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Saturday, August 4, 2012

25 की उम्र के बाद भी बेटियों को पारिवारिक पेंशन

रक्षा बंधन पर प्रदेश की महिलाओं को सौगात देते हुए राज्य सरकार ने अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा पुत्री को पारिवारिक पेंशन 25 वर्ष की आयु के बाद भी देने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही पेंशन राशि को 2,550 से बढ़ाकर 6,000 रुपए मासिक कर दिया गया है। इसके साथ ही पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा के दौरान शारीरिक दक्षता परीक्षा में सीना फुलाने में पांच सेमी की छूट दी है तो आरटेट परीक्षा में जनजाति उपयोजना क्षेत्र के अभ्यर्थियों के लिए उत्तीर्णाक 36 प्रतिशत कर दिया गया है। रक्षा बंधन के अवकाश के बावजूद बृहस्पतिवार को यहां मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए। बैठक के निर्णयों के अनुसार राज्य कर्मचारी या पेंशनर की पुत्री को 25 वर्ष की उम्र के बाद भी पारिवारिक पेंशन उस स्थिति में देय होगी, जबकि उसका तलाक शारीरिक अपंगता या मानसिक मनोविकार के कारण हुआ हो। इसी तरह पुत्र या पुत्री के मानसिक विकार, अपंगता, अंधे-गूंगे व बहरे एवं आजीविका अर्जित नहीं करने की क्षमता के कारण 25 वर्ष बाद भी पारिवारिक पेंशन पाने का हकदार होगा। पात्र व्यक्ति की अधिकतम मासिक आय 2,550 से बढ़ाकर 6,000 रुपए प्रतिमाह कर दी गई है। इसके साथ ही कैबिनेट ने कांस्टेबल भर्ती के दौरान शारीरिक दक्षता परीक्षा में अभ्यर्थी के पांच सेमी सीना फुलाने के नियम में संशोधन किया है। कैबिनेट ने इस संशोधन को मंजूरी दे दी है। पहले भर्ती के दौरान अभ्यर्थी के लिए सामान्यतया न्यूनतम सीना 81 सेमी तथा फुलाने के बाद 86 सेमी होना अनिवार्य था। कोर्ट की टिप्पणी के बाद पुलिस मुख्यालय ने पांच सेमी सीना फुलाने की अनिवार्यता में संशोधन प्रस्तावित किया था। इसके अलावा आरटेट परीक्षा में जनजाति उपयोजना क्षेत्र के अभ्यर्थियों अब उत्तीणार्ंक 36 प्रतिशत कर दिया गया है। बैठक में ग्राम सेवक के पद के बहुआयामी कायरें को मद्देनजर रखते हुए ग्राम सेवकों को 500 रुपए प्रतिमाह की दर से विषेष भत्ता एक अगस्त 2012 से स्वीकृत करने का निर्णय लिया है। यह विषेष भत्ता अन्य किसी प्रयोजन के लिए मान्य नहीं होगा। ग्राम सेवकों के वर्तमान पदोन्नति के अवसरों में वृद्धि करने के लिए पंचायत प्रसार अधिकारी के 265 नये पद सृजित करने का भी फैसला लिया है। ग्राम सेवकों को 12 जून 08 के स्थान पर 31 अगस्त 06 से पंचायत प्रसार अधिकारी के पद का वेतनमान चयनित वेतनमान के रूप में स्वीकृत किए जाएंगे। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में हुआ फैसला

साक्ष्य के रूप में डीएनए


