Tuesday, April 3, 2012

भारी पड़ेंगे तोहफे


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने छात्रों को टेबलेट तथा शिक्षितों को बेरोजगारी भत्ता देने की घोषणा की है। इन जनहितकारी कदमों में संकट छिपा हुआ है। इन कार्यक्रमों के लिए धन जुटाना कठिन है। उत्तर प्रदेश सरकार पर 2.5 लाख करोड़ रुपए का विशाल ऋण पहले ही चढ़ा हुआ है। इन राहतों पर 66 हजार करोड़ का अतिरिक्त खर्च आने का अनुमान है। इस खर्च के लिए और अधिक ऋण लिया जा सकता है, परंतु ऐसा करने पर ब्याज का बोझ बढ़ेगा और आने वाले समय में वित्तीय हालत बिगड़ने से राजनीतिक संकट भी उत्पन्न हो सकता है। यदि अखिलेश लंबी पारी खेलना चाहते हैं तो ऋण लेकर घी पियो नीति का त्याग करके दूसरे उपायों से जनहित हासिल करना होगा। यही बात अन्य राज्य सरकारों पर भी लागू होती है। आर्थिक विकास की गति बढ़ाने के लिए सुशासन स्थापित करना जरूरी है। उद्यमी की ऊर्जा घूस देने और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने में व्यर्थ नहीं होनी चाहिए। सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना होगा। उपाय है कि सभी सरकारी अधिकारियों की कार्यकुशलता और चरित्र का स्वतंत्र एजेंसी द्वारा गुप्त आकलन कराया जाए। वरिष्ठ अफसरों के कार्य आकलन के लिए खुली जन सुनवाई कराई जाए, जिसमें दुखियारों एवं पीडि़तों को अपनी बात उच्च अधिकारियों के सामने कहने का अवसर मिल सके। एक अलग खुफिया तंत्र स्थापित किया जाए जो स्वयं पहल करके भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करे। वर्तमान में शिकायत मिलने पर ही भ्रष्टाचार नियंत्रक एजेंसी हरकत में आती है। इन श्चोतों से मिली सूचना के आधार पर अकुशल और भ्रष्ट अधिकारियों को सेवानिवृत्त किया जाए और कुशल अधिकारियों को प्रमुख कार्य सौंपा जाए। आर्थिक विकास में दूसरी बाधा बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। इस दिशा में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के आधार पर आगे बढ़ा जा सकता है। बिजली एवं पानी के वितरण, शहर के गंदे पानी का ट्रीटमेंट, गाडि़यों का रजिस्ट्रेशन एवं ड्राइविंग लाइसेंस जारी करना, शहर से कचरा उठाना, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवा तथा बस सेवाओं के संचालन जैसे कायरें को आउटसोर्स किया जा सकता है। सड़क बनाने और बिजली संयंत्र लगाने जैसे कायरें को भी निजी उद्यमियों को सौंप देने से बुनियादी संरचना में तेजी से सुधार आएगा। पंजाब में अकाली सरकार ने बस सेवाओं को निजी उद्यमियों को सौंप दिया था, परंतु अधिकतर लाइसेंस राजनेताओं के करीबी लोगों को दिए गए। इससे जनता को बस सुविधा तो उपलब्ध हुई, लेकिन किराए में भारी वृद्धि होने के कारण असंतोष बढ़ा है। ऐसे भ्रष्ट पूंजीवाद से बचना चाहिए। राज्य सरकार की वित्तीय स्थिति के खस्ताहाल होने का प्रमुख कारण कर्मियों के वेतन और पेंशन हैं। इस समस्या से तत्काल निबटना कठिन है। फिर भी उपाय है कि नई भर्ती को पूरी तरह रोक दिया जाए। जिन विभागों के कायरें को आउटसोर्स किया जाता है उनके कर्मचारियों को दूसरे विभागों में भेज दिया जाए। सरकारी कर्मियों की जिम्मेदारी प्राइवेट सप्लायर के कार्य पर निगरानी रखने तक सीमित होनी चाहिए। जैसे सरकारी विद्यालयों को प्राइवेट कंपनियों को चलाने को दे दिया जाए और वर्तमान अध्यापकों को सभी प्राइवेट स्कूलों के निरीक्षण पर लगा दिया जाए तो सरकारी कर्मियों की संख्या धीरे-धीरे घटने में कोई अड़चन