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Saturday, February 18, 2012

बाल भुखमरी जारी रखने वाला बिल


राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक-2011 संसदीय प्रक्रिया के तहत संसद की स्थाई समिति के पास भेज दिया गया है। इस विधेयक का मकसद देश से भुखमरी और कुपोषण को मिटाना है; परंतु मौजूदा रूप में यह विधेयक यदि क़ानून बना तो देश में ये दोनों संकट बरकरार रहेंगे। कुपोषण, जिसे प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय शर्म कहा है, विकास के दावों पर काले धब्बे की तरह टिमटिमाता रहेगा, और जैसा कि होता है बहुत बहस के बाद इसे हमेशा के लिए बनी रहने वाली समस्या के रूप में मान्यता दे दी जाएगी। कुपोषण सबसे पहले बच्चों को खाता है और फिर समाज को। हमें यह जरूर देखना चाहिए कि क्या यह विधेयक बच्चों की खाद्य सुरक्षा पर कोई ईमानदार पहल करता है? जवाब है-नहीं बच्चों की खाद्य सुरक्षा का मतलब है, उनकी उम्र और शारीरिक विकास की जरूरत के मुताबिक पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराना। बच्चों को यदि सभी तरह के पोषक तत्व, विटामिन, वसा, कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटिन्स और मिनरल्स नहीं मिलते तो यह तय है कि वे पूरी तरह से पनप नहीं पाएंगे। जब राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून की बात हो रही है, तब जरूरी है कि हम ऐसा क़ानून बनाएं जो बच्चों की इन जरूरतों को विविध प्राकृतिक खाद्य पदार्थों से पूरा करने में सक्षम हो। बच्चों की पोषण संबंधी जरूरतें विविध खाद्यान्नों, दालों, खाद्य तेल, अंडे, मांस, फल-सब्जियों, दूध और कंद के जरिये पूरी होनी चाहिए। केंद्रित खाद्यान्न उत्पादन व्यवस्था से गड़बड़ी यदि देश में खाद्यान उत्पादन व्यवस्था केंद्रीयकृत और कमज़ोर होगी तो बच्चों के पोषण के अधिकार का उल्लंघन होता रहेगा। मौजूदा विधेयक के प्रावधान कुपोषण फैलाव को रोकने वाले क़ानून की भूमिका नहीं निभा पाएगा। एक तरफ यह पोषण की सुरक्षा नहीं दे रहा है, तो वहीं दूसरी ओर, इसमें कुपोषण के सामुदायिक प्रबंधन की कोई चर्चा नहीं की गई है। वर्तमान स्थिति में आंगनवाड़ी और मध्याह्न भोजन योजना में ढांचागत बदलावों की जरूरत है। इनके बिना भोजन का अधिकार एक और औपचारिकता बन कर रह जाएगा। खाद्य असुरक्षा का प्रत्यक्ष कारण आजीविका की असुरक्षा और संसाधनों पर से लोगों के घटते हक हैं। इसलिए बच्चों की खाद्य असुरक्षा को उन नीतियों की संदर्भ में देखे जाने की जरूरत है, जिनके कारण प्रदेश के बच्चों में भुखमरी और पोषण की असुरक्षा लगातार बढ़ती जा रही है। कुपोषण को खत्म करने के सभी प्रयास ज्यादा संस्थाओं और केन्द्रों की स्थापना के साथ जुड़े रहे हैं। हमें कुपोषण और भुखमरी के बुनियादी कारणों (जैसे कृषि और खाद्यान्न उत्पादन के संकट, केवल गेहूं और चावल के उत्पादन को प्रोत्साहन, स्थानीय खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर नीति बनाने वालों की कोई समझ न होना और केन्द्रीयकरण की नीतियां बनना, दालों और खाद्य तेलों तक लोगों की पंहुच कम होना;) को ईमानदारी से समझना और स्वीकार करना होगा। यदि यह विधेयक इन पक्षों पर मौन रहता है, तो तय है कि यह क़ानून बिलकुल बेकार साबित होगा। गरीबी से कुपोषण कि कुपोषण गरीबी? गरीबी हमारे लिए बड़ी चुनौती है; परंतु हमें इस सवाल का जवाब तो खोजना ही होगा कि गरीबी के कारण कुपोषण बढ़ रहा है या फिर कुपोषण के कारण गरीबी बढ़ रही है। मध्य प्रदेश के संदर्भ में हमारा अनुभव बताता है कि कुपोषित होने के कारण लोगों की शारीरिक और मानसिक क्षमताएं बाधित हुई हैं जिनके कारण वे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं और आजीविका के साधनों का उपयोग