वन एवं अन्य निर्माण मजदूर अधिनियम 1996 के तहत कंपनियों से वसूले जाने वाले उपकर को समाप्त कराने के लिए याचिका दाखिल की गई थी। याचिका को खारिज करते हुए माननीय उच्चतम न्यायालय ने कहा है, ‘संसद को मजदूरों के कल्याण के लिए उपकर लगाने का पूरा अधिकार है। समाज में आज भी मजदूरों का शोषण हो रहा है, इसलिए मजदूरों के कल्याण के लिए हर संभव कदम उठाए जाने चाहिए।’ उक्त अधिनियम के तहत सभी राज्यों में श्रमिक कल्याण बोर्ड स्थापित किए जाने हैं लेकिन आधे से अधिक राज्यों ने अभी तक श्रमिक कल्याण बोर्ड स्थापित नहीं किए हैं। जिन राज्यों में बोर्ड हैं, उनमें से अधिकतर में श्रमिक कल्याण कोष का उपयोग सही ढ़ंग से नहीं हो रहा है। विभिन्न राज्यों के श्रमिक बोडरे ने उपकर के रूप में करीब साढ़े पांच हजार करोड़ रुपए इकट्ठा किए। जिनमें से करीब 15 फीसद राशि ही खर्च की गई। दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम के दौरान ठेकेदारों से वसूले गए उपकर की करीब सात सौ करोड़ की राशि में से करीब तीस करोड़ की राशि खर्च की गई। मजदूरों पर खर्च करने के मामले में दक्षिण के दो राज्यों का प्रदर्शन अच्छा रहा। केरल में सबसे ज्यादा 78 फीसद, तमिलनाडु 43, मध्य प्रदेश 22 और आंध्र प्रदेश में 3 फीसद राशि खर्च की गई। बिहार, गुजरात, राजस्थान, एवं उत्तर प्रदेश एक फीसद से भी कम राशि खर्च कर पाए। श्रमिक कल्याण बोडरें के तहत प्रदेश के मजदूरों का पंजीकरण अनिवार्य है। राज्यों की तरफ से पंजीकरण के मामले में भी ढ़िलाई बरती जा रही है। देश के विभिन्न श्रमिक कल्याण बोडरें में असंगठित क्षेत्र के करीब 75 लाख श्रमिक पंजीकृत हैं। देश में सबसे ज्यादा करीब इक्कीस लाख मजदूर तमिलनाडु में पंजीकृत हैं। मध्य प्रदेश 17 लाख, करीब उतने ही केरल में, उत्तर प्रदेश में 10 लाख और आंध्र प्रदेश में करीब 9 लाख मजदूर पंजीकृत हैं। देश की कुल श्रमशक्ति में करीब 90 फीसद मजदूर असंगठित क्षेत्र में हैं। उद्योगों की अपेक्षा खेतों में मजदूरों खास तौर पर दलित मजदूरों का शोषण अधिक होता है। योजना आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार 2007-08 में कृषि मजदूरों की संख्या 55 फीसद थी, जो वर्ष 2009-10 में घटकर 45.5 फीसद रह गई। श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार प्रत्येक वर्ष करीब 12 करोड़ लोग रोजगार की तलाश में गांवों से शहरों की ओर पलायन करते हैं। अनेकों श्रम कानूनों के बावजूद ग्रामीण क्ष़ेत्रों में करीब 85 फीसद और शहरी क्षेत्रों में करीब 60 फीसद दिहाड़ी मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी दी जाती है। महिला मजदूरों को पुरुष मजदूरों से कम मजदूरी दी जाती है। गांवों में पर्याप्त संख्या में मजदूर नहीं मिलते और शहरों में मजदूरों को पर्याप्त काम नहीं मिलता। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के काम करने का कोई स्थायी ठिकाना न होने के कारण, अधिकतर मजदूर संबंधित योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाते हैं। खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए तर्क दिया जा रहा है कि इससे अगले तीन साल में एक करोड़ रोजगारों का सृजन होगा। रोजगार सृजन के नाम पर पहले भी ऐसे फैसले लिए जाते रहे हैं। रोजगार का यह कैसा सृजनीकरण है, जिसमें रोजगार की दर के बजाय बेरोजगारी की दर बढ़ रही है। श्रम मंत्रालय की एक सव्रेक्षण रिपोर्ट के अनुसार 2005 में बेरोजगारी दर करीब 8 फीसद थी, जो 2010 में बढ़कर करीब 9.5 फीसद