नहीं आएगी और सरकारी स्कूलों की ही नहीं, बल्कि प्राइवेट स्कूलों की भी गुणवत्ता में सुधार होगा। राज्य को कंप्यूटर युग में ले जाने का महत्वपूर्ण कार्य टेबलेट बांटकर नहीं होगा। इन टेबलेटों को महज शोकेसों में सजाया जाएगा क्योंकि इनका प्रयोग करने से छात्र का कोई भी उद्देश्य पूरा नहीं होगा। जैसे भूखे को दी गई किताब निष्फल होती है उसी तरह बेरोजगार को दिया गया टेबलेट निष्फल होगा। जनहित हासिल करने के लिए कर नीति में श्रम सघन उत्पादों को बढ़ावा देना चाहिए जैसे हैंडलूम, अगरबत्ती और कागज के लिफाफे बनाने वालों को छूट दी जाए और कपड़ा मिल तथा प्लास्टिक थैले बनाने वाले पर अधिक टैक्स लगाया जाए। केंद्र की गलत नीतियों के चलते हथकरघा जैसे रोजगार समाप्तप्राय हो चुके हैं। राज्य सरकार को अध्ययन कराना चाहिए कि बाजार में बिकने वाली विभिन्न वस्तुओं में कितने श्रम का समावेश हुआ है। श्रम-सघन माल पर टैक्स घटा देना चाहिए और पूंजी-सघन माल पर बढ़ा देना चाहिए। ऐसा करने से राज्य सरकार और उपभोक्ता पर अधिक भार नहीं पड़ेगा और रोजगार स्वत: उत्पन्न होने लगेंगे। इस उद्देश्य के लिए राज्य सरकार को गुड्स एंड सर्विस टैक्स का विरोध करना चाहिए चूंकि इसके लागू होने से राज्य सरकार की टैक्स दरों में फेरबदल करने की स्वायत्तता कम हो जाएगी। किसानों का हित हासिल करने के लिए राज्य सरकारें सस्ती अथवा मुफ्त बिजली एवं पानी दे रही हैं। कृषि उत्पादों के न्यून दामों को देखते हुए यह उचित दिखता है। परंतु इससे बिजली और पानी का भयंकर दुरुपयोग हो रहा है, जिससे राज्य की आर्थिक स्थिति गिर रही है। पानी का सही दाम वसूल किया जाए तो उसी पानी से दोगुना सिंचाई हो सकती है। उपाय है कि बिजली और पानी पर दी जाने वाली सभी रियायतें समाप्त कर दी जाएं। राज्य में कृषि उत्पादों के दामों में समानांतर वृद्धि होने दी जाए जिससे किसान का लाभ पूर्ववत रहे। दूसरे राज्यों से सस्ते माल के आयात पर टैक्स या रोक लगाई जाए अन्यथा दूसरे राज्यों का सस्ता माल प्रवेश करेगा और घरेलू किसान मारा जाएगा। बिजली-पानी के दामों में वृद्धि से जो रकम वसूल होती है, उसे शहरी उपभोक्ताओं द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं पर टैक्स की छूट के रूप में दे दिया जाए। ऐसा करने से किसानों एवं शहरी उपभोक्ताओं दोनों पर अतिरिक्त भार नहीं पड़ेगा परंतु राज्य में कृषि उत्पादन बढ़ जाएगा। बेरोजगारी भत्ता देने के स्थान पर उद्यमियों को रोजगार सब्सिडी देनी चाहिए। बेरोजगारी भत्ता देने से युवाओं में बेरोजगार बने रहने का आकर्षण बढ़ेगा। खबर है कि इस घोषणा के बाद रोजगार कार्यालयों में पंजीकरण की होड़ लग गई है। बेरोजगारी को प्रोत्साहन देने के स्थान पर रोजगार को प्रोत्साहन देना चाहिए। छोटी फैक्टि्रयों के श्रमिकों के प्रोविडेंट फंड के उद्यमी के हिस्से को राज्य सरकार अदा कर सकती है। श्रम कानूनों को सरल बनाया जा सकता है। श्रमिकों को दिए जाने वाले वेतन के एक हिस्से को राज्य सरकार द्वारा दिया जा सकता है। ऐसी नीति बनानी होगी कि उद्यमी के लिए अधिक संख्या में श्रमिकों को रोजगार देना लाभप्रद हो जाए। इन कदमों से राज्य की वित्तीय हालत का सुधार होगा, आर्थिक विकास दर बढ़ेगी, रोजगार उत्पन्न होंगे और टिकाउ जनहित हासिल होगा। (लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं) 12श्चश्रल्ल2@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

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