भारत में तेज आर्थिक विकास की तमाम कथाओं के मुकाबले यह कहानी बेहद उलटी, अचरज भरी और भयावह है। पिछले दशक की शानदार ग्रोथ के बावजूद भारत के सभी राज्यों में भूख व कुपोषण चरम पर है। एक भी राज्य ऐसा नहीं है, जो भूख से मुक्त होने के पैमाने के करीब फटकता हो। ऊंची आय वाले गुजरात, पंजाब जैसे राज्य हों अथवा बेहतर सामाजिक विकास वाला केरल, भूख के सूचकांक (हंगर इंडेक्स) पर यह तस्वीर बेहद डरावनी है। भूख-कुपोषण पर मानव विकास रिपोर्ट का रहस्योद्घाटन सनसनीखेज है। रिपोर्ट बताती है कि भारत भूख खत्म करने की लड़ाई हार गया है। सरकारी पैमाना कहता है कि भारत के ग्रामीण इलाकों में किसी व्यक्ति को स्वस्थ ढंग से जीने के लिए कम से 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्र में 2100 कैलोरी चाहिए। योजना आयोग की गरीबी रेखा का बुनियादी पैमाना भी यही है। मगर रिपोर्ट बताती है कि देश के 81 फीसदी ग्रामीण और 57 प्रतिशत शहरी इतना भी नहीं जुटा पाते। कुपोषण की समस्या केवल बच्चों की ही नहीं है, देश के करीब एक तिहाई वयस्क पुरुष व महिलाएं भी कुपोषण का शिकार हैं। इनका वजन (न्यूनतम बॉडी मास इंडेक्स 18.5) निर्धारित पैमाने से कम है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों के मामले में हालत बहुत बुरी है। देश के 46 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। हिमाचल, पंजाब, केरल, सिक्किम, मणिपुर व मिजोरम बच्चों में कुपोषण के मामले में अफ्रीका के निर्धनतम सहारा मरुस्थल के देशों जैसे हैं। मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार हंगर इंडेक्स यानी भूख सूचकांक में न्यूनतम स्तर 9.9 का है। भूख सूचकांक कुपोषण के तीन पैमानों पर आधारित है। किसी राज्य में भूख की स्थिति जानने के लिए नागरिकों में औसत कैलोरी (भोजन से मिलने वाली ऊर्जा) खपत, पांच साल से कम उम्र के बच्चों में कुपोषण, और पांच साल छोटे बच्चों की मृत्यु दर को आधार बनाया जाता है। विकास की ताजा चमक वाला गुजरात इस भूख सूचकांक पर 24.70 फीसदी अंकों के साथ 13वें नंबर पर है, यानी भूख से प्रभावित पांच प्रमुख राज्यों में शामिल है। छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश इससे ज्यादा बुरी हालत में हैं। मध्य प्रदेश भूख सूचकांक में सबसे गंभीर राज्य के तौर पर दर्ज हुआ है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, हरियाणा जैसे राज्यों में भी भयानक भूख व कुपोषण है। कर्नाटक व केरल की 28 फीसदी आबादी कुपोषण का शिकार है, जबकि उत्तर प्रदेश में बाल मृत्यु दर 9 और पंजाब में 5.2 फीसदी है। अनाजों की उपलब्धता में कमी और गैर अनाज की खपत में बढ़ोतरी न होने के रेखांकित करते हुए मानव विकास रिपोर्ट कहती है कि भारत भुखमरी की अपनी बुनियादी चुनौती से अब तक नहीं निबट पाया है।
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