हो गई। भारत मजदूरों के खून-पसीने की कीमत पर ही शोहरत और समृद्धि हासिल कर रहा है। एक तरफ देश के नगरों-महानगरों में ऊंची इमारतें हैं, चिकनी-चौड़ी सड़कें हैं जिनमें असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का श्रम लगा है। दूसरी तरफ इन्हीं शहरों के चौराहों पर रोज सुबह असंगठित मजदूर काम मिलने की उम्मीद में, कभी-कभी तो शाम तक बैठे रहते हैं, फिर भी उन्हें काम नहीं मिलता। काम मिलने की उम्मीद की सुबह बेबसी की शाम में बदल जाती है। कहीं-कहीं तो इन चौराहों पर मजदूरों की संख्या इतनी ज्यादा होती है, कि ऐसे चौराहों को ‘मजदूर चौक’ का नाम दे दिया जाता है। लोगों को किसी सड़क, कॉलोनी आदि का नाम बदलवाने के लिए लंबे आंदोलन चलाने पड़ते हैं, पर किसी चौक का नाम मजदूर चौक रखवाने के लिए कभी आंदोलन चलाने की जरूरत शायद ही पड़ी हो। कार्य विशेष में कौशल प्राप्त मजदूर इंजीनियर की तरह होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि मजदूर करके सीखता है और एक इंजीनियर पढ़कर सीखता है। ज्ञानार्जन का सिद्धांत है कि करके सीखा हुआ ज्ञान, पढ़कर सीखे हुए ज्ञान से बेहतर होता है। अंतरराष्टीय संस्था ‘गैलप’ ने दुनिया के 124 देशों में लोगों के जीवनस्तर से संबंधित एक सव्रेक्षण कराया था। सव्रेक्षण रिपोर्ट के अनुसार बेहतर जीवन जीने के मामले में भारत 71 वें स्थान पर रहा। भारत के करीब 17 फीसद लोग ही अपने जीवद से खुश हैं। 65 फीसद लोग गरीबी एवं बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, इनमें से करीब 20 फीसद गरीबी लोग ऐसे हैं, जो अधिक दुखी हैं। एक अन्य सव्रेक्षण रिपोर्ट में मजदूरों से काम कराने के मामले में भारत को दुनिया का दूसरा सबसे खराब देश माना गया है। करीब 60 फीसद मजदूरों को तनाव की स्थिति में काम करना पड़ता है। असंगठित मजदूरों में दलितों, आदिवासियों की संख्या अधिक है। उन्हें दलित होने की सामाजिक और मजदूर होने की दोहरी कुंठा से जूझना पड़ता है। डॉ. अंबेडकर ने मजदूरों को राजनीतिक आवाज देने के लिए 15 अगस्त 1936 को ‘स्वतंत्र मजदूर पार्टी’ की स्थापना की थी। उन्होंने कहा था,‘मजदूरों के जीवन की संपूर्णता एवं स्वतंत्रता के विरुद्ध काम करने वाली अर्थव्यवस्था को बदल देना या फिर नष्ट कर देना चाहिए।’ देश के नीति-नियंताओं ने अंबेडकर के विचारों से कोई सबक नहीं लिया। मुक्त व्यापार की नीतियों के जश्न में मजदूरों की आर्थिक मुक्ति के मुद्दों को भुला दिया गया है। एक तरफ आर्थिक उदारीकरण के दौर में देश में प्रतिवर्ष करोड़पतियों-अरबपतियों की नई फौज खड़ी हो रही है, तो वहीं दूसरी तरफ उदारीकरण में पनपी आर्थिक क्रूरताएं मजदूर हितों को रौंद रही हैं। आर्थिक उदारीकरण मजदूरों के लिए सख्तीकरण साबित हो रहा है। जब उद्योग डूबने लगते हैं, तो उन्हें आर्थिक पैकेज देकर उबार लिया जाता हैं और जब मजदूरों के हित डूबते हैं, तो उन्हें अधिकांशत: कोरे आासन मिलते हैं। केंद्र सरकार मजदूरों के लिए राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा योजना लाने के शुभ संकेत तो दे रही है पर यह देखना बाकी है कि यह संकेत जमीनी हकीकत में कब बदलेगा।
Monday, December 5, 2011
Wednesday, November 30, 2011
लिंग परीक्षण पर प्रतिगामी प्रस्ताव
