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Monday, December 5, 2011

मजदूर हित पर सरकारी कोताही

वन एवं अन्य निर्माण मजदूर अधिनियम 1996 के तहत कंपनियों से वसूले जाने वाले उपकर को समाप्त कराने के लिए याचिका दाखिल की गई थी। याचिका को खारिज करते हुए माननीय उच्चतम न्यायालय ने कहा है, ‘संसद को मजदूरों के कल्याण के लिए उपकर लगाने का पूरा अधिकार है। समाज में आज भी मजदूरों का शोषण हो रहा है, इसलिए मजदूरों के कल्याण के लिए हर संभव कदम उठाए जाने चाहिए।’ उक्त अधिनियम के तहत सभी राज्यों में श्रमिक कल्याण बोर्ड स्थापित किए जाने हैं लेकिन आधे से अधिक राज्यों ने अभी तक श्रमिक कल्याण बोर्ड स्थापित नहीं किए हैं। जिन राज्यों में बोर्ड हैं, उनमें से अधिकतर में श्रमिक कल्याण कोष का उपयोग सही ढ़ंग से नहीं हो रहा है। विभिन्न राज्यों के श्रमिक बोडरे ने उपकर के रूप में करीब साढ़े पांच हजार करोड़ रुपए इकट्ठा किए। जिनमें से करीब 15 फीसद राशि ही खर्च की गई। दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम के दौरान ठेकेदारों से वसूले गए उपकर की करीब सात सौ करोड़ की राशि में से करीब तीस करोड़ की राशि खर्च की गई। मजदूरों पर खर्च करने के मामले में दक्षिण के दो राज्यों का प्रदर्शन अच्छा रहा। केरल में सबसे ज्यादा 78 फीसद, तमिलनाडु 43, मध्य प्रदेश 22 और आंध्र प्रदेश में 3 फीसद राशि खर्च की गई। बिहार, गुजरात, राजस्थान, एवं उत्तर प्रदेश एक फीसद से भी कम राशि खर्च कर पाए। श्रमिक कल्याण बोडरें के तहत प्रदेश के मजदूरों का पंजीकरण अनिवार्य है। राज्यों की तरफ से पंजीकरण के मामले में भी ढ़िलाई बरती जा रही है। देश के विभिन्न श्रमिक कल्याण बोडरें में असंगठित क्षेत्र के करीब 75 लाख श्रमिक पंजीकृत हैं। देश में सबसे ज्यादा करीब इक्कीस लाख मजदूर तमिलनाडु में पंजीकृत हैं। मध्य प्रदेश 17 लाख, करीब उतने ही केरल में, उत्तर प्रदेश में 10 लाख और आंध्र प्रदेश में करीब 9 लाख मजदूर पंजीकृत हैं। देश की कुल श्रमशक्ति में करीब 90 फीसद मजदूर असंगठित क्षेत्र में हैं। उद्योगों की अपेक्षा खेतों में मजदूरों खास तौर पर दलित मजदूरों का शोषण अधिक होता है। योजना आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार 2007-08 में कृषि मजदूरों की संख्या 55 फीसद थी, जो वर्ष 2009-10 में घटकर 45.5 फीसद रह गई। श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार प्रत्येक वर्ष करीब 12 करोड़ लोग रोजगार की तलाश में गांवों से शहरों की ओर पलायन करते हैं। अनेकों श्रम कानूनों के बावजूद ग्रामीण क्ष़ेत्रों में करीब 85 फीसद और शहरी क्षेत्रों में करीब 60 फीसद दिहाड़ी मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी दी जाती है। महिला मजदूरों को पुरुष मजदूरों से कम मजदूरी दी जाती है। गांवों में पर्याप्त संख्या में मजदूर नहीं मिलते और शहरों में मजदूरों को पर्याप्त काम नहीं मिलता। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के काम करने का कोई स्थायी ठिकाना न होने के कारण, अधिकतर मजदूर संबंधित योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाते हैं। खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए तर्क दिया जा रहा है कि इससे अगले तीन साल में एक करोड़ रोजगारों का सृजन होगा। रोजगार सृजन के नाम पर पहले भी ऐसे फैसले लिए जाते रहे हैं। रोजगार का यह कैसा सृजनीकरण है, जिसमें रोजगार की दर के बजाय बेरोजगारी की दर बढ़ रही है। श्रम मंत्रालय की एक सव्रेक्षण रिपोर्ट के अनुसार 2005 में बेरोजगारी दर करीब 8 फीसद थी, जो 2010 में बढ़कर करीब 9.5 फीसद हो गई। भारत मजदूरों के खून-पसीने की कीमत पर ही शोहरत और समृद्धि हासिल कर रहा है। एक तरफ देश के नगरों-महानगरों में ऊंची इमारतें हैं, चिकनी-चौड़ी सड़कें हैं जिनमें असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का श्रम लगा है। दूसरी तरफ इन्हीं शहरों के चौराहों पर रोज सुबह असंगठित मजदूर काम मिलने की उम्मीद में, कभी-कभी तो शाम तक बैठे रहते हैं, फिर भी उन्हें काम नहीं मिलता। काम मिलने की उम्मीद की सुबह बेबसी की शाम में बदल जाती है। कहीं-कहीं तो इन चौराहों पर मजदूरों की संख्या इतनी ज्यादा होती है, कि ऐसे चौराहों को ‘मजदूर चौक’ का नाम दे दिया जाता है। लोगों को किसी सड़क, कॉलोनी आदि का नाम बदलवाने के लिए लंबे आंदोलन चलाने पड़ते हैं, पर किसी चौक का नाम मजदूर चौक रखवाने के लिए कभी आंदोलन चलाने की जरूरत शायद ही पड़ी हो। कार्य विशेष में कौशल प्राप्त मजदूर इंजीनियर की तरह होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि मजदूर करके सीखता है और एक इंजीनियर पढ़कर सीखता है। ज्ञानार्जन का सिद्धांत है कि करके सीखा हुआ ज्ञान, पढ़कर सीखे हुए ज्ञान से बेहतर होता है। अंतरराष्टीय संस्था ‘गैलप’ ने दुनिया के 124 देशों में लोगों के जीवनस्तर से संबंधित एक सव्रेक्षण कराया था। सव्रेक्षण रिपोर्ट के अनुसार बेहतर जीवन जीने के मामले में भारत 71 वें स्थान पर रहा। भारत के करीब 17 फीसद लोग ही अपने जीवद से खुश हैं। 65 फीसद लोग गरीबी एवं बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, इनमें से करीब 20 फीसद गरीबी लोग ऐसे हैं, जो अधिक दुखी हैं। एक अन्य सव्रेक्षण रिपोर्ट में मजदूरों से काम कराने के मामले में भारत को दुनिया का दूसरा सबसे खराब देश माना गया है। करीब 60 फीसद मजदूरों को तनाव की स्थिति में काम करना पड़ता है। असंगठित मजदूरों में दलितों, आदिवासियों की संख्या अधिक है। उन्हें दलित होने की सामाजिक और मजदूर होने की दोहरी कुंठा से जूझना पड़ता है। डॉ. अंबेडकर ने मजदूरों को राजनीतिक आवाज देने के लिए 15 अगस्त 1936 को ‘स्वतंत्र मजदूर पार्टी’ की स्थापना की थी। उन्होंने कहा था,‘मजदूरों के जीवन की संपूर्णता एवं स्वतंत्रता के विरुद्ध काम करने वाली अर्थव्यवस्था को बदल देना या फिर नष्ट कर देना चाहिए।’ देश के नीति-नियंताओं ने अंबेडकर के विचारों से कोई सबक नहीं लिया। मुक्त व्यापार की नीतियों के जश्न में मजदूरों की आर्थिक मुक्ति के मुद्दों को भुला दिया गया है। एक तरफ आर्थिक उदारीकरण के दौर में देश में प्रतिवर्ष करोड़पतियों-अरबपतियों की नई फौज खड़ी हो रही है, तो वहीं दूसरी तरफ उदारीकरण में पनपी आर्थिक क्रूरताएं मजदूर हितों को रौंद रही हैं। आर्थिक उदारीकरण मजदूरों के लिए सख्तीकरण साबित हो रहा है। जब उद्योग डूबने लगते हैं, तो उन्हें आर्थिक पैकेज देकर उबार लिया जाता हैं और जब मजदूरों के हित डूबते हैं, तो उन्हें अधिकांशत: कोरे आासन मिलते हैं। केंद्र सरकार मजदूरों के लिए राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा योजना लाने के शुभ संकेत तो दे रही है पर यह देखना बाकी है कि यह संकेत जमीनी हकीकत में कब बदलेगा।