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Monday, October 24, 2011

श्रम सुधारों का समय


भारत की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति-सुजुकी इंडिया के मानेसर संयंत्र में 14 दिन से चली आ रही हड़ताल खत्म हो गई है। कंपनी प्रबंधन, कर्मचारी और हरियाणा सरकार के बीच एक त्रिपक्षीय समझौते के बाद यह हड़ताल खत्म हुई। समझौते के तहत प्रबंधन 64 स्थायी कर्मचारियों को वापस लेने पर सहमत हो गया, लेकिन 30 कर्मचारियों का निलंबन जारी रहेगा। तीनों पक्षों में इस बात पर भी सहमति बनी कि 1200 अस्थायी कर्मचारियों को भी बहाल कर दिया जाएगा। शिकायतों के निस्तारण एवं श्रमिकों के कल्याण के लिए दो समितियों के गठन पर भी सहमति बनी ताकि संयंत्र में कार्य के अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराया जा सके। मारुति के 30 साल के इतिहास में सात हड़तालें हो चुकी हैं जिनमें से चार हड़तालें इसी साल हुईं। इस साल मई में मारुति के मानेसर प्लांट के संविदा कर्मचारियों ने अलग यूनियन बनाने की मांग को ठुकराए जाने पर हड़ताल की थी। उनका मानना था कि स्थायी कर्मचारियों की यूनियन की प्रबंधन से मिलीभगत है। पहले दौर की हड़ताल खत्म हुई तो कर्मचारियों को अच्छे आचरण के बांड पर हस्ताक्षर करने को कहा गया। मारुति प्रबंधन का कहना है कि ये अनुशासन संबंधी साधारण शर्ते हैं। दरअसल मारुति में हड़ताल भारतीय श्रम बाजार में श्रमिकों और प्रबंधन के बिगड़ते रिश्तों की कहानी है। प्रतिस्पर्धी कंपनियों को सस्ता श्रम चाहिए। वे ठेकेदारों के माध्यम से सस्ते मजदूरों को प्राथमिकता देते हैं। इन्हें चिकित्सा, बीमा, बचत, विकलांगता कवर जैसी सुविधाएं नहीं देनी पड़तीं। वेतन में भी भारी अंतर रहता है। जैसे मारुति में मुट्ठी भर स्थायी कर्मचारियों को 25,000 रुपये प्रतिमाह दिए जाते हैं जबकि ठेके पर रखे कर्मचारियों को समान काम के लिए 4,500 से 12,000 रुपये मिलते हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की रिपोर्ट के अनुसार देश में कामगारों की संख्या लगभग 46 करोड़ है जिसमें 94 फीसदी असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। अर्थव्यवस्था में अहम योगदान असंगठित कामगार सामाजिक सुरक्षा की सुविधाओं से वंचित है। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों में 90 फीसदी से ज्यादा को आमतौर पर सरकार की ओर से निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से भी कम पैसे मिलते हैं। श्रमिक हितों से संबंधित शायद ही किसी कानून का फायदा इन्हें मिल पाता है। असंगठित क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ी है, लेकिन वे मजदूरी में भेदभाव से लेकर कई तरह के शोषण का शिकार हैं। यही कारण है कि असंगठित कामगार औद्योगिक क्षेत्र में काम करने से हिचकते हैं। दरअसल औद्योगिक समूह अभी भी अनुबंधित श्रम कानूनों को पूरी तरह से समझ नहीं पाए हैं। उद्योग जगत कामगारों के प्रति जवाबदेह नहीं लगता। श्रमिकों को केवल ठेकेदार तक ही सीमित कर दिया गया है जो कानूनों और नियंत्रण से परे है। औद्योगिक इकाई इस बात की जिम्मेदारी नहीं लेती कि ठेकेदार मजदूरों को उचित मजदूरी देते भी हैं या नहीं। देश में श्रमिकों के हित में उठाए गए कदमों का दायरा संगठित क्षेत्र के श्रमिकों तक सीमित रहा है। हालांकि सरकार ने असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए एक राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा कोष के गठन को मंजूरी दी है। 1,000 करोड़ रुपये के इस कोष से संचालित योजनाओं का लाभ उन 43.3 करोड़ श्रमिकों को मिलेगा जो बुनकर, रिक्शा चालक या दिहाड़ी श्रमिक के रूप में काम करते हैं। सरकार ने गरीब परिवारों के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना, असंगठित क्षेत्र के लोगों के लिए वृद्धावस्था पेंशन और स्वावलंबन जैसी कई योजनाएं चलाई हैं, लेकिन जागरूकता के अभाव में आज भी बहुत कम श्रमिक परिवार इन कार्यक्रमों के बारे में जानते हैं। जरूरत के अनुसार इन कार्यक्रमों के लिए धन का आवंटन बहुत कम है। फिर बहुत सारी राशि बिचौलियों और भ्रष्ट कर्मचारियों की जेब में चली जाती है। जरूरत इस बात की है कि देश के श्रम बाजार की नीतियों का निष्पक्ष विश्लेषण हो और ऐसा रास्ता तैयार किया जाए जिसमें श्रम संसाधनों का एकतरफा दोहन न हो। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