अपराध अन्वेषण के क्षेत्र में डीएनए फिंगर प्रिंटिंग की अप्रतिम भूमिका सिद्ध हो चुकी है। इस तकनीक के विकास का श्रेय लेस्टर विश्वविद्यालय, इंग्लैंड के आनुवंशिकीविद प्रो. अलेक जेफरीज को जाता है, जिन्होंने 1985 में इस तकनीक का विकास किया था। भारत में इस विधि के आविष्कार का श्रेय डॉ. लालजी सिंह को है, जो तब हैदराबाद स्थित कोशिकीय एवं आणविक जीन विज्ञान केंद्र (सीसीएमबी) के निदेशक थे। उन्होंने 1988 में इस प्रविधि का विकास किया था। अब वह काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति हैं। 1988 में डॉ. वीके कश्यप ने भारत में इसकी कानूनी स्वीकृति के लिए प्रयास आरंभ किया। 1988 में बहुचर्चित बीना जैन हत्याकांड को बेंगलूर पुलिस ने इसी आधार पर निपटाया था। इस प्रकरण में अपराधियों तक पहुंच पाना अत्यंत दुरूह था, क्योंकि साक्ष्य के तौर पर मात्र मृत महिला की अस्थियां ही उपलब्ध थीं, लेकिन डीएनए फिंगर प्रिंटिंग के आधार पर पुलिस ने हत्या की गुत्थी सुलझा दी। पितृत्व सिद्ध करने के लिए 1989 में तलशेरी (केरल) में एक प्रसिद्ध मुकदमे में यह रीति सफल सिद्ध हुई। फिर मद्रास उच्च न्यायालय में भी एक मुकदमे में इस रीति को अपनाया गया। राजीव गांधी हत्याकांड संबंधी मुकदमे में तनु नामक मानव बम की ठीक से पहचान करने में डीएनए फिंगर प्रिटिंग प्रविधि सफल रही। बिल क्लिंटन और उनकी सचिव मोनिका लेवेंस्की प्रकरण में भी यह सफल रही है। इस संदर्भ में ताजातरीन मामला वयोवृद्ध राजनीतिज्ञ एनडी तिवारी का है। पांच वषरें की अदालती कवायद के बाद अंततोगत्वा सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एनडी तिवारी को अपना ब्लड सैंपल देना ही पड़ा और जब हैदराबाद की सीडीएफसी लैब ने परीक्षण किया तो उनका डीएनए छाप आरोप लगाने वाले और उसकी मां के रक्त नमूनों से हूबहू मैच कर गया। अब यहां यह जानना लाजिमी है कि डीएनए छाप का आधार क्या है और वह कैसे इस तरह के मामलों का निर्धारण करता है अथवा अपराधियों की जड़ तक पहुंचता है? जगनियंता ने धरती के सभी जीवधारियों को अलग-अलग सांचों से ढालकर निकाला है। जिस प्रकार दो व्यक्तियों के हाथों और पैरों की अंगुलियों के निशान या उभार समान नहीं होते उसी प्रकार दो व्यक्तियों के डीएनए प्रिंट भी समान नहीं होते हैं। माता-पिता के डीएनए का कुछ अंश बच्चों से साम्य रखता है और यही है डीएनए फिंगर पिं्रट का आधार। प्रत्येक जीवधारी की समस्त जैविक गतिविधियां कोशिकीय स्तर पर संपन्न होती हैं। मानव शरीर की प्रत्येक कोशिका में पाए जाने वाले डीएनए का तीन प्रतिशत भाग ही जैविकी का नियंत्रक है और यह प्राय: सभी मनुष्यों में समान पाया जाता है। मानव कोशिकाओं के 97 प्रतिशत डीएनए क्या कार्य करते हैं, इसका ज्ञान हमें नहीं है। अत: उन्हें रद्दी जीन (जंक जीन) की संज्ञा दी गई है। जीन वस्तुत: डीएनए के छोटे-छोटे हिस्से हैं। रद्दी जीनों का मात्र दशमलव एक प्रतिशत भाग ही व्यक्तिगत विविधता के लिए जिम्मेदार है। इसी भिन्नता से दो व्यक्तियों के बीच डीएनए प्रिंट पैतृकता का निर्धारण करता है, छाप समान पाए जाने पर अपराधियों तक जा पहुंचता है। जंक जीनों में बहुत सी टेंडम रिपीट (अनुबद्ध श्रृंखला) पाई जाती हैं, जो डीएनए फिंगर प्रिंटिंग का आधार है। डीएनए की संरचना दोहरी कुंडली (डबल हेलिक्स) जैसी होती है। हर कुंडली (फीते) की संरचना