Tuesday, March 8, 2011
Monday, March 7, 2011
सीखना होगा विरोध का मर्यादित तरीका
पिछले दिनों मिर्चपुर में जातीय हिंसा के बाद पुलिस ने कुछ युवाओं को गिरफ्तार किया था, जिनका संबंध जाट समुदाय से था। इसके विरोध में जाटों की एक खाप पंचायत ने इस साल जनवरी में 11 दिन तक हरियाणा के जींद जिले में आंदोलन किया था। रेल व सड़क यातायात को रोका गया, रेल पटरियां उखाड़ी गई और बसों में आग लगाई गई। इसके अलावा आंदोलनकारियों ने रेलवे व सड़क पर जाम लगाने के लिए 3,130 पेड़ काट डाले, जिससे पर्यावरण को गहरा नुकसान हुआ और राज्य सरकार को कटे हुए पेड़ हटाने के लिए 90 हजार रुपये खर्च करने पड़े। साथ ही बसों को रिपेयर कराने में ढाई लाख रुपये का खर्च आया। इस आंदोलन से आम जनता को जो नुकसान हुआ, वह अपनी जगह है। अब लगता यह है कि बतौर हर्जाना खाप पंचायतों को 33.95 करोड़ रुपये भरना पड़ेगा। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व हरियाणा राज्य सरकार से कहा है कि वह इन खाप पंचायतों से जुर्माना वसूल करने के रास्ते बतलाए। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उत्तर रेलवे और हरियाणा सरकार ने आंदोलन के कारण हुए नुकसान का अनुमान लगाया था। विरोध का यह अराजक और गैरकानूनी उदाहरण इकलौता नहीं है। यहां आए दिन विरोध और अपनी मांगे मनवाने के नाम पर देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि अपनी उचित या अनुचित मांगे मनवाने के लिए राजनीतिक या गैर राजनीतिक संगठन आंदोलन करते हैं। ये आंदोलन अक्सर हिंसा का रूप धरण कर लेते हैं, जिनमें सरकारी-निजी संपत्ति को गहरा नुकसान पहंुचता है और आम जनता को भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसके मद्देनजर रखते हुए देश की विभिन्न अदालतें बंद, आंदोलनों व प्रदर्शनों के खिलाफ फैसले सुनाती रही हैं और इन्हें प्रायोजित करने वाली पार्टियों पर जुर्माने भी लगाती रही हैं। मसलन, केरल में वामपंथियों द्वारा आयोजित बंद को उच्च न्यायलय ने गैर कानूनी घोषित किया था और माकपा पर जुर्माना किया था। इसी तरह मुंबई में शिवसेना पर जनसंपत्ति नष्ट करने के लिए 20 लाख रुपये का जुर्माना किया गया था। अदालतों द्वारा इस किस्म के जुर्माने लगाने का उद्देश्य यह प्रतीत होता है कि सरकारी व गैर सरकारी संपत्ति को नुकसान से बचाया जाए और जनता को असुविधा से दूर रखा जाए। संभवत: इसी तथ्य को मद्देनजर रखते हुए सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश जीएस संघवी और न्यायाधीश एके गांगुली की खंडपीठ ने राजस्थान के गूर्जर आंदोलन, हरियाणा के खाप आंदोलन आदि का जायजा लेते हुए कहा था, दुर्भाग्य से आज की सरकारें खामोश हैं। हर कोई खामोश है। हम इसे जारी नहीं रहने दे सकते। अदालतें सभी समस्याओं का समाधन नहीं कर सकतीं, लेकिन कानून के शासन को बरकरार रखने के लिए उन्हें हस्तक्षेप करना पड़ेगा और इनमें सबसे बुनियादी सवाल है सभ्य समाज। दूसरे शब्दों में इसका अर्थ यह है कि सुप्रीम कोर्ट यह नहीं चाहता कि कोई व्यक्ति या संगठन अपनी मांगें मनवाने के लिए इस किस्म का आंदोलन करे, जिसमें संपत्ति नष्ट हो या जनता को असुविधा हो। सुनने में यह बात बहुत अच्छी और आदर्शवादी लगती है, लेकिन सवाल यह है कि वह कौन-सा तरीका है, जिसके जरिये गूंगी-बहरी सरकार से अपनी मांगें मनवाई जाएं? खामोशी और सभ्य तरीके से की गई इलतिजा तो कोई सुनता नहीं। इस बात पर बहस हो सकती है कि जींद जिले में खाप पंचायत का आंदोलन सही था या नहीं, लेकिन इस आंदोलन की आड़ में सभी आंदोलनों को शामिल करके सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी नजीर पेश की है, जो चिंता का विषय है। इस पर आगे विचार करने से पहले यह जरूरी लगता है कि जींद आंदोलन को संक्षेप में दोहरा दिया जाए। हुआ यह था कि हरियाणा के मिर्चपुर गांव में एक जातीय संघर्ष के दौरान दलितों के मकानों में आग लगा दी गई थी, जिसमें एक 70 वर्षीय व्यक्ति और उसकी अपाहिज बेटी जलकर राख हो गए थे। इस आगजनी व हत्या के आरोप में पुलिस ने सवर्ण जाति के कुछ युवकों को गिरफ्तार किया। उनकी गिरफ्तारी के विरोध में 11 खाप पंचायतों ने जींद में 11 दिन तक रेल व सड़क यातायात बंद रखा। इस चक्काजाम के लिए हजारों पेड़ काटे गए, राज्य परिवहर की बसों में आग लगाई गई और रेल पटरियां उखाड़ी गई। इसे मद्देनजर रखते हुए सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने 31 जनवरी को गंभीर रुख अपनाते हुए कहा, सरकार किस तरह मुट्ठीभर लोगों को यह अनुमति दे सकती है कि वह दूसरों को जनयातायात इस्तेमाल न करने दे? क्या सरकार पूरी तरह असहाय थी? यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर रेलवे और हरियाणा सरकार को आदेश दिया कि वह खापों द्वारा प्रायोजित आंदोलन से हुए नुकसान का अनुमान लगाएं। यह नुकसान 33.95 करोड़ रुपये आंका गया है और पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व राज्य सरकारों को आदेश दिया कि वह शपथपत्रों द्वारा बताएं कि जिन खाप पंचायतों को मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने समाजिक संगठन कहा है, उनसे यह जुर्माना किस तरह से वसूल किया जाए। लेकिन इस जुर्माने को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के गूर्जर व अन्य आंदोलनों की ओर भी इशारा किया है। इससे यह चिंता बढ़ गई है कि क्या सुप्रीम कोर्ट सभी आंदोलनों पर प्रतिबंध लगाना चाहता है? अगर ऐसा है तो फिर राज्य सरकारों या केंद्र से जायज मांगें मनवाने का कौन-सा रास्ता होगा? यह सही है कि लोकतंत्र में कोई भी आंदोलन हिंसक नहीं होना चाहिए, लेकिन यह भी देखने को मिलता है कि जब तक आंदोलन में थोड़ी उग्रता शामिल न हो, सरकारों की कान पर जूं तक नहीं रेंगती। यह अफसोस की बात है कि लोकतंत्र के 63 वर्ष बाद भी हम जन विरोध व्यक्त करने का ऐसा कोई तरीका विकसित नहीं कर पाए हैं, जो शांतिपूर्ण हो और जिस पर राज्यों व केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया तेजी से आए और सकारात्मक हो। जापान में किसी बात का विरोध करने या मांगे पेश करने के लिए कर्मचारी काली पट्टी बांधकर काम पर जाते हैं और उत्पादन को तेज कर देते हैं। जापान सरकार के लिए मांजरा समझने को इतना ही इशारा काफी होता है, लेकिन जापान के इस मॉडल को कहीं और नहीं अपनाया गया है और अब अपने देश में संभव है कि सुप्रीम कोर्ट ऐसी ही भावनाएं रखता हो कि विरोध के तरीके सभ्य और किसी को परेशानी में न डालने वाले हों। मगर सवाल है कि क्या जापान की तरह हमारे देश की सरकार भी इस तरह के विरोध प्रदर्शन के प्रति उतनी ही संवेदनशीलता दिखाएगी, जितना जापान की सरकार या वहां का जनमानस दिखाता है? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Sunday, March 6, 2011
संस्था की गरिमा
केंद्रीय सतर्कता आयोग को ताकतवर बनाने की भी जरूरत है
