उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के बहेड़ी स्थित केसर चीनी मिल को 59 साल अपनी जमीन देने वाले हाजी अमीर अहमद और उनके जैसे 35 अन्य किसान जवानी से बुढ़ापे की दहलीज पर पहुंच गए। कुछ तो दुनिया से ही कूच कर गए, लेकिन किसी को भी न तो जमीन का मुआवजा मिला और न जमीन। किसान इस बेहद लंबे संघर्ष में थक चुके हैं,लेकिन हार नहीं मानी है। अपनी मांग के लिए वे आज भी सरकार से लड़ रहे हैं। किसानों के मुआवजे का यह मामला जिले की सबसे पुरानी चीनी मिल से जुड़ा है। 1931 के आसपास स्थापित केसर चीनी मिल का 1952 में विस्तार हुआ। किसानों की 52 बीघे जमीन का अधिग्रहण हुआ। तब अमीर अहमद के वालिद अब्दुल मजीद के समझाने पर किसानों ने जमीन दे दी, क्योंकि उन्हें यहां मिल लगने से कस्बे का हित दिखा। चीनी मिल प्रशासन ने आश्वस्त किया था किसानों से ली गई जमीन पर अस्पताल और स्कूल बनाएंगे। उस समय जमीन का मुआवजा आने के हिसाब मिलता था। 52 बीघा जमीन का एक हजार कुछ रु. का था। तब कलेक्ट्रेट में विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी का काम एडीएम देखा करते थे। अमीर अहमद बताते हैं कि मिल ने जमीन लेने के बाद शर्तो का पालन नहीं किया। शोर मचाने पर 10 साल बाद स्कूल और 30 साल बाद अस्पताल बना। दोनों भवन बनने के बाद भी जमीन बची रह गई। शर्त यह थी कि अगर दो साल में दोनों काम नहीं किये गए तो किसानों को जमीन वापस करना पड़ेगी। बाकी सभी किसानों का कहना है कि शर्तो के उल्लंघन पर हमें हमारी जमीन वापस मिले, क्योंकि हमें मुआवजा भी नहीं मिला है। एग्रीमेंट में यह भी कहा गया था कि स्कूल और अस्पताल के बनने पर अगर जमीन बची तो उसे किसानों को वापस कर दिया जाएगा। अपनी मांग लेकर किसान राजभवन पहुंचे तो राज्यपाल ने मामला शासन को भेज दिया। मुख्य सचिव ने डीएम को कार्रवाई के निर्देश दिए। इसे भी 6-7 माह हो गए। अब यह मामला एसडीएम बहेड़ी के पास लंबित है। उनसे पैमाईश कराकर रिपोर्ट भेजने को कहा गया है। किसान बताते हैं कि एसडीएम के पास जाओ तो वह आज या कल पैमाईश कराने की बात कहकर टरका देते हैं.
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Wednesday, June 15, 2011
59 साल से लड़ रहे मुआवजे की जंग
उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के बहेड़ी स्थित केसर चीनी मिल को 59 साल अपनी जमीन देने वाले हाजी अमीर अहमद और उनके जैसे 35 अन्य किसान जवानी से बुढ़ापे की दहलीज पर पहुंच गए। कुछ तो दुनिया से ही कूच कर गए, लेकिन किसी को भी न तो जमीन का मुआवजा मिला और न जमीन। किसान इस बेहद लंबे संघर्ष में थक चुके हैं,लेकिन हार नहीं मानी है। अपनी मांग के लिए वे आज भी सरकार से लड़ रहे हैं। किसानों के मुआवजे का यह मामला जिले की सबसे पुरानी चीनी मिल से जुड़ा है। 1931 के आसपास स्थापित केसर चीनी मिल का 1952 में विस्तार हुआ। किसानों की 52 बीघे जमीन का अधिग्रहण हुआ। तब अमीर अहमद के वालिद अब्दुल मजीद के समझाने पर किसानों ने जमीन दे दी, क्योंकि उन्हें यहां मिल लगने से कस्बे का हित दिखा। चीनी मिल प्रशासन ने आश्वस्त किया था किसानों से ली गई जमीन पर अस्पताल और स्कूल बनाएंगे। उस समय जमीन का मुआवजा आने के हिसाब मिलता था। 52 बीघा जमीन का एक हजार कुछ रु. का था। तब कलेक्ट्रेट में विशेष भूमि अध्याप्ति अधिकारी का काम एडीएम देखा करते थे। अमीर अहमद बताते हैं कि मिल ने जमीन लेने के बाद शर्तो का पालन नहीं किया। शोर मचाने पर 10 साल बाद स्कूल और 30 साल बाद अस्पताल बना। दोनों भवन बनने के बाद भी जमीन बची रह गई। शर्त यह थी कि अगर दो साल में दोनों काम नहीं किये गए तो किसानों को जमीन वापस करना पड़ेगी। बाकी सभी किसानों का कहना है कि शर्तो के उल्लंघन पर हमें हमारी जमीन वापस मिले, क्योंकि हमें मुआवजा भी नहीं मिला है। एग्रीमेंट में यह भी कहा गया था कि स्कूल और अस्पताल के बनने पर अगर जमीन बची तो उसे किसानों को वापस कर दिया जाएगा। अपनी मांग लेकर किसान राजभवन पहुंचे तो राज्यपाल ने मामला शासन को भेज दिया। मुख्य सचिव ने डीएम को कार्रवाई के निर्देश दिए। इसे भी 6-7 माह हो गए। अब यह मामला एसडीएम बहेड़ी के पास लंबित है। उनसे पैमाईश कराकर रिपोर्ट भेजने को कहा गया है। किसान बताते हैं कि एसडीएम के पास जाओ तो वह आज या कल पैमाईश कराने की बात कहकर टरका देते हैं.
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