योजना आयोग के प्रस्ताव, नीतियां अक्सर बहस का माहौल तैयार करती हैं। बीते दिनों योजना आयोग ने भ्रूण लिंग परीक्षण पर प्रतिबंध में ढील देने वाला जो प्रस्ताव रखा, उस पर सवाल खड़े हो गए हैं। यह नीति में बड़े बदलाव वाला प्रस्ताव है यानी इस मुददे पर अपनी पूर्व राय से हटना। योजना आयोग की एक बैठक में प्रस्ताव रखा गया कि देश में लड़कियों की संख्या में वृद्धि करने के लिए पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट(प्री कनसीव एंड प्री नेटल डायगोस्टिक टेक्नीक) में संशोधन किया जाए। प्रस्ताव में बेटियों के सुरक्षित जन्म या उनके जन्म को सुनिश्चित करने के लिए सरकार गांवों में भ्रूण लिंग परीक्षण पर प्रतिबंध हटाने और आंगनबाड़ी, एएनएम, आशा कार्यकर्ताओं व स्वयंसेवी संस्थाओं की सहायता से माताप्िाता को लड़की के सुरक्षित जन्म के लिए प्रेरित करने पर जोर है। यदि अभिभावक उसकी परवरिश करने में सक्षम नहीं है तो उसे गोद लेने का जिम्मा सरकार का होगा।EOFप्ट ए फीमेल फोटस नामक इस अभियान में सरकार आंगनबाड़ी, एएनएम, आशा कार्यकर्ताओं को ही नहीं बल्कि गर्भवती मां व उसके परिवार को इंसेंटिव देगी। ये लोग बेटियों की हत्या रोकने के लिए गर्भधारण करने वाली महिलाओं की भ्रूण लिंग जांच कराएंगे, यदि जांच से पता चला कि भ्रूण कन्या का है तो वे माता-पिता से पूछेंगे कि वे उसे जन्म देंगे, यदि उत्तर न में मिला तो आंगनबाड़ी, एएनएम कार्यकर्ता आदि उस अवांछित कन्या भ्रूण को जन्म देने के बावत अभिभावक को प्रेरित करेंगे। योजना आयोग का मानना है कि पीसी व पीएनडीटी एक्ट के लागू होने के इतने साल बाद भी कन्या भ्रूण हत्या के अनुपात में कोई सुधार नहीं दिखाई देता। लिहाजा नीति में बदलाव करके लड़कियों के घटते अनुपात को बढ़ाया जाए। नवीनतम जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक प्रति 1000 बालकों पर 914 बालिकाएं हैं जबकि एक दशक पूर्व प्रति हजार लड़कों पर 927 बालिकाएं थीं। 1971 में यह संख्या 940 थी। अपने मुल्क में कन्या भ्रूण हत्या के आंकड़े भयावह हैं जबकि ऐसा करना कानूनी अपराध है। एक लंबे संघर्ष के बाद 1994 में पीएनडीटी एक्ट लागू किया गया, जिसके तहत भ्रूण लिंग परीक्षण जांच पर प्रतिबंध लग गया। इस कानून का अल्ट्रासांउड लॉबी ने अपने आर्थिक हितों के मददेनजर कड़ा विरोध किया। कुछ सालों बाद इसे और कड़ा बनाने के लिए इसमें संशोधन किया गया। कानून का उल्लघंन करने वाला यदि दोषी पाया गया तो उसे सजा व जुर्माना देने का प्रावधान भी है। मगर असलियत का खुलासा सरकारी सव्रे ही करते हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के वाषिर्क सव्रे 2010- 2011 के तहत देश के नौ राज्यों में लिंग परीक्षण जांच की बात सामने आई है। गौरतलब यह भी है कि इस कानून के लागू होने के बाद कानून का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई बहुत कम हुई हैं। अधिकतर मामलों में सजा नहीं हुई। भ्रूण लिंग परीक्षण जांच संबंधी कानून को लागू करने में सरकार ने सुस्ती बरती, इसकी तसदीक 2001 व 2011 जनगणना के आंकड़े करते हैं। अखिल भारतीय जनवादी महिला संस्था की महासचिव सुधा सुंदर रमन का सवाल है कि सरकार को कानून का सख्ती से अमल करने के बावत सुझाव न देकर योजना आयोग का यह प्रस्ताव प्रतिगामी कदम साबित होगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि योजना आयोग इस हास्यास्पद प्रस्ताव के जरिए मौजूदा कानून को कम करके आंक रहा है। इससे हालात और जटिल होंगे। पहले एक्ट में सरकार ने जिस काम को अपराध की क्षेणी में रखा, अब उसे अपराध नहीं माना जाएगा, क्या उचित होगा? योजना आयोग के इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि जो अभिभावक लड़की को जन्म देने के बाद उसका पालन-पोषण