| भारत में अंध-देशभक्त उग्र राष्ट्रवाद की ऐसी ताकते हैं कि अग्नि-5 को छोड़े जाने का स्वागत गाजे-बाजे और तलवारें भांजने के साथ किया गया। राजनीतिक दलों ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ( डीआरडीओ) की वैज्ञानिक उपलब्धि के लिए उसकी जमकर तारीफ की। किसी ने यह तक नहीं सोचा कि 1950 के दशक की पुरातन प्रौद्योगिकी को कोई मौलिक चीज कैसे कह सकता है और यह भी कि इस तरह की उपलब्धियां जनसंहार के हथियारों तक ही सीमित क्यों हैं? किसी भी पार्टी ने उस पगलाई सी खुशी की आलोचना नहीं की, जो मीडिया में साफ तौर पर नजर आई। किसी ने भी मिसाइलों और परमाणु हथियारों की दौड़ के खतरों की चेतावनी नहीं दी, जो पूरे क्षेत्र को बुरी तरह से अस्थिर कर सकती है। चीन में ‘ग्लोबल टाइम्स’ की शत्रुतापूर्ण प्रतिक्रिया पर भी प्रतिक्रिया कोई अधिक संतुलित नहीं थी। चीन के सरकारी समाचार पत्र ने बेहद कड़े शब्दों में कहा था कि भारत एक ‘ मिसाइल भ्रम’ में पड़ा है परंतु चीन के साथ हथियारों की दौड़ में कुल मिलाकर वह कहीं नहीं खड़ा होता है। अगर भारत के पास चीन के ज्यादातर हिस्सों तक पहुंचने वाली मिसाइलें मौजूद हैं, तो भी इसका यह अर्थ नहीं कि चीन के साथ विवाद के दौरान अहंकारी होने से उसे कुछ हासिल हो जाएगा। भारत को यह साफ-साफ पता होना चाहिए कि चीन की परमाणु क्षमता अधिक शक्तिशाली और भरोसेमंद है। इस चीनी विचार की अच्छाई-बुराई जो भी हो, यह साफ है कि भारत के बेलेस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को सिर्फ पाकिस्तान नहीं बल्कि चीन भी एक सामरिक खतरा मानता है। आखिरकार अग्नि को बीजिंग, शंघाई और पूर्वी चीन के दूसरे शहरों तक पहुंचने के लिए बनाया गया है। चीन की बदले की कार्रवाई काफी मंहगी पड़ेगी। पर इस हषारेन्माद के बीच कोई इस खतरे पर बात नहीं कर रहा है। हषरेन्माद अन्य कारणों से भी अनुचित है। अग्नि भारत के जिस इंटीग्रेटिड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम का हिस्सा है, वह तकनीकी तौर पर किसी शानदार सफलता से बहुत दूर है। 1983 में शुरू हुए इस कार्यक्रम को पृथ्वी, अग्नि, आकाश, त्रिशूल और नाग मिसाइलों को 1997 तक विकसित कर लेना था। समय सीमा निकलने के 10 साल बाद और लागत में 400 गुने की बढ़ोतरी के बावजूद केवल कम दूरी की मारक क्षमता वाली पृथ्वी और अग्नि के तीन आधे-अधूरे प्रारूप ही तैयार हो पाए थे। डीआरडीओ को द्रव्य ईंधन से ठोस ईंधन प्रोपलशन में जाने में गंभीर समस्याएं आ रहीं थीं। परमाणु ऊर्जा विभाग की ही तरह डीआरडीओ ने भी कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं की हैं, जिनमें मेन बेैटिल टैंक, परमाणु ऊर्जा चलित पनडुब्बियां और हल्के लड़ाकू विमान शामिल हैं। जल्द ही यह घोषणा करना एक आदत बन गई कि दो या तीन परीक्षण उड़ानों के बाद, जिनमें से सब सफल नहीं थीं, मिसाइल को विकसित किया जा चुका है। दूसरे देशों में मिसाइलों को तब तक शमिल नहीं किया जाता है जब तक कि 8 या 12 परीक्षण उड़ानों में उनकी विसनीयता और सटीकता प्रमाणित नहीं हो जाती है। अनेक प्रकार की मिसाइलों को शामिल करने और उनको चलाने में भारतीय सेना और वायु सेना को समस्याओं का सामना करना पड़ा है। हारकर 2008 में आईजीएमडीपी को खत्म कर दिया गया था। पिछले नवम्बर में भारत ने 3,500 किलोमीटर क्षमता की अग्नि-4 का विकास और परीक्षण बजट में दिए गए मूल से दोगुना अधिक समय लगाने के बाद किया था। इसमें तीसरी अवस्था को जोड़कर डीआरडीओ ने इसकी मारक क्षमता को 5,000 किलोमीटर कर दिया। यह अब भी आईसीबीएम से पीछे है, जिसकी न्यूनतम मारक क्षमता को अनेक देश 5,500 या 8,000 किलोमीटर मानते हैं। खुद डीआरडीओ मानता है कि अग्नि-5 केवल 80 प्रतिशत स्वदेशी है। इस दावे पर भी चीनी विशेषज्ञों ने गंभीर सवाल उठाए हैं कि अग्नि-5 को ट्रक से भी छोड़ा जा सकता है। उनका कहना है कि इसका 50 टन का वजन सड़कों और पुलों के मामले में भारत के आदिम उपरी