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने देश के मुख्य सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस की नियुक्ति को निरस्त करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि भ्रष्टाचार-निरोधक इस शीर्ष संस्था के मुखिया को पारदर्शी चरित्र का होना चाहिए। यानी इसका नेतृत्व ऐसे व्यक्ति को करना चाहिए, जिसके आचरण पर उंगली न उठाई जा सके। अंगरेजी में एक कहावत है, जिसका अर्थ है कि राजा (सीजर) की पत्नी को संदेह से परे होना चाहिए। इसका सीधा-सा मतलब यह कि महत्वपूर्ण और सार्वजनिक पदों पर बैठने वाले व्यक्ति का आचरण पारदर्शी होना ही चाहिए। तभी केंद्रीय सतर्कता आयोग जैसी संस्था की शुचिता भी बरकरार रह सकेगी।
पीजे थॉमस की नियुक्ति के खिलाफ दायर जनहित याचिका में बहस के दौरान थॉमस के वकील वेणुगोपाल ने अनेक तर्क देकर सर्वोच्च अदालत को यह बताने की कोशिश की थी कि थॉमस पारदर्शी व्यक्तित्व के अधिकारी रहे हैं और केरल में पाम ऑयल घोटाले में उनके खिलाफ आरोप पत्र राजनीतिक कारणों से दायर किया गया था। थॉमस बेईमान हैं या नहीं, यह अलग बहस का विषय है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस एच कपाडिया ने इन तर्कों को यह कहकर काट दिया कि यह आरोप पत्र ही उनके आचरण पर संदेह पैदा करने के लिए काफी है। सीधी-सी बात है, एक ऐसे महत्वपूर्ण पद पर, जहां से देश के मुख्य सतर्कता आयुक्त को देश भर के अधिकारियों के आचरण पर टिप्पणी करनी हो या जांच के आदेश देने हों, संदेह की कोई गुंजाइश ही नहीं होनी चाहिए।
दरअसल सीवीसी की नियुक्ति के समय उच्चाधिकार प्राप्त चयन समिति में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने जब यह मुद्दा उठाया था, तब प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को थॉमस की नियुक्ति के पक्ष में दुराग्रह नहीं करना चाहिए था। लेकिन वे दोनों थॉमस को मुख्य सतर्कता आयुक्त बनाने पर अड़े हुए थे, ऐसे में, उन्होंने नेता विपक्ष की दलीलों को बहुत महत्व नहीं दिया। इस पर सुषमा स्वराज ने अपनी उपेक्षा का आरोप लगाया, क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने ‘हवाला कांड’ में निर्णय देते हुए यह स्पष्ट किया था कि ऐसे फैसले विपक्ष के नेता की सहमति से किए जाने चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है, तो फिर चयन समिति में विपक्ष के नेता को रखने का भला क्या औचित्य है? अगर बहुमत के आधार पर ही निर्णय करना था, तब तो समिति के बाकी दो सदस्य प्रधानमंत्री और गृह मंत्री कोई भी निर्णय लेने में सक्षम हैं। इस लिहाज से देखें, तो उच्चाधिकार प्राप्त समिति मात्र दिखावे की रह गई है।
जैन हवाला कांड के मुकदमे की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जब देखा कि सीबीआई लगातार प्रधानमंत्री कार्यालय से निर्देश लेती है और स्वतंत्र व्यवहार नहीं कर पाती, तो उसने सीबीआई की स्वायत्तता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उसे केंद्रीय सतर्कता आयोग के अधीन किए जाने के निर्देश दिए थे। अदालत ने साथ ही, यह भी निर्देश दिया था कि ‘कानून की निगाह में सब बराबर हैं’ के सिद्धांत का पालन करते हुए किसी भी पद पर बैठे वरिष्ठ अधिकारी या मंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत आने पर सीबीआई को सरकार से अनुमति नहीं लेनी होगी। पर विडंबना देखिए कि ‘विनीत नारायण’ फैसले के बाद शरद पवार की अध्यक्षता में बनी संसदीय समिति ने जो विधेयक तैयार किया, उसमें केंद्रीय सतर्कता आयोग को वह ताकत दी ही नहीं गई, जिससे वह अपना काम पूरी स्वतंत्रता से कर पाता। नतीजतन कहने को तो सीबीआई केंद्रीय सतर्कता आयोग की निगरानी में कार्य करती है, लेकिन वास्तव में उसकी स्थिति