डा. विमल शिक्षाविद हैं। तीन साल प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में रहने के बाद उन्होंने पीएचडी किया और जोधपुर में 21 साल हिन्दी के लेक्चरर-रीडर रहे। फिर वर्धमान विविद्यालय (पश्चिम बंगाल) को जमाया। रिसर्च सेंटर स्थापित किया। हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया। वहीं 13 साल प्रोफेसर रहे और प्रोवाइस चांसलर के रूप में रिटायर हुए। उन्होंने 13 किताबें लिखी हैं। आजकल आदिवासी व पिछड़े क्षेत्रों में सामाजिक-विकास कार्य कर रहे हैं। 71 वर्षीय डा. विमल ने लोहिया और जेपी को भी राजनीति करते देखा है। वीपी सिंह और चंद्रशेखर से उनकी नजदीकी रही है। बुद्धदेव और ममता की सादगी, ईमानदारी और कर्मठता के वह गवाह हैं। मेधा पाटेकर और अरुंधति राय के सामाजिक कायरे में वह सहयोगी हैं, उनके प्रशंसक हैं। डा. विमल छह महीने की छुट्टी लेकर जेपी के आन्दोलन में उनके साथ रहे। इसके बाद भी प्रत्यक्ष राजनीति में नहीं आये। हां, विचारक रहे। सलाहकार रहे। वह आज की सबसे बड़ी समस्या राजनीति में नैतिक गिरावट को मानते हैं। उन्हें 1952 और 57 के इलेक्शन भी खूब याद हैं। उनके अनुसार 1962 से राजनीति में तेजी से नैतिकता की कमी होनी शुरू हुई। इसकी वजह रही राजनीति का सत्ता आधारित हो जाना। इससे पहले राजनीति दर्शन (फिलासफी) थी। असल में 1947 में देश आजाद नहीं हुआ, सत्ता परिवर्तन हुआ। गुलाम देश को चलाने वाली व्यवस्था ही स्वीकार कर ली गयी। स्वाधीन देश को चलाने वाली व्यवस्था नहीं बनायी गयी। देश में केवल दो व्यक्तियों - गांधी और भगत सिंह के दिमाग में स्वाधीन भारत की सही परिकल्पना थी। जब देश आजाद हुआ तो इटली के नेता ग्राैनसी ने महात्मा गांधी को पत्र लिखा था कि अगर स्वाधीनता को बरकरार रखना है तो पूरी टीम के साथ राजनीति से हट जाइये। स्वाधीनता मिली है, राष्ट्रीयता की लहर है। आप सभी लोग समाज को बदलने में लगिये और सत्ता युवाओं को सौंप दीजिए। नहीं तो, स्वाधीनता केवल राजनीतिक और आर्थिक आजादी बनकर रह जाएगी। गांधीजी ने इसी दौरान कांग्रेस को भंग करने की बात भी कही थी। पर उनकी बात कांग्रेसियों ने नहीं मानी। बात वही राजनीति के दर्शन या सत्ता पर आधारित होने की आ जाती है। नेहरूजी की जीवनी मार्क्स के दर्शन से शुरू होती है और उसी के दर्शन से, पंक्ति से समाप्त होती है। जेपी ने पुस्तक लिखी थी- ‘समाजवाद ही क्यों’। राहुल सांकृत्यायन की किताब थी- ‘साम्यवाद क्यों’। राहुल जी जब देवली (राजस्थान) जेल में थे तो उन्होंने एक किताब ‘दर्शन दिग्दर्शन’ लिखी थी। इसमें लिखा था कि हमें आजादी पाने के लिए तो कुर्बानियां देनी पड़ रही हैं, कहीं आजादी बचाने के लिए भी कुर्बानियां न देनी पड़ें। आज लोकतंत्र की हालत देखिए। बड़े-बड़े घोटाले और भ्रष्टाचार। अन्ना नेता नहीं हैं, पर गांधीवादी हैं उन्हें आन्दोलन चलाना पड़ा। तब कहीं भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल बना। अगर राजनीति दर्शन है तो आचार पर आधारित समाज रच सकती है। जिस जाति में समाज में प्रतिरोध की क्षमता खत्म हो जाती है, वह मिट जाता है। देश में आज एक वर्ग, यों कहें एक भारत बड़े अमीरों, बड़े नेताओं और बड़े अधिकारियों का है। दूसरा भारत छोटे अमीरों, छोटे नेताओं और छोटे अधिकारियों-बाबुओं का है। तीसरा भारत हम लोगों का है जो समस्याएं झेल रहे हैं और चौथा भारत उन लोगों का है जिन पर आजाद होने से कोई फर्क ही नहीं पड़ा। उनके लिए पहले भी खाने, पीने, रहने, पढ़ने और लिखने की व्यवस्था नहीं थी, आज भी नहीं है। उनके लिए थाना पहले जैसा था, आज भी वैसा ही है। जिस दिन यह भारत खड़ा हो गया, उस दिन तीनों भारत खत्म हो जाएंगे। जब यह भारत खड़ा होता है तो इसे उग्रवाद कहा जाता है। अपने लोग क्यों गुस्से में हैं जानिये तो। जस्टिस सरकारिया पी. चिदम्बरम से यही बात तो कहते हैं। ये क्यों कानून हाथ में ले रहे हैं, समझिए तो। हम तो अभी तक यह भी नहीं समझ पाए हैं कि देश में राष्ट्रीयता पैदा करने के लिए हिन्दी कितनी जरूरी है। 1930 में जब दयानंद सरस्वती ने पश्चिम बंगाल में संस्कृत में अपना व्याख्यान दिया था तो नवजागरण के विचारक केशवचंद सेन ने उनसे कहा था, राष्ट्रीयता पैदा करने के लिए हिन्दी में भाषण दीजिए। हम सरकारी कामकाज में, संसद में पढ़ाई-लिखाई में कहां हिन्दी को स्थापित कर पा रहे हैं। अपने लोगों द्वारा, अपने लोगों के लिए अपने लोगों की सरकार। फिर काहे का डर। नेता और मंत्री कमांडो के बीच में चलते हैं। पहले के नेता निर्भीक थे। 