भी नहीं कर पा रहे हैं। उनका कुपोषण दूर करना होगा, तभी वे विकास की धारा में शामिल हो पाएंगे। मध्य प्रदेश ही एक ऐसा राज्य है, जहां वर्ष 1990 के स्थिति में 43.56 प्रतिशत लोग गरीब थे, जो वर्ष 2010 में बढ़ कर 48.6 प्रतिशत हो गए। यही वह दौर भी था, जब कुपोषण भी 54 प्रतिशत से बढ़ कर 60 प्रतिशत हो गया। सह्त्राब्दी विकास लक्ष्यों के तहत गरीबी के स्तर को 43.56 प्रतिशत से घटा कर 21.78 प्रतिशत पर लाया जाना था, परंतु हम इस लक्ष्य से बहुत दूर होते गए हैं। इसका मतलब है कि जब तक खाद्य असुरक्षा और कुपोषण को पहले दूर नहीं किया जाएगा, तब तक न तो गरीबी कम होगी और न ही विकास के दावों पर विास किया जा सकेगा। सरकार को यह कहना होगा कि बच्चों को कुपोषण और भुखमरी से मुक्त करने के लिए आर्थिक संसाधनों की कोई कमी नहीं आने दी जाएगी। खाद्य सुरक्षा विधेयक का आधार वक्तव्य राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 का आधार वक्तव्य कहता है, यह विधेयक मानव जीवन चक्र में सस्ती दर पर पर्याप्त मात्र में गुणवत्तापूर्ण भोजन के जरिये खाद्य और पोषण सुरक्षा उपलब्ध करने के मकसद से पेश किया जा रहा है, जिससे लोग सम्मानजनक जीवन जी सकें। लेकिन विधेयक बच्चों के भोजन के अधिकार को एकीकृत बाल विकास परियोजना और दोपहर भोजन योजना के दायरे तक ही सीमित करके देखता है। आधार वक्तव्य के बाद पूरे विधेयक में कहीं पर भी इस मंशा को लागू करने वाले प्रावधान दिखाई नहीं देते हैं। सुप्रीम कोर्ट छह साल पहले यह निर्देश दे चुका है कि एकीकृत बाल विकास परियोजना का गुणवत्तापूर्ण सर्वव्यापीकरण किया जाए परंतु केंद्र सरकार ने कहीं पर इसका उल्लेख नहीं किया है। इसका असर आज की पीढ़ी पर भी पढ़ेगा और भावी पीढ़ी पर भी। प्रस्तावित विधेयक के विश्लेषण से पता चलता है कि इसमें बच्चों और महिलाओं के नज़रिए से बनाया नहीं गया है। यह क़ानून बच्चों को कानूनी हकदार नहीं बल्कि कुछ योजनाओं का हितग्राही बनाए रखेगा। गरीबी रेखा और बच्चों के भोजन का अधिकार पिछले 15 वर्षो में भारत सरकार गरीबी के जो अनुमान लगाती रही, वे कभी भी वास्तविकता के करीब नहीं रहे। 1996 में भारत में 36 प्रतिशत परिवारों को गरीब कहा गया था और ठीक पांच वर्ष बाद यानी 2002 में सरकार ने बताया कि अब 26 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे हैं। एक तरफ तो भुखमरी बढ़ रही थी, रोज़गार घट रहे थे, कुपोषण में कोई गिरावट नहीं हो रही थी पर सरकार के मुताबिक गरीबी कम हो रही थी। यह तर्क भारत के सुप्रीम कोर्ट ने नहीं माना। तब केंद्र को मानना पड़ा कि देश में गरीबों की संख्या 36 फीसद पर ही बरकरार है। लेकिन यह आंकड़ा भी सही नहीं माना जा सकता क्योंकि अर्जुन सेन गुप्ता समिति ने वर्ष 2005-06 में बताया कि भारत में 77 प्रतिशत जनसंख्या केवल 20 रुपये प्रतिदिन खर्च करके जिंदा रहती है। उस दौर में योजना आयोग की परिभाषा के मुताबिक़ गरीब उन्हें ही माना गया जो गांव में रोजाना 15 रुपये और शहर में 20 रुपये से कम खर्च कर पा रहे थे। प्रोफेसर सेनगुप्ता ने एक तरह से यह सिद्ध किया कि यदि गांव के स्तर पर भी 20 रुपये के खर्च को जीवन जीने का न्यूनतम खर्च मान लिया जाए तो गरीबी की रेखा में 41 प्रतिशत जनसंख्या जुड़ जाएगी। सरकार ने इस संख्या को कम करने के लिए खर्च की सीमा को नीचे रखा। ऐसे में गरीबी की चयन की प्रक्रिया कभी भी दोषमुक्त नहीं हो पाई। केवल मध्य प्रदेश में ही 27 लाख परिवार इस विसंगति के कारण सस्ते राशन, सामाजिक सुरक्षा और अन्य अधिकारों से वंचित बने रहे। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 की कोई भी विसंगति बच्चों के पोषण और भोजन के अधिकार को वयस्कों से ज्यादा प्रभावित करेगी। गरीबी रेखा से हटाने वाली सूची !