आज भी पूर्ववत् है। यानी उच्च पदस्थ अधिकारियों और मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच करने की उसे छूट नहीं है। ऐसा करने से पहले सीबीआई को प्रधानमंत्री कार्यालय से अनुमति लेनी होती है। विडंबना यह है कि प्रधानमंत्री कार्यालय सीबीआई की ऐसी सभी प्रार्थनाओं पर चुपचाप बैठा रहता है और वर्षों तक अनुमति प्रदान नहीं करता। नतीजतन उच्च पदस्थ भ्रष्ट अधिकारी न सिर्फ अपने पद पर बने रहते हैं, बल्कि प्रधानमंत्री कार्यालय के अघोषित सुरक्षा कवच में अपने अनैतिक कारनामों को डंके की चोट पर अंजाम भी देते रहते हैं। ऐसा अब तक के हर प्रधानमंत्री के कार्यकाल में होता आया है, चाहे वह यूपीए का रहा हो या एनडीए का। इतना ही नहीं, पिछले दिनों इस आयोग से सरकार ने वह अधिकार भी छीन लिया, जिसके तहत वह सीबीआई को केस रजिस्टर करने का निर्देश देता था। ऐसे तमाम प्रमाण हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि केंद्र में सरकार कोई भी हो, वह उच्च पदासीन व्यक्तियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार की जांच नहीं होने देना चाहती। इसलिए केंद्रीय सतर्कता आयोग की लगातार दुर्गति की जा रही है।
सर्वोच्च न्यायालय के मौजूदा फैसले ने भविष्य के लिए यह सुनिश्चित कर दिया कि ‘पारदर्शी’ का अर्थ वह नहीं होगा, जो कोई भी सरकार मनमाने ढंग से लगाना चाहे। बल्कि सार्वजनिक महत्व के पदों पर नियुक्ति के समय व्यक्ति के आचरण की पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित करना चयन समिति का दायित्व होगा। यह बहाना नहीं चलेगा कि समिति को अमुक व्यक्ति के बारे में वही जानकारी थी, जो उसके बायोडाटा में थी। आशा की जानी चाहिए कि भविष्य में फिर कोई पीजे थॉमस पिछले दरवाजे से ऐसे महत्वपूर्ण पदों पर नहीं बैठ पाएगा। इस सबके बावजूद सीवीसी भ्रष्टाचार से निपटने में सक्षम होगा, इसमें संदेह है। इसलिए जरूरी है कि सर्वोच्च न्यायालय ‘हवाला कांड’ के फैसले का फिर से मूल्यांकन करते हुए सीवीसी को मजबूत बनाने के लिए भी कड़े निर्देश जारी करे। तभी यह आयोग नाम के अनुरूप अपनी सार्थकता सिद्ध कर पाएगा।
चुनाव आयोग की तरह हो सीवीसी का गठन
सीवीसी जैसे पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया के संदर्भ में यह सुझाव दे रहे हैं लेखक
पीजे थॉमस ने सीवीसी पद से जाते- जाते सरकार और नौकरशाहों के बीच के संबंधों और एक-दूसरे से लाभ लेने और देने के मामलों का विवादित पिटारा खोल दिया। सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्ति पर तीखी आपत्ति जताते हुए पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़ा कर दिया है। रियाटरमेंट के बाद की नियुक्ति, बड़े सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई से पहले अनुमति जैसे कई प्रावधान भी हैं जो परोक्ष रूप से थॉमस जैसे प्रकरणों को बढ़ावा देते हैं। इससे चिंतित वरिष्ठ नौकरशाह और राज्यसभा के पूर्व महासचिव योगेंद्र नारायण का मानना है कि अब वक्त आ गया है जब नियुक्ति की प्रक्रिया पर खुल कर चर्चा हो और सार्थक बदलाव हों। दैनिक जागरण के विशेष संवाददाता आशुतोष झा से उनकी बातचीत के प्रमुख अंश : विवादों में रहे सीवीसी पीजे थॉमस की नियुक्ति को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने गैर कानूनी करार दे दिया। इसका जिम्मेदार आप किसे मानते हैं? मेरी नजर में सबसे बड़ी गलती केंद्रीय कार्मिक विभाग की है। उसकी जिम्मेदारी थी कि थॉमस के खिलाफ विचाराधीन चार्जशीट की जानकारी समिति के