Tuesday, July 5, 2011

संसद की सर्वोच्चता की आड़ में


 सबसे पहले सर्वदलीय सम्मेलन के बाद सरकार की ओर से जारी एक पंक्ति के वक्तव्य पर नजर डालिए, सर्वदलीय सम्मेलन इस बात पर सहमत हुआ कि सरकार स्थापित प्रक्रियाओं का पालन करते हुए संसद के अगले सत्र में एक मजबूत एवं प्रभावी लोकपाल विधेयक लाए। इसमें स्थापित प्रक्रियाओं शब्द सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसका सर्वमान्य अर्थ कानून बनाने में संसद की सर्वोच्चता को हर हाल में बनाए रखना है, लेकिन लोकपाल के गठन को लेकर अन्ना हजारे के अनशन तथा उनके समूह के साथ सरकार की बातचीत के आलोक में विचार करें तो यह आगे की प्रक्रिया में उनकी किसी प्रकार की भूमिका के निषेध की मुखर घोषणा है। सरकार की ओर से पिछले कुछ दिनों से यह तर्क दिया जा रहा था कि गैर-निर्वाचित लोगों का कोई समूह विधेयक के मामले में अपना विचाार नहीं थोप सकता। सरकार और विपक्ष के बीच लोकपाल विधेयक पर गहरे मतभेदों के बावजूद इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों में सर्वसम्मति कायम हुई। सरकार के खिलाफ हर मुद्दे पर तलवार खींचने वाली भाजपा ने कहा कि विधेयक के कई मुद्दों पर सरकार के साथ उनके मतभेद हैं, पर सरकार मानसून सत्र में विधेयक लाए और इसे संसद की स्थायी समिति को भेजे। संसद की स्थायी समिति को भेजने का अभिप्राय सामान्यत: संसद की सर्वोच्चता की प्रतिष्ठित करना है। जिन अन्य दलों ने सरकार द्वारा तैयार विधेयक के कई प्रावधानों से असहमति व्यक्त की और अन्ना समूह द्वारा प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने का समर्थन किया, उन सबकी राय भी यही थी कि कोई बाहरी तत्व यह तय नहीं कर सकता कि संसद कैसा कानून बनाए। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो लोकपाल विधेयक पर विचार करने के लिए आयोजित सर्वदलीय सम्मेलन इसके प्रावधानों पर विचार कर इसका एक सर्वसम्मत रूप तैयार करने की जगह संसद बनाम तथाकथित नागरिक समाज में संसद की सर्वोच्चता कायम रखने की सर्वसम्मति वाली बैठक में परिणत हो गई। संसद की सर्वोच्चता वास्तव में राजनीतिक प्रतिष्ठान की ही सर्वोच्चता है। इस परिणति को हम कतई अस्वाभाविक नहीं कह सकते। अन्ना हजारे और उनके साथी इस बैठक के पूर्व जन लोकपाल पर राजनीतिक समर्थन पाने के लिए दलों के नेताओं से अवश्य मिल रहे थे, लेकिन कहीं से इनके समर्थन में कोई प्रतिक्रिया सुनाई नहीं पड़ रही थी। वास्तव में राजनीतिक दलों में यह राय बन चुकी थी कि इस कथित नागरिक समाज को ज्यादा महत्व देना राजनीतिक प्रतिष्ठान को नजरअंदाज करने जैसा है। सर्वदलीय बैठक में इसकी प्रतिध्वनि लगातार सुनी गई। राजद अध्यक्ष लालू यादव ने तो यहां तक कह दिया कि हम 121 करोड़ नागरिकों का मत लेकर जीतते हैं, ये सिविल सोसाइटी वालों को कहां से इतना समर्थन है। सपा ने तो अन्ना हजारे और उनके साथियों के साथ बातचीत को ही गैरजरूरी बताया। बैठक में इसके विरुद्ध निर्मित माहौल का ही परिणाम था कि वित्तमंत्री एवं दस्तावेज तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष प्रणब मुखर्जी को यह कहना पड़ा कि सरकार कभी भी कानून बनाने की स्थापित प्रक्रिया से छेड़छाड़ नहीं करना चाहती थी। वह बातचीत विमर्श और सुझाव का इससे एक अलग नया प्रयोग था। ध्यान रखने की बात है कि प्रधानमंत्री द्वारा अपने निवास पर बुलाई गई इस बैठक में सरकार की ओर से अपने मसौदे के साथ अन्ना समूह द्वारा तैयार मसौदा भी रखा गया था। किसी दल ने उस मसौदे पर चर्चा करना मुनासिब नहीं समझा। इसका व्यावहारिक अर्थ यही हुआ कि तथाकथित जनलोकपाल वाला मसौदा राजनीतिक दलों द्वारा अस्वीकृत हो चुका है। ज्यादातर विपक्षी नेताओं की रणनीति यही थी कि इस बैठक में किसी प्रारूप पर चर्चा की ही न जाए और संसद में विधेयक पेश होने के बाद अपना मत व्यक्त करें। जाहिर है, संसद में सरकार अपना मसौदा पेश करेगी और उसी पर चर्चा होगी। दूसरे शब्दों में जन लोकपाल के नाम से तैयार मसौदे के राजनीतिक स्तर पर आगे बढ़ने का रास्ता अब बंद हो चुका है। नेताओं का तेवर देखिए तो अन्ना हजारे चाहें तो अनशन करें, लोकपाल गठन के मामले में केवल और केवल राजनीतिक प्रतिष्ठान के दृष्टिकोण का ही महत्व होगा। बैठक की इस परिणति के आलोक में यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इसके द्वारा संसद के महत्व के बहाने राजनीतिक प्रतिष्ठान ने अपनी वरीयता बनाए रखना सुनिश्चित किया है। प्रश्न है कि क्या राजनीतिक दलों का यह रवैया उचित है? क्या यह हमारे लोकतंत्र के हित में है? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा बैठक में कही गई दो बातों से असहमत नहीं हुआ जा सकता। एक, लोकपाल हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में मौजूद अन्य संस्थाओं की तर्कसंगत भूमिका और उनके अधिकार को कमतर नहीं कर सकता। दो, हमारा संविधान एक-दूसरे के अधिकार क्षेत्र में परस्पर संतुलन की व्यवस्था पर कायम है और लोकपाल को इसी ढांचे में अपनी उचित जगह तलाशनी होगी। निस्संदेह, जन लोकपाल का मसौदा संविधान द्वारा निर्मित कई संस्थाओं की भूमिका को कमजोर करता है और इसमें विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बीच का संतुलन चरमरा देने का अंश भी निहित है। देश को उच्च स्तर के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए एक मजबूत लोकपाल जैसी संस्था चाहिए, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में ऐसी किसी संस्था के सुपर सरकार की हैसियत नहीं होनी चाहिए। किंतु सर्वदलीय बैठक में राजनीतिक दलों के रवैये से लोकपाल का प्रश्न गौण हो गया है। लोकतंत्र का चरित्र और इसकी भूमिका सर्वाधिक अहम प्रश्न बनकर उभरा है। संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक प्रतिष्ठान को हाशिए पर धकेलना या उसे महत्वहीन करना कतई उचित नहीं माना जा सकता। लोकतंत्र में लोक हर पहलू का केंद्रबिंदु है और चुनाव द्वारा जिनका निर्वाचन होता है, वे इस प्रणाली में लोक प्रतिनिधि हैं। उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे निजी या सामूहिक, संसद या संसद के बाहर की अपनी हर भूमिका में लोकेच्छा को ही प्राथमिकता देंगे। संविधान में बेशक कानून बनाने या संविधान में संशोधन आदि की प्रक्रिया को संसद एवं राज्य विधायिकाओं तक सीमित रखा गया है। संसद में विधेयक पेश करने एवं पारित करने की संवैधानिक प्रक्रिया में कहीं पर नागरिक समाज की भूमिका का उल्लेख नहीं है, लेकिन उसमें कहीं नहीं कहा गया है कि अगर आप देश के नागरिकों के किसी समूह से बातचीत करते हैं, उनसे विधेयक के किसी मसौदे पर चर्चा करते हैं, उनका सुझाव लेते हैं या उनका मसौदा संसद के पटल पर रखते हैं तो वह प्रक्रिया का उल्लंघन हो जाएगा या संविधान विरोधी होगा। हम अन्ना हजारे एवं उनके साथियों के अपने अभियान एवं विचार-विमर्श से पहले राजनीतिक दलों को बिल्कुल अलग रखने या उनको अस्पृश्य मान लेने के रवैये से कतई सहमत नहीं, उनके कथित जन लोकपाल को भी हम जनता का मसौदा मानने को तैयार नहीं हैं, लेकिन उनके अनशन का सरकार द्वारा संज्ञान लेना या उनसे बातचीत करना तो किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्वाभाविक स्पंदनशीलता का परिचायक माना जाना चाहिए। हम यह भी मानते हैं कि सरकार ने केवल एक रणनीति के तहत उनसे बातचीत की, पर कुछ नेताओं ने इसके प्रति जिस हिकारत भाव का प्रदर्शन किया, वह खतरनाक है। सरकार के निर्णयों से अगर हम असंतुष्ट हैं या हम कोई कानून चाहते हैं तो हमारे सामने पहला रास्ता किसी तरह सरकार तक अपनी मांग पहुंचाना और न मानने पर कानून के दायरे में विरोध करना है। विरोध का सरकार द्वारा संज्ञान एवं बातचीत की निंदा किसी स्वस्थ राजनीतिक प्रतिष्ठान की पहचान नहीं हो सकती। राजनीतिक दलों का यह व्यवहार साबित करता है कि हमारे लोकतंत्र का चरित्र व्यवहार में अलोकतांत्रिक होता जा रहा है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).

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