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Tuesday, July 5, 2011

किसे चाहिए लोकतंत्र विरोधी लोकपाल


इस ड्राफ्ट के मुताबिक केवल पूर्व सीईसी और पूर्व सीएजी ही इस देश की सवा अरब आबादी में इस लायक समझे गए हैं जो ईमानदारी के पुतले होते हैं। सर्च कमेटी के बाकी पांच सदस्यों में भी देश के आम नागरिकों की कोई भूमिका नहीं होगी। केवल सम्मानित लोगों की ही भूमिका होगी। यानी लोकतंत्र की मूल भावना जनता का शासन, जनता के द्वारा, जनता के लिए बेमानी हो जाएगी..स बार आजादी की सालगिरह कुछ अलग किस्म की होने की उम्मीद है। कारण है कि महात्मा गांधी के 21वीं सदी के अवतार अन्ना हजारे ऐलान कर चुके हैं कि अगर 15 अगस्त तक जनलोकपाल विधेयक पारित न किया गया तो वे 16 अगस्त से फिर आमरण अनशन करेंगे। अभी तक के सूरत-ए-हाल संकेत दे रहे हैं कि अन्ना को भूखे रहने के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि न तो सरकार और सिविल सोसाइटी के सदस्यों में इस बिल को लेकर सहमति बनी है और न ही किसी राजनीतिक दल ने संसद में अपने रुख पर अपने पत्ते खोले हैं। दूसरा, अगर इस माह किसी प्रारूप पर सबकी सहमति मिल भी गई तो संसद का मॉनसून सत्र एक अगस्त से शुरू होगा और 15 अगस्त से पहले तो यह किसी भी हालत में पारित होने से रहा। सो, अन्ना जी का अनशन तो पक्का है।

यहां सवाल यह है कि क्या लोकपाल बहुत जरूरी है और वह भी उसी शक्ल में जैसा कि अन्ना मंडली चाहती है? जाहिर सी बात है कि इस प्रश्न पर देश भर में गंभीर मतभेद हैं। पहला सवाल तो यही है कि अन्ना मंडली को देश के किस वर्ग का समर्थन हासिल है? क्या अन्ना मंडली देश के संविधान और सवा अरब की आबादी से ऊपर कोई दैवी शक्ति है? अभी तक जो इस मंडली की हरकतें सामने आई हैं उससे तो यही लगता है कि यह मंडली देश के संविधान से ऊपर की कोई चीज है। देश को लोकपाल मिले या न मिले, भ्रष्टाचार मिटे या न मिटे लेकिन अगर यह मंडली अपने मकसद में कामयाब हो गई तो देश का लोकतंत्र हार जाएगा। हमारे संविधान में संसद सवरेपरि है और कोई भी कानून बनाने या निरस्त करने का अधिकार उसी के हाथों केंद्रित है। यह पहली बार हो रहा है कि बाहरी असामाजिक तत्व, जो स्वयं को इस देश का आम नागरिक नहीं मान रहे, वे खुद को सिविल सोसाइटी कह रहे हैं, सरकार के साथ मिलकर कोई कानून बनाने जा रहे हैं। अगर यह परिपाटी पड़ गई तो लोकतंत्र समाप्त हो जाएगा और दस हजार सफेदपोश संसद के बाहर मजमा लगाकर जब चाहेंगे तभी अपनी सुविधा के मुताबिक कोई नया कानून बना लेंगे। यह सभी राजनीतिक दलों का कत्र्तव्य बनता है कि उनके आपस के चाहे जो राजनीतिक विवाद हों उनसे ऊपर उठकर इस अलोकतांत्रिक प्रक्रिया को रोकें। जन लोकपाल विधेयक के विरोध में कुछ प्रमुख कारणों पर विचार किया जाना चाहिए। पहला यह कि अन्ना मंडली का लोकपाल किसके प्रति उत्तरदायी होगा? क्या यह संसद, संविधान, विधायिका या जनता के प्रति उत्तरदायी होगा? अभी तक लोकपाल का जो स्वरूप इस मंडली ने पेश किया है उसके मुताबिक यह किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होगा। फिर क्या यह एक निरंकुश व्यवस्था होगी? इसके चयन की प्रक्रिया में आम जनता की कोई भागेदारी नहीं होगी। कुछ तथाकथित सम्मानित और संभ्रांत लोग इस प्रक्रिया में शामिल होंगे। इस मंडली के एक प्रपत्र के अनुसार, जनलोकपाल के दस सदस्यों और अध्यक्ष के चयन के लिए एक चयन समिति बनाई जाएगी। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता, दो सबसे कम उम्र के हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक व मुख्य निर्वाचन आयुक्त होंगे। चयन समिति योग्य लोगों का चयन उस सूची से करेगी, जो उसे सर्च कमेटी द्वारा मुहैया कराई जाएगी। अब इस प्रक्रिया पर करीब से गौर किया जाए तो इसमें जनता की भागीदारी कहां नजर आती है? अगर प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता को जनता की भागीदारी माना जा रहा है तब दो सवाल उठते हैं। इस समिति में जनता की भागीदारी अल्पमत की है और नौकरशाहों का वर्चस्व है क्योंकि चयन समिति के आठ सदस्यों में से मात्र दो जनता द्वारा निर्वाचित हैं। तो पहला सवाल यह कि क्या भारत की जनता बेवकूफ है? ऐसा माना भी जा सकता है क्योंकि अन्ना जी का पक्का विश्वास है कि वोटर सौ रुपए की शराब की बोतल पर बिक जाता है! दूसरा सवाल यह कि अगर प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं तो अन्ना मंडली को जनता के द्वारा चुनी जाने वाली किसी प्रक्रिया पर ऐतराज क्यों है?

इससे भी ज्यादा आपत्ति वाली बात यह ड्राफ्ट आगे कहता है, सर्च कमेटी में दस सदस्य होंगे, जिसका गठन इस तरह होगा - सबसे पहले पूर्व सीईसी और पूर्व सीएजी में से पांच सदस्य चुने जाएंगे। इनमें वे पूर्व सीईसी और पूर्व सीएजी शामिल नहीं होंगे जो दागी हों या किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े हों या अब भी किसी सरकारी सेवा में कार्यरत हों। ये पांच सदस्य बाकी पांच सदस्यों का चयन देश के सम्मानित लोगों में से करेंगे, और इस तरह दस लोगों की सर्च कमेटी बनेगी। यहीं इस मंडली का लोकतंत्र विरोधी चेहरा बेनकाब हो जाता है और इसकी जनविरोधी सोच को समझा जा सकता है। इस ड्राफ्ट के मुताबिक केवल पूर्व सीईसी और पूर्व सीएजी ही इस देश की सवा अरब आबादी में इस लायक समझे गए हैं जो ईमानदारी के पुतले होते हैं। सर्च कमेटी के बाकी पांच सदस्यों में भी देश के आम नागरिकों की कोई भूमिका नहीं होगी। केवल सम्मानित लोगों की ही भूमिका होगी। यानी लोकतंत्र की मूल भावना जनता का शासन, जनता के द्वारा, जनता के लिए बेमानी हो जाएगी। अब जरा इन सम्मनित लोगों की परिभाषा पर भी ध्यान दे लिया जाए। सर्च कमेटी देश के विभिन्न सम्मानित लोगों जैसे संपादकों, कुलपतियों या जिनको वे ठीक समझें, उनसे सुझाव मांगेगी। यानी इस मंडली की नजर में 80 रुपए रोज की दिहाड़ी का मजदूर इस देश का सम्मानित नागरिक नहीं है। सम्मानित संपादक जी हैं, कुलपति हैं या वे जिन्हें यह कमेटी कह दे कि वे सम्मानित हैं।

संसद की सर्वोच्चता की आड़ में


 सबसे पहले सर्वदलीय सम्मेलन के बाद सरकार की ओर से जारी एक पंक्ति के वक्तव्य पर नजर डालिए, सर्वदलीय सम्मेलन इस बात पर सहमत हुआ कि सरकार स्थापित प्रक्रियाओं का पालन करते हुए संसद के अगले सत्र में एक मजबूत एवं प्रभावी लोकपाल विधेयक लाए। इसमें स्थापित प्रक्रियाओं शब्द सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसका सर्वमान्य अर्थ कानून बनाने में संसद की सर्वोच्चता को हर हाल में बनाए रखना है, लेकिन लोकपाल के गठन को लेकर अन्ना हजारे के अनशन तथा उनके समूह के साथ सरकार की बातचीत के आलोक में विचार करें तो यह आगे की प्रक्रिया में उनकी किसी प्रकार की भूमिका के निषेध की मुखर घोषणा है। सरकार की ओर से पिछले कुछ दिनों से यह तर्क दिया जा रहा था कि गैर-निर्वाचित लोगों का कोई समूह विधेयक के मामले में अपना विचाार नहीं थोप सकता। सरकार और विपक्ष के बीच लोकपाल विधेयक पर गहरे