गरीबी रेखा की सूची में प्राथमिक और सामान्य और इसके अलावा बचे परिवारों की श्रेणियों का निर्धारण योजना आयोग के जिन अनुमानों के आधार पर हो रहा है, उनके कारण 31 करोड़ लोग प्राथमिक परिवार की श्रेणी से बाहर होने वाले हैं। इन 31 करोड़ लोगों में से 4.5 करोड़ की उम्र छह वर्ष से कम है। यदि एपीएल और बीपीएल के प्रावधान को मिटाकर इस क़ानून का सर्वव्यापीकरण नहीं किया गया तो 4.5 करोड़ बच्चे सम्मानजनक जीवन के हक़ से सीधे तौर पर वंचित रह जाएंगे। देश की 121 करोड़ जनसंख्या में से लगभग 63 करोड़ लोगों को इस क़ानून का लाभ मिलेगा जबकि अभी 93.17 करोड़ लोगों (वर्तमान जनसंख्या का 77 प्रतिशत) को पर्याप्त भोजन व पोषण नहीं मिल रहा है। इस नज़रिए से यह क़ानून लक्षित नहीं बल्कि सार्वभौमिक होना चाहिए। केवल खाद्यान्न से नहीं मिटेगा कुपोषण राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 कहता है कि प्राथमिक परिवारों को प्रति व्यक्ति सात किलो के हिसाब से सस्ता राशन दिया जाएगा और सामान्य परिवारों को तीन किलो प्रति व्यक्ति प्रति माह खाद्यान्न मिलेगा। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के मानकों के मुताबिक़ पांच सदस्यीय परिवार को लगभग 49 किलो खाद्यान्न की जरूरत होती है। परंतु यह क़ानून ऐसे गरीब परिवारों को अधिकतम 35 किलो खाद्यान्न उपलब्ध करवाएगा। लगभग 25 प्रतिशत जनसंख्या यानी 30 करोड़ लोगों को सामान्य परिवारों की श्रेणी में रखा गया है। इन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य (खाद्यान्न का वह मूल्य जो सरकार किसानों को देती है) से आधी कीमत पर तीन किलो प्रति व्यक्ति प्रतिमाह के हिसाब से खाद्यान्न मिलेगा। यानी पांच सदस्यों के एक परिवार को केवल 15 किलो ही खाद्यान्न मिल पाएगा। भोजन का यह अभाव सबसे पहले बच्चों पर कुअसर डालेगा। बिना तेल और दाल के कोई खाद्य सुरक्षा नहीं देश में बाल कुपोषण का एक बड़ा कारण लोगों के भोजन में प्रोटीन और वसा या चर्बी का अभाव है। यह पोषक तत्व हमें दालों और खाद्य तेल से मिलते हैं। खाद्य सुरक्षा विधेयक केवल अनाज के हक़ की बात करता है, जिनसे प्रोटीन और वसा की जरूरतें पूरी नहीं हो पाएंगी। जब तक खाद्यान्न के साथ-साथ लोगों को इस क़ानून के तहत खाने का तेल और दालें नहीं दिए जाएंगे, इस विधेयक की शुरुआती पंक्तियों में पोषण की सुरक्षा के दावे के मायने नहीं होंगे। बच्चों के नज़रिए से इस विधेयक की समीक्षा आवश्यकता है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक 2011 में बच्चों के लिए ऐसे प्रावधान शामिल किए जाएं जिनसे वे भुखमरी के साए से मुक्त हो सकें।
(लेखक भोजन के अधिकार अभियान के सक्रिय कार्यकर्ता और शोधकर्ता हैं)

निजी हाथों में न सौंपें आईसीडीएस


यह वाकई विचित्र है कि हमारे देश में बाल कुपोषण के अस्वीकार्य रूप से ज्यादा बने रहने पर प्रधानमंत्री का विक्षोभ तभी जागा, जब एक गैर सरकारी संगठन की रिपोर्ट में इस सचाई को रेखांकित किया गया है। इससे पहले भी अनेक रिपोटरे में, जिनमें सरकारी एजेंसियों की रिपोर्टे भी शामिल हैं, इस सचाई को रेखांकित किया गया था कि सकल घरेलू वृद्धि दर के आंकड़े के विपरीत देश के स्वास्थ्य की स्थिति काफी निराशाजनक है। क्या वाकई प्रधानमंत्री को इन सचाइयों की खबर ही नहीं थी?