मानव विकास में अभी भी काफी पीछे है बिहार


बिहार में आहिस्ता-आहिस्ता ही सही लोगों का जीवन स्तर सुधरने लगा है। योजना आयोग की इंडिया : ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट 2011 में कहा गया है कि केरल, दिल्ली, हिमाचल, गोवा और पंजाब जैसे विकसित राज्यों की तुलना में बिहार मानव विकास के मामले में अभी भी काफी पीछे है। छत्तीसगढ़ और ओडि़सा ही सिर्फ उससे नीचे है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले कुछ वर्षो में बिहार में तेजी से आर्थिक विकास हुआ है, लेकिन मानव विकास इंडेक्स में गरीबी, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छता की सुविधाओं की कमी के कारण यह दिखाई नहीं देता। हालांकि राज्य सरकार की ओर से गरीबी को कम करके इंडेक्स में सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं। जून 2009 तक 40 लाख बीपीएल परिवारों और 24 लाख अंत्योदय परिवारों को राशन कार्ड बांटे गए। 2004 से 2008 के बीच अनुसूचित जाति-जनजाति के कल्याण पर खर्च की राशि दोगुनी हो गई। फिर भी मानव विकास इंडेक्स के मामले में बिहार अन्य राज्यों की तुलना में अभी काफी पीछे है। मानव विकास इंडेक्स के मामले में केरल (0.790) पहले नंबर पर, दिल्ली (0.750) दूसरे नंबर पर और हिमाचल प्रदेश (0.652) तीसरे स्थान पर हैं। सबसे नीचे की पायदान पर छत्तीसगढ़ (0.358) है। उड़ीसा (0.362) के साथ नीचे से दूसरे नंबर पर। बिहार (0.367) का नीचे से तीसरा स्थान है। यह बात जरूर देखने को मिल रही है कि बिहार, ओडि़सा और छत्तीसगढ़ जैसे गरीब राज्यों ने मानव विकास इंडेक्स के मामले में राष्ट्रीय औसत से तेजी के साथ विकास किया है। हालांकि अभी भी ये राज्य इस स्थिति में नहीं पहुंच पाए हैं कि इंडेक्स में कोई उलटफेर कर सके। बिहार में मानव विकास की स्थिति पर नजर दौड़ाए तो स्पष्ट है कि आय, शिक्षा और स्वास्थ्य तीनों क्षेत्रों में विकास हुआ है। शिक्षा के क्षेत्र में रफ्तार कुछ ज्यादा ही तेज है। सर्व शिक्षा अभियान, स्कूलों में बड़ी संख्या में अभियान चलाकर बच्चों का नामांकन, मुख्यमंत्री साइकिल योजना और बालिका पोशाक योजना का रंग शिक्षा के इंडेक्स में साफ-साफ झलक रहा है।

तरक्की कर रहे भारत में भूख और कुपोषण चरम पर


भारत में तेज आर्थिक विकास की तमाम कथाओं के मुकाबले यह कहानी बेहद उलटी, अचरज भरी और भयावह है। पिछले दशक की शानदार ग्रोथ के बावजूद भारत के सभी राज्यों में भूख व कुपोषण चरम पर है। एक भी राज्य ऐसा नहीं है, जो भूख से मुक्त होने के पैमाने के करीब फटकता हो। ऊंची आय वाले गुजरात, पंजाब जैसे राज्य हों अथवा बेहतर सामाजिक विकास वाला केरल, भूख के सूचकांक (हंगर इंडेक्स) पर यह तस्वीर बेहद डरावनी है। भूख-कुपोषण पर मानव विकास रिपोर्ट का रहस्योद्घाटन सनसनीखेज है। रिपोर्ट बताती है कि भारत भूख खत्म करने की लड़ाई हार गया है। सरकारी पैमाना कहता है कि भारत के ग्रामीण इलाकों में किसी व्यक्ति को स्वस्थ ढंग से जीने के लिए कम से 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्र में 2100 कैलोरी चाहिए। योजना आयोग की गरीबी रेखा का बुनियादी पैमाना भी यही है। मगर रिपोर्ट बताती है कि देश के 81 फीसदी ग्रामीण और 57 प्रतिशत शहरी इतना भी नहीं जुटा पाते। कुपोषण की समस्या केवल बच्चों की ही नहीं है, देश के करीब एक तिहाई वयस्क पुरुष व महिलाएं भी कुपोषण का शिकार हैं। इनका वजन (न्यूनतम बॉडी मास इंडेक्स 18.5) निर्धारित पैमाने से कम है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों के मामले में हालत बहुत बुरी है। देश के 46 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। हिमाचल, पंजाब, केरल, सिक्किम, मणिपुर व मिजोरम बच्चों में कुपोषण के मामले में अफ्रीका के निर्धनतम सहारा मरुस्थल के देशों जैसे हैं। मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार हंगर इंडेक्स यानी भूख सूचकांक में न्यूनतम स्तर 9.9 का है। भूख सूचकांक कुपोषण के तीन पैमानों पर आधारित है। किसी राज्य में भूख की स्थिति जानने के लिए नागरिकों में औसत कैलोरी (भोजन से मिलने वाली ऊर्जा) खपत, पांच साल से कम उम्र के बच्चों में कुपोषण, और पांच साल छोटे बच्चों की मृत्यु दर को आधार बनाया जाता है। विकास की ताजा चमक वाला गुजरात इस भूख सूचकांक पर 24.70 फीसदी अंकों के साथ 13वें नंबर पर है, यानी भूख से प्रभावित पांच प्रमुख राज्यों में शामिल है। छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश इससे ज्यादा बुरी हालत में हैं। मध्य प्रदेश भूख सूचकांक में सबसे गंभीर राज्य के तौर पर दर्ज हुआ है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, हरियाणा जैसे राज्यों में भी भयानक भूख व कुपोषण है। कर्नाटक व केरल की 28 फीसदी आबादी कुपोषण का शिकार है, जबकि उत्तर प्रदेश में बाल मृत्यु दर 9 और पंजाब में 5.2 फीसदी है। अनाजों की उपलब्धता में कमी और गैर अनाज की खपत में बढ़ोतरी न होने के रेखांकित करते हुए मानव विकास रिपोर्ट कहती है कि भारत भुखमरी की अपनी बुनियादी चुनौती से अब तक नहीं निबट पाया है।

आपकी सेहत पर सरकार कर रही कंजूसी


स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी ढांचे की लचर स्थिति के बावजूद इस पर सरकारी उपेक्षा खत्म होने का नाम नहीं ले रही। योजना आयोग ने अपने ताजा आकलन में बताया है कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के तहत बड़ी रकम इस क्षेत्र पर खर्च होने के बाद भी स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का सरकार सिर्फ 1.3 फीसदी ही खर्च कर रही है। योजना आयोग ने अपनी मानव विकास रिपोर्ट- 2011 में स्वास्थ्य क्षेत्र की उपेक्षा पर खास ध्यान दिलाया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 1990 में जहां प्रति हजार शिशु में 80 की मौत हो जाती थी, वहीं 2009 में भी यह सिर्फ 50 तक पहुंच सका है। शिशु मृत्यु दर (आइएमआर) को वर्ष 2015 तक 26.7 तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन जिस तरह 20 साल में सिर्फ 30 बिंदुओं की कमी आई है, उसे देखते हुए यह लक्ष्य अब काफी चुनौतीपूर्ण हो गया है। इसी तरह मातृत्व मृत्यु दर (एमएमआर) में वर्ष 2003 से लेकर 2009 के दौरान सिर्फ 89 बिंदुओं की कमी आई है। पहले जहां एक लाख जीवित जन्म पर 301 माताओं की मौत हो रही थी, वहीं अब यह घटकर 212 रह गई, लेकिन 2012 तक इसे 100 तक पहुंचाने के लक्ष्य से यह बहुत दूर है। रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) और जननी सुरक्षा योजना की वजह से संस्थागत प्रसव में तो बढ़ोतरी हुई है। 2006 तक जहां सिर्फ 39 फीसदी महिलाएं ही चिकित्सकीय निगरानी में बच्चे को जन्म दे रही थीं, वहीं 2009 तक यह अनुपात बढ़कर 78 फीसदी हो गया, लेकिन अभी इसे शत प्रतिशत तक पहुंचाना है। इसी तरह कुल प्रजनन दर (टीएफआर) के मामले में नौ राज्यों दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, पंजाब, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ने जरूर वर्ष 2008 तक 2.1 की दर हासिल कर ली है, लेकिन बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे गरीब राज्य में यह दर अब भी तीन से ज्यादा बनी हुई है। अपने देश में अब भी दस हजार की आबादी पर अस्पताल के सिर्फ नौ बिस्तर उपलब्ध हैं। जबकि चीन में यह अनुपात 30 है। इसी तरह भारत में प्रति दस हजार आबादी पर सिर्फ छह डॉक्टर उपलब्ध हैं, जबकि चीन में यह संख्या 14 है। नर्स के मामले में तो यह स्थिति बहुत ही खराब है। जहां विकसित देशों में प्रति सौ-डेढ़ सौ लोगों पर एक नर्स उपलब्ध है, भारत में 1205 लोगों पर एक नर्स है।