समक्ष रखी जाती। आल इंडिया सर्विस आफिसर्स का पूरा बायोडाटा उसके पास होता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि 2003-04 में कार्मिक विभाग की नोटिंग भी हो चुकी थी। कुछ नोटिंग तो ऐसी भी थी कि चार्जशीट पर आगे बढ़ने की अनुमति दे दी गई है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कार्मिक विभाग को जो करना चाहिए था वह नहीं किया गया। यह प्रक्रिया की गलती थी और उसके लिए कार्मिक विभाग जिम्मेदार था। हां, यह भी सच्चाई है कि नियुक्ति समिति ने पूरी गंभीरता से काम नहीं किया। आपको क्या लगता है कि समिति ने इतनी जल्दबाजी क्यों की? देखिए, मैं ठोस तौर पर कुछ नहीं सकता। प्रधानमंत्री समेत केंद्रीय गृहमंत्री और नेता प्रतिपक्ष इस समिति में होते हैं। नेता प्रतिपक्ष ने असहमति जताई थी। हो सकता है कि गठबंधन राजनीति की मजबूरी रही हो, पर मैं समझता हूं कि यह सिस्टम की असफलता है। अब जब पूरी बातें खुल गई हैं तो कानून में साफ तौर पर यह शामिल किया जाना चाहिए कि सीवीसी के पद पर ऐसे किसी व्यक्ति की नियुक्ति नहीं हो सकती है जिसके खिलाफ चार्जशीट लंबित भी है। नियुक्ति के प्रावधान और कानून पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए। क्या सीवीसी जैसे पदों पर नियुक्ति के लिए समिति में एकमत का प्रावधान जरूरी है? सुप्रीम कोर्ट ने इस पर भी विचार किया है और कहा है कि वीटो पावर किसी के पास नहीं होना चाहिए। मैं भी इससे सहमत हूं। हमेशा एकमत होना संभव भी नहीं है। हां, सर्वसम्मति जरूर होनी चाहिए। थॉमस के मामले में हालांकि वह भी गलत साबित हुआ। लिहाजा ऐसी प्रक्रिया होनी चाहिए कि पहले कुछ नामों पर एकमत निर्णय लिया जाए और फिर उन नामों में से कोई एक नाम सर्वसम्मति से तय किया जाए। आखिरकार बहुमत तो सरकार का ही होता है। क्या आपको लगता है कि थॉमस जैसे मामलों में आइएएस अधिकारियों के मूल काडर के राज्य भी दोषी होते हैं। आइएएस की नियुक्ति तो केंद्र सरकार करती है और उसके पास संबंधित व्यक्ति की पूरी जानकारी होती है। लिहाजा राज्य सरकार पर दोष डालना सही नहीं होगा। सुप्रीमकोर्ट ने परोक्ष रूप से सीवीसी के लिए सिर्फ नौकरशाह के चुने जाने पर असहमति जताई है। मेरा तो मानना है कि चुनाव आयोग की तरह ही सीवीसी भी एक मल्टीफंक्शनल बाडी हो, जहां अलग अलग सेवा से लोग आएं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सार्वजनिक क्षेत्रों से भी लोगों को लिया जाना चाहिए। मेरी राय में इसमें कोई आपत्ति नहीं है। किसी भी शिकायत पर अच्छी जांच वही कर सकता है जिसके पास उस क्षेत्र का अनुभव हो। अगर टेलीकाम का मामला है तो वह आदमी क्या करेगा जिसे स्पेक्ट्रम की जानकारी नहीं है। जो जिस क्षेत्र का अनुभवी है वही अच्छी जांच कर सकता है। कानून का मामला है तो बार एसोसिएशन है। सिविल सेवा है तो उसके सीनियर हों। मैं आपके मुद्दे से थोड़ा भटका रहा हूं, लेकिन बताऊं कि सिंगल प्वाइंट डायरेक्टिव है कि संयुक्त सचिव से ऊपर के किसी भी व्यक्ति पर मामला चलाने से पहले सरकार से अनुमति लेनी होती है। उसका एक तार्किक आधार था। जनता सरकार में दो सचिवों के कार्यालयों पर सीबीआइ ने रेड कर दी थी। उसकी जानकारी कैबिनेट सचिव तक को नहीं थी। बताइए कि यह सही था क्या। क्या इस अनुमति के प्रावधान की आड़ में भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं मिलता है? अच्छा हो कि ऐसी अनुमति देने के लिए स्वतंत्र अथारिटी बने। सीवीसी अभी कानूनी बाडी है। उसे संवैधानिक बाडी बना दिया जाए और उसी के