बाल विकास कार्यक्रम की दशा
देश में नवजात शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर, बाल कुपोषण, खून की कमी आदि के असहनीय रूप से ऊंचे स्तर पर बने रहने की समस्या से निपटने के लिए सरकार के एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में, समेकित बाल विकास परियोजना (आईसीडीएस) 1975 में एक तजुब्रे के रूप में की गई थी और इस कार्यक्रम ने अपनी कारगरता साबित की है। लेकिन सरकार समुचित वित्तीय संसाधन आवंटित करने के जरिए इस कार्यक्रम की पूरी संभावनाओं का दोहन करने के लिए जरूरी कदम उठाने में विफल ही रही है। 28 नवम्बर 2001 को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया था कि आईसीडीएस को सार्वभौम बनाया जाए और उसकी सभी सेवाएं, छह वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों को तथा सभी गर्भवती महिलाओं व नव-प्रसूताओं को मुहैया कराई जाएं। इसके बावजूद, 2004 तक तो इस मामले में संतोषजनक कुछ भी नहीं किया गया। कथित रूप से सार्वभौम बनाए जाने के बावजूद खुद सरकार के ही रिकाडरे के अनुसार, देश में छ: वर्ष से कम आयु के जो 16 करोड़ बच्चे हैं उनमें से, आधे से भी कम ही आईसीडीएस के दायरे में आते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन सेवाओं को सार्वभौम बनाने के लिए आंगनवाड़ियों की संख्या बढ़ाकर 14 लाख करने का आदेश दिया था। इनमें 1,10,000 से ज्यादा आंगनवाड़ी केंद्र तो नाकारा ही बने हुए हैं। दूसरी ओर काम कर रहे माने जाने वाले केंद्रों में से भी 73,000 हजार में कोई आंगनवाड़ीकर्मी ही नियुक्त नहीं किए गए हैं। आंगनवाड़ी सुपरवाइजरों के तो करीब एक-तिहाई पद खाली ही पड़े हुए हैं।
सार्वभौम सिर्फ नाम के वास्ते
इसके अलावा आंगनवाड़ी केंद्रों का फैलाव भी एक जैसा नहीं है। एक ओर तो ऐसे इलाकों में जहां पहले से आंगनवाड़ी केंद्र मौजूद हैं, नये-नये केंद्र खोले जा रहे हैं। दूसरी ओर अनुसूचित जाति/ जनजाति-बहुल इलाकों में दूर-दूर तक कोई आंगनवाड़ी केंद्र ही नहीं हैं। ज्यादातर आंगनवाड़ी केंद्रों के पास अपनी कोई जगह नहीं है और इनमें से अनेक तो अब भी खुली जगहों पर ही चल रहे हैं। सामुदायिक भागीदारी के नाम पर आंगनवाड़ी केंद्रों के लिए भोजन की आपूर्ति, भोजन तैयार करने तथा भोजन के वितरण के कामों का निजीकरण किया जा रहा है। इसका नतीजा यह हो रहा है कि इनके लिए खाद्य की आपूर्ति बहुत बार अनियमित तरीके से होती है और वितरित होने वाला भोजन अक्सर मात्रा में अपर्याप्त व गुणवत्ता में खराब होता है, जिसे बच्चे खाना ही पसंद नहीं करते हैं।
अजीबोगरीब दलील
