वामपंथियों और समाजवादियों के दबाव के कारण ही संप्रग-1 सरकार ने मुसलमान समाज की समस्या का अध्ययन करने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र सच्चर की अध्यक्षता में 9 मार्च, 2005 को एक आयोग का गठन किया। आयोग ने 17 नवंबर, 2006 को अपनी रिपोर्ट शासन को दी और शासन ने 30 नवंबर, 2006 को संसद के दोनों सदनों में रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट से मुस्लिम समाज के बारे में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए जैसे मुसलमानों की साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से पांच फीसदी कम है। छह वर्ष से लेकर 14 वर्ष के आयुवर्ग के मुस्लिम बच्चों में से 25 फीसदी कभी स्कूल गए ही नहीं। जो बच्चे स्कूल जाते भी हैं, वे जल्द ही स्कूल छोड़ देते हैं। हाईस्कूल तक जाते-जाते फेल होने वाले बच्चों में भी मुस्लिम लड़कियां अव्वल हैं। मुश्किल से चार फीसदी मुस्लिम बच्चे ग्रेजुएशन कर पाते हैं क्योंकि इनकी बस्तियों में या आस-पास अच्छे स्कूलों की कमी है। अधिकांश मुसलमान बच्चे सरकारी स्कूल की जगह मदरसे में जाना पसंद करते है। पढ़ाई-लिखाई के अभाव में स्वत: रोजगार तलाशना इनकी मजबूरी है। इसलिए पूरे देश में वेंडर अथवा हॉकर का काम करने वालों में 12 प्रतिशत मुस्लिम हैं। 16 प्रतिशत किसी दुकान में काम करते हैं और 70 फीसदी महिलाएं घरेलू कार्य में रत हैं। नियमित वेतन वाली नौकरियों में मुसलमानों की हिस्सेदारी न के बराबर है। इसीलिए ग्रामीण क्षेत्र में गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाली आबादी में 38 फीसदी और शहरी क्षेत्र में 27 फीसदी मुसलमान हैं। ग्रामीण हलकों में 40 प्रतिशत बड़ी मुस्लिम बस्तियों के आस-पास स्वास्थ्य सेवाएं नगण्य हैं। इतनी दुर्दशा के निदान का उपाय उसी सरकार द्वारा नियुक्त एक दूसरे कमीशन ने सुझाया। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस रंगनाथ मिश्रा ने संस्तुति की कि मुसलमानों की दशा सुधारने के लिए सरकारी नौकरियों में इनकी आबादी के समतुल्य आरक्षण किया जाए। उनका कहना है कि भारत के संविधान में सरकारी नौकरियों में 50 से अधिक आरक्षण की व्यवस्था पर प्रतिबंध है और अल्पसंख्यक के नाम से भारतीय संविधान के किसी वर्ग के लिए जगह आरक्षित करने की गुजांइश नहीं है। आरक्षण के लिए जो भी संवैधानिक प्रावधान हैं वे अनुसूचित जनजाति तथा पिछड़े वर्गो के लिए हैं। इसलिए अल्पसंख्यक वर्ग की दयनीय दशा को देखते हुए आरक्षण के विस्तार की आवश्यकता है जो संविधान में संशोधन करके ही दिया जा सकता है। कमीशन के अनुसार अल्पसंख्यकों का अलग से 15 फीसदी आरक्षण होना चाहिए, जिसमें 10 फीसदी मुसलमानों का हो। भारत के पांच प्रमुख राज्यों की चुनाव घोषणा की प्रथम संध्या पर सरकार ने सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लिए 27 फीसदी आरक्षण के ही कोटे से अल्पसंख्यक समाज के पिछडे़ वर्ग के लिए 4.5 फीसदी आरक्षण का आदेश प्रसारित कर दिया। यदि मंडल आयोग की संस्तुतियों को देखा जाए तो पिछड़ी जातियों की कुल संख्या संपूर्ण आबादी की 52 प्रतिशत है। इसमें हिंदू, मुसलमान, इसाई, सिख, बौद्ध, जैन, सभी वगरें की पिछड़ी जातियां शामिल हैं। उनकी संस्तुति में इन सभी वगरें के पिछड़ों को आरक्षण की परिधि में लाकर 27 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही गई थी। अब उसी आरक्षण में से 4.5 प्रतिशत आरक्षण अल्पसंख्यक समाज को दे देना समझ से परे है। इस आरक्षण का लाभ अत्यधिक पिछड़े मुस्लिम समाज के बच्चे कैसे उठा सकेंगे? इसका अधिकांश लाभ इसाइयों और बौद्धों को मिलेगा। सरकार ने बहुत ही चालाकी के साथ चुनाव की पूर्व संध्या पर मुस्लिम समाज को नए सिरे से ठगने का काम किया है ताकि वह पंजाब की चुनावी रैलियों आरक्षण को सिखों के लिए बता सके, उत्तर-प्रदेश के चुनावी भाषण में मुसलमान एजेंडे में रहेगा और गोवा में इसाई समाज के लिए आरक्षण की घोषणा की जाएगी। हमेशा की तरह कांग्रेस की यह बाजीगरी मुसलमान समाज को कभी राहत नहीं दे सकती। कांग्रेस ने इस समाज को हमेशा वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया है। 1990 में जब वीपी सिंह की सरकार ने सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गो के लिए 27 फीसदी आरक्षण का आदेश निकाला था, तो इसका सबसे जोरदार विरोध कांग्रेस ने ही किया था। राजीव गांधी ने संसद में विपक्ष के नेता की हैसियत से 6 सितंबर, 1990 को जोरदार भाषण दिया था और उसमें मंडल आयोग की संस्तुतियों को खत्म कर देने की मांग की थी। उन्होंने बार-बार इस बात पर बल दिया कि आरक्षण के कानून का मकसद केवल एक जाति है। आज के मंत्री राजीव गांधी के उन भाषणों को नए सिरे सुनें तो उन्हें शर्मिंदगी होगी कि हमारे नेता ने आरक्षण का विरोध किया। आज उनके शिष्यगण आज के अल्पसंख्यक समाज को ठगने के लिए मंडल कमीशन की संस्तुति को इस्तेमाल कर रहे हैं। 1977 में जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश, बिहार की सरकारों ने 15 फीसदी आरक्षण का इंतजाम पिछड़े वगरें के लिए किया था, जिसमें मुस्लिम जातियां भी शामिल थीं। इस आरक्षण की व्यवस्था के बावजूद मुसलमानों की स्थिति लगातार बिगड़ती ही गई। यदि सरकार में इस बड़े अल्पसंख्यक समाज की तरक्की के लिए थोड़ी भी इच्छाशक्ति है तो सच्चर और मिश्रा कमीशन की संस्तुतियों के अनुसार कार्य करे। मंडल आयोग और छेदीलाल आयोग तो मूलत: पिछड़े वगरें के लिए बने थे। उन आयोगों की तरफ ताकने के बजाय सरकार मुस्लिमों के कल्याण के लिए कुछ ठोस उपाय करे। (लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं)
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