सनातन भारतीय परंपरा में प्रकृति के पंच तत्वों को अनमोल माना गया है। इसलिए संपूर्ण प्रचीन भारतीय साहित्य में आग, हवा और पानी का कहीं मोल निर्धारित किया हो, ऐसा देखने में नहीं आता। लेकिन जीवन के लिए जरूरी बुनियादी जरूरतों का एक निश्चित मूल्य तय कर उसे आर्थिक उत्पाद बनाने की कोशिश की मुहिम प्रधानमंत्री ने छेड़ दी है। हाल ही में दिल्ली में भारत जल सप्ताह का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि मौजूदा कानून भूमि के मालिकों को अपनी भूमि से मर्जी के मुताबिक जल निकालने का अधिकार देते हैं। इसकी कोई सीमा नहीं है। लिहाजा, इसे कानून बनाकर नियंत्रित करने की जरूरत हैं। तय है कि प्रधानमंत्री ऐसे उपाय करने का इरादा जता रहे हैं, जिसमें पानी बेचने की मंशा अंतर्निहित है। भारत सरकार ने कुछ समय पहले जो नई जल नीति का प्रारूप तैयार किया है, उसमें भी पानी को बाजार के हवाले करने के संकेत हैं। प्रारूप में खेती और घरेलू क्षेत्र में पानी के इस्तेमल पर जो छूटें मिलती हैं, उन्हें पूरी तरह खत्म करने का सुझाव दिया गया है। जाहिर है, ये कानूनी उपाय किसानों से पानी छीनकर औद्योगिक जगत को आसानी से उपलब्ध कराने की मंशा दर्शाते हैं। हमारे देश की सर्वोच्च प्राथमिकता आर्थिक विकास है। किसी भी देश का आर्थिक विकास जीवनदायी जल की बड़ी मात्रा में उपलब्धता के बिना संभाव नहीं है। चूंकि मनमोहन सिंह की प्राथमिकता में बाजार है, इसलिए उनकी मंशा के अनुरूप जिस राष्ट्रीय जल नीति को अपनाने की कवायद की जा रही है, वह पानी की विसंगति को बढ़ावा देने वाली है। इसमें पानी को एक प्रकृतिक संपदा और उस पर देश के प्रत्येक नागरिक के स्वाभाविक अधिकार को स्वीकार करने की बजाय एक आर्थिक उत्पाद माना गया है। मसलन, यदि यह नीति कानूनी आकार ले लेती है तो पानी उस व्यक्ति को ही मिलेगा, जिसकी जेब में खरे दाम होंगे। इस लिहाज से भेद की इबारत में लिखी इस नीति की सबसे ज्यादा कीमत उस किसान को चुकानी होगी, जो अपनी आजीविका के लिए अपने खेतों में उपलब्ध सिंचाई संसाधनों से फसलों को लहलहाता है। जाहिर है, जो खेती पहले से ही घाटे का धंधा बनी हुई है, वह और संकट में आएगी। जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि स्वच्छ और पर्याप्त पेयजल की उपलब्धता के बिना जीने के अधिकार के संवैधानिक प्रावधान का कोई अर्थ नहीं रह जाता है? दुनिया की 17 फीसदी आबादी भारत में है, लेकिन उपयोग करने लायक पानी महज 4 फीसदी है। तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और शहरीकरण ने जल की आपूर्ति और मांग के अंतर की खाई को और चौड़ा कर दिया है। बढ़ता वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन जो संकेत दे रहा है, उससे जल की उपलब्धता में और कमी आने के अनुमान तो है ही, देश के जलचक्र के परिवर्तित हो जाने की भी आशंका जताई जा रही है। इन सबके बीच पानी का मोल तय करना हालात को और भयावह बनाएगा, लेकिन वर्तमान सरकार की पहली प्राथमिकता आर्थिक विकास दर का मानक स्तर बनाए रखना है। इसके लिए जरूरी है कि उद्योगों को पर्याप्त पानी उपलब्ध कराया जाए। हालांकि विकास दर के सूचकांक को नापे जाते वक्त पानी के महत्व को दरकिनार रखते हुए औद्योगिक प्रगति को औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक से नापा जाता है। इनकी पराश्रित सहभागिता आर्थिक विकास की वृद्धि दर दर्शाती है। 2006-07 में भारत की विकास दर ने 9.6 की ऊंचाई छू ली थी। सकल घरेलू उत्पाद एक ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया था। यदि हमें देश की औसत विकास दर 6 प्रतिशत तक ही बनाए रखना है तो एक अध्ययन के अनुसार, 2031 तक मौजूदा स्तर से 4 गुना अधिक पानी की जरूरत होगी। तभी सकल घरेलू उत्पाद बढ़कर 2031 तक 4 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकेगा। अब सवाल उठता है कि इतना पानी आएगा कहां से और ऐसे कौन से उपाए किए जाएं, जिनसे पानी की बर्बादी पर रोक लगे। पानी की बर्बादी का सिलसिला 1970 में नलकूप क्रांति के आगमन पर हुआ। वर्तमान में दो करोड़ 25 लाख से अधिक निजी नलकूप लग चुके हैं। इनमें जो खेतों में सिंचाई के लिए लगाए गए हैं, उनकी तो जरूरत है। मगर जो घरों और होटलों में लगे हैं, उनकी आवश्यकता की पड़ताल करने की जरूरत है। यदि शौचालय फ्लश, बॉथटब, तरणताल और वाहनों की धुलाई पर ही प्रतिबंध लगा दिया जाए तो लाखों लीटर पानी की बर्बादी रोकी जा सकती है, लेकिन संप्रग सरकार पूंजीपतियों की सुविधाओं पर अंकुश लगने वाला कोई कदम उठाएगी, ऐसा लगता नहीं है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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