करने में अनिच्छा जाहिर करेंगे, ऐसी लड़कियों को सरकार गोद ले लेगी। उन्हें पालना घर, बालगृह आदि में भेज दिया जाएगा। ऐसे सरकारी व सरकारी अनुदान से संचालित केद्रों में बदइंतजामी, बच्चियों के शारीरिक व यौन शोषण की खबरें आए दिन छपती रहती हैं। सचाई तो यह है कि कानून पर पाबंदी उठाने या प्रतिबंध में ढील दिए जाने के पक्ष में एक मजबूत लॉबी सक्रिय है और यदि ऐसा हुआ तो देश में कन्या भ्रूण हत्याओं की संख्या में बढ़ावा होने की आशंका भी नजर आती है। इस विवादास्पद प्रस्ताव से पैदा होने वाली जटिलताओं व असहमति के स्वरों पर व्यापक विचार-विमर्श होना चाहिए। बेशक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, मानव संसाधन विकास एवं पंचायती राज मंत्रालयों में मोटे तौर पर इस योजना पर सहमति है मगर अन्य पहलूओं को भी ध्यान में रखना होगा। इसे आखिरी व कारगर हथियार मानने की अपेक्षा बेटी बचाओ संबंधी दूसरे अभियानों पर फोकस करने के बावत भी सोचा जा सकता है। पाबंदी पर ढील देना या आंगनबाड़ी, एएनएम को नकद प्रोत्साहन देना इस सामाजिक बीमारी का शर्तिया और पक्का इलाज नहीं है। इस पर ध्यान रखने की जरूरत है।
Tuesday, November 29, 2011
विकास पर भारी भूख और कुपोषण
Saturday, November 26, 2011
प्रति व्यक्ति दाल की उपलब्धता 32 ग्राम
सरकार ने स्वीकार किया कि देश में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन दाल की उपलब्धता महज 32 ग्राम है। सरकार ने दाल की उपलब्धता में कमी के पीछे जनसंख्या वृद्धि को कारण बताया है। कृषि खाद्य प्रसंस्करण राज्यमंत्री हरीश रावत ने बताया कि वर्ष 1960 में दालों की प्रति व्यक्ति प्रतिदिन उपलब्धता 65.5 ग्राम थी। उस दौरान देश में दालों का एक करोड़ 18 लाख टन उत्पादन होता था। रावत ने बताया कि वर्ष 2010 में यह उपलब्धता महज 31.6 ग्राम रह गई । इस दौरान देश में दालों का एक करोड़ 46 लाख टन उत्पादन हुआ। उन्होंने कहा कि दालों के उत्पादन में वृद्धि होने के बावजूद दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में गिरावट आई है जिसका कारण दालों के उत्पादन में वृद्धि की तुलना में जनसंख्या में अधिक वृद्धिध होना है । उन्होंने वाईएस चौधरी के सवाल के लिखित जवाब में राज्यसभा को यह जानकारी दी।
Friday, November 25, 2011
कब बहुरेंगे दिन बुंदेलखंड के
| उत्तर प्रदेश विधानसभा में पारित चार राज्यों के प्रस्ताव ने बुंदेलखंड इलाके के लोगों में दशकों पुरानी मांग पूरा होने की उम्मीद जगा दी है। हालांकि महज छह जिलों, 22 विधानसभा सीटों और एक करोड़ से भी कम आबादी के उत्तर प्रदेश के बुदेलखंड का अलग राज्य बनना तब तक संभव नहीं होगा, जब तक मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड को भी इसमें मिलाने की प्रक्रिया प्रारंभ न हो। प्राकृतिक संपदा के मामले में संपन्न बुंदेलखंड क्षेत्र में बारिश बहुत कम होती है और यह सरकारी उपेक्षा का शिकार रहा है। यहां दो साल में एक बार जब भी सूखा पड़ता है, सरकारें राहत का मलहम लगाने लगती हैं, लेकिन बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों और आम लोगों का बड़ा वर्ग मान चुका है कि अलग राज्य के अलावा कोई विकल्प नहीं है। दो साल पहले कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और उसके बाद उप्र की मुख्यमंत्री मायावती सूखाग्रस्त बुंदेलखंड का दर्द जानने गए और दोनों ने ही अलग राज्य की मांग का समर्थन किया था। इससे पहले गंगाचरण राजपूत, राजा बुंदेला, सत्यव्रत चतुव्रेदी