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Tuesday, February 14, 2012

औषधि परीक्षण का खतरनाक धंधा


देश में अवैध औषधि परीक्षण की जांच की मांग करने वाली एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार और भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआइ) से जवाब तलब करने के साथ इस मुद्दे पर नए सिरे से बहस आरंभ हो गई है। औषधि निर्माता कंपनियों द्वारा उनकी शोध प्रयोगशालाओं में अनुसंधान करके विकसित की गई नई औषधियों की बिक्री से पूर्व मनुष्यों पर उनका परीक्षण किया जाना अनिवार्य है। बाजार में न आई हुई इन दवाओं का यह परीक्षण ही ड्रग ट्रायल अथवा क्लीनिकल ट्रायल कहलाता है। इसमें दवा के दुष्प्रभावों के साथ-साथ रोगी की जान का भी जोखिम रहता है। अत: ऐसी दवाओं को सबसे पहले चूहों की एक प्रजाति पर आजमाया जाता है और प्रयोग की सफलता के बाद मनुष्यों पर परीक्षण करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा ड्रग ट्रायल के लिए चार चरणों की व्यवस्था लागू है। प्रथम चरण में औषधि के विषैले प्रभाव का आकलन किया जाता है। द्वितीय चरण में दवा की आवश्यक मात्रा के सापेक्ष उसके वांछित प्रभावों एवं दुष्प्रभावों की जानकारी एकत्र की जाती है। इन दोनों चरणों का परीक्षण प्राय: अत्याधुनिक सुविधा संपन्न विकसित देशों में किया जाता है, जहां स्वयंसेवकों के लघु समूह पर अध्ययन कर उन्हें संभावित खतरों की गंभीरता का ध्यान रखते हुए मोटी रकम दी जाती है। तृतीय चरण में ज्यादा रोगियों पर परीक्षण की आवश्यकता के कारण दवा कंपनियां मुख्यत: विकासशील देशों की ओर उन्मुख होती हैं। परीक्षणों से प्राप्त परिणामों के आधार पर अंतिम चरण में दवा की उपयोगिता सिद्ध होने के पश्चात ड्रग रेग्युलेटर अथारिटी से दवाओं को बाजार में उतारने की अनुमति मांगी जाती है और लाइसेंस प्राप्त कर दवा को सीमित बाजार में उतारते हैं। भारत सहित विश्व के 85 देशों में चिकित्सा संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था व‌र्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन ने 1964 में शोधरत चिकित्सा वैज्ञानिकों के लिए नैतिक सिद्धांतों से संबंधित अंतरराष्ट्रीय मानदंड निर्धारित किए हैं। इसे डिक्लेरेशन ऑफ हेलसिंकी कहा गया। भारत सरकार ने भी अनियमितताओं पर प्रभावी अंकुश रखने के लिए ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट में संशोधन किया है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा परीक्षण करने वाले चिकित्सकों की सीमा-रेखाओं का निर्धारण करते हुए रोगियों के व्यापक हित एवं उनकी सुरक्षा का भरपूर ध्यान रखा गया है। पश्चिमी देशों में मरीजों की सुरक्षा के लिए बने कठोर कानूनों तथा ट्रायल में आने वाली अत्यधिक लागत के कारण बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा मुख्यत: विकासशील देशों में सुव्यवस्थित ढंग से ड्रग ट्रायल का संजाल बिछाया जा रहा है। विश्व के लगभग 178 देशों में ऐसे करीब एक लाख बीस हजार दवा परीक्षण जारी हैं। इन देशों में भारत, चीन, इंडोनेशिया और थाईलैंड प्रमुख हैं। भारत में खासतौर पर मध्य प्रदेश व आंध्र प्रदेश में दवा परीक्षण प्रगति पर हैं। इन परीक्षणों में सम्मिलित किए जाने वाले व्यक्ति अधिकतर गरीब, अनपढ़ एवं आदिवासी हैं। सवा अरब की जनसंख्या वाले हमारे देश में अत्यधिक जीन विविधता होने तथा क्लीनिकल ट्रायल की लागत पश्चिमी देशों की तुलना में अत्यधिक किफायती (लगभग बीस प्रतिशत) पड़ने के कारण भारत विदेशी दवा कंपनियों के शोध-कार्यो के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। साथ ही, यहां दवा-परीक्षण संबंधी कानून भी अधिक कठोर नहीं है। इसी कारण, विशेष रूप से विगत पांच वर्षो में, विदेशी दवा कंपनियों ने भारत को अपनी नई दवाओं के परीक्षण की प्रयोगशाला बना डाला है। अनुमान के मुताबिक आज हमारे देश में करीब डेढ़ लाख लोगों पर उनके जाने-अनजाने 1600 दवाओं के शोध-परीक्षण हो रहे हैं। साथ ही, अनुमान है कि भारत में लगभग 1500 करोड़ रुपये का ड्रग ट्रायल कारोबार जारी है, जिसके वर्ष 2012 तक बढ़कर 2760 करोड़ रुपये तक पहुंच जाने की संभावना है। दुर्भाग्यवश आर्थिक प्रलोभन तथा कमजोर निगरानी तंत्र के रहते हमारे देश में जानलेवा ड्रग ट्रायल के कई मामले प्रकाश में आए हैं। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की मार्ग-दर्शिका के अनुसार परीक्षण में रोगी और दो गवाहों की लिखित सहमति आवश्यक है। संभावित दुष्प्रभावों की जानकारी देने संबंधी ऑडियो-वीडियो रिकार्डिग कराए जाने की भी बाध्यता है, परंतु दुख का विषय है कि दवा परीक्षणों के विरुद्ध सक्रिय विभिन्न संगठनों की सूचना के अनुसार भारत में औषधि परीक्षणों को लेकर अपेक्षित पारदर्शिता का अभाव है। मौत की आशंका वाले ट्रायल में प्रत्येक रोगी को जीवन-बीमा के दायरे में रखा जाना भी अनिवार्य है। इसमें भी अनियमितताएं उजागर हुई हैं। मौजूदा स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति का अध्ययन किया जाए तो इस प्रश्न का उत्तर मिलना भी कठिन नहीं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा प्रायोजित ऐसे ड्रग ट्रायल का अस्तित्व में रहना समीचीन है अथवा नहीं? क्लीनिकल ट्रायल पर प्रभावी नियंत्रण के लिए सक्षम निगरानी तंत्र का होना बहुत आवश्यक है। यह भी जरूरी है कि अस्पतालों के लिए ट्रायल की संपूर्ण जानकारी स्वास्थ्य विभाग को दिए जाने की बाध्यता हो तथा ड्रग ट्रायल से संबंधित संपूर्ण धनराशि सरकारी संस्थानों के माध्यम से ही वितरित किए जाने की व्यवस्था हो। परीक्षणकर्ताओं से अपेक्षा है कि कंपनी के साथ ड्रग ट्रायल संबंधी करार करते समय जनहित में परीक्षण के परिणाम को प्रकाशित करने का अधिकार भी अवश्य लिया जाए। इसके अतिरिक्त अशिक्षित अथवा गरीबी-रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले लोगों को क्लीनिकल ट्रायल से मुक्त रखा जाना चाहिए। (लेखक चिकित्सक हैं) 1ी2श्चश्रल्ल2ी@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