मतभेदों के बावजूद इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों में सर्वसम्मति कायम हुई। सरकार के खिलाफ हर मुद्दे पर तलवार खींचने वाली भाजपा ने कहा कि विधेयक के कई मुद्दों पर सरकार के साथ उनके मतभेद हैं, पर सरकार मानसून सत्र में विधेयक लाए और इसे संसद की स्थायी समिति को भेजे। संसद की स्थायी समिति को भेजने का अभिप्राय सामान्यत: संसद की सर्वोच्चता की प्रतिष्ठित करना है। जिन अन्य दलों ने सरकार द्वारा तैयार विधेयक के कई प्रावधानों से असहमति व्यक्त की और अन्ना समूह द्वारा प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने का समर्थन किया, उन सबकी राय भी यही थी कि कोई बाहरी तत्व यह तय नहीं कर सकता कि संसद कैसा कानून बनाए। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो लोकपाल विधेयक पर विचार करने के लिए आयोजित सर्वदलीय सम्मेलन इसके प्रावधानों पर विचार कर इसका एक सर्वसम्मत रूप तैयार करने की जगह संसद बनाम तथाकथित नागरिक समाज में संसद की सर्वोच्चता कायम रखने की सर्वसम्मति वाली बैठक में परिणत हो गई। संसद की सर्वोच्चता वास्तव में राजनीतिक प्रतिष्ठान की ही सर्वोच्चता है। इस परिणति को हम कतई अस्वाभाविक नहीं कह सकते। अन्ना हजारे और उनके साथी इस बैठक के पूर्व जन लोकपाल पर राजनीतिक समर्थन पाने के लिए दलों के नेताओं से अवश्य मिल रहे थे, लेकिन कहीं से इनके समर्थन में कोई प्रतिक्रिया सुनाई नहीं पड़ रही थी। वास्तव में राजनीतिक दलों में यह राय बन चुकी थी कि इस कथित नागरिक समाज को ज्यादा महत्व देना राजनीतिक प्रतिष्ठान को नजरअंदाज करने जैसा है। सर्वदलीय बैठक में इसकी प्रतिध्वनि लगातार सुनी गई। राजद अध्यक्ष लालू यादव ने तो यहां तक कह दिया कि हम 121 करोड़ नागरिकों का मत लेकर जीतते हैं, ये सिविल सोसाइटी वालों को कहां से इतना समर्थन है। सपा ने तो अन्ना हजारे और उनके साथियों के साथ बातचीत को ही गैरजरूरी बताया। बैठक में इसके विरुद्ध निर्मित माहौल का ही परिणाम था कि वित्तमंत्री एवं दस्तावेज तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष प्रणब मुखर्जी को यह कहना पड़ा कि सरकार कभी भी कानून बनाने की स्थापित प्रक्रिया से छेड़छाड़ नहीं करना चाहती थी। वह बातचीत विमर्श और सुझाव का इससे एक अलग नया प्रयोग था। ध्यान रखने की बात है कि प्रधानमंत्री द्वारा अपने निवास पर बुलाई गई इस बैठक में सरकार की ओर से अपने मसौदे के साथ अन्ना समूह द्वारा तैयार मसौदा भी रखा गया था। किसी दल ने उस मसौदे पर चर्चा करना मुनासिब नहीं समझा। इसका व्यावहारिक अर्थ यही हुआ कि तथाकथित जनलोकपाल वाला मसौदा राजनीतिक दलों द्वारा अस्वीकृत हो चुका है। ज्यादातर विपक्षी नेताओं की रणनीति यही थी कि इस बैठक में किसी प्रारूप पर चर्चा की ही न जाए और संसद में विधेयक पेश होने के बाद अपना मत व्यक्त करें। जाहिर है, संसद में सरकार अपना मसौदा पेश करेगी और उसी पर चर्चा होगी। दूसरे शब्दों में जन लोकपाल के नाम से तैयार मसौदे के राजनीतिक स्तर पर आगे बढ़ने का रास्ता अब बंद हो चुका है। नेताओं का तेवर देखिए तो अन्ना हजारे चाहें तो अनशन करें, लोकपाल गठन के मामले में केवल और केवल राजनीतिक प्रतिष्ठान के दृष्टिकोण का ही महत्व होगा। बैठक की इस परिणति के आलोक में यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इसके द्वारा संसद के महत्व के बहाने राजनीतिक प्रतिष्ठान ने अपनी वरीयता बनाए रखना सुनिश्चित किया है। प्रश्न है कि क्या राजनीतिक दलों का यह रवैया उचित है? क्या यह हमारे लोकतंत्र के हित में है? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा बैठक में कही गई दो बातों से असहमत नहीं हुआ जा सकता। एक, लोकपाल हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में मौजूद अन्य संस्थाओं की तर्कसंगत भूमिका और उनके अधिकार को कमतर नहीं कर सकता। दो, हमारा संविधान एक-दूसरे के अधिकार क्षेत्र में परस्पर संतुलन की व्यवस्था पर कायम है और लोकपाल को इसी ढांचे में अपनी उचित जगह तलाशनी होगी। निस्संदेह, जन लोकपाल का मसौदा संविधान द्वारा निर्मित कई संस्थाओं की भूमिका को कमजोर करता है और इसमें विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के बीच का संतुलन चरमरा देने का अंश भी निहित है। देश को उच्च स्तर के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए एक मजबूत लोकपाल जैसी संस्था चाहिए, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में ऐसी किसी संस्था के सुपर सरकार की हैसियत नहीं होनी चाहिए। किंतु सर्वदलीय बैठक में राजनीतिक दलों के रवैये से लोकपाल का प्रश्न गौण हो गया है। लोकतंत्र का चरित्र और इसकी भूमिका सर्वाधिक अहम प्रश्न बनकर उभरा है। संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक प्रतिष्ठान को हाशिए पर धकेलना या उसे महत्वहीन करना कतई उचित नहीं माना जा सकता। लोकतंत्र में लोक हर पहलू का केंद्रबिंदु है और चुनाव द्वारा जिनका निर्वाचन होता है, वे इस प्रणाली में लोक प्रतिनिधि हैं। उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे निजी या सामूहिक, संसद या संसद के बाहर की अपनी हर भूमिका में लोकेच्छा को ही प्राथमिकता देंगे। संविधान में बेशक कानून बनाने या संविधान में संशोधन आदि की प्रक्रिया को संसद एवं राज्य विधायिकाओं तक सीमित रखा गया है। संसद में विधेयक पेश करने एवं पारित करने की संवैधानिक प्रक्रिया में कहीं पर नागरिक समाज की भूमिका का उल्लेख नहीं है, लेकिन उसमें कहीं नहीं कहा गया है कि अगर आप देश के नागरिकों के किसी समूह से बातचीत करते हैं, उनसे विधेयक के किसी मसौदे पर चर्चा करते हैं, उनका सुझाव लेते हैं या उनका मसौदा संसद के पटल पर रखते हैं तो वह प्रक्रिया का उल्लंघन हो जाएगा या संविधान विरोधी होगा। हम अन्ना हजारे एवं उनके साथियों के अपने अभियान एवं विचार-विमर्श से पहले राजनीतिक दलों को बिल्कुल अलग रखने या उनको अस्पृश्य मान लेने के रवैये से कतई सहमत नहीं, उनके कथित जन लोकपाल को भी हम जनता का मसौदा मानने को तैयार नहीं हैं, लेकिन उनके अनशन का सरकार द्वारा संज्ञान लेना या उनसे बातचीत करना तो किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्वाभाविक स्पंदनशीलता का परिचायक माना जाना चाहिए। हम यह भी मानते हैं कि सरकार ने केवल एक रणनीति के तहत उनसे बातचीत की, पर कुछ नेताओं ने इसके प्रति जिस हिकारत भाव का प्रदर्शन किया, वह खतरनाक है। सरकार के निर्णयों से अगर हम असंतुष्ट हैं या हम कोई कानून चाहते हैं तो हमारे सामने पहला रास्ता किसी तरह सरकार तक अपनी मांग पहुंचाना और न मानने पर कानून के दायरे में विरोध करना है। विरोध का सरकार द्वारा संज्ञान एवं बातचीत की निंदा किसी स्वस्थ राजनीतिक प्रतिष्ठान की पहचान नहीं हो सकती। राजनीतिक दलों का यह व्यवहार साबित करता है कि हमारे लोकतंत्र का चरित्र व्यवहार में अलोकतांत्रिक होता जा रहा है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).