जिस एनजीओ के अध्ययन ने बाल कुपोषण के सवाल पर प्रधानमंत्री की आत्मा को झकझोर कर जगा दिया है, उसके प्रतिनिधि ने रिपोर्ट जारी किए जाने के मौके पर एक अजीबोगरीब दलील पेश की है। उसने दावा किया कि भारत में बाल कुपोषण की वजह न तो गरीबी है और न भूख। बाल कुपोषण की वजह तो, ‘खाने व खिलाने की आदतों’ में छुपी है! यह तब है जबकि योजना आयोग की मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार पूरे 31 करोड़ भारतीय गरीब हैं। सचाई यह है कि नवउदारवादी नीतियों के बोलबाले के पिछले दशकों में, कुल मिलाकर प्रति व्यक्ति कैलोरी व प्रोटीन आहार में गिरावट ही आई है। वि भूख सूचकांक (जीएचआई) में भारत को, इसके तहत आने वाले 84 देशों में से 67 वें स्थान पर रखा गया है। भूख सूचकांक में देशों को, उनकी कुपोषित आबादी के अनुपात, पांच वर्ष की आयु तक के कम वजन के बच्चों के अनुपात तथा पांच वर्ष की आयु तक के शिशुओं की मृत्यु दर के हिसाब से, आंका जाता है। 2008 में भारत के लिए अलग से जो सव्रे किया गया था, उसमें 15 राज्यों को गिनती में लिया गया था, जिनमें भारत की कुल आबादी का 95 फीसद हिस्सा रहता है। इसका मतलब कोई भी राज्य भूख की मार से बरी नहीं है। इस सव्रे के अनुसार, 12 राज्यों में भूख के पहलू से हालात ‘चिंताजनक’ थे और मध्य प्रदेश के मामले में तो ‘अति-चिंताजनक’। ऐसे मामलों में यह और भी जरूरी हो जाता है कि उपयुक्त रोजगार मुहैया कराने के जरिए लोगों को गरीबी की दलदल से बाहर निकाला जाए। पीडीएस को मजबूत कर, सस्ती दरों पर खाद्यान्न मुहैया कराने तथा इसके तहत क्रम में गेहूं-चावल के साथ दालें व खाने-पकाने का तेल आदि भी सस्ती दरों पर दिया जाना चाहिए। इसके साथ, सभी बच्चों, गर्भवती महिलाओं तथा प्रसूताओं को पर्याप्त मात्रा में पोषक आहार मुहैया कराया जाना भी जरूरी है।
आईसीडीएस का निजीकरण नहीं इलाज
बहरहाल, अंत में बिल्ली थैले से बाहर आ ही गई। प्रधानमंत्री ने यह कहकर अपना छुपा हुआ एजेंडा उजागर कर दिया अब हम कुपोषण का मुकाबला करने के लिए सिर्फ आईसीडीएस के ही भरोसे नहीं रह सकते हैं। नवउदारवादी नीतियों के अपनाए जाने के बाद से ही सरकार इसकी कोशिशों में लगी रही है कि आईसीडीएस का निजीकरण किया जाए और किसी तरह से अपने कंधों पर से यह जिम्मेदारी उतार दी जाए। सामुदायिक हिस्सेदारी के नाम पर पूरक आहार की आपूर्ति, उसे तैयार करने तथा उसके वितरण के काम और आंगनवाड़ी केंद्रों के प्रबंधन का काम पंचायतों को, स्वयं सहायता ग्रुपों को, माता कमेटियों को, एनजीओ को (जिनमें उक्त अध्ययन करने वाला नैगम भी शामिल है) और वेदांत जैसे भीमकाय नैगम घरानों को भी सौंपे जा रहे हैं। कई राज्यों में तो आंगनवाड़ी केंद्रों के ऐन बगल में, उन्हीं बच्चों को लक्ष्य बनाकर सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा अस्थायी आधार पर पोषण केंद्र, नर्सरी केंद्र आदि खोले जा रहे हैं और उन्हीं लाभार्थियों के लिए एक अस्वस्थ्य प्रतियोगिता शुरू की जा रही है। इसके चलते सार्वजनिक धन की बर्बादी भी हो रही है। आंगनवाड़ी सेविकाओं और सहायकों के साथ सरकार बहुत ही बुरा सलूक कर रही है। उन्हें महज ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ मानने की आड़ में सरकार ग्रेच्युटी, पेंशन आदि सामाजिक लाभ भी देने के लिए तैयार नहीं है।