शर्करा-फास्फोरस-शर्करा-फास्फोरस से होती है। हर फीते को पाली न्यूक्लिओटाइड कहते हैं। इन फीतों को जोड़ने का काम चार नाइट्रोजन क्षार-एडीनीन (ए), गुआनीन (गु), थायमीन (टी) और साइटोसीन (सी) करते हैं। ए हमेशा टी से और गु हमेशा सी से क्रमश: हाइड्रोजन के दो और तीन कमजोर बंधों से बंधे रहते हैं। न्यूक्लिओटाइडों की बार-बार दोहराई जाने वाली एक ही श्रृंखला को टेंडम कहते हैं। टेंडम रिपीट्स की संख्या परिवर्तनशील होती है। कभी-कभी दो या तीन इकाइयों का समूह अथवा ऐसे सैकड़ों समूह दोहराए जाते हैं। जैसे एक फीते में दो दोहराव-जीएटीए/जीएटीए-अथवा तीन दोहराव जीएटीए/जीएटीए/जीएटीए। तो इसके पलट दूसरे फीते में क्रम इसका ठीक उल्टा होगा, जैसे सीटीएटी/सीटीएटी और इसी प्रकार तीन दोहराव इस प्रकार होगा-सीटीएटी/सीटीएटी/सीटीएटीआदि। उल्लेखनीय है कि प्रत्येक व्यक्ति में पाया जाने वाला डीएनए पुनरावृत्त अनुक्रम (टेंडम रिपीट) समान नहीं होता है। टेंडम रिपीटों की भिन्नता ही व्यक्ति की विशिष्टता है और यह हम विरासत में अपने जनकों से प्राप्त करते हैं। टेंडम रिपीटों की संख्या में भिन्नता के कारण इस क्षेत्र को चर संख्या टेंडम पुनरावृत्त कहते हैं। यदि दो डीएनए प्रतिचित्रों में वीएनटीआर की लंबाई समान है तो इसका अर्थ यह है कि वे एक ही व्यक्ति से प्राप्त किए गए हैं और यदि वीएनटीआर की लंबाइयों में भिन्नता है तो समझना चाहिए कि दोनों डीएनए नमूने भिन्न-भिन्न व्यक्तियों से लिए गए हैं। इसी आधार पर डीएनए प्रतिचित्र एक ऐसा साक्ष्य बन जाता है जो पितृत्व सिद्ध करने अथवा अपराधियों की पहचान करने में विश्वसनीय प्रमाण सिद्ध होता है। डीएनए फिंगर प्रिंटिंग से प्राप्त बैंड नमूने हर व्यक्ति के भिन्न होते हैं। उंगलियों से प्राप्त चिह्नों में जिस प्रकार एक विशिष्टता होती है उसी प्रकार हर डीएनए फिंगर प्रिंटिंग में विशिष्टता होती है, जो एक व्यक्ति की दूसरे से अलग पहचान बनाती है। इस प्रविधि में रक्त, वीर्य, बालों के टुकड़े या फिर मृतक के नाखूनों से चिपकी हुई अपराधी की चमड़ी का अल्पांश भी मिल जाए तो अपराधी तक पहुंचा जा सकता है। डीएनए का स्वरूप कभी भी नहीं परिवर्तित होता है, यहां तक कि मृत्यु के बाद भी और इसीलिए इसकी मैचिंग अकाट्य साक्ष्य है। (लेखक विज्ञान मामलों के विशेषज्ञ हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

Tuesday, April 3, 2012

भारी पड़ेंगे तोहफे


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने छात्रों को टेबलेट तथा शिक्षितों को बेरोजगारी भत्ता देने की घोषणा की है। इन जनहितकारी कदमों में संकट छिपा हुआ है। इन कार्यक्रमों के लिए धन जुटाना कठिन है। उत्तर प्रदेश सरकार पर 2.5 लाख करोड़ रुपए का विशाल ऋण पहले ही चढ़ा हुआ है। इन राहतों पर 66 हजार करोड़ का अतिरिक्त खर्च आने का अनुमान है। इस खर्च के लिए और अधिक ऋण लिया जा सकता है, परंतु ऐसा करने पर ब्याज का बोझ बढ़ेगा और आने वाले समय में वित्तीय हालत बिगड़ने से राजनीतिक संकट भी उत्पन्न हो सकता है। यदि अखिलेश लंबी पारी खेलना