कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के वीटो के बाद खाद्य सुरक्षा विधेयक को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूर कर दिया है। यूपी के सियासी दंगल में राहुल को खाद्य सुरक्षा विधेयक का अस्त्र मुहैया कराने के लिए सरकार अब इसे सोमवार को संसद में पेश कर सकती है। यह बात अलग है कि संसद में पेश होने के बाद इसे स्थायी समिति के पास विचार के लिए भेजा जाना तय है। इससे देश की करीब एक तिहाई आबादी को सस्ती दरों पर अनाज उपलब्ध कराया जा सकेगा। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में इस विधेयक पर बहुत ज्यादा चर्चा नहीं हुई। सूत्र बताते हैं कि सिर्फ खाद्य सब्सिडी को लेकर संक्षिप्त चर्चा हुई, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष का इस विधेयक को लेकर पूरी सरकार पर इतना ज्यादा दबाव था कि बैठक में इस पर तुरंत सहमति की मुहर लग गई। राकांपा सुप्रीमो और खाद्य मंत्री शरद पवार व दूसरे सहयोगी दलों की चिंताओं को भी संप्रग अध्यक्ष का ड्रीम बताते हुए इसे अब न रोकने के लिए प्रधानमंत्री ने मना लिया। वैसे तो खुद कांग्रेस के मंत्री भी मौजूदा आर्थिक हालात और जन वितरण प्रणाली के ढांचे के मद्देनजर इस कानून के पक्ष में अभी नहीं हैं। खाद्य सुरक्षा कानून का लाभ देश की 63.5 प्रतिशत आबादी को मिलेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली 75 तो शहरी क्षेत्रों में 50 प्रतिशत आबादी इसके दायरे में आएगी। ग्रामीण और शहरी गरीबों को प्रति व्यक्ति 7 किलो प्रति माह के हिसाब से अनाज मिलेगा। कानून में 5 व्यक्तियों की इकाई को परिवार माना गया है। इसको लागू करने में सरकार पर पहले साल 95000 करोड़ रुपये की सब्सिडी का बोझ आएगा। यह तीसरे साल तक 1.50 लाख करोड़ रुपये हो जाएगा। वर्तमान में सरकार 31000 करोड़ रुपये खाद्य सब्सिडी पर खर्च कर रही है। इसके अतिरिक्त तीसरे साल देश में कृषि उत्पादों के भंडारण के लिए गोदाम बनाने पर 50000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि की आवश्यकता होगी। खाद्य मंत्री केवी थामस ने कहा था कि इसको लागू करने के लिए करीब 3.5 लाख करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। इसके तहत अब गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों, गरीबी रेखा से ऊपर के परिवारों और अंत्योदय अन्न योजना के तहत आने वाले वर्ग के प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है। इसके विपरीत अब प्राथमिकता वाले और सामान्य उपभोक्ता वर्ग के तहत जनता को बांटा गया है। प्राथमिकता वर्ग में आने वाले गरीबों को एक रुपये प्रति किलो की दर पर मोटा अनाज, दो रुपये किलो के हिसाब से गेहूं और 3 रुपये किलो के हिसाब से चावल दिया जाएगा, जबकि सामान्य उपभोक्ता वर्ग को अनाज के समर्थन मूल्य का 50 फीसदी देना होगा। जिन गरीबों को अनाज दिया जाना है उनकी संख्या सामाजिक आर्थिक जनगणना के नतीजे आने के बाद तय होगी।
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Monday, December 19, 2011
Wednesday, June 1, 2011
मुआवजे का जापानी मॉडल
लेखक भूमि अधिग्रहण के विवादों को समाप्त करने के लिए जापान की व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं...