समुचित संसाधन से मिलेंगे नतीजे
महिला व बाल कल्याण मंत्री ने आईसीडीएस का ‘पुनर्गठन’ की बात कही है। किसी भी पुनर्गठन में पर्याप्त बजट आवंटन के जरिए उसे मजबूत किए जाने का प्रयास होना चाहिए न कि उसके निजीकरण का। खेदजनक है कि जहां 11 वीं योजना में आईसीडीएस के लिए 72,877.52 करोड़ रुपये की संशोधित योजना थी। वहीं पूरी योजना अवधि में करीब आधी राशि ही आवंटित की गई। महिला तथा बाल कल्याण मंत्री ने आईसीडीएस के लिए अगले पांच साल में 2 लाख करोड़ रुपये के आवंटन की मांग की है ताकि उसके कामकाज तथा उसके लिए ढांचागत सुविधाओं में बढ़ोतरी की जा सके। अगर हम मुट्ठीभर नैगम कम्पनियों व अमीरों पर विभिन्न कर रियायतों के जरिए पूरे 14,28,028 करोड़ रुपये का राजस्व लुटाया है तो देश के 16 करोड़ बच्चों और करोड़ों गर्भवती व नव-प्रसूताओं के लिए, इतना खर्चा करने से वित्त मंत्रालय को इनकार नहीं करना चाहिए।

पांच में एक ही बच्चा सही वजन का


भूख और कुपोषण पर एक सव्रे रिपोर्ट ने देश के विकास के तिलस्म को चूर-चूर कर दिया। रिपोर्ट के नतीजों ने देश के आलाकमान की नींद उड़ा दी है। यहां तक कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को स्वीकार करना पड़ा कि देश में भुखमरी और कुपोषण की स्थिति चिंताजनक है। जिन 100 जिलों को केंद्रित किया गया, वे थे-बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश। इन राज्यों के जिलों में पाया गया कि 40 प्रतिशत बच्चों का वजन कम था यानी वे अंडरवेट थे और 60 प्रतिशत का कद सामान्य से कम था यानी उनका विकास रुका हुआ था। कम आय वाले, यानी गरीब परिवारों में कुपोषण अधिक पाया गया और इनमें भी मुस्लिम, अनुसूचित जाति व जनजाति वाले परिवारों में पोषण के संकेतक काफी चौंकाने वाले थे। हम जानते हैं कि बाल कुपोषण को मापने का एक महत्त्वपूर्ण आधार है जन्म के समय शिशु का वजन तो यह भी पाया गया कि 50 प्रतिशत वच्चों का वजन जन्म के समय 2.5 किलो से कम था और यह कि 92 प्रतिषत् माताओं को कुपोषण के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी। कुछ और नतीजे भी सामने आए, मसलन कन्याओं के प्रति लापरवाही का रुख रहता है, साथ ही उन्हें बाल्यावस्था में पोषण का जो भी लाभ मिलता है, वह उम्र के साथ पलट जाता है। कुछ राज्यों में जन्म के समय कम वजन वाले शिशुओं का प्रतिशत इस प्रकार है-
सरकारी दावा था कि पिछले 7 वष्रों में बाल कुपोषण में 20.3 प्रतिशत कमी आई है। फिर भी आंकड़े बताते हैं कि कम वजन वाले वच्चे 42 प्रतिशत हैं और कम कद वाले 59 प्रतिशत; इनमें भी आधे बौने हैं। एक और तथ्य सामने आया कि निरक्षर माताओं के बच्चों में कम वजन वालों की संख्या अधिक थी-लगभग 45 प्रतिशत जबकि 10 साल तक शिक्षा प्राप्त माताओं में यह तादाद घटकर 27 प्रतिशत हो गई
तो पूरा हो चुका सहस्रब्दि विकास लक्ष्य
