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Wednesday, June 1, 2011

उद्योगों के लिए जमीन


किसानों, खेतिहर मजदूरों और आदिवासियों का विस्थापन इस समय देश की एक प्रमुख समस्या के रूप में उभर रहा है। विस्थापन के दो प्रमुख कारण हैं, शहरीकरण और नए उद्योगों की स्थापना। अगर भारत को तरक्की करनी है तो इनमें से किसी का भी विरोध नहीं किया जा सकता। जो बुद्धिजीवी विस्थापन का विरोध कर रहे हैं, वे बुनियादी रूप से विकास-विरोधी नहीं हैं। उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि औद्योगीकरण किसानों के हितों की कीमत पर न हो। औद्योगीकरण का फायदा तो सभी को मिलेगा, पर मारे जाएंगे किसान। जब किसानों को अपनी जमीन से जुदा होने के लिए मजबूर कर दिया जाता है, तब स्वाभाविक है कि वे ज्यादा से ज्यादा मुआवजे की मांग करें। जमीन का छिनना उनके लिए सिर्फ जमीन से महरूम होना नहीं है, जीविका एक एकमात्र साधन से वंचित होना भी है। इसीलिए भूमि के प्रति ममता बढ़ी है और लोग नए उद्योगों की स्थापना का विरोध कर रहे हैं। समस्या यह है कि समस्या की जड़ में जाने की कोशिश नहीं हो रही है। औद्योगीकरण का विरोध कहीं-कहीं इस तरह हो रहा है मानो औद्योगिक विकास ही अवांछित हो। कृषि भूमि के औद्योगिक उपयोग की पहलों के विरोध का आधार यह प्रतीत होता है कि किसानों का किसान बने रहना ही श्रेयस्कर है। इससे एक अजीब अंतद्र्वद्व की सृष्टि हो रही है। यह भ्रम पैदा हो रहा है कि सरकार विकास चाहती है और उसके विरोधी यथास्थिति के समर्थक हैं। इस भ्रम को दूर किया जाना चाहिए और सिर्फ विस्थापन का विरोध कर ऐसे तरीकों का प्रचार करना चाहिए, जिनसे औद्योगीकरण भी हो और इसके लिए व्यापक जन संहार भी न करना पड़े। आजादी के बाद से ही औद्योगीकरण का हल्ला शुरू हो गया था, पर वास्तविक औद्योगीकरण बहुत कम हुआ। इसी का नतीजा है कि कृषि पर इतनी बड़ी आबादी की निर्भरता बनी हुई है। किसी देश के लगभग 70 प्रतिशत लोग अपनी जीविका के लिए किसी न किसी रूप में अगर कृषि क्षेत्र पर निर्भर हों तो वह देश खेतिहर ही कहलाएगा। उसे औद्योगिक दृष्टि से विकसित देश नहीं कहा जा सकता। यही वह मूल गड़बड़ी है, जिसके कारण खेती और उद्योग ही नहीं बिगड़े हुए हैं, बल्कि बेरोजगारी की समस्या भी उग्रतर होती जा रही है। विकास का कोई निश्चित पैमाना नहीं है, क्योंकि हर देश की अपनी परिस्थितियां होती हैं और इन परिस्थितियों के फ्रेम में ही विकास की कार्यनीति बनाई जाती है। हमारे देश के लिए ऐसे उद्योग, जिनमें पूंजी ज्यादा लगती हो और रोजगार कम पैदा होता हो, खतरनाक हैं। इससे आर्थिक शक्ति का भयावह केंद्रीकरण होता है और ऐसे लोगों की तादाद बढ़ती जाती है, जिनकी जेब में पैसा नहीं होता। पैसा न होने से वे उपभोक्ता बाजार में प्रवेश नहीं कर पाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि खेती और कारखानों से पैदा होने वाली चीजों का बाजार तेजी से नहीं बढ़ता। जनसाधारण की क्रय शक्ति सीमित रहने से किसान को खेती की पैदावार का उचित मूल्य नहीं मिल पाता, क्योंकि सरकार कृषि उपज के मूल्यों को, खासतौर से अन्न के मूल्यों को, अनुचित तरीके से दबाकर रखती है। इसका दूसरा नतीजा यह होता है कि सरकार कृषि क्षेत्र को सब्सिडी देने को बाध्य हो जाती है। न दे तो किसानों में और ज्यादा हाहाकार मच जाए। लोगों की क्रय शक्ति न बढ़ने का एक और नतीजा यह होता है कि औद्योगिक उत्पादन की खपत न बढ़ने से उद्योग-धंधों का विकास अपेक्षित गति से नहीं हो पाता। कई दशकों से हमारी अर्थव्यवस्था इसी संकट में गिरफ्तार है। फिर भी हममें से कुछ लोग खुश होकर दांत निपोरते रहते हैं कि भारत एक बहुत बड़ा बाजार बन चुका है। अगर उपभोक्ता समुदाय की संख्या बीस या तीस करोड़ मान ली जाए तो भी सत्तर-अस्सी करोड़ से ज्यादा लोग अभी भी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के संघर्ष तक ही सीमित है। इसलिए भारत का औद्योगीकरण जरूरी ही नहीं, अनिवार्य है। लेकिन उस ढंग का औद्योगीकरण नहीं, जैसा हो रहा है। हमें तो ऐसे कल-कारखाने चाहिए, जिनमें पूंजी कम लगे और रोजगार ज्यादा पैदा हो। इसके लिए उत्पादकता के स्तर से समझौता किया जा सकता है। जो नई से नई मशीनों का समर्थन कर रहे हैं, वे देश के दुश्मन हैं। उन्हें एक खास वर्ग की चिंता है, देश के सभी वर्गो की नहीं। अपनी परिस्थितियों के अनुसार टेक्नोलॉजी अगर हम विदेशी बाजार से आयात नहीं कर सकते, क्योंकि सारी दुनिया ही नवीनतम टेक्नोलॉजी के पीछे दीवानी है, तो हमें यह टेक्नोलॉजी खुद पैदा करनी होगी। यह तभी संभव है, जब इस मिशन को राष्ट्रीय अभियान बनाया जाए। इस टेक्नोलॉजी पर आधारित कारखाने स्थापित करने के लिए ज्यादा जमीन की जरूरत नहीं होगी। पूंजी कम लगने से गांव के लोग या ग्राम और जिला पंचायतें भी ऐसी औद्योगिक इकाइयां खड़ी कर सकेंगी। टेक्नोलॉजी सरल होने से गांव के लोग भी उसका संचालन कर सकेंगे। इस औद्योगिक नीति का नतीजा यह होगा कि खेती पर आधारित आबादी धीरे-धीरे उद्योगों की तरफ मुड़ने लगेगी। दुख इस बात का है कि समस्या पर समग्रता से विचार न कर जमीन के मुवावजे के विभिन्न फार्मूलों पर विचार हो रहा है, मानो खेती और उद्योग एक-दूसरे से जुड़े हुए न हों, बल्कि उनकी नियति अलग-अलग हो। कोई भी गंभीर समस्या इस संकुचित दृष्टि से नहीं सुलझाई जा सकती। दोनों ही बुनियादी समस्याएं हैं। अगर हम सिर्फ उनके रोजगार की बात सोचेंगे, जिनकी जमीन हड़पी जा रही है तो उनके लिए कौन सोचेगा, जिनके पास जमीन तो है, पर जो फिर भी गरीबी से घिरे हुए हैं?