विकास कायरें के लिए भूमि अधिग्रहण को लेकर देश जल रहा है। दुर्भाग्य है कि सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने निजी कंपनियों के उपयोग के लिए सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण को हरी झंडी दे दी है। भूमि अधिग्रहण का मूल सिद्धांत है कि व्यापक जनहित के लिए निजी हित को छोड़ना होगा। इस दृष्टि से चाणक्य ने राजा को सलाह दी थी कि व्यक्ति को परिवार के लिए, परिवार को गांव के लिए तथा गांव को देश के लिए त्याग देना चाहिए। इस सिद्धांत के अनुसार उत्तर प्रदेश के किसानों को एक्सप्रेस वे बनाने के लिए बेदखल किया जा रहा है, परंतु किसानों का मानना है कि देश हित के लिए नहीं, बल्कि व्यक्ति विशेष के लिए उनकी भूमि ली जा रही है। यानी समस्या भूमि अधिग्रहण के मूल सिद्धांत में नहीं, बल्कि इसके क्रियान्वयन की है। जैसे बच्चे को सब्जी खरीदने बाजार भेजा जाए और वह टॉफी खरीद लाए तो बाहर जाने के सिद्धांत में गड़बड़ी नहीं है, बल्कि समस्या सिद्धांत के अनुरूप कार्य न करने की है। किसी भी सार्वजनिक कार्य के लिए भूमि को अधिग्रहीत किया जा सकता है। सार्वजनिक कार्य क्या है, इसकी व्याख्या करने का अधिकार सरकार को है। अत: सरकार यदि कहती है कि लाख लोगों को बेदखल करके एक बिल्डर को भूमि देना सार्वजनिक हित में है तो न्यायालय इसमें दखल नहीं करता है। एक दृष्टि से यह सही भी है। सरकार यदि कानून का दुरुपयोग करेगी तो जनता में आक्रोश फैलेगा और अगले चुनाव में सत्ता बदल जाएगी। बंगाल की वामपंथी सरकार ने सिंगुर और नंदीग्राम में ऐसा ही किया था, जिसका परिणाम उन्हें भोगना पड़ रहा है, परंतु सार्वजनिक हित निर्धारित करने का यह रास्ता कष्टप्रद है। इस रास्ते निर्णय लेने में बहुत नुकसान होता है। जैसे हिटलर ने सार्वजनिक हित की गलत व्याख्या की और उसे परिणाम भुगतना पड़ा। इस प्रक्रिया में लाखों की जान गई और तमाम देश बर्बाद हो गए। अत: सार्वजनिक कार्य की व्याख्या करने का अंतिम और अनियंत्रित अधिकार सरकार को देना अनुचित लगता है, जैसा कि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने सुझाव दिया है। विकल्प है कि भूमि अधिग्रहण केवल सार्वजनिक कार्य के लिए हो। जैसे हाईवे को बनाने के लिए जितनी न्यूनतम भूमि की आवश्यकता हो उतनी ही अधिग्रहीत की जाए। हाईवे के बगल में प्राइवेट प्रापर्टी बनाने के लिए भूमि का अधिग्रहण न किया जाए। इस परिभाषा में सिंगुर में टाटा के कारखाने के लिए अधिग्रहण गैर-कानूनी हो जाएगा, क्योंकि कारखाना लगाना सार्वजनिक कार्य नहीं है यद्यपि इससे सार्वजनिक हित हो सकता है। यमुना एक्सप्रेस वे में भी विवाद समाप्त हो जाएगा, क्योंकि हाईवे के बगल की भूमि वर्तमान भूमिधारक के हाथ में रह जाएगी। इसके मूल्य की वृद्धि से वह लाभान्वित होगा। दूसरा विकल्प है कि भूमि अधिग्रहण कानून को सख्त बना दिया जाए। जापान में भूमि अधिग्रहण के समय अनेक मुआवजे देने पड़ते हैं। उतनी ही जमीन दूसरे स्थान पर खरीदने के लिए पर्याप्त रकम दी जाती है। खेती-व्यापार को स्थानांतरित करने में हुए खर्च की अदायगी की जाती है। उस दौरान कमाए जाने वाले लाभ की क्षति तथा कर्मचारियों को दिए जाने वाले वेतन का भुगतान किया जाता है। भूमि के मूल्य में भविष्य में होने वाली वृद्धि के अंश का भुगतान किया जाता है। सार्वजनिक