1946 की बात है। मौलाना आजाद सरदार पटेल और नेहरू मध्य प्रदेश के जंगल से गुजर रहे थे। पहले से जानकारी थी कि यहां डाकू लूट लेते हैं। डाकू दूर से दिखे तो पटेल कुछ विचलित हुए, पर नेहरू ने कार रुकवा ली। आजाद के हाथ का सहारा लेकर कार के बोनट पर चढ़ गये। चिल्लाकर बोले, मैं जवाहरलाल नेहरू बोल रहा हूं। हम आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमें पैसे की जरूरत है। लाओ हमें पैसा दो। चमत्कार हो गया। डाकू चुपचाप पास आये। बन्दूकें जमीन पर डाल दीं। लूटी गयी दौलत कार में डाल दी। घोड़े पर दो आदमी साथ कर दिये कि इन्हें जंगल की सीमा से बाहर छोड़ आओ। आज है इतना साहस है किसी नेता में। आज असल में नेता नहीं उसकी कमाई दौलत की ही सुरक्षा करते हैं कमांडो। ममता के पास तो न कोई कमांडो है और न कोई सुरक्षा व्यवस्था है। पर्ची भेजिए, सीएम से मिल लीजिए। बुद्धदेव भी ऐसे ही सीएम थे। राइटर्स बिल्डिंग के नंदन लान में विकलांग बेटी को टहलाते थे। न कोई चपरासी, न सिपाही। जो चला गया, मिल लिया। छोटे-छोटे कुल्हड़ों में चाय पीते पिलाते थे। ईएमएस नम्बूदरीपाद, हरकिशन सिंह सुरजीत कितने बड़े नेता-विचारक थे। एक कमरे में जिन्दगी कट गयी। सोमनाथ चटर्जी की बंगाल में इज्जत केंद्र में मंत्री या लोकसभा अध्यक्ष बनने से नहीं बल्कि उनकी शख्सियत से है। क्या हम उनकी सादगी, इनकी सरलता, उनकी ईमानदारी को नहीं अपना सकते। क्या इसलिए नहीं अपना सकते कि ये कल्चर कम्युनिस्टों की देन है। बात वही है सत्ता आधारित राजनीति की। वीपी सिंह ने भाजपा और वामपंथियों दोनों का समर्थन लिया था। इस पर नक्सली नेता विनोद मिश्र ने पूछा था, ऐसे क्या चला पाएंगे सरकार। वह बोले थे, न चले। सत्ता ही सब कुछ थोड़े ही है। लेकिन आज सत्ता के लिए ही सब कुछ हो रहा है। कमाई, सुरक्षा, अलगाव और आडम्बर। फिर भी विमलजी को उम्मीद है सब कुछ ठीक होगा। अगर अन्ना हजारे भ्रष्टाचार को बहस के केन्द्र में ला सकते हैं, भ्रष्टाचार को राजनीतिक मुद्दा बनवा सकते हैं तो और भी होगा।
Wednesday, February 15, 2012
ब्रिटेन की मदद के मोहताज क्यों
पिछले दिनों ब्रिटेन में सत्तारूढ़ कंजरवेटिव पार्टी के कुछ सांसदों की भारत को आर्थिक सहायता बंद करने की मुहिम शुरू होने से यहां एक नई बहस छिड़ गई है। किसी का कहना है कि इसके लिए खुद भारत जिम्मेदार है तो कहीं कहा जा रहा है कि भारत को उसकी आर्थिक सहायता ठुकरा देनी चाहिए। दूसरी ओर खुद भारत सरकार ने भी कह दिया है कि वह ब्रिटेन से आर्थिक सहायता नहीं चाहता है। बता दें कि ब्रिटेन से भारत को वर्तमान में 26 करोड़ पाउंड की आर्थिक सहायता हर वर्ष मिलती है। हाल ही में ब्रिटेन के विकास सचिव ने भारत के तीन सबसे गरीब राज्यों को केंद्रित करते हुए अगले चार साल में 110 करोड़ पाउंड की सहायता देने का अनुमोदन किया है। हालांकि ब्रिटेन द्विपक्षीय सहायता के संदर्भ में भारत के लिए सबसे ज्यादा सहायता देने वाला देश है, लेकिन इसके बाद भी वह 1 अरब डॉलर का महज एक तिहाई ही भारत को आर्थिक सहायता के रूप में देता है। वास्तव में देखा जाए तो भूमंडलीकरण के बाद विदेशों से मिलने वाली सहायता राशि निरंतर घटती ही जा रही है। अगर भारत को मिलने वाली कुल सहायता की बात करें तो भारत को वर्ष 2010-11 में दुनिया के दूसरे मुल्कों से 7.8 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता प्राप्त हुई, जबकि भारत ने अफ्रीका सहित अन्य अल्प विकसित देशों को 2.84 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता प्रदान की। ब्रिटेन में भारत को सहायता देने के मसले पर आलोचना करने वालों का कहना है कि जब भारत में 7 प्रतिशत से भी अधिक गति से आर्थिक विकास हो रहा है, क्रय शक्ति समता के आधार पर भारत आर्थिक रूप से दुनिया का तीसरा सबसे ज्यादा शक्तिशाली देश बन चुका है, अपने बलबूते पर अंतरिक्ष कार्यक्रम संचालित कर रहा है, हजारों किलोमीटर दूर मारक क्षमता वाले प्रक्षेपास्त्र बना रहा है, स्वयं का परमाणु कार्यक्रम करने में सक्षम है तो ऐसे राष्ट्र को सहायता लेने की क्या जरूरत है। यही नहीं, भारत में अरबपतियों की संख्या भी अच्छी खासी है और खुद भारत अफ्रीका सरीखे देशों को विकास के लिए भारी आर्थिक सहायता दे रहा है। ऐसे में भारत को आर्थिक देने का कोई औचित्य नहीं है। दूसरी ओर ब्रिटेन सरकार ने इस विवाद को विराम देने का प्रयास करते हुए यह कहा है कि वह भारत को दी जाने वाली आर्थिक सहायता वहां की केंद्र सरकार को न देते हुए, उन राज्यों को सीधा प्रदान करेगी, जो सबसे ज्यादा गरीब और पिछड़े हैं। ब्रिटिश सरकार का कहना है कि भारत के तीन ऐसे सबसे गरीब राज्यों को चिह्नित करते हुए वहां के गरीबों खासतौर पर महिलाओं और बच्चों के आर्थिक उत्थान पर यह आर्थिक सहायता केंद्रित रहेगी। ब्रिटेन के विकास सचिव द्वारा अनुमोदित 1.1 अरब पाउंड की अगले चार वर्षो के लिए सहायता का आवंटन भी इसी तर्ज पर होगा। तर्क कुछ भी दिए जाएं, वास्तविकता यह है कि ब्रिटेन द्वारा भारत को दी जाने वाली आर्थिक सहायता के बारे में यह विवाद भारत और ब्रिटेन के बीच रिश्तों में आई कड़वाहट के कारण पैदा हुआ है। दरअसल, पिछले दिनों भारत ने ब्रिटेन में बने लड़ाकू विमान टाइफून की जगह फ्रांस में बने रफेल जेट के साथ रक्षा सौदा करने को ज्यादा तवज्जो दी। इस बहस में नया मोड़ तब आया, जब ब्रिटेन के अखबार संडे