हाल के दिनों में ऐसी खबरें आई थीं कि जनलोकपाल बिल के नाम पर देश में बड़ा सामजिक आंदोलन खड़ा करने वाली टीम अन्ना का आंदोलन एनजीओ के विदेशी फंड की देन था। इसका भी कारण यह बताया गया कि टीम अन्ना के जनलोकपाल बिल का जो मसौदा सरकार के सामने पेश किया गया था, उसमें प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने का तो प्रावधान था, लेकिन एनजीओ, मीडिया और कॉरपोरेट घरानों को बाहर रखने की सिफारिश की गई थी। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि टीम अन्ना और उसका समर्थन करने वाले कई लोगों के ऐसे एनजीओ संचालित हैं, जिन्हें विदेशों से करोड़ों का अनुदान मिलता है। मसलन, टीम अन्ना के मुख्य सिपहसालार अरविंद केजरीवाल के एनजीओ कबीर ने 2010-11 में अमेरिका के मिशीगन स्थित फोर्ड फाउंडेशन से करीब 3,97,000 डॉलर हासिल किए थे। फोर्ड फाउंडेशन के अलावा इन लोगों ने कोक और लेहमन ब्रदर्स से भी करोड़ों रुपये हासिल किए हैं। इसी तरह योगेंद्र यादव के एनजीओ को 3.5 लाख डॉलर, पार्थिव शाह के एनजीओ को 2.55 लाख डॉलर, अमिताभ बेहर के नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया को 2.5 लाख डॉलर मिले हैं। ऐसे एनजीओ की फेरहिस्त काफी लंबी है, जिन्हें विदेशों से करोड़ों की आर्थिक मदद मिली है। टीम अन्ना के अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी के एनजीओ लाखों के वारे-न्यारे कर रहे हैं। यह जांच का विषय है कि चंदे के रूप में विदेशों से भारी-भरकम रकम वसूलने वाले एनजीओ मिली रकम में से कितने धन का इस्तेमाल सही मकसद के लिए करते हैं? हाल ही में सरकारी रिकॉर्ड से पता चला है कि करीब 22,000 एनजीओ को समाज सेवा के लिए 2009-10 के दौरान विदेशों से 10,000 करोड़ रुपये का अनुदान मिला है। इसमें से 3218 एनजीओ तमिलनाडु से संबंधित हैं, जिन्हें 1663.31 करोड़ रुपये की सहायता खासकर अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली और नीदरलैंड जैसे देशों से मिली है। यह रिपोर्ट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस बयान के बाद आई है कि तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु संयंत्र के विरोध प्रदर्शन को तेज करने के लिए कुछ एनजीओ को विदेशी धन मिला है। गत 11 जनवरी को केंद्रीय गृहसचिव आरके सिंह की रिपोर्ट के अनुसार कथित तौर पर कोष का दुरुपयोग करने के आरोप में 12 एनजीओ को निगरानी दायरे में रखा गया है, वहीं चार अन्य के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 21,508 समूहों को कुल 10,337.59 करोड़ रुपये की विदेशी मदद मिलने की जानकारी है। राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच सबसे ज्यादा विदेशी सहायता दिल्ली को करीब 1,815.91 करोड़ रुपये की मिली है। इसके बाद तमिलनाडु 1,663.31 करोड़ और आंध्र प्रदेश को 1,324.87 करोड़ रुपये मिले हैं। पिछले तीन साल (2007-2010) के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि सबसे ज्यादा अनुदान अमेरिका से प्राप्त हुआ है। विदेशी अनुदान की सबसे ज्यादा राशि 1,482.58 करोड़ रुपये कार्यालयीन खर्चे में शामिल है, जबकि ग्रामीण विकास के लिए 944.13 करोड़ और बच्चों के कल्याण के लिए 742.42 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। जहां तक बात एनजीओ को मिलने वाली विदेशी सहायता की है तो वर्ल्ड विजन इंडिया तमिलनाडु को 208 करोड़ रुपये दिए गए हैं, जबकि रूरल डेवलपमेंट ट्रस्ट अनंतपुर को 151 करोड़ रुपये मिले हैं। देश के उन 12 बड़े एनजीओ की सीबीआइ जांच चल रही है, जिन्हें बड़ी मात्रा में विदेशी अनुदान प्राप्त होता है। इनके बारे में पुख्ता सबूत मिल रहे हैं कि ये विदेशों से मिल रही भारी-भरकम धनराशि का इस्तेमाल सरकारी कामकाज में बाधा पहुंचाने के लिए कर रहे हैं। अब जबकि सरकार तथा खुफिया एजेंसियां यह पता लगाने में कामयाब हो ही गई हैं कि भारत में मौजूद कुछ एनजीओ विदेशी धन की प्राप्ति के लिए देश और सरकार को अस्थिर करना चाहते हैं तो सरकार को ऐसे एनजीओ पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि जब भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए मजबूत जनलोकपाल अवश्यंभावी है, तब एनजीओ को इसके दायरे से बाहर रखने की साजिश में कौन-सी ताकतें शामिल हैं? ऐसा नहीं है कि सभी एनजीओ भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं या सरकार को अस्थिर करने का प्रयास करते हैं, लेकिन जंगल में मोर नाचते किसने देखा? एनजीओ को विदेशों से प्राप्त धनराशि किन मदों में खर्च की जा रही है, इसका पूरा ब्यौरा सरकार को जुटाना चाहिए। गड़बड़ी की आशंका में बिना किसी दबाव के राष्ट्र विरोधी एनजीओ पर नकेल कसनी चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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