इस रिपोर्ट का जिक्र प्रधानमंत्री के भाषण में महत्व ग्रहण कर गया क्योंकि भारत को सहस्रब्दि विकास लक्ष्य को हासिल करना है और अभी हम काफी पीछे चल रहे हैं। सिंह ने अपने भाषण में कहा-‘हमारे देश में 6 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों की संख्या 6 करोड़ है और हमारी अर्थव्यवस्था और हमारे समाज के स्वास्थ्य की कुंजी इस पीढ़ी के हाथ में है। उन्हें स्वीकारना पड़ा, ‘हमारे देश में कुपोषण की समस्या राष्ट्रीय शर्म का विषय है’। फिर क्या यह हैरानी की बात नहीं कि गरीबी और भूख से लड़ने के लिए जो खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित किया जाना था, उसके लिए इच्छाशक्ति का अभाव ही नहीं दीखा बल्कि विधेयक पोषण की समस्या को छूता तक नहीं है। क्या इस बात को नजरअंदाज किया जा सकता है कि 7 वर्षों के अंतराल में प्रत्येक पांच बच्चों में से केवल एक बच्चा स्वस्थ वजन तक पहुंच सका। प्रधानमंत्री आगाह करते हैं कि इस समस्या का समाधान केवल आईसीडीएस पर निर्भर रहकर नहीं हो सकता बल्कि ‘नीति निर्माताओं और योजनाओं को लागू करवाने वालों को तमाम मसलों के अंतरसंबंधों को समझना होगा, मसलन शिक्षा और स्वास्थ्य, साफ-सफाई, पेय जल और पोषण के आपसी संबंधों को।’
खाद्यान्न सुरक्षा में दें पोषण को महत्त्व
पर प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक वितरण पण्राली को व्यापक बनाने, कृषि के विकास को पोषण से जोड़ने, मिड-डे मील योजना और आईसीडीएस को मजबूत करने या फिर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को गरीबों की पहुंच में लाने के बारे में कुछ भी नहीं कहा और न ही खाद्य सुरक्षा विधेयक में पोषण के पक्ष को महत्त्व देने के बारे में चर्चा की। वे कहते हैं कि स्वस्थ रखने योग्य स्वास्थ्य पर केंद्रित करने से कुछ हासिल नहीं होगा। यह सच है कि बीमारी से बचाव महत्त्वपूर्ण है पर क्या यह संभव होगा, जब देश में एनएचआरएम और जननी सुरक्षा योजना में व्यापक भ्रष्टाचार दिखाई पड़ा है, यहां तक कि बड़े-बड़े घोटाले तक सामने आए हैं पर कोई ऑडिट की व्यवस्था नहीं की गई है। उत्तर प्रदेश में हज़ारों करोड़ रुपयों का घोटाला सामने है। मनमोहन जी का वादा कि 200 चुनिंदा जिलों में वे ‘मल्टीसेक्टोरल’ योजनाएं लागू करवाएंगे और कुपोषण के खिलाफ पूरे देश में अभियान चलवाएंगे; आकषर्क जरूर है पर जमीनी सचाई घोषणाओं से काफी दूर होती है। यह सूरत तब तक नहीं बदलेगी जब तक योजनाओं को लागू करने वाली एजेंसियों पर लापरवाही के बदले सख्त कानूनी सजा़ की नीति नहीं अपनाई जाती और लाभार्थियों के कानूनी अधिकार नहीं बढ़ाए जाते। इस बात का सबूत हमको आंकड़ों में मिलता है, मसलन 6 सबसे अच्छे बाल-विकास सूचकांक वाले जिलों में भी 33 प्रतिशत कम वजन वाले और 43 प्रतिशत कम कद वाले बच्चे पाए गए। आंगनवाड़ी स्कीम के बावजूद भारतीय महिलाओं का एक-तिहाई हिस्सा कम वजन वाला और आधे से अधिक हिस्सा, लगभग 56 प्रतिशत रक्ताल्पता से ग्रस्त पाया गया। 80 प्रतिशत बच्चे भी रक्ताल्पता से पीड़ित पाए गए। यदि भारत इसी रफ्तार से विकास करता रहा तो उसे मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स को हासिल करने में अभी 32 वर्ष और लगेंगे। देश के 8.2 की जीडीपी दर को देखते हुए क्या यह हमारे लिए अशोभनीय नहीं है ?