टेलीग्राफ ने भारतीय विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी के एक बयान का जिक्र किया, जिसमें उन्होंने राज्यसभा में यह कहा था कि भारत को ब्रिटेन द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह राशि भारत के लिहाज से बहुत ही कम है। इस पूरे प्रकरण के कारण ब्रिटेन के कुछ सांसद भड़के हुए हैं। ऐसा लगता है कि ब्रिटेन भारत में लगभग 180 साल शासन करने के कारण अपनी औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर नहीं आ पा रहा है। ब्रिटेन को यह नहीं भूलना चाहिए कि आज परिस्थितियां अलग हैं। भारत का पहले जहां दुनिया के विदेशी व्यापार में भारत का हिस्सा मात्र आधा प्रतिशत होता था, वह अब बढ़कर 1.5 तक पहुंच चुका है। आज भारत से लगभग 250 अरब डॉलर से भी अधिक की वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात होता है। इसी तरह भारत 370 अरब डॉलर की वस्तुओं का आयात भी करता है। आज से करीब 10 साल पहले राजग के शासन काल में वित्तमंत्री जसवंत सिंह ने पहली बार सरकार के बजट में गरीब मुल्कों को भारत से आर्थिक सहायता देने के लिए प्रावधान रखा था। वर्ष 2003 में भारत सरकार ने यह निर्णय लिया कि अब वह केवल छह देशों अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, यूरोपीय समुदाय और रूस से ही आर्थिक सहायता लेगी और उस समय सरकार ने 7,491 करोड़ रुपये के द्विपक्षीय ऋणों को वापस भी कर दिया। हालांकि यह सही है कि आज भारत में शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक सेवाओं के लिए अधिक से अधिक धन राशि की जरूरत है ताकि देश की गरीब जनता के लिए अधिकाधिक सुविधाएं जुटाई जा सकें। यहां यह ध्यान देने योग्य है कि यह आर्थिक सहायता अधिकतर ऋणों के रूप में होती है और उसके साथ ब्याज सहित देनदारी भी जुड़ी होती है। यही नहीं, विदेशों से मिलने वाली सहायता में बहुत-सी शर्ते भी साथ में जुड़ी होती हैं, जिसका असर देश की संप्रभुता और आर्थिक विकास की दिशा पर पड़ता है। आज हमारा देश सॉफ्टवेयर प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पूरी दुनिया में अपना एक मुकाम बना चुका है। भारत की अकेली एक कंपनी टीसीएस द्वारा अकेले ही 7.5 अरब डॉलर के सॉफ्टवेयर का निर्यात किया जाता है। अपार व्यावसायिक अवसरों के कारण भारत को अप्रैल 2000 से लेकर नवंबर 2011 तक 390 अरब डॉलर का विदेशी निवेश (प्रत्यक्ष एवं संस्थागत) प्राप्त हो चुका है। दुनिया भर में फैले भारतीयों द्वारा वर्ष 2010 में 5.4 अरब डॉलर से भी अधिक भारत को भेजे गए। भारत अपने प्रवासियों द्वारा दुनिया से राशि प्राप्त करने वाला सबसे बड़ा देश है। चीन को भी अपने प्रवासियों से भारत से कम राशि प्राप्त होती है। ऐसे में ब्रिटेन की 26 करोड़ पाउंड यानी कोई दो हजार करोड़ रुपये की सहायता राशि कोई ऐसा बड़ा मुद्दा नहीं है, जिसके कारण भारत के आर्थिक विकास या गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों में कोई विशेष अंतर आएगा। भारत में चार बड़े फ्लाई ओवर बनाने में ही इतनी धन राशि खप जाती है। केंद्रीय सरकार का वर्ष 2011-12 का बजट ही 12 लाख 57 हजार करोड़ रुपये का था। ऐसे में देश के सम्मान के साथ समझौता करते हुए मात्र 26 करोड़ पाउंड की वार्षिक सहायता (जो अधिकतर ऋण के रूप में ही है) लेने की कोई जरूरत देश को नहीं है। आज भारत को आर्थिक सहायता (ऋण) देने वाले देश भारत में ऐसे कानूनी, प्रशासनिक और वैधानिक परिवर्तन कराने का प्रयास कर रहे हैं, जिससे देश अपनी प्राथमिकताओं से अलग उनके हित साधने वाली आर्थिक नीतियां बनाने को बाध्य हो जाए। विश्व बैंक द्वारा सामाजिक सेवाओं में विदेशी कंपनियों की दावेदारी बढ़ाते हुए विविध प्रकार के दबाव बनाने के कई मामले सामने आए हैं। ऐसे में भारत को विदेशों पर अपनी निर्भरता को समाप्त करते हुए आत्मनिर्भरता के आधार पर देश के विकास को आगे बढ़ाने का काम करना होगा। ब्रिटेन से आने वाली सहायता को वापस भेजते हुए इसकी शुरुआत की जा सकती है। (लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं)
कठघरे में दो प्रधानमंत्री
भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के पास रास्ते की पहचान के लिए दो अलग-अलग प्रकाशपुंज हैं। एक देश के सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री को बचा लिया है, जबकि दूसरे देश के सुप्रीम कोर्ट ने वहां के प्रधानमंत्री को अवमानना के मामले में कोर्ट में हाजिर होने को कहा है। हालांकि इन दोनों मामले में कोई समानता नहीं है, फिर भी कोर्ट का संदेश एक जैसा है। संदेश है कि न्यायपालिका स्वतंत्र है। वह किसी दबाव में नहीं आती। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से चूक हुई है। चूक यह है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा के अभियोजन की अनुमति 16 महीने तक नहीं दी। राजा मनमाने एवं गैरकानूनी तरीके से मोबाइल कंपनियों को 2 जी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस देने के आरोपी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मनमोहन सिंह को दोषमुक्त करार दिया है। कोर्ट का कहना है कि प्रधानमंत्री खुद हर मामले को विस्तार से नहीं देख सकते। प्रधानमंत्री उपयुक्त कार्रवाई तभी कर सकते थे जब उनके सलाहकार मंत्री के खिलाफ लगे आरोपों की गंभीरता से उन्हें अवगत कराते, लेकिन इस मामले में यह विश्वास करना कठिन है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने मनमोहन सिंह को राजा के खिलाफ मामला दर्ज करने की मंजूरी के बारे में सूचना नहीं दी होगी और वह भी तब जब यह 16 महीने से लंबित था। हकीकत तो यह है कि लगातार याद दिलाए जाने पर भी प्रधानमंत्री कार्यालय का जवाब यही होता था कि मामला सीबीआइ के पास भेजा हुआ है, जबकि मंजूरी के लिए किसी जांच की जरूरत नहीं थी। जाहिर है, कुछ दूसरे कारणों से विलंब हुआ। नि:संदेह इस प्रकरण में प्रधानमंत्री की किरकिरी हुई है, क्योंकि मामला उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी से जुड़ा हुआ है। सफाई देने मात्र से मामला धुल नहीं गया है। यह सही है कि प्रधानमंत्री साझा सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं और उन्हें अपने सहयोगी द्रमुक की संवेदनशीलता के प्रति सजग रहना चाहिए था। राजा और प्रधानमंत्री के बीच हुए पत्राचार से यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री कार्यालय को यह जानकारी थी कि राजा किस तरह सभी नियमों को दरकिनार कर कुछ खास कंपनियों की मदद कर रहे थे। इसके बावजूद प्रधानमंत्री कार्यालय ने कुछ नहीं किया। मतलब साफ है, या तो कोई कार्रवाई नहीं करने का निर्देश था या फिर प्रधानमंत्री कार्यालय खुद उलझन में था। प्रधानमंत्री कार्यालय का लचर रवैया हो या फिर राजनीतिक मजबूरियां, इससे न तो प्रधानमंत्री और न ही द्रमुक के साथ गठबंधन की अध्यक्षता करने वाली सोनिया गांधी की नैतिक जिम्मेदारी कम होती है। मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री कार्यालय का इतना अधिक विस्तार कर दिया गया है कि इससे दायित्वों को लेकर उलझन और एक ही काम कई जगह होने की स्थिति बन गई है। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के सिर्फ एक सचिव थे-त्रिलोक सिंह। वह ही शरणार्थियों के पुनर्वास का काम भी देखा करते थे। जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने एलके झा को अपना सचिव बनाया। उस वक्त तक प्रधानमंत्री कार्यालय छोटा था। प्रधानमंत्री कार्यालय का वास्तविक विस्तार इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हुआ। उन्होंने इसे समानांतर सरकार में तब्दील कर दिया। सभी मंत्रालयों का एक-एक अधिकारी प्रधानमंत्री कार्यालय में तैनात कर दिया गया। इस तरह यह एक तरह से मिनी सरकार बन गया। मनमोहन सिंह ने इसे यथावत बनाए रखा। नतीजा है कि आज प्रधानमंत्री कार्यालय का सीधा दखल सभी मंत्रालयों में है। प्रधानमंत्री कार्यालय पर एक और आघात सुप्रीम कोर्ट द्वारा 122 लाइसेंसों को रद किए जाने से लगा है। ये सारे लाइसेंस राजा ने जारी किए थे। कोर्ट ने अब इनकी नीलामी का निर्देश दिया है। कोर्ट के संकेत के अनुसार 2001 के भाजपा शासनकाल के समय से लेकर अब तक जारी किए गए लाइसेंसों की जांच होनी चाहिए। जिस वक्त प्रमोद महाजन संचार मंत्री थे उस समय मैं राज्यसभा का सदस्य था। तब महाजन के बारे में भी तरह-तरह की चर्चाएं होती थीं। यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी जैसे बड़े कद वाले प्रधानमंत्री भी उन पर लगाम कसने में असमर्थ थे। पाकिस्तान में सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों को फिर से खोलने के लिए स्विस सरकार को लिखने का निर्देश दिया था। जनरल परवेज मुशर्रफ ने जरदारी और उनकी पत्नी बेनजीर भुट्टो के खिलाफ इन मामलों को नेशनल रिकंसिलिएशन ऑर्डिनेंस के जरिए बंद कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस अध्यादेश को संविधान की भावनाओं के विपरीत करार दिया है। इसके बचाव में गिलानी का कहना है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति को संविधान के तहत छूट हासिल है यानी उनके खिलाफ मुकदमा नहीं चल सकता। इस तरह दोनों देशों-भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के सामने नैतिक सवाल खड़ा है। अवमानना के लिए गिलानी की खिंचाई हो सकती है और उन्हें अपना पद गंवाना पड़ सकता है। प्रधानमंत्री कार्यालय की चूक की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार कर मनमोहन सिंह इस्तीफे की पेशकश कर सकते हैं। लोकतंत्र में ये सब सामान्य बातें हैं। फिर भी, भारत में इस संबंध में अंतिम निर्णय तो संसद के निर्वाचित सदस्य ही करेंगे। पाकिस्तान में निर्वाचित नेशनल असेंबली का एक लोकतांत्रिक कोना तो है, लेकिन वास्तविक शक्ति सेना के हाथों में है। हालांकि, पाकिस्तान में एक तीसरी शक्ति के रूप