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Tuesday, February 14, 2012

नव उदारवादी नीतियों के लिए सबक


टूजी स्पेक्ट्रम मामले में जस्टिस जी. एस. सिंघवी और ए.के. गांगुली ने अपने फैसले से दूर संचार कंपनियों के उन 122 लाइसेंसों को, जो उनको 2008 में दिए गए थे रद्द करके संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार को बहुत कुछ सोचने पर विवश किया है। ये लाइसेंस 2000 के शुरुआती सालों में शुरू उस भ्रष्ट प्रक्रिया की देन थे जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक हितों के विरुद्ध और संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन माना है। संप्रग का यह कहना कि फैसले में गृहमंत्री पी. चिदंबरम को बेकसूर करार कर दिया गया है और संप्रग की नीतियों से इसका कोई लेना-देना नहीं है कहीं न कहीं गलत जरूर है। दरअसल फैसले में निजी जिम्म्ेादारियों पर बात ही नहीं की गई है। उसने तो लाइसेंस देने की पहले-आओ पहले-पाओ की नीति और लाइसेंस अर्जियों के लिए अंतिम तिथियों तथा चुनिंदा कंपनियों को लाइन से बाहर आवंटन करने के प्रभावों की छानबीन की है। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी के स्वीकृत सिद्धांत के अधीन गुनाह का हिस्सा होने के लिए मौजूदा सरकार के खिलाफ एक जबरदस्त आरोप है। फैसले में रेखांकित इस तथ्य से सरकार बरी नहीं हो जाती कि दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने प्रधानमंत्री या गृहमंत्री की सलाह पर ध्यान नहीं दिया। इससे यही सवाल खड़ा होता है कि उन्हें मंत्री पद पर बने ही क्यों रहने दिया गया। सरकार की मंत्रिमंडलीय व्यवस्था में अंतिम शब्द प्रधानमंत्री का होता है। फैसले में इलेक्ट्रोमेगनेटिक स्पेक्ट्रम सरीखे दुर्लभ संसाधन के इस्तेमाल का लाइसेंस देने के लिए पहले आओ पाले पाओ के केंद्रीय पक्ष को गलत ठहराया गया है और अपने सत्ताकाल में राजग ने भी इसी नीति का पालन किया था। इसने भी लाइसेंस देने की प्रक्रिया के साथ हेरफेर किया। इसलिए इस मामले में राजग को ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं। बहरहाल, उक्त फैसला पांच कारणों से महत्वपूर्ण है। सबसे अहम इस रूप में कि सरकार के पास राष्ट्र के प्राकृतिक संसाधन इसकी अमानत के तौर पर होते हैं और उसका खास दायित्व होता है कि वह उनके किसी भाग को निजी उद्यमियों को सौंपते समय न्यायपूर्ण और पारदर्शी ढंग से काम करे। वायु तंरंगो के अलावा इन दुर्लभ संसाधनों में भूमि, खनिज, तेल, गैस और पानी आदि भी आते हैं। सही मूल्य तय करने के लिए नीलामी की पद्धति को लगभग सर्वजनीन बनाने की सिफारिश कर अदालत मामले का अति सरलीकरण कर देती है। लेकिन बोली लगाने या नीलामी का तरीका सिर्फ विकसित बाजारों के मामलों में कामयाब हो सकता है और यह भूमि अथवा पानी में कहीं नहीं है। सार्वजनिक जमीन को अस्पतालों, स्कूलों अथवा कम कीमत के मकानों जैसे कामों के लिए आवंटित करने के मामलों में नीलामियां करना सही नहीं है। इसके बावजूद सार्वजनिक अमानत सिद्धांत तय कर दिया गया है। इसका अर्थ कि रसूख, असर, रित सिफारिश ओर अनेक अन्य क्षेत्रों में पट्टेधारी के आधार ‘चहेते सौदों’
के अधीन जारी लाइसेसों को जांच के लिए खोला जा सकता है। इसकी चपेट में सैकड़ों लाइसेंस आ जाएंगे जिनमें ऐसे प्रोजेक्टों के विशाल बहुमत का प्रतिनिधित्व करने वाले निहित स्वाथरे ने सार्वजनिक संपत्ति को कौड़ियों के मोल हथिया लिया है। इसके उन अनेकानेक परियोजनाओं के लिए स्पष्ट निहितार्थ हैं, जिनमें बिजली उत्पादन कंपनियों को कोयला खदानों के अधिकार बिना सोचे-समझे दे दिए गए हैं। दूसरे, फैसले में नागरिकों की भ्रष्टाचार संबधी शिकायतें करने के अधिकार को मान्यता देकर जनहित याचिका को वह ऊंचा दर्जा फिर दे दिया गया है जो इसे पहले प्राप्त था। इससे शिकायतों के समाधान का वैकल्पिक मंच मिल सकता है। यह अदालती फैसला सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले के विपरीत है जो उसने एक दशक पहले एनरॉन मामले में सेंटर ऑफ ट्रेड यूनियंस के पिटीशन को खारिज करते हुए दिया था। परंतु फैसला इस पर चर्चा नहीं करता कि संप्रग सरकार 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन के मामले में नियंत्रक एवं महालेखाकार की उस रिपोर्ट के आने के लंबे समय बाद तक सरकारी खजाने को हुए नुकसान से इंकार क्यों करती रही जिसके आकलन के अनुसार यह नुकसान 56,000 करोड़ से 1.76,000 करोड़ रुपये तक था। इसने उन कंपनियों पर कोई जुर्माना भी नहीं लगाया जिन्होंने पूरी प्रक्रिया में हेराफरी की थी। फैसले में इसका आधार बताए बगैर केवल मुकदमे की लागत की बात थी। चौथे, न्यायिक पुनरीक्षण को लेकर फैसला कुछ पेचीदा रास्ता लेता है। यह इस तर्क को अस्वीकार करता है कि वाणिज्यिक और वित्तीय मामलों में न्यायिक पुनरीक्षण बड़े सार्वजनिक हित में सीमित होना चाहिए। लेकिन इसमें यह नहीं बताया गया है कि इस सार्वजनिक हित का निर्धारण संबद्ध जज की अपनी समझ के अतिरिक्त किस तरह होना चाहिए। जब तक कड़े मापदंड तय नहीं किए जाते, यह न्यायिक अति-सक्रियता की ओर ले जा सकता है। फिर भी यह तो मानना ही चाहिए कि जजों ने नियंतण्रऔर धैर्य से काम लिया और अपने को उन राजनीतिक बखेड़ों से प्रभावित नहीं होने दिया जो घोटाले के सामने आने के साथ पैदा हुए थे। और अंत में फैसले में 2जी घोटाले में निष्क्रिय भूमिका अदा करने और इसका रास्ता साफ करने के लिए टेलीकोम रेगुलेटरी अथोरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई ) को फटकार लगाई गई है। परंतु विडंबना यह है कि 2जी लाइसेसों की नई नीलामी के तौर-तरीको को तय करने के लिए इसी एजेंसी को नामजद किया गया है और घोटाले की चल रही सीबीआई जांच का मूल्यांकन और उस पर रिपोर्ट करने के लिए किसी विशेष जांच एजेंसी को नियुक्त करने के स्थान पर इस काम को वो केंद्रीय सर्तकता आयोग को सौंपता है, जो बड़ी हद तक एक अक्षम एजेंसी है। बहरहाल, व्यापक परिप्रेक्ष्य में यह फैसला नवउदारवादी आर्थिक नीतियों की कमजोरियां रेखांकित करता है और राष्ट्रीय संसाधनों का गलत इस्तेमाल किए जाने की आशंका के प्रति चेताता है। नवउदारवाद का लक्ष्य निजी स्वाथरें द्वारा सार्वजनिक संसाधनों को हड़पना और आम लोगों को उनकी पहुंच से वंचित करना है। इस कारण पूंजी अनिवार्यत: अधिकाधिक प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करती जाएगी जिनमें भूमि, खनिज और वायु शामिल है। इसको बेहतर नियामकों अथवा बाजार आधारित अधिक पारदर्शी क्रियाविधि द्वारा नहीं रोका जा सकता है जो इसी प्रक्रिया को बनाए रखने का काम करेंगी। पिछले सात दशकों के सबसे खराब वैिक आर्थिक संकट, महामंदी का एक बड़ा सबक यह है कि नव उदारवाद इसके केंद्र में ही दिवालिया साबित हो चुका है। नवउदारवाद ने न केवल निवेश और संवृद्धि की दर धीमी की है, बल्कि इसने वैिक पर्यावरण संकट और खास तौर जलवायु परिवर्तन तथा सामाजिकता को बुरी तरह प्रभावित किया है। यूरोप में कल्याणकारी राज्य की स्थापना के माध्यम से हासिल सामाजिक उपलब्धि को नष्ट किया जा रहा है। आय में असमानता ने अपूर्व विस्तार लिया है और कल तक के संपन्न समाजों में बेरोजगारी महामंदी के स्तर को छू रही है। भारत को नवउदारवाद को पूरी तरह छोड़ देना चाहिए लेकिन यह आसानी से होने वाला नहीं क्योंकि सरकार नवउदारवाद की इस हद तक पक्षधर दिख रही है कि स्थाई गरीबी बढ़ती जा रही है। असमानताओं सहित इसके सबसे बुरे नतीजे नहीं देखे जा रहे हैं और सरकार ‘दूसरी पीढ़ी’ के नवउदारवादी सुधार लागू करने पर अड़ी है।