आतंकवाद से जूझ चुके पंजाब के लोग हथियारों का लाइसेंस रिन्यू कराने में पीछे हैं। यहां तीन लाख से अधिक लाइसेंसी हथियार हैं और इनमें 60 हजार ने पांच साल से लाइसेंस रिन्यू नहीं कराए। नियमानुसार लाइसेंसों को तीन साल के बाद रिन्यू करवाना होता है। इन डिफाल्टरों के खिलाफ न तो किसी अधिकारी ने कोई कार्रवाई की और न ही उनके हथियारों को जब्त करने के लिए कोई नोटिस ही जारी किया। यह खुलासा पटियाला निवासी एक आरटीआई आवेदक द्वारा मांगी गई जानकारी में हुआ है। जुलाई 2010 में पटियाला के अश्विनी कुमार ने पंजाब के प्रत्येक जिले के डिप्टी कमिश्नर से सूचना के अधिकार के तहत लाइसेंसी हथियारों के संबंध में जानकारी मांगी। पूछा गया कि हरेक जिले में कितने हथियार हैं? कितने लाइसेंस पिछले पांच साल से रिन्यू नहीं हुए? जो लाइसेंस रिन्यू नहीं हुए, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई? शुरू में सभी डिप्टी कमिश्नरों ने जानकारी देने में आपत्ति जताई, लेकिन अश्विनी कुमार ने इस संबंध में चंडीगढ़ स्थित सूचना आयुक्त को शिकायत दे दी। शिकायत को गंभीरता से लेते हुए सूचना आयुक्त ने राज्य के प्रत्येक डीसी को आदेश जारी कर उक्त जानकारी देने का निर्देश दिया। जो जानकारी दी गई उसके मुताबिक करीब तीन लाख लाइसेंसी हथियारों में से 20 फीसदी हथियारों के लाइसेंस पांच साल से रिन्यू नहीं हुए हैं। इस जानकारी ने चौंकाने के साथ-साथ संबंधित अधिकारियों की ढिलाई को भी उजागर कर दिया है।
Friday, May 6, 2011
Thursday, May 5, 2011
कैदियों के अधिकारों की चिंता
हाल में उच्चतम न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण फैसले में कहा कि हिरासत में हुई मौत दुर्लभ से दुर्लभतम श्रेणी का जुर्म है और इसके लिए दोषी पुलिसवालों को मौत की सजा मिलेगी। ऐसी मौत उसी तरह है जैसे किसी असहाय और अपने में असमर्थ व्यक्ति को तड़पा-तड़पा कर मार दिया जाए। न्यायालय के अनुसार हिरासत में मौत संभवत: कानून के शासन से शासित होने वाले सभ्य समाज का सबसे वीभत्स अपराध है। यदि किसी के साथ कोई अत्याचार या अमानवीय व्यवहार होता है, चाहे यह पुलिस जांच के दौरान ही क्यों न हो तो यह अनुच्छेद 21 (जीवन व आजादी का अधिकार) तथा 22 (1) का खुला उल्लंघन है। हमारी जेलों में सामान्यत: विचाराधीन से लेकर सजायाफ्ता कैदी तक से पूछताछ के दौरान अमानवीय व्यवहार होता है। पुलिस हिरासत में जाते ही किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार कैसे खत्म हो सकते हैं। क्या किसी के अधिकार निलंबित रखे जा सकते हैं? मानवीय अधिकारों की रीढ़ स्पर्श करते इन सवालों का उत्तर सिर्फ ‘नहीं’ है। ‘यातना निवारण विधेयक 2010’
भी कहता है कि पुलिस हिरासत में आरोपियों को यातना देना गैरकानूनी और आपराधिक है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक जहां किसी तरह की क्रूरता, अमानवीयता या अपमानित करने वाले व्यवहार को यातना की श्रेणी में रखा गया है, वहीं यातना निवारण विधेयक किसी व्यक्ति के शारीरिक अंगों को प्रत्यक्ष नुकसान पहुंचाने या जीवन पर खतरे को इस श्रेणी में रखता है। मानवाधिकारों की पैरवी करने वाले लंबे अरसे से पूछताछ या सच उगलवाने के नाम पर कैदियों को प्रताड़ित किए जाने के विरुद्ध आवाज उठा रहे हैं, तो इसकी वजह यही है कि अकेले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में 1994 से 2008 के बीच हिरासत में मौत के 16836 मामले दर्ज किए गये। सवाल है कि अपराधी होने मात्र से क्या व्यक्ति जीवन की सुरक्षा और स्वतंत्रता का अधिकार खो देता है? थॉमस जेफरसन ने 13 अमेरिकी उपनिवेशों की स्वतंत्रता की उद्घोषणा में कहा था, ‘हम इस सत्य को स्वयं प्रमाणित मानते हैं कि सब मनुष्य समान रूप से जन्म लेते हैं और जन्मदाता ने इन्हें जन्म से ही कुछ ऐसे अधिकार दिए हैं जिनका अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। इनमें प्रमुख हैं, जीवन की सुरक्षा, मानवीय स्वतंत्रता एवं सुख प्राप्ति।’
संयुक्तराष्ट्र ने 1975 में यह मानते हुए कि अपराधियों को भी जीवन की सुरक्षा का अधिकार है, हिरासत में यातना के खिलाफ घोषणा पत्र पारित किया था, जिस पर भारत ने भी हस्ताक्षर किए हैं। इससे पूर्व भी मानवाधिकारों के अनेक अंतराष्ट्रीय समझौतों पर भारत हस्ताक्षर कर चुका है इसके बावजूद पुलिस हिरासत में, आरोपियों को दी जाने वाली यातना या र्थड डिग्री के तरीकों में विशेष बदलाव नहीं आया है। पुलिस हिरासत में पूछताछ के दौरान यातना देने की प्रवृत्ति ने व्यवस्थागत रूप ले लिया है। आरोपियों के नाखून उखाड़ना, नाखून के नीचे या उंगलियों के पोरों में तेज सूई घोंपना यंतण्रा की प्राचान तकनीक है। करंट लगाने से लेकर कोड़े मारने जैसे तरीकों का प्रयोग आज भी जारी है। सुप्रीम कोर्ट की अनेक हिदायतों के बावजूद, पुलिस सुधार की सिफारिशें सुप्तावस्था में हैं, इसलिए कहना मुश्किल है कि न्यायालय के ओदश को, पुलिस महकमा कितनी गंभीरता से लेता है। भारत कानूनों के निर्माण में कभी पीछे नहीं रहता, परन्तु दुर्भाग्य से इनके निर्वाहन का पक्ष सदैव कमजोर रहा। समस्या की जड़ हमारी असंवेदनशीलता है जो किसी और की पीड़ा को देखकर व्यथित नहीं होती, विशेषकर जब प्रश्न वर्दीवालों का हो। कैदियों के मानवाधिकारों का हनन कब रुकेगा, इसका उत्तर ढूंढ पाना मुश्किल है।
लोकतंत्र को एक मौका और
पंचायतों के लिए चुनाव तो देश के कई राज्यों में हुए लेकिन आदिवासी बहुल क्षेत्रों और आतंकवादग्रस्त राज्य कश्मीर में ग्राम पंचायतों का लोकतांत्रिक ढंग से चुनाव होना और लोगों का उनमें बड़ी संख्या में शामिल होना अपने आप एक महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम है। दोनों क्षेत्रों में लोगों का एक बड़ा वर्ग लोकतांत्रिक व्यवस्था से घोर असंतुष्ट दिखाई देता है। वे कहते रहे हैं कि भारतीय संविधान, शासन व्यवस्था और राजनीतिक तंत्र के तहत चुनाव प्रक्रिया में शामिल होना उसी तंत्र का समर्थन करना है जिसके खिलाफ वे हथियार उठाए हैं और आतंकवादी कहलाने का जोखिम भी ले रहे हैं। कहीं से उन्हें उम्मीद दिलाई गई है कि तंत्र को उखाड़ने से ही उन की दृष्टि का लोकतंत्र स्थापित होगा। पूर्वी भारत के वन्य राज्यों में आदिवासियों को विश्वास दिला दिया गया है कि आधुनिक नागर संस्कृति और शहरी तौरत रीकों के कारण उन की लौकिक संस्कृति नष्ट की जा रही है।
संवाद ही सहमति का एकमात्र रास्ता
दरअसल, आदिवासियोें की जीवनशैली आधुनिकता की विरोधी है और जब तक लोगों को इससे हटाकर कथित आधुनिकता की ओर नहीं लाया जाता,आदिवासियों का कल्याण सम्भव नहीं है। साफ है कि किसी भी अतिवाद में अतिरंजना की बहुत बड़ी भूमिका होती है। जो चित्र उन्हें दिखाया गया है वह अतिरंजित तो है ही। ऐसी स्थिति में राजनीतिक गरीब और कम जानकार लोगों को इस तरह की बातों से लुभाते हैं और एक जुनून की स्थिति पैदा कर दी जाती है। इस जुनून का जवाब सरकारों के पास हथियार ही होता है। आतंकवाद या कथित माओवाद- समाज के ऐसे दो गुटों के बीच वर्चस्व की जंग होती है। स्पष्ट है कि हथियारों की इस होड़ में कोई हल तो नहीं निकल सकता है। हथियार छोड़कर संवाद ही सहमति का एकमात्र रास्ता है। यह संवाद कैसे स्थापित किया जाए? हम ने जिस लोकतंत्र को अपना लिया है, उस में चुनाव एक महत्वपूर्ण साधन है लेकिन चुनावों ने जो रूप ले लिया है वह तो एक शोषणयुक्त व्यवस्था को ही जन्म देता है। पैसा और रसूख ही तो उम्मीदवार को जितवा सकते हैं। फिर जो प्रतिनिधि जीत कर आते हैं वे तुरंत अपने मतदाताओं से किनारा कर लेते हैं। वही मंत्री बनते हैं, वही सरकारी पैसे की बंदरबांट में लग जाते हैं। ऐसे में जो चुनाव हाल ही में हो गए, उन में बड़ी संख्या में मतदाता शामिल क्यों हुए?
‘अतिवादियों’ का लोकतांत्रिक तरीका
दरअसल, आतंकवाद और नक्सलवाद की हिंसक धाराओं के साथ-साथ बागियों का ऐसा वर्ग भी होता है जो लोकतांत्रिक तरीके से उस सत्ता से लड़ने में विश्वास करता है जिसे वह उखाड़ना चाहता है। अतिवादी अपनी लड़ाई गांवों के स्तर पर लड़ता है। वह विधानसभा या लोकसभा के स्तर पर न तो लड़ सकता है और न ही इससे उस का उद्देश्य पूरा होने की उम्मीद होती है। राज्य प्रशासन और केंद्रीय राजनीति में पड़कर अधिक खतरा तो इसी बात का है कि उस के चुने हुए नेता उसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाएं जिससे वे बगावत करना चाहते थे और जिस के लिए लोगों ने उन्हें चुना था।
पंचायत लोकतंत्र का अच्छा प्लेटफार्म
झारखंड में शिबू सोरेन कभी वास्तविक लोकनायक के रूप में सामने आए थे जिन्होंने अनपढ़ आदिवासियों को लौकिक परम्पराओं के आधार पर व्यवस्था के खिलाफ एक सशक्त ताकत के रूप में खड़ा किया था। शिबू ने उन दिनों मुझे कहा था, ‘तुम नगरवासी रूस-अमेरिका की किताब पढ़ते हो लेकिन मैं तो माटी की किताब पढ़कर ही लोगों को समझाता हूं।’ लेकिन सत्ता के निकट आते-आते गुरुजी एक सत्तालोभी राजनीतिक ही बन गए थे। जो चुनाव आम जनता के सब से करीब होता है वह पंचायतों का चुनाव ही होता है। उसे आम जनता आसानी से नियंत्रित कर सकती है और उससे विधायकों और सांसदों को प्रभावित करना सम्भव है। जो आंदोलन लोकतंत्र के माध्यम से अपने एजेंडे को आगे ले जाना चाहते हैं, उनके लिए पंचायत ही एक अच्छा प्लेटफार्म बन जाता है।
टकराव और मध्यमार्ग का संयुक्त पथ
इसलिए जब घाटी में भारी मतदान हो जाए और लोग उत्साह से वोट डालने बाहर आएं तो यह पूछा जा सकता है कि क्या घाटी हिंसा से मुंह मोड़ रही है? कश्मीर घाटी में सईद अलीशाह गिलानी ने चुनावों का बहिष्कार करने का ऐलान किया था। लेकिन पहले चरण में तो उन के ऐलान की पूरी तरह अनदेखी की गई। गिलानी और उन के हिमायतियों के लिए यह सिद्धांत का प्रश्न है। लेकिन लगता है कि पिछले कुछ सालों में कश्मीर में भी एक ऐसा वर्ग पैदा हो गया है कि जो अहिंसक तरीकों से ही अपने उद्देश्य तक पहुंचना चाहता है। इसके लिए उन्हें किसी राजनीतिक विचारधारा को अपनाने की आवश्यकता ही नहीं और न पार्टियों के झंडे तले काम करना होगा। कश्मीर में टकराव और मध्यमार्गियों का भी यह चुनाव हो रहा है। पहले चरण में दक्षिण कश्मीर यानी अनंतनाग मंडल में कुछ गांवों में तो मतदान प्रतिशत 84 प्रतिशत हो गया था। लेकिन इस से यह अंदाज नहीं लगाना चाहिए कि जो हथियार का रास्ता अपनाना चाहते हैं, उन्होंने हथियार डाल दिए हैं। आरम्भ में ही एक महिला उम्मीदवार हसीना बेगम को आतंकवादियों ने गोली से उड़ा दिया। हालांकि ऐसी बहुत सी घटनाएं नहीं हुई लेकिन इस का असर महिला उम्मीदवारों पर तो पड़ा ही है। हालांकि कोई नहीं जानता कि नतीजों के बाद पंचायतों का स्वरूप क्या होगा लेकिन एहतियात के तौर पर जहां उमर अब्दुल्ला यह कहते हैं कि यह जनमतसंग्रह नहीं है और वहीं महबूबा का कहना है कि लोगों ने उस लोकतांत्रिक व्यवस्था को एक और मौका दिया है जिसका अवमूल्यन स्वयं सरकार ने किया है ।
Tuesday, May 3, 2011
Sunday, May 1, 2011
क्यों उभरता है युवाओं में आक्रोश
भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन से युवाओं में आक्रोश का उभरना स्वाभाविक है। यह उम्मीद जगाता है कि देश अभी मुर्दा नहीं हुआ है। फिल्म रंग दे बसंती की मेरी कहानी भी मेरे पिछले 50 सालों के आक्रोश का नतीजा है। 1959-60 के दौरान जब मैं स्कूल में था तो हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने एक दिन घोषणा की कि देश में जो भी भ्रष्टाचार के आरोप में दोषी पाया जाएगा, उसे नजदीक के टेलीफोन के खंभे से लटका दिया जाएगा। हम उन पर इतना भरोसा करते थे कि अगले दिन स्कूल जाते वक्त रास्ते के सारे टेलीफोन के खंभे देखते हुए गए कि किस खंबे से कौन लटका है, क्योंकि हमें पता था कि हमारे शहर में कौन भ्रष्टाचारी है। मगर सारे खंभे खाली थे और वे आज तक उसी तरह खाली पड़े हैं। दरअसल, इसकी मुख्य वजह है हमारा सिस्टम। इस सिस्टम को मैंने गौर से देखा है, समझा है। यह इतना चालाक है कि वह कई अन्ना हजारे को हजम कर जाएगा और डकार भी नहीं लेगा। हरेक राजनीतिक पार्टी में आजकल वकीलों की भरमार का यदि कारण खोजा जाए तो इनकी उपस्थिति इसीलिए होती है ताकि अन्ना जैसों के आंदोलन को दबाया और मिटाया जा सके। यह सिस्टम इतना चालाक है कि उसने अपने अंदर एक सेफ्टी वॉल्व बना रखा है जिसके रास्ते लोकतंत्र के नाम पर कभी-कभी वह हमें अपने गुस्से की भाप निकालने का मौका दे देता है ताकि हमें यह वहम बना रहे कि हम एक लोकतांत्रिक देश और लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं और हमें अपनी आवाज बुलंद करने का और आक्रोश व्यक्त करने का पूरा-पूरा हक है। मगर एक बार यदि भाप निकल जाए तो सिस्टम वापस फिर से हावी हो जाता है। कांग्रेस ने करीब 60 साल के अपने शासन में इसका अच्छी तरह अभ्यास कर लिया है, लेकिन दूसरे दलों को अभी इसमें पारंगत होना बाकी है। मैं डरता हूं कि कहीं अन्ना हजारे का यह आंदोलन भी सेफ्टी वॉल्व बनकर न रह जाए। अन्ना के आंदोलन को बदनाम करने की सरकार की जो साजिश है उसके पीछे मंशा कुछ और नहीं, बल्कि यही चाल है। इसके अलावा नेता के मनोविज्ञान को अगर समझें तो पता चल जाएगा कि वह क्यों नहीं चाहते कि इस समस्या का समाधान हो। विचारणीय प्रश्न है कि आखिर हमें नेता की जरूरत पड़ती ही क्यों है? जाहिर है अपनी समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए। समस्याएं न हों तो हमें नेता की जरूरत क्यों पड़ेगी और जो खुश है वह नेता के पास क्यों जाएगा? सुखी आदमी को नेता की जरूरत नहीं होती। सिर्फ दुखी आदमी को इसकी जरूरत होती है अपने दुख से छुटकारा पाने के लिए। नेता यह बात बखूबी समझता है। सीधे शब्दों में कहें तो उसका भविष्य हमारे दुखों से बंधा होता है। इसलिए ऊपर से वह यह दिखाने की कोशिश करता रहता है कि वह हमारे दुख दूर करना चाहता है मगर उसकी सारी कोशिश यह होती है कि हमारे दुख किसी न किसी रूप में बने रहें तकि हमें उसकी जरूरत भी बनी रहे। रंग दे बसंती के अंत में भ्रष्ट मंत्री की हत्या को लेकर यह प्रश्न मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि क्या इसका हिंसक होना जरूरी था? इसका जवाब मैं हमेशा गीता के उद्धरण से देता रहा हूं कि समय और परिस्थितियों के अनुसार जो भी उचित हो उसका उपयोग करना चाहिए। हमें सिद्धांतों के किताबी आचरण की बजाय व्यावहारिक आचर-व्यवहार को अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए जो कि समय, काल और परिस्थिति पर निर्भर होता है। उदाहरण के तौर पर आज पाकिस्तान या चीन यदि भारत पर अचानक हमला कर दें तो अन्ना हजारे के नारा लगाने या उपवास करने के तरीके से वे वापस नहीं भाग जाएंगे। उनसे निपटने की रणनीति हमें उन्हीं की शैली में अपनानी होगी और उनसे सशस्त्र युद्धकरना होगा। भगवान श्रीराम ने रावण के हाथों कैद सीता माता को छुड़ाने के लिए उपवास का सहारा नहीं लिया और न ही भगवान कृष्ण ने कौरवों के खिलाफ जनांदोलन किया था। उस काल में समय और परिस्थिति का तकाजा थी हिंसा। जब सारे रास्ते बंद हो गए तो हिंसा का ही रास्ता बचा। गांधीजी अंग्रेजों के खिलाफ हिंसा का सहारा नहीं ले सकते थे, क्योंकि अंग्रेज उस भाषा को समझते थे और उसका उत्तर देना बखूबी जानते थे। मगर गांधीजी के अहिंसा के हथियार ने अंग्रेजों को निहत्था कर दिया, क्योंकि इसका अंग्रेजों के पास कोई जवाब नहीं था। 1948 में जब कश्मीर पर पाकिस्तानी कबायलियों ने अचानक हमला कर दिया तो गांधीजी उनके खिलाफ उपवास पर नहीं बैठे, बल्कि वह भारतीय सेना को जीत का आशीर्वाद देने पहुंचे। सोचिए अगर हिटलर से गांधीजी का पाला पड़ा होता तो क्या गांधीजी सफल होते? शायद हिटलर गांधीजी को उपवास पर ही गोली मरवा देता। ब्रिटेन में लोकतंत्र था, इसलिए अंग्रेजों को वहां की जनता का भी डर था। यही वजह थी कि उन्हें गांधीजी के सामने झुकना पड़ा। हिटलर तानाशाह था, उसे किसी का डर नहीं था। इसलिए हिंसा या अहिंसा कोई सनातन मूल्य नहीं है, समय और परिस्थिति के अनुसार उसका उपयोग जायज है। मेरा मानना है कि दौर कोई भी हो जो भी भगत सिंह बनने की जुर्रत करेगा वह मारा जाएगा। पिछले 63 सालों में न जाने कितने युवा अपने ही देश की पुलिस के हाथों मारे गए हैं और न जाने कितने मासूम और निरपराध प्रताडि़त किए गए। मेरी बात तो छोडि़ए, मैं तो एक मामूली सा फिल्म लेखक हूं, विजय तेंदुलकर जैसे बुद्धिजीवी कहते थे कि जब वह किसी नेता को स्टेज पर देखते हैं तो उनका मन करता है कि अगर उनकी जेब में पिस्तौल होती तो वह उसे गोली मार देते। मिस्त्र में लोग हिंसा पर उतर आए आखिर उन्होंने उपवास का सहारा क्यों नहीं लिया? आज लीबिया में क्या हो रहा है? साहिर लुधियानवी की ही पंक्तियां हैं-तुमने जिस खून को मक्ताल में दबाना चाहा, आज वो कूचा-ए-बाजार में आ निकला है,, कहीं शोला, कहीं नारा, कहीं पत्थर बनकर ..। जैसा कि भगत सिंह ने असेंबली में बम फोड़ने से पहले कहा था, सत्ता जब बहरी हो जाए तो उसके कान खोलने के लिए सिर्फ चिल्लाना काफी नहीं होता, उसके लिए कभी-कभी एक धमाका भी जरूरी होता है। यह सरकार भी इस वहम में नींद ले रही थी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ युवाओं के आक्र ोश की भाप (अन्ना का आंदोलन) भी हमेशा की तरह थोड़े समय में ही सेफ्टी वॉल्व से बाहर निकल जाएगी, लेकिन जब उसने देखा कि पूरा प्रेशर कूकर ही फटने वाला है तब जाकर उसकी नींद टूटी। हालांकि आशंका अभी भी बरकरार है। दरअसल, सत्ता भ्रष्ट नहीं करती, बल्कि जो भ्रष्ट हैं अक्सर वही सत्ता की तरफ आकर्षित होते हैं। सत्ता अगर भ्रष्ट करती होती तो लाल बहादुर शास्त्री भी भ्रष्ट हो गए होते और सरदार पटेल भी। मगर ऐसा नहीं हुआ। सत्ता इतनी कीमती चीज है कि उसे राजनीतिज्ञों के हाथ में देना ही खतरनाक है। इसे उनके हाथ में देना चाहिए जो उस विषय के जानकार हों, तभी भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं का कोई हल संभव है। (ऋतुराज गुप्ता से बातचीत पर आधारित) (लेखक जानेमाने पटकथा लेखक हैं)
अन्ना के मकसद में अड़ंगेबाजी
भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन पर बैठने के पहले अन्ना हजारे ने यह तो जरूर सोचा होगा कि उनकी लड़ाई आसान नहीं होगी, लेकिन शायद यह न सोचा हो कि शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच होने वाले उनके किसी कार्यक्रम को करने की अनुमति कोई विश्वविद्यालय नहीं देगा। लखनऊ विश्वविद्यालय ने ऐसा ही किया। भले ही अन्ना का लखनऊ आगमन रद हो गया हो, लेकिन सत्ता के आगे विश्वविद्यालय का यह समर्पण अन्ना हजारे के उन समर्थकों को शायद ही रोक सके जो एक मई को फोन से दिए जाने वाले उनके भाषण को सुनने लखनऊ के झूलेलाल पार्क में जमा होना चाहते हैं। अन्ना के अनशन पर बैठने से लेकर अब तक जो कुछ हुआ है उससे एक बनाम सरकार की लड़ाई में सत्ता का कुरूप चेहरा उजागर हो गया है। किसी भी अच्छी चीज को नष्ट करने का सरलतम उपाय उसे विवादित कर देना है। अन्ना विरोधी साजिशन यही कर रहे हैं। यह याद करना मुश्किल है कि दिग्विजय सिंह ने पिछली बार सकारात्मक बयान कब दिया था। अब तो उनके साथ कांग्रेसी समंदर में अपने लिए एक अदद टापू तलाश रहे अमर सिंह भी हैं। लगता है कि उनके पास एक ऐसा जादुई झोला है जिसमें हर किस्म की सीडी हैं। अपने गांव को आदर्श बना देने वाले एक पूर्व फौजी अन्ना में जब कमियां नहीं मिलीं तो उनके अनशन को अलोकतांत्रिक बताया जाने लगा। अन्ना हजारे के अनशन का मूल प्रश्न क्या था? प्रभावी लोकपाल की उनकी मांग कहां से उपजी थी? 72 साल के अन्ना के साथ अगर देश हो लिया तो कारण क्या था? कस्बाई सड़कों से लेकर दिल्ली के राजपथ तक जो जनसमूह उमड़ा वह क्या प्रश्न हल करना चाहता था? उस सवाल पर चर्चा क्यों नहीं होती? कोई पार्टी आगे आकर यह क्यों नहीं कहती कि अन्ना का तरीका गलत था, पर हम उनके मुद्दे से सहमत हैं और संकल्प लेते हैं कि हमारे राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय स्तर तक के नेता अपराधों में लिप्त नहीं होंगे, जमीन का धंधा नहीं करेंगे, वोट के लिए संसद में नोट उछालते नहीं दिखेंगे, विधानसभाओं में एक दूसरे पर कुर्सियां नहीं फेंकेंगे, गंभीर और विकासवादी राजनीति करेंगे। अपने चुनावी घोषणापत्रों में भ्रष्टाचार को कोढ़ बताने वाले दल इस समय या तो चुप हैं और या अन्ना व उनके सहयोगियों में कमियां निकालने के अभियान में लगे हैं। सच यह है कि अन्ना के अनशन ने यह बात बखूबी सिद्ध कर दी है कि भ्रष्टाचार सभी दलों के लिए केवल जबानी जमाखर्च है। विपक्ष चाहता तो आगे बढ़कर कहता कि लोकपाल मसौदा कमेटी में हमारे भी लोग होंगे और हम अन्ना की इस शुरुआत को तार्किक समापन तक ले जाएंगे। सच यह है कि सरकार अनशन से नहीं उसे मिले प्रबल समर्थन से डरी। आंदोलन के कारण सरकार, राजनीतिक दलों और पेशेवर नेताओं की असहजता समझी जा सकती है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से बुद्धिजीवी भी मौन हैं। कुछ बोले भी तो उन्हें आंदोलन में संसद की अवमानना नजर आई। उनका तर्क है कि लोकतंत्र में कानून बनाने का काम संसद का है, लेकिन कोई अनशन करके इसके लिए दबाव डाले तो यह ब्लैकमेलिंग है। इन बुद्धिमानों को लगता है कि सभी ऐसा ही करने लगे तो लोकतंत्र का होगा क्या? अन्ना ने अनशन के दौरान टीवी पर कहा था कि संसद जो कहेगी उन्हें स्वीकार होगा और वह लोकपाल बिल पर चर्चा के लिए विशेष सत्र बुलाने के पक्ष में नहीं है। उनका कहना था कि संसद के सत्रों पर जनता का बहुत पैसा खर्च होता है और लोकपाल बिल पर चर्चा नियमित मानसून सत्र में की जा सकती है। इसमें कहां हो गई संसद की अवमानना। जनभावना लोक है और लोक से बड़ा कुछ नहीं। लोक मान चुका है कि यह अन्ना ही हैं जिन्होंने महाराष्ट्र में शरद पवार से लगातार लोहा लिया। अन्ना के अनशन की सफलता ही इस बात का प्रमाण है कि आम लोग भ्रष्टाचार से किस कदर ऊबे हैं। उन्हें जैसे ही कहीं मुक्ति का छोटा भी द्वार दिखा, वे दौड़ लिए। राज्यों में और राष्ट्रीय राजनीति में ऐसा कौन है जिसकेपीछे लोग इस तरह खड़े हो सकते हैं। अन्ना विरोधियों का तर्क यह भी है कि उनकेसाथ जो लोग खड़े हुए वे तो ऐसे सुविधाभोगी हैं जो वोट देने नहीं जाते। अगर यह मान भी लें तो इस बात पर किसे शर्मिदा होना चाहिए-आम जनता को या फिर राजनीतिक वर्ग को? अगर किसी एक मुद्दे पर अभी तक अपने को अलग-थलग रखता आया वर्ग मुखर हो रहा है तो यह हर्ष का विषय है। एक अन्ना केखिलाफ जिस तरह से पूरा सिस्टम जुट गया है उससे अगर कुछ दिनों बाद यह मुहिम ठंडी पड़ती दिखे तो ताज्जुब नहीं, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि अन्ना ने लोगों में भ्रष्टाचार के खिलाफ भीतर पैठी भावना को झकझोरा है। अन्ना से यह श्रेय कोई नहीं ले पाएगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
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