में सुप्रीम कोर्ट का उदय हुआ है। यह संयोग है कि सेना इस सुप्रीम कोर्ट का साथ दे रही है। सेना ने ही गिलानी के मामले को आगे बढ़ाया है। गिलानी ने मेमोगेट से सेना को नाराज कर दिया था। दरअसल, जरदारी सरकार ने सेना की बगावत के खतरे को लेकर अमेरिका से हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया था। इस मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने जो आयोग बनाया है वह राष्ट्रपति जरदारी या प्रधानमंत्री गिलानी की पसंद नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस इफ्तिखार चौधरी ने बहुत हद तक पाकिस्तान की न्यायपालिका की स्वतंत्रता को फिर से बहाल किया है। लेकिन आज भी सैन्य कोर्ट और यहां तक कि अभियोजन के दौरान असैनिक अधिकारियों के खिलाफ याचिका स्वीकार करने का अधिकार हाइकोर्ट को नहीं है। भारत में इस तरह की समस्या नहीं है, लेकिन भ्रष्टाचार ने तमाम संस्थाओं को अशक्त बना दिया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से आस बंधती है-भारत में भी और पाकिस्तान में भी। (लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
Tuesday, February 14, 2012
नव उदारवादी नीतियों के लिए सबक
टूजी स्पेक्ट्रम मामले में जस्टिस जी. एस. सिंघवी और ए.के. गांगुली ने अपने फैसले से दूर संचार कंपनियों के उन 122 लाइसेंसों को, जो उनको 2008 में दिए गए थे रद्द करके संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार को बहुत कुछ सोचने पर विवश किया है। ये लाइसेंस 2000 के शुरुआती सालों में शुरू उस भ्रष्ट प्रक्रिया की देन थे जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक हितों के विरुद्ध और संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन माना है। संप्रग का यह कहना कि फैसले में गृहमंत्री पी. चिदंबरम को बेकसूर करार कर दिया गया है और संप्रग की नीतियों से इसका कोई लेना-देना नहीं है कहीं न कहीं गलत जरूर है। दरअसल फैसले में निजी जिम्म्ेादारियों पर बात ही नहीं की गई है। उसने तो लाइसेंस देने की पहले-आओ पहले-पाओ की नीति और लाइसेंस अर्जियों के लिए अंतिम तिथियों तथा चुनिंदा कंपनियों को लाइन से बाहर आवंटन करने के प्रभावों की छानबीन की है। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी के स्वीकृत सिद्धांत के अधीन गुनाह का हिस्सा होने के लिए मौजूदा सरकार के खिलाफ एक जबरदस्त आरोप है। फैसले में रेखांकित इस तथ्य से सरकार बरी नहीं हो जाती कि दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने प्रधानमंत्री या गृहमंत्री की सलाह पर ध्यान नहीं दिया। इससे यही सवाल खड़ा होता है कि उन्हें मंत्री पद पर बने ही क्यों रहने दिया गया। सरकार की मंत्रिमंडलीय व्यवस्था में अंतिम शब्द प्रधानमंत्री का होता है। फैसले में इलेक्ट्रोमेगनेटिक स्पेक्ट्रम सरीखे दुर्लभ संसाधन के इस्तेमाल का लाइसेंस देने के लिए पहले आओ पाले पाओ के केंद्रीय पक्ष को गलत ठहराया गया है और अपने सत्ताकाल में राजग ने भी इसी नीति का पालन किया था। इसने भी लाइसेंस देने की प्रक्रिया के साथ हेरफेर किया। इसलिए इस मामले में राजग को ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं। बहरहाल, उक्त फैसला पांच कारणों से महत्वपूर्ण है। सबसे अहम इस रूप में कि सरकार के पास राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधन इसकी अमानत के तौर पर होते हैं और उसका खास दायित्व होता है कि वह उनके किसी भाग को निजी उद्यमियों को सौंपते समय न्यायपूर्ण और पारदर्शी ढंग से काम करे। वायु तंरंगो के अलावा इन दुर्लभ संसाधनों में भूमि, खनिज, तेल, गैस और पानी आदि भी आते हैं। सही मूल्य तय करने के लिए नीलामी की पद्धति को लगभग सर्वजनीन बनाने की सिफारिश कर अदालत मामले का अति सरलीकरण कर देती है। लेकिन बोली लगाने या नीलामी का तरीका सिर्फ विकसित बाजारों के मामलों में कामयाब हो सकता है और यह भूमि अथवा पानी में कहीं नहीं है। सार्वजनिक जमीन को अस्पतालों, स्कूलों अथवा कम कीमत के मकानों जैसे कामों के लिए आवंटित करने के मामलों में नीलामियां करना सही नहीं है। इसके बावजूद सार्वजनिक अमानत सिद्धांत तय कर दिया गया है। इसका अर्थ कि रसूख, असर, रित सिफारिश ओर अनेक अन्य क्षेत्रों में पट्टेधारी के आधार ‘चहेते सौदों’
के अधीन जारी लाइसेसों को जांच के लिए खोला जा सकता है। इसकी चपेट में सैकड़ों लाइसेंस आ जाएंगे जिनमें ऐसे प्रोजेक्टों के विशाल बहुमत का प्रतिनिधित्व करने वाले निहित स्वाथरे ने सार्वजनिक संपत्ति को कौड़ियों के मोल हथिया लिया है। इसके उन अनेकानेक परियोजनाओं के लिए स्पष्ट निहितार्थ हैं, जिनमें बिजली उत्पादन कंपनियों को कोयला खदानों के अधिकार बिना सोचे-समझे दे दिए गए हैं। दूसरे, फैसले में नागरिकों की भ्रष्टाचार संबधी शिकायतें करने के अधिकार को मान्यता देकर जनहित याचिका को वह ऊंचा दर्जा फिर दे दिया गया है जो इसे पहले प्राप्त था। इससे शिकायतों के समाधान का वैकल्पिक मंच मिल सकता है। यह अदालती फैसला सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले के विपरीत है जो उसने एक दशक पहले एनरॉन मामले में सेंटर ऑफ ट्रेड यूनियंस के पिटीशन को खारिज करते हुए दिया था। परंतु फैसला इस पर चर्चा नहीं करता कि संप्रग सरकार 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन के मामले में नियंत्रक एवं महालेखाकार की उस रिपोर्ट के आने के लंबे समय बाद तक सरकारी खजाने को हुए नुकसान से इंकार क्यों करती रही जिसके आकलन के अनुसार यह नुकसान 56,000 करोड़ से 1.76,000 करोड़ रुपये तक था। इसने उन कंपनियों पर कोई जुर्माना भी नहीं लगाया जिन्होंने पूरी प्रक्रिया में हेराफरी की थी। फैसले में इसका आधार बताए बगैर केवल मुकदमे की लागत की बात थी। चौथे, न्यायिक पुनरीक्षण को लेकर फैसला कुछ पेचीदा रास्ता लेता है। यह इस तर्क को अस्वीकार करता है कि वाणिज्यिक और वित्तीय मामलों में न्यायिक पुनरीक्षण बड़े सार्वजनिक हित में सीमित होना चाहिए। लेकिन इसमें यह नहीं बताया गया है कि इस सार्वजनिक हित का निर्धारण संबद्ध जज की अपनी समझ के अतिरिक्त किस तरह होना चाहिए। जब तक कड़े मापदंड तय नहीं किए जाते, यह न्यायिक अति-सक्रियता की ओर ले जा सकता है। फिर भी यह तो मानना ही चाहिए कि जजों ने नियंतण्रऔर धैर्य से काम लिया और अपने को उन राजनीतिक बखेड़ों से प्रभावित नहीं होने दिया जो घोटाले के सामने आने के साथ पैदा हुए थे। और अंत में फैसले में 2जी घोटाले में निष्क्रिय भूमिका अदा करने और इसका रास्ता साफ करने के लिए टेलीकोम रेगुलेटरी अथोरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई ) को फटकार लगाई गई है। परंतु विडंबना यह है कि 2जी लाइसेसों की नई नीलामी के तौर-तरीको को तय करने के लिए इसी एजेंसी को नामजद किया गया है और घोटाले की चल रही सीबीआई जांच का मूल्यांकन और उस पर रिपोर्ट करने के लिए किसी विशेष जांच एजेंसी को नियुक्त करने के स्थान पर इस काम को वो केंद्रीय सर्तकता आयोग को सौंपता है, जो बड़ी हद तक एक अक्षम एजेंसी है। बहरहाल, व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह फैसला नवउदारवादी आर्थिक नीतियों की कमजोरियां रेखांकित करता है और राष्ट्रीय संसाधनों का गलत इस्तेमाल किए जाने की आशंका के प्रति चेताता है। नवउदारवाद का लक्ष्य निजी स्वाथरें द्वारा सार्वजनिक संसाधनों को हड़पना और आम लोगों को उनकी पहुंच से वंचित करना है। इस कारण पूंजी अनिवार्यत: अधिकाधिक प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करती जाएगी जिनमें भूमि, खनिज और वायु शामिल है। इसको बेहतर नियामकों अथवा बाजार आधारित अधिक पारदर्शी क्रियाविधि द्वारा नहीं रोका जा सकता है जो इसी प्रक्रिया को बनाए रखने का काम करेंगी। पिछले सात दशकों के सबसे खराब वैिक आर्थिक संकट, महामंदी का एक बड़ा सबक यह है कि नव उदारवाद इसके केंद्र में ही दिवालिया साबित हो चुका है। नवउदारवाद ने न केवल निवेश और संवृद्धि की दर धीमी की है, बल्कि इसने वैिक पर्यावरण संकट और खास तौर जलवायु परिवर्तन तथा सामाजिकता को बुरी तरह प्रभावित किया है। यूरोप में कल्याणकारी राज्य की स्थापना के माध्यम से हासिल सामाजिक उपलब्धि को नष्ट किया जा रहा है। आय में असमानता ने अपूर्व विस्तार लिया है और कल तक के संपन्न समाजों में बेरोजगारी महामंदी के स्तर को छू रही है। भारत को नवउदारवाद को पूरी तरह छोड़ देना चाहिए लेकिन यह आसानी से होने वाला नहीं क्योंकि सरकार नवउदारवाद की इस हद तक पक्षधर दिख रही है कि स्थाई गरीबी बढ़ती जा रही है। असमानताओं सहित इसके सबसे बुरे नतीजे नहीं देखे जा रहे हैं और सरकार ‘दूसरी पीढ़ी’ के नवउदारवादी सुधार लागू करने पर अड़ी है।संपत्ति पर अधिकार
योजना आयोग एक ऐसा प्रस्ताव ले कर आया है जो भारत में पति-पत्नी के रिश्तों में रेडिकल परिवर्तन ला सकता है, लेकिन पुरुष मानसिकता को देखते हुए कम से कम अगले बीस साल तक ठंडा घर में पड़ा रहेगा। आयोग चाहता है कि विवाह के बाद पति और पत्नी जो भी संपत्ति हासिल करें, उस पर दोनों का समान अधिकार हो। यह प्रस्ताव नया भले ही लगे पर विवाह की अवधारणा में हमेशा मौजूद रहा है। यथार्थ तो यही है कि विवाह के बाद पति-पत्नी एक हो जाते हैं, लेकिन उनकी आर्थिक हैसियत एक नहीं हो जाती। पति राजा है तो वह राजा बना रहता है और पत्नी रंक है तो वह रंक बनी रहती है। राजा के साथ विवाह होने पर वह रानी की तरह रहने लगती है, लेकिन तभी तक जब तक राजा उस पर मेहरबान रहे। विवाह को जो ऊंचा स्थान सभी धर्मो और समुदायों में दिया गया है और विवाह के मंत्र जो कहते हैं उसके साथ इस आर्थिक विषमता का कोई मेल नहीं है। परिणाम यह होता है कि विवाह होते तो स्वर्ग में हैं पर वैवाहिक जीवन नरक में बिताया जाता है। अगर विवाह संस्था को एक मानवीय संस्था बनाना है तो हमें सब तरह की बराबरी पर विचार करना ही होगा। जिस