सहित कई कांग्रेसी आंदोलन की अगुवाई करते रहे हैं। अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में बुंदेलखंड की सभी लोकसभा सीटों पर भाजपा काबिज थी। अपने घोषणा पत्र और जन सभाओं में भाजपा नेता पृथक राज्य की मांग उठाते रहे लेकिन सत्ता संभालने के बाद सब भूल गए। बहरहाल इतने व्यापक राजनीतिक समर्थन के बावजूद अलग राज्य की मांग में कोई प्रगति न होना स्पष्ट दर्शाता है कि राजनीतिज्ञों का असल मकसद बुंदेलखंड के नाम पर महज सियासत करना है। अलग राज्य की मांग को लेकर 1942 से चल रहा आंदोलन कुछ साल पहले उग्र हो गया था और बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के संयोजक शंकरलाल मेहरोत्रा और अन्य चार लोग राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत महीनों जेल में रहे। मेहरोत्रा के असामयिक निधन के बाद अभिनेता व कांग्रेसी नेता राजा बुंदेला आंदोलन की कमान संभाले हैं। मौदहा के विधायक बादशाह सिंह का संगठन भी अलग राज्य की राजनीति करता है। भारत के नक्शे के ठीक मध्य में स्थित बुंदेलखंड का क्षेत्र यमुना, नर्मदा, चंबल और टौंस नदियों के बीच लगभग 400 किलोमीटर पूर्व से पश्चिम और इतना ही उत्तर से दक्षिण वर्गाकार फैला है । लगभग 1.60 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले इस भू-भाग की भाषा, संस्कृति, आचार-विचार में एकरूपता के बावजूद यह दो राज्यों (उप्र और मप्र) में विभाजित हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार सन 200-500 ईस्वी में इस क्षेत्र की पहचान अलग राज्य के रूप में रही है और यह स्वरूप चंदेलों (सन 831- 1203 ई) और उसके बाद बुंदेलों, व अंग्रेजों के शासनकाल तक बरकरार रहा। बुंदेला शासकों के दौरान यह बुंदेलखंड कहलाया। स्वतंत्रता से पहले बुंदेलखंड राज्य बनाया गया और उसकी राजधानी नौगांव बनी लेकिन दो महीने बाद ही इसका विभाजन विंध्यप्रदेश के रूप में हो गया था । 1942 में प्रसिद्ध साहित्कार व संपादक पं. बनारसीदास चतुव्रेदी ने टीकमगढ़ रियासत के महाराज वीर सिंह देव के सहयोग से पृथक राज्य का आंदोलन शुरू किया था। देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने अनेक रियासतें मिला अलग बुंदेलखंड राज्य की परिकल्पना प्रस्तुत की थी, लेकिन तत्कालीन केंद्र सरकार नहीं मानी। 1948 में जवाहरलाल नेहरू, विट्ठल भाई पटेल व पट्टाभि सीतारामैय्या की अगुआई में गठित जेवीपी आयोग ने बुंदेलखंड का पृथक अस्तित्व नहीं स्वीकारा लेकिन 1955 में राज्य पुनर्गठन आयोग के प्रमुख केएम पणिक्कर ने इसके औचित्य का समर्थन किया। बुंदेलखंड के पन्ना में हीरे की खदानें हैं, यहां का ग्रेनाइट जग विख्यात है। यहां गोरा पत्थर, सीमेंट पत्थर, रेत-बजरी के भंडार हैं। तालाबों की मछलियां कोलकाता के बाजार में बिकती हैं। जंगलों में मिलने वाला तेंदू पत्ता हरा सोना कहा जाता है। खजुराहो, झांसी, ओरछा जैसे स्थल सालभर पर्यटकों को आकषिर्त करते हैं। अनुमान है कि दोनों राज्यों के बुंदेलखंड मिला कर कोई एक हजार करोड़ की आय सरकार के खाते में जमा कराते हैं, लेकिन इलाके के विकास पर इसका दस फीसद भी खर्च नहीं होता। सवाल उठ रहा है कि नए राज्यों के गठन का आधार क्या हो? पुरानी मांग या भौगोलिक संरचना या क्षेत्रों का पिछड़ापन या छोटे राज्यों का सिद्धांत। देखा जाए तो इस रूप में बुंदेलखंड राज्य की मांग का आधार सशक्त है। बहरहाल मध्यप्रदेश सरकार की चुप्पी बुंदेलखंड को सुलगा रही है। |
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