परियोजना के कारण भूमि के मूल्य में होने वाली वृद्धि का भुगतान होता है। नए स्थान पर खेती-व्यापार जमाने का खर्च दिया जाता है। जापान में भूमि अधिग्रहण कानून सख्त होने के कारण सार्वजनिक कायरें के लिए भी भूमि की अधिकतर खरीद आपसी समझौते से की जाती है। परियोजना के रूप में बदलाव कर दिया जाता है। सत्तर के दशक में नरीता एयरपोर्ट के लिए भूमि अधिग्रहण किया गया। अधिग्रहण का भारी विरोध हुआ। इस विरोध से निपटने में समय लगने के कारण प्रोजेक्ट सात साल विलंब से शुरू हुआ। इसके बाद एयरपोर्ट के विस्तार का प्रश्न उठा। पुन: अधिग्रहण करके नरीता एयरपोर्ट का विस्तार करने के स्थान पर सरकार ने समुद्र पर दूसरा नया कानसाई एयरपोर्ट बनाया। इजरायल में भी अधिग्रहण कानून लगभग इतना ही सख्त है। विशेष बात यह है कि इन परेशानियों के कारण जापान और इजरायल का आर्थिक विकास बाधित नहीं हुआ है। कारण यह कि मुख्य विषय परियोजना के लाभ के वितरण का है। यमुना एक्सप्रेस वे से आर्थिक विकास होगा, यह तय है। विषय है कि भूमि की मूल्य वृद्धि का लाभ हाईवे कंपनी कमाएगी अथवा किसान? देश को दोनों तरह से उतना ही लाभ होगा। भूमि अधिग्रहण को लेकर वर्तमान में जो आक्रोश दिख रहा है उसका मूल कारण है कि विकास के नाम पर गरीब को बेदखल करके लाभ अमीर को पहुंचाया जा रहा है। वर्तमान सरकारें गरीब को बेदखल करके अमीर को लाभ पहंुचा रही हैं। सरकार के इस दुश्चरित्र को नियंत्रित करने के लिए भूमि अधिग्रहण कानून को सुदृढ़ करना चाहिए ताकि इसका दुरुपयोग न हो। सुझाव है कि विकास कार्यो के लिए भूमि की खरीद मुख्यत: बाजार के माध्यम से की जानी चाहिए। परियोजना यदि वास्तव में लाभकारी है तो लाभ के एक बड़े अंश को भूमि विक्रेता को दे दिया जाए तो विवाद समाप्त हो जाएगा। मूल विषय अधिग्रहीत भूमि की कीमत तय करने का है। बाजार के माध्यम से सही कीमत तय हो जाती है, ऐसा अर्थशास्त्र में माना जाता है। वर्तमान में भूमि अधिग्रहण कानून का सहारा सिर्फ इसलिए लिया जा रहा है कि कंपनियां बाजार से कम कीमत पर भूमि का क्रय करना चाहती हैं। दूसरा सुझाव है कि जापान की तर्ज पर भूमि अधिग्रहण कानून को सख्त बना देना चाहिए। तब इसका दुरुपयोग कम होगा। तीसरे, स्पेशल इकोनामिक जोन अथवा जल विद्युत परियोजनाओं जैसे वाणिज्यिक प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण तभी किया जाना चाहिए जब 90 प्रतिशत भूमिधरों ने स्वेच्छा से भूमि विक्रय कर दी हो। 10 प्रतिशत अडि़यल भूमिधारकों के विरुद्ध अधिग्रहण उचित ठहराया जा सकता है, परंतु 90 प्रतिशत के विरुद्ध यह सर्वथा अनुचित है। चौथा सुझाव है कि मुआवजे में भूमि के वर्तमान मूल्य के साथ-साथ भविष्य में पेंशन की व्यवस्था हो। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने कहा है कि रजिस्ट्री किए गए दाम से छह गुना दाम किसानों को दिया जाए। यह संतोषप्रद नहीं है। सात गुना क्यों नहीं अथवा 20 गुना क्यों नहीं। भूमि का दाम अंतत: बाजार को तय करने देना चाहिए। यह भी सभी को ज्ञात है कि प्रापर्टी में काला धन बड़ी मात्रा में लगा रहता है एवं रजिस्ट्री कम दाम पर कराई जाती है। अत: मनमाने ढंग से छह गुना दाम तय करना अनुचित है। (लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
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