विवाह में स्त्री और पुरुष की आर्थिक हैसियत अलग-अलग हो, वह कभी सफल नहीं हो सकता। इस तरह के जो विवाह सफल दिखाई देते हैं वे स्त्री की पराधीनता पर आधारित होते हैं। अधिकतर मामलों में चूंकि स्त्री का अपना कोई स्वतंत्र आर्थिक आधार नहीं होता इसलिए वह अपने को पति से नीचे मान कर चलती है। वह जानती है कि पति को अप्रसन्न करने के नतीजे कितने भयावह हो सकते हैं। इस तरह विवाह के भीतर किसी तरह का लोकतंत्र नहीं रह जाता। हर मामले में पुरुष की ही मर्जी चलती है, क्योंकि पैसा उसके ही पास होता है और कुछ खर्च करना हो तो पत्नी को उससे पैसा मांगना होता है। इससे पारिवारिक जीवन में उसकी भूमिका बहुत सीमित हो जाती है। अक्सर तो उसका मानसिक विकास भी नहीं हो पाता क्योंकि वह वास्तविक दुनिया की कारगुजारियों से नावाकिफ रहती है। परिवार की आर्थिक स्थिति में किसी प्रकार की सच्ची साझेदारी के अभाव में पत्नियों का अस्तित्व तक उनके अपने हाथ में नहीं रहता। चूंकि उनके पास अपनी मर्जी से खर्च करने के लिए पैसा नहीं होता इसलिए वे अपनी मर्जी का इस्तेमाल करना भी भूल जाती हैं। उन्हें डर होता है कि पति छोड़ देगा तो वे कहां जाएंगी? पिता के परिवार में लौटना कोई सच्चा विकल्प नहीं है। वहां उसका स्वागत करने के लिए शायद ही कोई उत्सुक रहता हो। इसलिए स्त्री की मजबूरी हो जाती है कि वह किसी भी शर्त पर विवाह को टूटने न दे। इस बेबसी का सारा फायदा पुरुष को मिलता है और वह परिवार के सभ्य जंगल में शेर की तरह जीवन बिताता है। इसका असर बेटे-बेटियों पर भी पड़ता है। बेटियां जानती हैं कि परिवार की संपत्ति में उनकी कोई कानूनी हिस्सेदारी नहीं है। विवाह के समय माता-पिता से जो मिल जाए वही उनका धन है और इस धन पर भी उस परिवार का कब्जा हो जाता है जहां वह ब्याह करके जाती है। इससे बेटियों के व्यक्तित्व में एक बेसहारापन अपने आप विकसित हो जाता है। दूसरी ओर बेटे जानते हैं कि परिवार की संपत्ति में उन सबका बराबर हिस्सा है इसलिए उनके व्यक्तित्व में अधिकार चेतना होती है जो उन्हें स्वतंत्र और स्वाभिमानी बनाती है। इसका असर पूरे सामाजिक ढांचे पर पड़ता है। एक आधी आबादी का दूसरी आधी आबादी से रिश्ता बिगड़ा रह जाता है। कह सकते हैं कि स्त्री-पुरुष की भौतिक विषमता हमारी सबसे सबसे तगड़ी आदत है। दूसरी आदतें टूट चुकी हैं या टूट रही हैं, राजतंत्र नहीं रहा, जातियों की ऊंच-नीच को चुनौती मिल रही है, सभी को शिक्षा हासिल करने का अधिकार मिल चुका है, अछूतपन के समर्थन में कोई चूं तक नहीं कर सकता, दलित सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश बन सकता है। स्त्री-पुरुष को बराबरी का हक न देने की हजारों वर्ष पुरानी आदत अभी भी हमें जकड़े हुए है। इस अस्वस्थ आदत को पारिवारिक संपत्ति में बराबरी का अधिकार जरूर धक्का पहुंचाएगा। सच पूछिए तो इससे पुरुष समाज को भी कम फायदा नहीं है। विशेषाधिकार आदमी को बड़ा नहीं, छोटा बनाता है। परिवार में लोकतंत्र नहीं होने से समाज में भी लोकतंत्र नहीं हो पाता। चूंकि पुरुष परिवार के भीतर आर्थिक विषमता को पालता है, इसलिए सामाजिक स्तर पर मौजूद आर्थिक विषमता को चुनौती देने की बात उसके मन में ही नहीं आती। परिवार में पुरुष और स्त्री के बीच जो असमान संबंध होता है वह असमान संबंध समाज में पुरुषों के बीच भी कायम रहता है। जब स्त्री अपनी दिखाई पड़ने वाली जंजीरों से आजाद हो जाएगी तब पुरुष भी अपनी न दिखने वाली जंजीरों से मुक्त हो सकेगा, लेकिन यह समस्या का पूरा हल नहीं है। पूरा हल इसलिए नहीं है कि भारत में संपत्ति है कितने परिवारों के पास? अधिकांश स्ति्रयां अपने पुरुषों की दरिद्रता में ही साझा कर रही हैं। इसलिए योजना आयोग के इस प्रस्ताव से जो सुविधा उच्च और मध्य वर्ग को मिल जाएगी, वह गरीब परिवारों तक नहीं पहुंचेगी। इसलिए योजना बना कर बड़े पैमाने पर संपत्ति का निर्माण और उसका साझा वितरण ही नए समाज की नींव बन सकता है। व्यापक समस्याओं के आंशिक समाधान नहीं होते।
औषधि परीक्षण का खतरनाक धंधा
देश में अवैध औषधि परीक्षण की जांच की मांग करने वाली एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार और भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआइ) से जवाब तलब करने के साथ इस मुद्दे पर नए सिरे से बहस आरंभ हो गई है। औषधि निर्माता कंपनियों द्वारा उनकी शोध प्रयोगशालाओं में अनुसंधान करके विकसित की गई नई औषधियों की बिक्री से पूर्व मनुष्यों पर उनका परीक्षण किया जाना अनिवार्य है। बाजार में न आई हुई इन दवाओं का यह परीक्षण ही ड्रग ट्रायल अथवा क्लीनिकल ट्रायल कहलाता है। इसमें दवा के दुष्प्रभावों के साथ-साथ रोगी की जान का भी जोखिम रहता है। अत: ऐसी दवाओं को सबसे पहले चूहों की एक प्रजाति पर आजमाया जाता है और प्रयोग की सफलता के बाद मनुष्यों पर परीक्षण करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा ड्रग ट्रायल के लिए चार चरणों की व्यवस्था