जरिए अनुमति दी जाए ताकि किसी भी मामले को छिपाने के लिए दबाव नहीं बनाया जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने इंटीग्रिटी कमीशन बनाने की बात कही है। मैं उससे पूरी तरह सहमत हूं। यह केवल नौकरशाही की बात नहीं है। न्यायपालिका में भी ऐसा होता है। जस्टिस निर्मल यादव के मामले में जितनी देरी हुई उसे हम सभी जानते हैं। पंद्रह महीने बाद न्यायपालिका से अनुमति मिली। लिहाजा ऐसी एक संस्था की जरूरत है जो हर मामले पर स्वतंत्र रूप से विचार करे और किसी भी शिकायत पर कार्रवाई की अनुमति देने के लिए स्वतंत्र हो। कई अर्द्ध न्यायिक निकाय हैं जिनका बड़ा अधिकार होता है। मसलन टेलीकाम रेगुलेटरी अथारिटी। क्या इसमें नियुक्ति के तौर तरीके से आप सहमत हैं? मैं आपसे सहमत हूं। रेगुलेटरी संस्थाओं का सार है कि वह स्वतंत्र फैसला लें। पश्चिम की तर्ज पर हमने इन संस्थाओं को अपना तो लिया, लेकिन ऐसे लोगों की भर्ती नहीं कर पाए जो किसी भी दल, विचार, और वाद से मुक्त हों। समाज में दो भाग हैं। एक सरकार और दूसरा सिविल सोसाइटी। ये संस्थाएं सिविल सोसाइटी का प्रतिनिधित्व करती हैं, लेकिन सच्चाई कई बार बिल्कुल अलग होती है। रिटायरमेंट के बाद नियुक्ति का सिलसिला लंबे समय से चल रहा है। क्या यह भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं देता? समाज को हमेशा अनुभवी आदमी की जरूरत होती है। पोस्ट रिटायरमेंट जॉब में खराबी नहीं है। देखना यह है कि जिसकी नियुक्ति हो रही है वह सही है या नहीं। कई मामलों में यह चलन भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है, लेकिन सारे विवाद खत्म हो जाएं अगर इन नियुक्तियों के लिए भी अलग से राजनीतिक दलों को शामिल करते हुए एक समिति बने। नियुक्ति का एकाधिकार सरकार के पास नहीं होना चाहिए। कुछ राजनीतिक दलों की समिति होनी चाहिए। सभी नामों पर वहीं विचार होना चाहिए। सबसे बड़ा फायदा तो यह होगा कि सरकार एकाधिकारी रूप से किसी खास व्यक्ति को लाभ पहुंचाने की स्थिति में नहीं होगी|
Friday, March 4, 2011
जातीय जनगणना और सामाजिक सुरक्षा
मूल स्वरूप में जनसंख्या में बदलाव जैविक घटना होने के साथ समाज में सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक व आर्थिक आधारों को प्रभावित करती है। राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना, स्कूलों में दोपहर का भोजन, बीपीएल और एपीएल के माध्यम से आहार का आधार बनाए जाने के कारण भी सटीक जनगणना जरूरी है। इसलिए जातिवार जनसंख्या का लक्ष्य देश के गरीब व वंचित वर्ग को खाद्य और पेयजल जैसी सुरक्षा का उपाय तो होगा ही, सरकारी सेवाओं में आरक्षण किस जाति और वर्ग के लिए जरूरी है, इसकी भी झलक इससे मिलेगी
देश के लोकतांत्रिक सदनों में अब मामले इस दृष्टि से ज्यादा उछाले जाते हैं ताकि विपक्ष को प्रचार मिले अन्यथा जातीय जनगणना के मुद्दे को फिर से उठाने की जरूरत ही नहीं थी। यूपीए सरकार पहले ही जाति आधारित जनगणना का फैसला ले चुकी है। हालांकि पिछड़े तबके से जुड़े लालू, मुलायम और शरद यादव जैसे नेताओं का कहना है कि केवल जाति की गणना से काम चलने वाला नहीं है बल्कि जातियों की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षिणक स्थिति का भी पता लगाना चाहिए। जातिगत गिनती के साथ सामाजिक सुरक्षा से जुड़े आंकड़े सामने आते हैं तो इसमें हर्ज नहीं है। गणना की इस पण्राली से कई अहं व नए पहलू सामने आएंगे। वृहत्तर हिन्दू समाज (हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिख) में जिस जातीय संरचना को ब्राrाणवादी व्यवस्था का दुष्चक्र माना जाता है, हकीकत में यह कितनी पुख्ता है, इसका खुलासा होगा। मुसलमानों में भी जातिप्रथा पर पर्दा डला है। पिछड़ों की समृद्ध जातियां जाति आधारित जनगणना पर इसलिए दबाव डालती चली आ रही हैं ताकि पिछड़ों को उनके जातीय प्रतिशत के हिसाब से आरक्षण सुविधा का लाभ मिले। आर्थिक और शैक्षिक आंकड़े सामने आने पर आरक्षण की सुविधा से यदि संपन्न पिछड़ों को अलग किया जाता है तो इन आंकड़ों की महत्ता सार्थक होगी। इस तथ्य को नहीं नकारा जा सकता है कि जाति एक चक्र है। यदि जाति चक्र न होती तो अब तक टूट गयी होती। जाति पर जबरदस्त कुठारघात महाभारत काल के भौतिकवादी ऋषि चार्वाक ने किया था। बुद्ध भी धर्म, जाति और वर्णाश्रित व्यवस्था तोड़ समग्र भारतीय नागरिक समाज के लिए समान आचार संहिता प्रयोग में लाए। चाणक्य ने जन्म और जातिगत श्रेष्ठता को तिलांजलि देते हुए व्यक्तिगत योग्यता को मान्यता दी। नानक ने जातीय अवधारणा को अमान्य करते हुए राजसत्ता में धर्म के उपयोग को मानवाधिकारों का हनन माना। कबीर ने भी कहा कि जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजियो ज्ञान। महात्मा गांधी के जाति प्रथा तोड़ने के प्रयास इतने अतुलनीय थे कि उन्होंने ‘अछूतोद्धार’ जैसे आंदोलन चला उनके काम दिनचर्या में शामिल कर आचरण में आत्मसात किये। पर इतने सार्थक प्रयासों के बाद भी जाति टूट नहीं पाई। क्योंकि कुलीन हिन्दू मानसिकता, जाति तोड़क कोशिशों के समानांतर अवचेतन में पैठ जमाए अपनी जातीय अस्मिता और उसके भेद को लेकर लगातार संघर्ष करती रही है। इसी मूल की प्रतिच्छाया हम पिछड़ों और दलितों में देख सकते हैं। मुख्यधारा में आने के बाद न पिछड़ा, पिछड़ा रह जाता है न दलित, दलित। वह भी उन्हीं ब्राrाणवादी हथकंडों को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने लगता है, जो ब्राrाणवादी व्यवस्था के हजारों साल रहे। जातिवार जनगणना और उससे वर्तमान आरक्षण पद्धति में परिवर्तन की उम्मीद को लेकर पिछड़े तबके के नेताओं का जोर है कि पिछड़ी जातियों की गिनती अनुसूचित जाति व जनजातियों की तरह कराई जाए। क्योंकि आरक्षण के संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद 16 की जरूरतों को पूरा करने के लिए यह पहल जरूरी है। लेकिन आरक्षण किसी भी जाति के समग्र उत्थान का मूल कभी नहीं बन सकता। आरक्षण के सामाजिक सरोकार केवल संसाधनों के बंटवारे और उपलब्ध अवसरों में भागीदारी से जुड़े हैं। आरक्षण की मांग अब शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार और ग्रामीण अकुशल बेरोजगारों के लिए सरकारी योजनाओं में हिस्सेदारी से जुड़ गई है। परंतु जब तक सरकार समावेशी आर्थिक नीतियां अमल में लाकर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों तक नहीं पहुंचती तब तक पिछड़ी, निम्न जाति अथवा आय के स्तर पर पिछले छोर पर बैठे व्यक्ति के जीवन स्तर में सुधार नहीं आ सकता। लेकिन पूंजीवाद की पोषक सरकारें समावेशी आर्थिक विकास की पक्षधर क्योंकर होगी? हमारा संविधान प्रत्येक देशवासी को भोजन का अधिकार तो देता है लेकिन सरकारें भूमि के व्यावसायिक अधिग्रहण को जायज ठहराती हैं और साधारण नमक और कंपनियों को पानी का अधिकार दे बुनियादी हकों की समस्याएं खड़ी करती हैं। अक्सर कहा जाता है कि इस्लाम में जातिप्रथा की गुंजाइश नहीं है। इसलिए ज्यादातर मुसलमान जाति आधारित जनगणना नकारते हुए उसके प्रारूप में केवल धर्म और लिंग दर्ज करते हैं। जाति का खाना अक्सर खाली छोड़ दिया जाता है अथवा उसमें मुसलमान लिख दिया जाता है जबकि एम एजाज अली के मुताबिक मुसलमान भी चार श्रेणियों में विभाजित हैं। उच्च वर्ग में सैयद, शेख, पठान, अब्दुल्ला, मिर्जा, मुगल, अशरफ जातियां शुमार हैं तो पिछड़े वर्ग में कुंजड़ा, जुलाहा, धुनिया, दर्जी, रंगरेज, डफाली, नाई, पमारिया आदि। पठारी क्षेत्रों में रहने वाले मुस्लिम आदिवासी जनजातियों की श्रेणी में आते हैं। अनुसूचित जातियों के समतुल्य धोबी, नट, बंजारा, बक्खो, हलालखोर, कलंदर, मदारी, मोची आदि हैं। मुस्लिमों में ये ऐसी प्रमुख जातियां हैं जो पूरे देश में लगभग इन्हीं नामों से जानी जाती हैं। इसके अलावा अन्य राज्यों में ऐसी कई जातियां हैं जो क्षेत्रीयता के दायरे में हैं। जैसे बंगाल में मंडल, विास, चौधरी, राएन, हलदार, सिकदर आदि। यही जातियां बंगाल में मुस्लिमों में बहुसंख्यक हैं। इसी तरह दक्षिण भारत में मरक्का, राऊथर, लब्बई, मालाबारी, पुस्लर, बोरेवाल, गारदीय, बहना, छप्परबंद आदि। उत्तर-पूर्वी भारत के असम, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर आदि में विभिन्न उपजातियों के क्षेत्रीय मुसलमान हैं। राजस्थान में सरहदी, फीलबान, बक्सेवाले आदि हैं। गुजरात में संगतराश, छीपा जैसी अनेक नामों से जानी जाने वाली बिरादरियां हैं। जम्मू-कश्मीर में ढोलकवाल, गुडवाल, बकरवाल, गोरखन, वेदा (मून) मरासी, डुबडुबा, हैंगी आदि जातियां हैं। इसी प्रकार पंजाब में राइनों और खटीकों की भरमार है। इतनी प्रत्यक्ष जातियों के बावजूद मुसलमानों को लेकर भ्रम है कि ये जातीय दुष्चक्र की गुंजलक में नहीं जकड़े हैं। जाति-विच्छेद पर आवरण कुलीन मुस्लिमों की रणनीति माना जा सकता है। मुसलमानों के सच्चे रहनुमाओं को कोशिश करनी चाहिए कि उनकी गिनती जाति आधारित हो। 1931 में हुई जनगणना में बिहार और उड़ीसा में मुसलमानों की तीन बिरादरियों का जिक्र है- मुस्लिम डोम, मुस्लिम हलालखोर और मुस्लिम जुलाहे। बाकी जातियों को क्यों हटाया गया, इसकी पड़ताल हो तो अच्छा है। ऐसा होता है तो वास्तविक रूप से आर्थिक बदहाली झेल रही जातियों को सरकारी लाभ की योजनाओं से जोड़ा जा सकेगा। पारसियों की घटती आबादी की स्थिति भी जातीय गणना से साफ होगी। क्योंकि हाल में इस समुदाय को प्रजनन सहायता योजना चलाकर जनसंख्या वृद्धि दर बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। जनगणना में ऐसे उपायों का भी सख्ती से पालन होना चाहिए था जिससे बांग्लादेशी घुसपैठिए इस पंजी में दर्ज न हो पाते? लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इनकी भी गिनती होगी। जबकि ये देश के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने और सुरक्षा की दृष्टि से भारी बोझ हैं। मूल स्वरूप में जनसंख्या में बदलाव जैविक घटना के साथ समाज में सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक व आर्थिक आधारों को प्रभावित करती है। राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना, स्कूलों में दोपहर भोजन, बीपीएल और एपीएल के माध्यम से आहार का आधार बनाए जाने के कारण भी सटीक जनगणना जरूरी है। इसलिए जातिवार जनसंख्या का लक्ष्य देश के गरीब व वंचित वर्ग को खाद्य और पेयजल जैसी सुरक्षा का उपाय तो होगा ही, सरकारी सेवाओं में आरक्षण किस जाति और वर्ग के लिए जरूरी है, इसकी भी झलक मिलेगी। इस लिहाज से मुस्लिम समाज के रहनुमाओं को भी अंतिम छोर पर बैठे अपने समाज की जातिवार जनगणना पर जोर देना चाहिए।
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