कृषि को वैीकरण से मुक्त कीजिए
कृषि विकास का प्रश्न हमारे देश के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि ग्रामीण आय का 50 प्रतिशत कृषि क्षेत्र से आता है और हमने पहले ही कहा है कि आय से पोषण का गहरा ताल्लुक है। महिला श्रमिकों का 80 प्रतिशत हिस्सा भी कृषि क्षेत्र में कार्यरत है। इसलिए उनकी स्थिति को बदले बिना बच्चों के बेहतर पोषण की गारंटी करना संभव नहीं है। पर कृषि पर वैीकरण का ऐसा कुप्रभाव पड़ा है कि साल भर इस क्षेत्र में काम मिल पाना संभव नहीं है। कृषि में जो परिवर्तन किए जा रहे हैं, वे न ही आम किसान के हक में हैं, न ही खेतिहर मजदूर के और न ही खाद्यान्न के उपभोक्ताओं के हित में। निर्यात के लिए नकदी फसल उत्पादन पर अधिक जोर है और बड़ी परियोजनाओं, विशेष आर्थिक क्षेत्रों और बांधों व पर्यटन केंद्रों आदि के लिए कृषि भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है। इस संदर्भ में क्या कानूनी परिवर्तन होंगे यह अभी देखना बाकी है। दूसरी ओर, कृषि लागत सामग्री पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष व वि वैंक के इशारे पर सब्सिडी घटाई जा रही है, जिसके चलते कृषि न ही व्यवहार्य न लाभकर साबित हो रहा है। क्रेडिट कार्ड देकर और गाहे-बगाहे उनके कर्ज माफ करके किसानों की खुदकुशी पर रोक नहीं लगाई जा सकती। जहां गेहूं-चावल के स्टाक सड़ जाते हैं, कुपोषण का मुकाबला करने के लिए दाल, दूध, अंडे और मांस की खपत बढ़ानी चाहिए पर इनका उत्पादन ही जरूरत से कम रह जाता है। सार्वजनिक वितरण पण्राली भी इन वस्तुओं का वितरण नहीं करती। राशन पण्राली को व्यापक बनाने की जगह उसे टाग्रेटेड बनाकर व बीपीएल सूची को छोटे से छोटा बनाने की नित नई तरकीबों से गरीबी के आंकड़ों को छिपाया जा रहा है। महिला उत्पादकों को सशक्त बनाने की जगह उन्हें स्वयं सहायता समूहों की सदस्यता देकर अधिकारों से वंचित और व्यापक भ्रष्टाचार का शिकार बनाया जा रहा है। यही नहीं मनरेगा के जरिये ग्रामीण रोजगार में जिस तरह इज़ाफा हो सकता है, उसे भी सीमित करने की नीति बनाई जा रही है। यदि हम कुपोषण और भुखमरी के अन्य कारकों को देखें तो समझ सकेंगे कि वृहद् संरचनात्मक मुद्दे भी मुंह बाएं हल तलाश रहे हैं-मसलन गैरबराबरी-सामाजिक या लैंगिक व आर्थिक, निम्न जीवन स्तर, शिक्षा और स्वास्थ्य का निजीकरण, रोजगार का अभाव, श्रम की कठोर व विपरीत स्थितियां, विस्थापन, भूमि सुधार न होना आदि। ऐसे में गरीब जनता स्थायी विपन्नता के कुचक्र में फंस जाती है, जिससे निकल पाना आसान नहीं होता। अनूसूचित जाति व जनजाति के लोग इसके सबसे अधिक शिकार होते हैं। विपन्नता का सीधा प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है और अस्वस्थ माताओं के बच्चे भी स्थायी गरीबी के कुचक्र में जकड़ जाते हैं, क्योंकि उनकी उत्पादन क्षमता कम हो जाती है। यह भी देखा गया है कि ग्रामीण इलाकों में कृषि मजदूर व शहरी क्षेत्रों में अस्थायी श्रमिक सबसे कम आय में जीवनयापन को बाध्य होते हैं। ऐसे परिवारों को केंद्र में रखकर नीति निर्माण पर बल देना होगा वरना आंकड़ों की जादूगरी देश को विकास के रास्ते पर नहीं ले जा सकेगी।