सरकार ने जहां माना है कि देश की लगभग 30 फीसदी आबादी अभी भी गरीब है। वहीं उसने गरीबी के पैमाने में और कटौती कर दी है। अब शहरों में रोजाना 28.65 और गांवों में 22.42 रुपये से ज्यादा कमाने वाले को गरीब नहीं माना जाएगा। यह सुप्रीमकोर्ट में सरकार की ओर से दाखिल 32 और 26 रुपये के पैमाने से भी कम है। इससे सामाजिक संगठन और भड़क सकते हैं। गरीबों की संख्या पर योजना आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2009-10 में 29.8 फीसदी जनता गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही थी। दूसरे शब्दों में कहे तो 35.47 करोड़ जनता औसतन 26 रुपये रोजाना पर गुजारा कर रही है। यह स्थिति तब है जब 2009-10 के पिछले पांच वर्षो तक देश की आर्थिक विकास दर आजादी के बाद सबसे तेज रही है। तेंदुलकर समिति के फार्मूले पर तैयार इस रिपोर्ट के मुताबिक, 2004-05 में देश में गरीबों की संख्या 40.72 करोड़ थी जो 09-10 में 35.46 करोड़ हो गई है। दूसरे शब्दों में तब 37.2 फीसदी आबादी गरीब थी जिनकी संख्या घट कर 29.8 फीसदी हो गई है। ये आंकड़े यह भी बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम को ज्यादा सफलता मिली है क्योंकि ग्रामीण गरीबों की संख्या में 8 फीसदी की गिरावट हुई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में 4.8 फीसदी गरीब कम हुए हैं। योजना आयोग के आंकड़े कई अहम तथ्य उजागर करते हैं जो आने वाले दिनों सरकार के नीति निर्धारण में काफी जरूरी साबित हो सकते हैं। मसलन अनुसूचित जनजाति (एसटी) की 47.4 फीसदी आबादी अभी भी गरीबी रेखा के नीचे रहती है। गांवों में 42.3 फीसदी अनुसूचित जाति (एससी), 31.9 फीसदी अन्य पिछड़ी जाति के लोग गरीब है। शहरी इलाकों में भी लगभग यही स्थिति है। बिहार और छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में दो तिहाई एससी व एसटी गरीबी रेखा के नीचे हैं। योजना आयोग का यह आकलन एक तरह से यूपीए-वन के कार्यकाल की सीधी समीक्षा है। यूपीए-एक ने जून, 2004 में कार्यकाल संभाला था। उसके बाद के पांच वर्षो तक देश की आर्थिक विकास दर क्रमश: 6.9 फीसदी, 9.5 फीसदी, 9.6 फीसदी, 9.3 फीसदी और 6.8 फीसदी रही है। इस दौरान आबादी में 4.26 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा के उपर लाने में सफलता हासिल हुई है। इस तरह से देखा जाए तो अगर अगले चार दशकों तक नौ फीसदी या इससे ज्यादा की आर्थिक विकास दर हासिल की जाती है तब जा कर अगले तीन से चार दशकों के बीच गरीबी का खात्मा हो सकेगा।
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