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Thursday, May 5, 2011

कैदियों के अधिकारों की चिंता


हाल में उच्चतम न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण फैसले में कहा कि हिरासत में हुई मौत दुर्लभ से दुर्लभतम श्रेणी का जुर्म है और इसके लिए दोषी पुलिसवालों को मौत की सजा मिलेगी। ऐसी मौत उसी तरह है जैसे किसी असहाय और अपने में असमर्थ व्यक्ति को तड़पा-तड़पा कर मार दिया जाए। न्यायालय के अनुसार हिरासत में मौत संभवत: कानून के शासन से शासित होने वाले सभ्य समाज का सबसे वीभत्स अपराध है। यदि किसी के साथ कोई अत्याचार या अमानवीय व्यवहार होता है, चाहे यह पुलिस जांच के दौरान ही क्यों न हो तो यह अनुच्छेद 21 (जीवन व आजादी का अधिकार) तथा 22 (1) का खुला उल्लंघन है। हमारी जेलों में सामान्यत: विचाराधीन से लेकर सजायाफ्ता कैदी तक से पूछताछ के दौरान अमानवीय व्यवहार होता है। पुलिस हिरासत में जाते ही किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार कैसे खत्म हो सकते हैं। क्या किसी के अधिकार निलंबित रखे जा सकते हैं? मानवीय अधिकारों की रीढ़ स्पर्श करते इन सवालों का उत्तर सिर्फ ‘नहीं’ है। ‘यातना निवारण विधेयक 2010’
भी कहता है कि पुलिस हिरासत में आरोपियों को यातना देना गैरकानूनी और आपराधिक है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक जहां किसी तरह की क्रूरता, अमानवीयता या अपमानित करने वाले व्यवहार को यातना की श्रेणी में रखा गया है, वहीं यातना निवारण विधेयक किसी व्यक्ति के शारीरिक अंगों को प्रत्यक्ष नुकसान पहुंचाने या जीवन पर खतरे को इस श्रेणी में रखता है। मानवाधिकारों की पैरवी करने वाले लंबे अरसे से पूछताछ या सच उगलवाने के नाम पर कैदियों को प्रताड़ित किए जाने के विरुद्ध आवाज उठा रहे हैं, तो इसकी वजह यही है कि अकेले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में 1994 से 2008 के बीच हिरासत में मौत के 16836 मामले दर्ज किए गये। सवाल है कि अपराधी होने मात्र से क्या व्यक्ति जीवन की सुरक्षा और स्वतंत्रता का अधिकार खो देता है? थॉमस जेफरसन ने 13 अमेरिकी उपनिवेशों की स्वतंत्रता की उद्घोषणा में कहा था, ‘हम इस सत्य को स्वयं प्रमाणित मानते हैं कि सब मनुष्य समान रूप से जन्म लेते हैं और जन्मदाता ने इन्हें जन्म से ही कुछ ऐसे अधिकार दिए हैं जिनका अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। इनमें प्रमुख हैं, जीवन की सुरक्षा, मानवीय स्वतंत्रता एवं सुख प्राप्ति।’
संयुक्तराष्ट्र ने 1975 में यह मानते हुए कि अपराधियों को भी जीवन की सुरक्षा का अधिकार है, हिरासत में यातना के खिलाफ घोषणा पत्र पारित किया था, जिस पर भारत ने भी हस्ताक्षर किए हैं। इससे पूर्व भी मानवाधिकारों के अनेक अंतराष्ट्रीय समझौतों पर भारत हस्ताक्षर कर चुका है इसके बावजूद पुलिस हिरासत में, आरोपियों को दी जाने वाली यातना या र्थड डिग्री के तरीकों में विशेष बदलाव नहीं आया है। पुलिस हिरासत में पूछताछ के दौरान यातना देने की प्रवृत्ति ने व्यवस्थागत रूप ले लिया है। आरोपियों के नाखून उखाड़ना, नाखून के नीचे या उंगलियों के पोरों में तेज सूई घोंपना यंतण्रा की प्राचान तकनीक है। करंट लगाने से लेकर कोड़े मारने जैसे तरीकों का प्रयोग आज भी जारी है। सुप्रीम कोर्ट की अनेक हिदायतों के बावजूद, पुलिस सुधार की सिफारिशें सुप्तावस्था में हैं, इसलिए कहना मुश्किल है कि न्यायालय के ओदश को, पुलिस महकमा कितनी गंभीरता से लेता है। भारत कानूनों के निर्माण में कभी पीछे नहीं रहता, परन्तु दुर्भाग्य से इनके निर्वाहन का पक्ष सदैव कमजोर रहा। समस्या की जड़ हमारी असंवेदनशीलता है जो किसी और की पीड़ा को देखकर व्यथित नहीं होती, विशेषकर जब प्रश्न वर्दीवालों का हो। कैदियों के मानवाधिकारों का हनन कब रुकेगा, इसका उत्तर ढूंढ पाना मुश्किल है।