाह होते तो स्वर्ग में हैं पर वैवाहिक जीवन नरक में बिताया जाता है। अगर विवाह संस्था को एक मानवीय संस्था बनाना है तो हमें सब तरह की बराबरी पर विचार करना ही होगा। जिस विवाह में स्त्री और पुरुष की आर्थिक हैसियत अलग-अलग हो, वह कभी सफल नहीं हो सकता। इस तरह के जो विवाह सफल दिखाई देते हैं वे स्त्री की पराधीनता पर आधारित होते हैं। अधिकतर मामलों में चूंकि स्त्री का अपना कोई स्वतंत्र आर्थिक आधार नहीं होता इसलिए वह अपने को पति से नीचे मान कर चलती है। वह जानती है कि पति को अप्रसन्न करने के नतीजे कितने भयावह हो सकते हैं। इस तरह विवाह के भीतर किसी तरह का लोकतंत्र नहीं रह जाता। हर मामले में पुरुष की ही मर्जी चलती है, क्योंकि पैसा उसके ही पास होता है और कुछ खर्च करना हो तो पत्नी को उससे पैसा मांगना होता है। इससे पारिवारिक जीवन में उसकी भूमिका बहुत सीमित हो जाती है। अक्सर तो उसका मानसिक विकास भी नहीं हो पाता क्योंकि वह वास्तविक दुनिया की कारगुजारियों से नावाकिफ रहती है। परिवार की आर्थिक स्थिति में किसी प्रकार की सच्ची साझेदारी के अभाव में पत्नियों का अस्तित्व तक उनके अपने हाथ में नहीं रहता। चूंकि उनके पास अपनी मर्जी से खर्च करने के लिए पैसा नहीं होता इसलिए वे अपनी मर्जी का इस्तेमाल करना भी भूल जाती हैं। उन्हें डर होता है कि पति छोड़ देगा तो वे कहां जाएंगी? पिता के परिवार में लौटना कोई सच्चा विकल्प नहीं है। वहां उसका स्वागत करने के लिए शायद ही कोई उत्सुक रहता हो। इसलिए स्त्री की मजबूरी हो जाती है कि वह किसी भी शर्त पर विवाह को टूटने न दे। इस बेबसी का सारा फायदा पुरुष को मिलता है और वह परिवार के सभ्य जंगल में शेर की तरह जीवन बिताता है। इसका असर बेटे-बेटियों पर भी पड़ता है। बेटियां जानती हैं कि परिवार की संपत्ति में उनकी कोई कानूनी हिस्सेदारी नहीं है। विवाह के समय माता-पिता से जो मिल जाए वही उनका धन है और इस धन पर भी उस परिवार का कब्जा हो जाता है जहां वह ब्याह करके जाती है। इससे बेटियों के व्यक्तित्व में एक बेसहारापन अपने आप विकसित हो जाता है। दूसरी ओर बेटे जानते हैं कि परिवार की संपत्ति में उन सबका बराबर हिस्सा है इसलिए उनके व्यक्तित्व में अधिकार चेतना होती है जो उन्हें स्वतंत्र और स्वाभिमानी बनाती है। इसका असर पूरे सामाजिक ढांचे पर पड़ता है। एक आधी आबादी का दूसरी आधी आबादी से रिश्ता बिगड़ा रह जाता है। कह सकते हैं कि स्त्री-पुरुष की भौतिक विषमता हमारी सबसे सबसे तगड़ी आदत है। दूसरी आदतें टूट चुकी हैं या टूट रही हैं, राजतंत्र नहीं रहा, जातियों की ऊंच-नीच को चुनौती मिल रही है, सभी को शिक्षा हासिल करने का अधिकार मिल चुका है, अछूतपन के समर्थन में कोई चूं तक नहीं कर सकता, दलित सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश बन सकता है। स्त्री-पुरुष को बराबरी का हक न देने की हजारों वर्ष पुरानी आदत अभी भी हमें जकड़े हुए है। इस अस्वस्थ आदत को पारिवारिक संपत्ति में बराबरी का अधिकार जरूर धक्का पहुंचाएगा। सच पूछिए तो इससे पुरुष समाज को भी कम फायदा नहीं है। विशेषाधिकार आदमी को बड़ा नहीं, छोटा बनाता है। परिवार में लोकतंत्र नहीं होने से समाज में भी लोकतंत्र नहीं हो पाता। चूंकि पुरुष परिवार के भीतर आर्थिक विषमता को पालता है, इसलिए सामाजिक स्तर पर मौजूद आर्थिक विषमता को चुनौती देने की बात उसके मन में ही नहीं आती। परिवार में पुरुष और स्त्री के बीच जो असमान संबंध होता है वह असमान संबंध समाज में पुरुषों के बीच भी कायम रहता है। जब स्त्री अपनी दिखाई पड़ने वाली जंजीरों से आजाद हो जाएगी तब पुरुष भी अपनी न दिखने वाली जंजीरों से मुक्त हो सकेगा, लेकिन यह समस्या का पूरा हल नहीं है। पूरा हल इसलिए नहीं है कि भारत में संपत्ति है कितने परिवारों के पास? अधिकांश स्ति्रयां अपने पुरुषों की दरिद्रता में ही साझा कर रही हैं। इसलिए योजना आयोग के इस प्रस्ताव से जो सुविधा उच्च और मध्य वर्ग को मिल जाएगी, वह गरीब परिवारों तक नहीं पहुंचेगी। इसलिए योजना बना कर बड़े पैमाने पर संपत्ति का निर्माण और उसका साझा वितरण ही नए समाज की नींव बन सकता है। व्यापक समस्याओं के आंशिक समाधान नहीं होते।
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