ढांचे को देखते हुए समस्या पैदा करेगा। इस सब की परवाह कए बगैर डीआरडीओ अब यह डींग हांक रहा है कि वह 2 मीटर की अग्नि-5 को मल्टी इंडिपेंडेटली टारगेटिड री-ऐंट्री विहिक्लस (एमआईआरवी) अर्थात अनेक वारहेड्स से लैस करना चाहता है, जो भिन्न-भिन्न निशानों पर चोट कर सकें। पर एमआईआरवी को अभी पूरी तरह से चीन भी विकसित नहीं कर पाया है। डीआरडीओ अगि- 5 का इस्तेमाल सेटेलाइट-रोधी अस्त्र के रूप में भी करना चाहता है। वह ऐसी मिसाइलें भी विकसित करना चाहेगा जिनका इस्तेमाल दोबारा किया जा सकता हो। इनमें से हरेक रास्ता आपसी होड़ और लागतों के बेहद ऊंचे होने के खतरों से भरा है। अगर हमारे देश का सिद्धांत पहले प्रयोग नहीं अर्थात भारत पर जब तक परमाणु अस्त्रों से पहले हमला नहीं होता वह हमला नहीं करेगा; के साथ भरोसेमंद न्यूनतम अवरोधक विकसित करना है, तो इतने भारी खर्च का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। सेटेलाइट-रोधी मिसाइलों का विचार बाहरी अंतरिक्ष के सैन्यीकरण के विरुद्ध भारत के बार-बार दोहराए गए दृष्टिकोण के विरुद्ध है। इस प्रकार का सैन्यीकरण गंभीर खतरों से भरा है, जिनमें बैलेस्टिक मिसाइल प्रतिरक्षा या ‘सन ऑफ स्टार वार्स‘ भी शामिल है, जिससे हथियारों की दौर तेज होकर नए स्तरों पर पहुंच जाएगी। दोबारा इस्तेमाल होने वाली मिसाइल का विचार तो सीधे-सीधे आर्थिक तबाही का नुस्खा है। इस प्रकार के फैसलों या इरादों का एलान करना डीआरडीओ का काम नहीं है। यह विशेषाधिकार राजनीतिक नेतृत्व का है। 1998 में परमाणु परीक्षण कराने के लिए भाजपा और डीआरडीओ के जोड़ को छूट देकर भारत ने सुरक्षा के लिए भारी कीमत अदा की है। सही बात तो यह है कि परमाणु हथियारों ने भारत और पाकिस्तान को अधिक असुरक्षित बना दिया है। दोनों देशों के लाखों निहत्थे नागरिकों पर परमाणु मिसाइलों के आक्रमण का खतरा मंडराने लगा है, जिससे बचने का कोई उपाय नहीं है। दोनों देश भारी मात्रा में बमों के ईंधन के ढेर लगा रहे हैं। अपने यूरोनियम समृद्धि कार्यक्रम का विस्तार भी करने के साथ पाकिस्तान प्लूटोनियम उत्पादन की नई सुविधाओं का निर्माण कर रहा है। इन दो राष्ट्रों के बीच नाममात्र के लिए भी हथियार नियंतण्रकी कोई प्रक्रिया नहीं चल रही है। 50 साल तक भारत परमाणु निवारण के खिलाफ एक सैद्धांतिक द्दष्टिकोण पर कायम रहा है। हमने प्रतिरोध को नैतिक रूप से घृणित कहा था क्योंकि इसके मूल में मानव जीवन के प्रति निर्मम अवमानना और शत्रु देश के लाखों नागरिकों की हत्या करने की तत्परता है। भारत ने कहा था कि निवारक हथियारों की दौड़ की ओर ले जाता है, जो अधिक असुरक्षा पैदा करती है, और जो आर्थिक रूप से विनाशकारी हो सकती है। इससे शीतयुद्व के जमाने में अमेरिका और सोवियत संघ की अगुआई में दोनों गुटों द्वारा परमाणु हथियारों के भयानक जखीरे, मिसाइलों की होड़ तथा जनसंहार और परंपरागत शस्त्रास्त्रों पर लगातार बढ़ते हुए खचोर्ं के साथ इसका सच बाहर आता है। 1950 के दशक के प्रारंभ में प्रत्येक गुट के पास जो थोड़े से परमाणु हथियार थे, वे हथियारों की दौड़ के चलते 1960 के दशक में कई सौ और 70 के दशक में कई हजार तक हो गए थे। 1980 के दशक के मध्य तक ये 70,000 की भयावह संख्या को पार कर गए थे, जो सारी दुनिया को 50 बार खत्म करने के लिए काफी थे। पल भर में छोड़े जाने वाली मिसाइलों के सिरों पर हजारों परमाणु सिरे लगा दिए गए थे। यह एक बड़ी त्रासदी है कि नई दिल्ली ने परमाणु प्रतिरोधकों के सच को अपनी चेतना से मिटा दिया है। वह चीन के साथ मिसाइल और परमाणु हथियारों की दौड़ में लग गया है, जो आर्थिक आकार और सैनिक खर्च दोनों के मामले में भारत से तीन गुना बड़ा है। भारत को ठहर कर दोबारा सोचना और चीन तथा पाकिस्तान के साथ होड़ को कम करने के कूटनीतिक विकल्पों को तलाशना चाहिए। |
Monday, April 30, 2012
’अग्नि‘ पर इतराने वालों से कुछ सवाल
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