चाहते हैं तो ऋण लेकर घी पियो नीति का त्याग करके दूसरे उपायों से जनहित हासिल करना होगा। यही बात अन्य राज्य सरकारों पर भी लागू होती है। आर्थिक विकास की गति बढ़ाने के लिए सुशासन स्थापित करना जरूरी है। उद्यमी की ऊर्जा घूस देने और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने में व्यर्थ नहीं होनी चाहिए। सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना होगा। उपाय है कि सभी सरकारी अधिकारियों की कार्यकुशलता और चरित्र का स्वतंत्र एजेंसी द्वारा गुप्त आकलन कराया जाए। वरिष्ठ अफसरों के कार्य आकलन के लिए खुली जन सुनवाई कराई जाए, जिसमें दुखियारों एवं पीडि़तों को अपनी बात उच्च अधिकारियों के सामने कहने का अवसर मिल सके। एक अलग खुफिया तंत्र स्थापित किया जाए जो स्वयं पहल करके भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करे। वर्तमान में शिकायत मिलने पर ही भ्रष्टाचार नियंत्रक एजेंसी हरकत में आती है। इन श्चोतों से मिली सूचना के आधार पर अकुशल और भ्रष्ट अधिकारियों को सेवानिवृत्त किया जाए और कुशल अधिकारियों को प्रमुख कार्य सौंपा जाए। आर्थिक विकास में दूसरी बाधा बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। इस दिशा में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के आधार पर आगे बढ़ा जा सकता है। बिजली एवं पानी के वितरण, शहर के गंदे पानी का ट्रीटमेंट, गाडि़यों का रजिस्ट्रेशन एवं ड्राइविंग लाइसेंस जारी करना, शहर से कचरा उठाना, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवा तथा बस सेवाओं के संचालन जैसे कायरें को आउटसोर्स किया जा सकता है। सड़क बनाने और बिजली संयंत्र लगाने जैसे कायरें को भी निजी उद्यमियों को सौंप देने से बुनियादी संरचना में तेजी से सुधार आएगा। पंजाब में अकाली सरकार ने बस सेवाओं को निजी उद्यमियों को सौंप दिया था, परंतु अधिकतर लाइसेंस राजनेताओं के करीबी लोगों को दिए गए। इससे जनता को बस सुविधा तो उपलब्ध हुई, लेकिन किराए में भारी वृद्धि होने के कारण असंतोष बढ़ा है। ऐसे भ्रष्ट पूंजीवाद से बचना चाहिए। राज्य सरकार की वित्तीय स्थिति के खस्ताहाल होने का प्रमुख कारण कर्मियों के वेतन और पेंशन हैं। इस समस्या से तत्काल निबटना कठिन है। फिर भी उपाय है कि नई भर्ती को पूरी तरह रोक दिया जाए। जिन विभागों के कायरें को आउटसोर्स किया जाता है उनके कर्मचारियों को दूसरे विभागों में भेज दिया जाए। सरकारी कर्मियों की जिम्मेदारी प्राइवेट सप्लायर के कार्य पर निगरानी रखने तक सीमित होनी चाहिए। जैसे सरकारी विद्यालयों को प्राइवेट कंपनियों को चलाने को दे दिया जाए और वर्तमान अध्यापकों को सभी प्राइवेट स्कूलों के निरीक्षण पर लगा दिया जाए तो सरकारी कर्मियों की संख्या धीरे-धीरे घटने में कोई अड़चन नहीं आएगी और सरकारी स्कूलों की ही नहीं, बल्कि प्राइवेट स्कूलों की भी गुणवत्ता में सुधार होगा। राज्य को कंप्यूटर युग में ले जाने का महत्वपूर्ण कार्य टेबलेट बांटकर नहीं होगा। इन टेबलेटों को महज शोकेसों में सजाया जाएगा क्योंकि इनका