Friday, September 30, 2011

शिक्षा पर उदासीनता


शासन के शीर्ष पदों पर बैठे लोग अपने सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को लेकर गंभीर नहीं, इसका एक नया प्रमाण यह है कि अभी कई राज्यों ने शिक्षा अधिकार कानून के संदर्भ में अधिसूचना तक जारी नहीं की है। अधिसूचना जारी न करने वाले राज्यों में महाराष्ट्र, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे बड़े राज्य तो हैं ही, केंद्रीय सत्ता की नाक के नीचे रहने वाला दिल्ली भी है। यह लेटलतीफी तब है जब छह से चौदह साल तक के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा देने का कानून बने हुए डेढ़ साल होने वाले हैं। इस कानून पर अमल महज सामाजिक दायित्व की पूर्ति ही नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया भी है। हालांकि सभी राज्य सरकारें शिक्षा की महत्ता का बखान करती रहती हैं, लेकिन जब इस दिशा में कुछ करने की बारी आती है तो वे तरह-तरह के बहाने से लैस हो जाती हैं। यह ठीक नहीं कि केंद्र सरकार इन बहानों को तवज्जो दे रही है। शिक्षा अधिकार कानून पर अमल में लापरवाही
बरतने वाले राज्यों पर दबाव बनाने में केंद्र सरकार की यह दलील शायद ही काम आए कि इस कानून के हिसाब से अधिसूचना न जारी करने वाले राज्यों को नए स्कूलों के लिए धन नहीं दिया जाएगा। कोई आश्चर्य नहीं कि केंद्र सरकार की इस सख्ती के बावजूद राज्य सरकारें हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाएं। यह शिक्षा अधिकार कानून के प्रति राज्य सरकारों की उदासीनता ही है कि उन्होंने बार-बार याद दिलाए जाने के बाद अधिसूचना जारी की और कुछ राज्य तो अभी भी ऐसा करने में आनाकानी कर रहे हैं। इससे अधिक आश्चर्यजनक और कुछ नहीं हो सकता कि पिछले वित्तीय वर्ष के अंत तक सिर्फ 15 राज्यों ने शिक्षा अधिकार कानून पर अमल की अधिसूचना जारी की थी। जिस कानून को सामाजिक उत्थान के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया हो उसके संदर्भ में राज्य सरकारों का ढीला-ढाला रवैया सवाल खड़े करने वाला है। राज्य सरकारों के रवैये से यह स्पष्ट है कि इस कानून के अमल में अभी और देर होगी। ध्यान रहे कि अधिसूचना जारी करने मात्र से 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को स्कूलों में दाखिला नहीं मिलने वाला। ऐसा तो तब होगा जब पर्याप्त स्कूल, शिक्षक और अन्य संसाधन जुटा लिए जाएंगे। इस संदर्भ में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि संसाधनों के मामले में राज्य सरकारें आर्थिक तंगी का रोना रोती रहती हैं। हालांकि सर्वशिक्षा अभियान के तहत 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को शिक्षा प्रदान करने में खर्च होने वाले धन का बड़ा भाग केंद्र सरकार वहन कर रही है, फिर भी राज्य सरकारें अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति का हवाला देने से बाज नहीं आ रहीं। राज्य सरकारों के ऐसे आचरण को देखते हुए इसकी उम्मीद और भी कम है कि वे सर्वशिक्षा अभियान के तहत संचालित होने वाले स्कूलों की दशा सुधारने और उनमें गुणवत्ता प्रधान शिक्षा के लिए सचेत होंगी। इससे इंकार नहीं कि 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाना एक बड़ा काम है, लेकिन यह काम तब और दुरूह हो जाएगा जब राज्य सरकारें उसमें रुचि नहीं लेंगी। जब राज्य सरकारें इस मामले में उदासीनता का परिचय देंगी तब फिर यह लगभग तय है कि निजी क्षेत्र के स्कूल इस कार्य में सहयोग देने के लिए स्वेच्छा से तैयार होने वाले नहीं हैं।