लागू है। प्रथम चरण में औषधि के विषैले प्रभाव का आकलन किया जाता है। द्वितीय चरण में दवा की आवश्यक मात्रा के सापेक्ष उसके वांछित प्रभावों एवं दुष्प्रभावों की जानकारी एकत्र की जाती है। इन दोनों चरणों का परीक्षण प्राय: अत्याधुनिक सुविधा संपन्न विकसित देशों में किया जाता है, जहां स्वयंसेवकों के लघु समूह पर अध्ययन कर उन्हें संभावित खतरों की गंभीरता का ध्यान रखते हुए मोटी रकम दी जाती है। तृतीय चरण में ज्यादा रोगियों पर परीक्षण की आवश्यकता के कारण दवा कंपनियां मुख्यत: विकासशील देशों की ओर उन्मुख होती हैं। परीक्षणों से प्राप्त परिणामों के आधार पर अंतिम चरण में दवा की उपयोगिता सिद्ध होने के पश्चात ड्रग रेग्युलेटर अथारिटी से दवाओं को बाजार में उतारने की अनुमति मांगी जाती है और लाइसेंस प्राप्त कर दवा को सीमित बाजार में उतारते हैं। भारत सहित विश्व के 85 देशों में चिकित्सा संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन ने 1964 में शोधरत चिकित्सा वैज्ञानिकों के लिए नैतिक सिद्धांतों से संबंधित अंतरराष्ट्रीय मानदंड निर्धारित किए हैं। इसे डिक्लेरेशन ऑफ हेलसिंकी कहा गया। भारत सरकार ने भी अनियमितताओं पर प्रभावी अंकुश रखने के लिए ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट में संशोधन किया है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा परीक्षण करने वाले चिकित्सकों की सीमा-रेखाओं का निर्धारण करते हुए रोगियों के व्यापक हित एवं उनकी सुरक्षा का भरपूर ध्यान रखा गया है। पश्चिमी देशों में मरीजों की सुरक्षा के लिए बने कठोर कानूनों तथा ट्रायल में आने वाली अत्यधिक लागत के कारण बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा मुख्यत: विकासशील देशों में सुव्यवस्थित ढंग से ड्रग ट्रायल का संजाल बिछाया जा रहा है। विश्व के लगभग 178 देशों में ऐसे करीब एक लाख बीस हजार दवा परीक्षण जारी हैं। इन देशों में भारत, चीन, इंडोनेशिया और थाईलैंड प्रमुख हैं। भारत में खासतौर पर मध्य प्रदेश व आंध्र प्रदेश में दवा परीक्षण प्रगति पर हैं। इन परीक्षणों में सम्मिलित किए जाने वाले व्यक्ति अधिकतर गरीब, अनपढ़ एवं आदिवासी हैं। सवा अरब की जनसंख्या वाले हमारे देश में अत्यधिक जीन विविधता होने तथा क्लीनिकल ट्रायल की लागत पश्चिमी देशों की तुलना में अत्यधिक किफायती (लगभग बीस प्रतिशत) पड़ने के कारण भारत विदेशी दवा कंपनियों के शोध-कार्यो के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। साथ ही, यहां दवा-परीक्षण संबंधी कानून भी अधिक कठोर नहीं है। इसी कारण, विशेष रूप से विगत पांच वर्षो में, विदेशी दवा कंपनियों ने भारत को अपनी नई दवाओं के परीक्षण की प्रयोगशाला बना डाला है। अनुमान के मुताबिक आज हमारे देश में करीब डेढ़ लाख लोगों पर उनके जाने-अनजाने 1600 दवाओं के शोध-परीक्षण हो रहे हैं। साथ ही, अनुमान है कि भारत में लगभग 1500 करोड़ रुपये का ड्रग ट्रायल कारोबार जारी है, जिसके वर्ष 2012 तक बढ़कर 2760 करोड़ रुपये तक पहुंच जाने की संभावना है। दुर्भाग्यवश आर्थिक प्रलोभन तथा कमजोर निगरानी तंत्र के रहते हमारे देश में जानलेवा ड्रग ट्रायल के कई मामले प्रकाश में आए हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की मार्ग-दर्शिका के अनुसार परीक्षण में रोगी और दो गवाहों की लिखित सहमति आवश्यक है। संभावित दुष्प्रभावों की जानकारी देने संबंधी ऑडियो-वीडियो रिकार्डिग कराए जाने की भी बाध्यता है, परंतु दुख का विषय है कि दवा परीक्षणों के विरुद्ध सक्रिय विभिन्न संगठनों की सूचना के अनुसार भारत में औषधि परीक्षणों को लेकर अपेक्षित पारदर्शिता का अभाव है। मौत की आशंका वाले ट्रायल में प्रत्येक रोगी को जीवन-बीमा के दायरे में रखा जाना भी अनिवार्य है। इसमें भी अनियमितताएं उजागर हुई हैं। मौजूदा स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति का अध्ययन किया जाए तो इस प्रश्न का उत्तर मिलना भी कठिन नहीं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा प्रायोजित ऐसे ड्रग ट्रायल का अस्तित्व में रहना समीचीन है अथवा नहीं? क्लीनिकल ट्रायल पर प्रभावी नियंत्रण के लिए सक्षम निगरानी तंत्र का होना बहुत आवश्यक है। यह भी जरूरी है कि अस्पतालों के लिए ट्रायल की संपूर्ण जानकारी स्वास्थ्य विभाग को दिए जाने की बाध्यता हो तथा ड्रग ट्रायल से संबंधित संपूर्ण धनराशि सरकारी संस्थानों के माध्यम से ही वितरित किए जाने की व्यवस्था हो। परीक्षणकर्ताओं से अपेक्षा है कि कंपनी के साथ ड्रग ट्रायल संबंधी करार करते समय जनहित में परीक्षण के परिणाम को प्रकाशित करने का अधिकार भी अवश्य लिया जाए। इसके अतिरिक्त अशिक्षित अथवा गरीबी-रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले लोगों को क्लीनिकल ट्रायल से मुक्त रखा जाना चाहिए। (लेखक चिकित्सक हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे
Subscribe to:
Posts (Atom)