प्रयोग करने से छात्र का कोई भी उद्देश्य पूरा नहीं होगा। जैसे भूखे को दी गई किताब निष्फल होती है उसी तरह बेरोजगार को दिया गया टेबलेट निष्फल होगा। जनहित हासिल करने के लिए कर नीति में श्रम सघन उत्पादों को बढ़ावा देना चाहिए जैसे हैंडलूम, अगरबत्ती और कागज के लिफाफे बनाने वालों को छूट दी जाए और कपड़ा मिल तथा प्लास्टिक थैले बनाने वाले पर अधिक टैक्स लगाया जाए। केंद्र की गलत नीतियों के चलते हथकरघा जैसे रोजगार समाप्तप्राय हो चुके हैं। राज्य सरकार को अध्ययन कराना चाहिए कि बाजार में बिकने वाली विभिन्न वस्तुओं में कितने श्रम का समावेश हुआ है। श्रम-सघन माल पर टैक्स घटा देना चाहिए और पूंजी-सघन माल पर बढ़ा देना चाहिए। ऐसा करने से राज्य सरकार और उपभोक्ता पर अधिक भार नहीं पड़ेगा और रोजगार स्वत: उत्पन्न होने लगेंगे। इस उद्देश्य के लिए राज्य सरकार को गुड्स एंड सर्विस टैक्स का विरोध करना चाहिए चूंकि इसके लागू होने से राज्य सरकार की टैक्स दरों में फेरबदल करने की स्वायत्तता कम हो जाएगी। किसानों का हित हासिल करने के लिए राज्य सरकारें सस्ती अथवा मुफ्त बिजली एवं पानी दे रही हैं। कृषि उत्पादों के न्यून दामों को देखते हुए यह उचित दिखता है। परंतु इससे बिजली और पानी का भयंकर दुरुपयोग हो रहा है, जिससे राज्य की आर्थिक स्थिति गिर रही है। पानी का सही दाम वसूल किया जाए तो उसी पानी से दोगुना सिंचाई हो सकती है। उपाय है कि बिजली और पानी पर दी जाने वाली सभी रियायतें समाप्त कर दी जाएं। राज्य में कृषि उत्पादों के दामों में समानांतर वृद्धि होने दी जाए जिससे किसान का लाभ पूर्ववत रहे। दूसरे राज्यों से सस्ते माल के आयात पर टैक्स या रोक लगाई जाए अन्यथा दूसरे राज्यों का सस्ता माल प्रवेश करेगा और घरेलू किसान मारा जाएगा। बिजली-पानी के दामों में वृद्धि से जो रकम वसूल होती है, उसे शहरी उपभोक्ताओं द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं पर टैक्स की छूट के रूप में दे दिया जाए। ऐसा करने से किसानों एवं शहरी उपभोक्ताओं दोनों पर अतिरिक्त भार नहीं पड़ेगा परंतु राज्य में कृषि उत्पादन बढ़ जाएगा। बेरोजगारी भत्ता देने के स्थान पर उद्यमियों को रोजगार सब्सिडी देनी चाहिए। बेरोजगारी भत्ता देने से युवाओं में बेरोजगार बने रहने का आकर्षण बढ़ेगा। खबर है कि इस घोषणा के बाद रोजगार कार्यालयों में पंजीकरण की होड़ लग गई है। बेरोजगारी को प्रोत्साहन देने के स्थान पर रोजगार को प्रोत्साहन देना चाहिए। छोटी फैक्टि्रयों के श्रमिकों के प्रोविडेंट फंड के उद्यमी के हिस्से को राज्य सरकार अदा कर सकती है। श्रम कानूनों को सरल बनाया जा सकता है। श्रमिकों को दिए जाने वाले वेतन के एक हिस्से को राज्य सरकार द्वारा दिया जा सकता है। ऐसी नीति बनानी होगी कि उद्यमी के लिए अधिक संख्या में श्रमिकों को रोजगार देना लाभप्रद हो जाए। इन कदमों से राज्य की वित्तीय हालत का सुधार होगा, आर्थिक विकास दर बढ़ेगी, रोजगार उत्पन्न होंगे और टिकाउ जनहित हासिल होगा। (लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे