ममता बनर्जी की नाराजगी का शिकार हुए पूर्व रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी की जगह मुकुल रॉय की रेल मंत्रालय में ताजपोशी होगी। शुरुआती असहमति के बावजूद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ममता ने इसके लिए तैयार कर लिया है। मंगलवार सुबह रॉय को कैबिनेट मंत्री पद की शपथ दिलाई जाएगी। इसके साथ ही त्रिवेदी के रेल बजट के किराया वृद्धि के तीखे प्रस्तावों की रुखसती तय है। रॉय संसद में रेल बजट पर चर्चा का जवाब देने के दौरान ही साधारण क्लास की किराया वृद्धि को वापस लेने और स्लीपर क्लास के किरायों में आंशिक कमी का ऐलान कर सकते हैं। वातानुकूलित श्रेणियों के किरायों में भी राहत संभव है। ममता के निर्देश पर रविवार शाम प्रधानमंत्री को अपना त्यागपत्र भेज चुके त्रिवेदी का इस्तीफा सोमवार को मंजूर हो गया। शाम को प्रधानमंत्री की ओर से रॉय को कैबिनेट मंत्री बनाने का प्रस्ताव राष्ट्रपति भवन भेज दिया गया। शपथ ग्रहण के बाद रॉय ही सदन में रेल बजट पर चर्चा का जवाब देंगे और इसकी पूरी संभावना है कि वह त्रिवेदी के किराया वृद्धि के प्रस्तावों पर कैंची चलाएंगे। त्रिवेदी ने अपने बजट में साधारण दर्जो में 2 पैसे, स्लीपर क्लास में 5, वातानुकूलित श्रेणियों में क्रमश: 10 (थर्ड एसी), 15 (सेकेंड एसी) और 30 पैसे (फर्स्ट एसी) प्रति किमी वृद्धि का प्रस्ताव किया था। सूत्रों के अनुसार ममता की मंशा है कि साधारण दर्जे में वृद्धि पूरी तरह रद की जाए, स्लीपर क्लास की वृद्धि घटाकर 2 या 3 पैसे प्रति किमी पर लाई जाए। उनकी नजर में एसी क्लास की किराया वृद्धि भी ज्यादा है, लिहाजा थर्ड एसी में बढ़ोतरी को 5 पैसे, सेकेंड एसी में 10 और फर्स्ट एसी में 15 पैसे करना उचित होगा। अभी रेलवे को यात्री किराये से सालाना करीब 26 हजार करोड़ की आय होती है। इसमें से 20 हजार करोड़ अकेले स्लीपर क्लास से आते हैं। त्रिवेदी के किराया वृद्धि के प्रस्तावों से 2012-13 में रेलवे को 8000 करोड़ की अतिरिक्त आमदनी होने वाली थी। यदि कटौतियां हुई तो फायदा घटकर 3000 करोड़ रह जाएगा। वातानुकूलित श्रेणियों में प्रस्तावित किराये में कटौती नहीं होती है तो रेलवे को 4000 करोड़ की अतिरिक्त आय होगी। इसकी भरपाई रेलवे माल ढुलाई से करने की कोशिश करेगी, जहां बजट से पहले ही 20 फीसदी तक की वृद्धि की जा चुकी है। इससे पहले, ममता ने लोस में पार्टी नेता सुदीप बंदोपाध्याय और विश्वस्त मुकुल रॉय के साथ संसद भवन परिसर में प्रधानमंत्री से मुलाकात की और उन्हें राजी कर लिया। मुकुल के नाम पर प्रधानमंत्री को कुछ आशंकाएं थीं। यही कारण था कि पिछली बार ममता ने मुकुल को रेल मंत्रालय में स्थापित करने की कोशिश की थी, लेकिन बाद में त्रिवेदी आसीन हो गए थे। इस बार जबकि ममता मुकुल के नाम पर अडिग थीं तो प्रधानमंत्री चाहते थे कि कम से कम रेल बजट पारित होने तक इंतजार करें, लेकिन ममता ने दो टूक कह दिया कि वह इससे सहमत नहीं हैं। बताते हैं कि उन्होंने राजग काल में रेल बजट के दौरान मंत्रालय में हुए फेरबदल का उदाहरण देते हुए कहा, उस वक्त उन्होंने रेल बजट पेश किया था लेकिन संसद में जवाब नीतीश कुमार ने दिया था। सूत्र बताते हैं कि सरकार ने सुदीप बंदोपाध्याय को प्रोन्नत करने का भी प्रस्ताव दिया था लेकिन ममता की जिद के सामने सरकार को झुकना पड़ा। माना जा रहा है कि भविष्य में जहाजरानी मंत्रालय में खाली हुई जगह पर तृणमूल से किसी महिला सांसद को शामिल कराने की कोशिश होगी। ममता ने संसद के सेंट्रल हाल में पार्टी के सभी सांसदों के साथ भी बैठक की, जिसमें त्रिवेदी भी मौजूद थे। बताया जाता है कि उन्होंने सभी सांसदों को जनता से जुड़े मुद्दों पर सतर्क रहने की ताकीद करने के साथ ही यह संकेत भी दे दिया कि अनुशासन के मुद्दों पर किसी को नही बख्शा जाएगा। ममता ने बाद में पत्रकारों से बातचीत में पीएम के साथ बैठक को संतोषप्रद बताते हुए कहा, एनसीटीसी, रेल यात्री किराया में बढ़ोत्तरी जैसे सभी मुद्दों पर चर्चा हो गई है। किराया पर फैसला प्रधानमंत्री लेंगे, लेकिन उन्होंने इसका भी परोक्ष संकेत दे दिया कि साधारण और स्लीपर क्लास के किराए को ठीक किया जाएगा।
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Tuesday, March 20, 2012
26 रुपये रोजाना पर गुजर कर रही 35 करोड़ आबादी
सरकार ने जहां माना है कि देश की लगभग 30 फीसदी आबादी अभी भी गरीब है। वहीं उसने गरीबी के पैमाने में और कटौती कर दी है। अब शहरों में रोजाना 28.65 और गांवों में 22.42 रुपये से ज्यादा कमाने वाले को गरीब नहीं माना जाएगा। यह सुप्रीमकोर्ट में सरकार की ओर से दाखिल 32 और 26 रुपये के पैमाने से भी कम है। इससे सामाजिक संगठन और भड़क सकते हैं। गरीबों की संख्या पर योजना आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2009-10 में 29.8 फीसदी जनता गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही थी। दूसरे शब्दों में कहे तो 35.47 करोड़ जनता औसतन 26 रुपये रोजाना पर गुजारा कर रही है। यह स्थिति तब है जब 2009-10 के पिछले पांच वर्षो तक देश की आर्थिक विकास दर आजादी के बाद सबसे तेज रही है। तेंदुलकर समिति के फार्मूले पर तैयार इस रिपोर्ट के मुताबिक, 2004-05 में देश में गरीबों की संख्या 40.72 करोड़ थी जो 09-10 में 35.46 करोड़ हो गई है। दूसरे शब्दों में तब 37.2 फीसदी आबादी गरीब थी जिनकी संख्या घट कर 29.8 फीसदी हो गई है। ये आंकड़े यह भी बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम को ज्यादा सफलता मिली है क्योंकि ग्रामीण गरीबों की संख्या में 8 फीसदी की गिरावट हुई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में 4.8 फीसदी गरीब कम हुए हैं। योजना आयोग के आंकड़े कई अहम तथ्य उजागर करते हैं जो आने वाले दिनों सरकार के नीति निर्धारण में काफी जरूरी साबित हो सकते हैं। मसलन अनुसूचित जनजाति (एसटी) की 47.4 फीसदी आबादी अभी भी गरीबी रेखा के नीचे रहती है। गांवों में 42.3 फीसदी अनुसूचित जाति (एससी), 31.9 फीसदी अन्य पिछड़ी जाति के लोग गरीब है। शहरी इलाकों में भी लगभग यही स्थिति है। बिहार और छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में दो तिहाई एससी व एसटी गरीबी रेखा के नीचे हैं। योजना आयोग का यह आकलन एक तरह से यूपीए-वन के कार्यकाल की सीधी समीक्षा है। यूपीए-एक ने जून, 2004 में कार्यकाल संभाला था। उसके बाद के पांच वर्षो तक देश की आर्थिक विकास दर क्रमश: 6.9 फीसदी, 9.5 फीसदी, 9.6 फीसदी, 9.3 फीसदी और 6.8 फीसदी रही है। इस दौरान आबादी में 4.26 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा के उपर लाने में सफलता हासिल हुई है। इस तरह से देखा जाए तो अगर अगले चार दशकों तक नौ फीसदी या इससे ज्यादा की आर्थिक विकास दर हासिल की जाती है तब जा कर अगले तीन से चार दशकों के बीच गरीबी का खात्मा हो सकेगा।
Wednesday, February 29, 2012
गांवों के गरीबों को मुफ्त दवा देगी सरकार
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्वास्थ्य मंत्रालय से ग्रामीण क्षेत्र के सभी स्वास्थ्य केंद्रों पर मरीजों को मुफ्त दवा देने की नई योजना पर काम करने को कहा है। लोगों को सस्ता इलाज देने के लिए केंद्र सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र के खर्च को अगले पांच वर्षो में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का ढाई प्रतिशत करने के साथ ही केंद्रीय स्तर पर दवा खरीद एजेंसी गठित करने जा रही है। 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान स्वास्थ्य क्षेत्र की प्राथमिकताएं तय करने के लिए बुधवार को प्रधानमंत्री ने अपने कार्यालय में योजना आयोग और स्वास्थ्य मंत्रालय के अफसरों संग बैठक की। इस दौरान स्वास्थ्य मंत्रालय ने सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में सभी को मुफ्त दवा उपलब्ध करवाने की योजना का प्रस्ताव किया। पीएम ने योजना पर तेजी से अमल करने को कहा है। इस सिलसिले में केंद्रीय दवा खरीद एजेंसी के गठन को कैबिनेट पहले ही मंजूरी दे चुका है। साथ ही उन्होंने मंत्रालय को इलाज के मानक तय करने के लक्ष्य को भी जल्दी पूरा करने को कहा है। बैठक में तय किया गया कि 12वीं पंचवर्षीय योजना अवधि के दौरान इस क्षेत्र में होने वाले खर्च को मौजूदा 1.4 फीसदी से बढ़ा कर 2.5 फीसदी तक किए जाने की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने इस लिहाज से योजना आयोग को केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र का हिस्सा बढ़ाने को कहा है। साथ ही कहा है कि चूंकि स्वास्थ्य मूल रूप से राज्य का विषय है, इसलिए राज्यों को भी इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जाएगा। बैठक के दौरान पीएम ने नकली दवा पर अंकुश के लिए औषधि और सौंदर्य प्रसाधन (संशोधन) बिल पर जल्दी विचार कर संसद में पेश करने की जरूरत बताई। स्वास्थ्य मंत्रालय से भी राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन से जुड़ी योजनाओं का विलय करने के लिए कार्ययोजना तैयार करने को कहा गया है। सरकार का इरादा इस पूरी प्रक्रिया 20131-4 तक पूरी करने का है।
Monday, December 19, 2011
सोनिया के दबाव में खाद्य सुरक्षा बिल पर मुहर
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के वीटो के बाद खाद्य सुरक्षा विधेयक को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूर कर दिया है। यूपी के सियासी दंगल में राहुल को खाद्य सुरक्षा विधेयक का अस्त्र मुहैया कराने के लिए सरकार अब इसे सोमवार को संसद में पेश कर सकती है। यह बात अलग है कि संसद में पेश होने के बाद इसे स्थायी समिति के पास विचार के लिए भेजा जाना तय है। इससे देश की करीब एक तिहाई आबादी को सस्ती दरों पर अनाज उपलब्ध कराया जा सकेगा। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में इस विधेयक पर बहुत ज्यादा चर्चा नहीं हुई। सूत्र बताते हैं कि सिर्फ खाद्य सब्सिडी को लेकर संक्षिप्त चर्चा हुई, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष का इस विधेयक को लेकर पूरी सरकार पर इतना ज्यादा दबाव था कि बैठक में इस पर तुरंत सहमति की मुहर लग गई। राकांपा सुप्रीमो और खाद्य मंत्री शरद पवार व दूसरे सहयोगी दलों की चिंताओं को भी संप्रग अध्यक्ष का ड्रीम बताते हुए इसे अब न रोकने के लिए प्रधानमंत्री ने मना लिया। वैसे तो खुद कांग्रेस के मंत्री भी मौजूदा आर्थिक हालात और जन वितरण प्रणाली के ढांचे के मद्देनजर इस कानून के पक्ष में अभी नहीं हैं। खाद्य सुरक्षा कानून का लाभ देश की 63.5 प्रतिशत आबादी को मिलेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली 75 तो शहरी क्षेत्रों में 50 प्रतिशत आबादी इसके दायरे में आएगी। ग्रामीण और शहरी गरीबों को प्रति व्यक्ति 7 किलो प्रति माह के हिसाब से अनाज मिलेगा। कानून में 5 व्यक्तियों की इकाई को परिवार माना गया है। इसको लागू करने में सरकार पर पहले साल 95000 करोड़ रुपये की सब्सिडी का बोझ आएगा। यह तीसरे साल तक 1.50 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा। वर्तमान में सरकार 31000 करोड़ रुपये खाद्य सब्सिडी पर खर्च कर रही है। इसके अतिरिक्त तीसरे साल देश में कृषि उत्पादों के भंडारण के लिए गोदाम बनाने पर 50000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि की आवश्यकता होगी। खाद्य मंत्री केवी थामस ने कहा था कि इसको लागू करने के लिए करीब 3.5 लाख करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। इसके तहत अब गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों, गरीबी रेखा से ऊपर के परिवारों और अंत्योदय अन्न योजना के तहत आने वाले वर्ग के प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है। इसके विपरीत अब प्राथमिकता वाले और सामान्य उपभोक्ता वर्ग के तहत जनता को बांटा गया है। प्राथमिकता वर्ग में आने वाले गरीबों को एक रुपये प्रति किलो की दर पर मोटा अनाज, दो रुपये किलो के हिसाब से गेहूं और 3 रुपये किलो के हिसाब से चावल दिया जाएगा, जबकि सामान्य उपभोक्ता वर्ग को अनाज के समर्थन मूल्य का 50 फीसदी देना होगा। जिन गरीबों को अनाज दिया जाना है उनकी संख्या सामाजिक आर्थिक जनगणना के नतीजे आने के बाद तय होगी।
Monday, October 24, 2011
तरक्की कर रहे भारत में भूख और कुपोषण चरम पर
भारत में तेज आर्थिक विकास की तमाम कथाओं के मुकाबले यह कहानी बेहद उलटी, अचरज भरी और भयावह है। पिछले दशक की शानदार ग्रोथ के बावजूद भारत के सभी राज्यों में भूख व कुपोषण चरम पर है। एक भी राज्य ऐसा नहीं है, जो भूख से मुक्त होने के पैमाने के करीब फटकता हो। ऊंची आय वाले गुजरात, पंजाब जैसे राज्य हों अथवा बेहतर सामाजिक विकास वाला केरल, भूख के सूचकांक (हंगर इंडेक्स) पर यह तस्वीर बेहद डरावनी है। भूख-कुपोषण पर मानव विकास रिपोर्ट का रहस्योद्घाटन सनसनीखेज है। रिपोर्ट बताती है कि भारत भूख खत्म करने की लड़ाई हार गया है। सरकारी पैमाना कहता है कि भारत के ग्रामीण इलाकों में किसी व्यक्ति को स्वस्थ ढंग से जीने के लिए कम से 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्र में 2100 कैलोरी चाहिए। योजना आयोग की गरीबी रेखा का बुनियादी पैमाना भी यही है। मगर रिपोर्ट बताती है कि देश के 81 फीसदी ग्रामीण और 57 प्रतिशत शहरी इतना भी नहीं जुटा पाते। कुपोषण की समस्या केवल बच्चों की ही नहीं है, देश के करीब एक तिहाई वयस्क पुरुष व महिलाएं भी कुपोषण का शिकार हैं। इनका वजन (न्यूनतम बॉडी मास इंडेक्स 18.5) निर्धारित पैमाने से कम है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों के मामले में हालत बहुत बुरी है। देश के 46 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। हिमाचल, पंजाब, केरल, सिक्किम, मणिपुर व मिजोरम बच्चों में कुपोषण के मामले में अफ्रीका के निर्धनतम सहारा मरुस्थल के देशों जैसे हैं। मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार हंगर इंडेक्स यानी भूख सूचकांक में न्यूनतम स्तर 9.9 का है। भूख सूचकांक कुपोषण के तीन पैमानों पर आधारित है। किसी राज्य में भूख की स्थिति जानने के लिए नागरिकों में औसत कैलोरी (भोजन से मिलने वाली ऊर्जा) खपत, पांच साल से कम उम्र के बच्चों में कुपोषण, और पांच साल छोटे बच्चों की मृत्यु दर को आधार बनाया जाता है। विकास की ताजा चमक वाला गुजरात इस भूख सूचकांक पर 24.70 फीसदी अंकों के साथ 13वें नंबर पर है, यानी भूख से प्रभावित पांच प्रमुख राज्यों में शामिल है। छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश इससे ज्यादा बुरी हालत में हैं। मध्य प्रदेश भूख सूचकांक में सबसे गंभीर राज्य के तौर पर दर्ज हुआ है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, हरियाणा जैसे राज्यों में भी भयानक भूख व कुपोषण है। कर्नाटक व केरल की 28 फीसदी आबादी कुपोषण का शिकार है, जबकि उत्तर प्रदेश में बाल मृत्यु दर 9 और पंजाब में 5.2 फीसदी है। अनाजों की उपलब्धता में कमी और गैर अनाज की खपत में बढ़ोतरी न होने के रेखांकित करते हुए मानव विकास रिपोर्ट कहती है कि भारत भुखमरी की अपनी बुनियादी चुनौती से अब तक नहीं निबट पाया है।
Saturday, October 8, 2011
एक करोड़ लोगों को नौकरी देने का लक्ष्य
सूचना प्रौद्योगिकी नीति का मसौदा जारी
सरकार ने शुक्रवार को सूचना प्रौद्योगिकी नीति, 2011 का मसौदा पेश किया। इसका मकसद 2020 तक एक करोड़ कुशल श्रमबल का विकास करना और वैिक आईटी शक्ति के रूप में भारत की स्थिति को और मजबूत करना है। संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने नीति का मसौदा पेश करते हुए कहा कि नीति के तहत 2020 तक 200 अरब डालर के निर्यात का भी लक्ष्य रखा गया है। साथ ही आईटी और आईटी संबद्ध उद्योगों से उस समय तक 300 अरब डालर की आमदनी का लक्ष्य तय किया गया है। फिलहाल आईटी निर्यात 59 अरब डालर और राजस्व 88 अरब डालर का है। सिब्बल ने बताया, ‘इस नीति के तहत हमारा उद्देश्य आईटी और आईटी संबद्ध सेवाओं से वर्तमान के 88 अरब डालर के राजस्व को 2020 तक 300 अरब डालर पर पहुंचाने का है। इसके लिए 2020 तक आईटी निर्यात को वर्तमान के 59 अरब डालर से 200 अरब डालर पर पहुंचाने का है। साथ ही इस दौरान आईटी क्षेत्र में एक करोड़ अतिरिक्त श्रमबल तैयार करना है।’
उन्होंने कहा कि भारतीय आईटी उद्योग को अपनी आमदनी का 80 प्रतिशत निर्यात से मिलता है। इस क्षेत्र में 25 लाख कुशल कर्मचारी कार्यरत हैं। सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार विभाग की वेबसाइट पर नीति के मसौदे पर विभिन्न पक्ष एक माह तक अपनी राय दे सकते हैं। कपिल सिब्बल ने कहा कि नीति के मसौदे का मकसद लघु एवं मध्यम उपक्र मों तथा नए वेंचर्स को आईटी को अपनाने के लिए वित्तीय लाभ मुहैया कराना है। उन्होंने कहा कि हम प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) के लागू होने का इंतजार कर रहे हैं और उसके बाद लघु एवं मध्यम आकार की आईटी कंपनियों को प्रोत्साहन देने का ढांचा तैयार किया जाएगा। मसौदे में क्लाउड आधारित प्रौद्योगिकी में वैिक बाजार में उल्लेखनीय हिस्सेदारी हासिल करने का भी लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा उच्च शिक्षा संस्थानों में सेंटर फार एक्सिलेंस के गठन पर भी नीति में जोर दिया गया है। इसके जरिए 2020 तक आईटी विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में कम से कम 3,000 पीएचडी पाने वाले लोगों को लाना है।
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