भारत में इलेक्ट्रॉनिक कचरे की समस्या गंभीर होती जा रही है। पर्यावरण और वन मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार इस साल के अंत तक भारत के ई-कचरे की मात्रा आठ लाख टन तक पहंुच जाएगी, जो पिछले सात वर्षो में आठ गुना ज्यादा है। इस ई-कचरे में विकसित देशों से आयात किया जाने वाला करीब 50,000 टन कचरा और शामिल हो जाता है। हालांकि विदेशों से इस तरह का कचरा मंगाने पर रोक लगी हुई है। इस कचरे के निपटान के लिए उचित निगरानी व्यवस्था नहीं होने से जन स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है। ई-कचरे को गैरकानूनी तरीके से जला कर नष्ट किया जाता है। इस प्रक्रिया में डायोक्सिन और फ्युरान जैसे रसायन निकलते हैं। आर्सनिक और एस्बेस्टस की मौजूदगी से डायोक्सिन का निर्माण अधिक मात्रा में होने लगता है। डायोक्सिन को कैंसरकारक माना जाता है। ई-कचरे में घरों में इस्तेमाल किए जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक सामान, खिलौने, सेलफोन, मेडिकल उपकरण, विद्युत व इलेक्ट्रॉनिक औजार और आइटी उपकरण आदि शामिल हैं। ई-कचरे में भारी धातुओं की मौजूदगी पर्यावरण के लिए नुकसानदायक है। इनका मानव स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। देश में सबसे ज्यादा ई-कचरा उत्पन्न करने वाले शीर्ष दस शहरों में मुंबई सबसे ऊपर है। दूसरे और तीसरे स्थान पर दिल्ली और बेंगलूर हैं। इनके बाद चैन्नई, कोलकाता, अहमदाबाद, हैदराबाद, पुणे, सूरत और नागपुर के नंबर आते हैं। देश में उत्पन्न होने वाले कुल ई-कचरे में 70 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ दस राज्यों से आता है। ये राज्य हैं महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और पंजाब। पर्यावरण मंत्रालय ने पिछले साल नए नियम अधिसूचित करके ई-कचरे के संग्रह और उसकी रिसायकलिंग की जिम्मेदारी निर्माताओं पर डाली थी, लेकिन व्यवहार में ऐसा कुछ कहीं दिखाई नहीं देता। दैनिक इस्तेमाल में आने वाली इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं और औद्योगिक इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद सैकड़ों विभिन्न पदार्थो से बने होते हैं, जो विषाक्त होने के साथ-साथ आर्थिक दृष्टि से बहुमूल्य भी होते हैं। इन वस्तुओं में बड़ा हिस्सा लोहे, अलुमिनियम, प्लास्टिक और कांच का होता है, लेकिन इनमें अल्प मात्रा में सोना, तांबा और प्लेटिनियम जैसी बहुमूल्य धातुएं भी विद्यमान रहती हैं। अत: सारा ई-कचरा फेंकने लायक नहीं होता। यह एक तरह का ई-संसाधन भी है, जो एक आकर्षक व्यापारिक अवसर प्रदान करता है। विदेशों में बेकार कंप्यूटरों, मॉनिटरों और सेलफोनों के हिस्सों को अलग करके नए उत्पाद तैयार किए जाते हैं। आपके द्वारा खारिज किए गए इलेक्ट्रॉनिक सामान का कोई कलपुर्जा या सर्किट किसी और आइटम को ठीक करने के काम आ सकता है। इस तरह एक वस्तु का दूसरी वस्तु में इस्तेमाल करके ई-कचरे की मात्रा कम की जा सकती है। ई-कचरे के निपटान के लिए खुद कंपनियों को आगे आना चाहिए। उन्हें पुराने पड़ चुके आइटमों को कुछ कीमत देकर वापस खरीद लेना चाहिए। इससे लोगों को ई-कचरे को इधर-उधर फेंकने से रोका जा सकता है। विदेशों की तरह भारत में भी ई-कचरे के संग्रह की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। इस संबंध में सरकार को कड़ाई करनी पड़ेगी। उपभोक्ताओं को भी ई-कचरे के बारे में शिक्षित करना जरूरी है। इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं की बिक्री के समय ही उन्हें यह बता देना चाहिए कि पुरानी पड़ने पर इन चीजों का निपटान कैसे किया जाए। ई-कचरे की गंभीरता को समझते हुए अनेक देशों ने इसके प्रबंधन के लिए समुचित कदम उठाए हैं, जिनका अनुसरण भारत भी कर सकता है। अमेरिका ने पर्यावरण की दृष्टि से अधिक टिकाऊ और कारगर इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के विकास और उनके रिसाइक्लिंग मार्केट को बढ़ावा देने के लिए नई नीति बनाई है। चीन और जापान में ई-कचरे से बहुमूल्य धातुओं को वापस निकालने पर जोर दिया जा रहा है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) भारत में ई-कचरे के बढ़ते ढेर पर मुकुल व्यास की टिप्पणी
No comments:
Post a Comment