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Monday, April 16, 2012

जल के निजीकरण के खतरे


केंद्रीय जल संसाधन मंत्री पवन कुमार बंसल ने यह कहकर चौंका दिया है कि सरकार पानी के निजीकरण पर विचार कर रही है। राष्ट्रीय जल नीति इस माह के अंत तक घोषित कर दी जाएगी। बंसल के मुताबिक जल संसाधन मंत्रालय ने जल नीति का मसौदा कई माह पहले तैयार कर लिया था। इस बारे में लगातार विशेषज्ञों और संबंधित लोगों से चर्चा हो रही है। नीति का जो मसौदा विशेषज्ञों को दिया गया था, वह इस अहम संसाधन के निजीकरण की जोरदार वकालत करता है। इसके अनुसार जल वितरण कार्य में सरकार की कोई एजेंसी शामिल नहीं होनी चाहिए। यह कितनी बड़ी त्रासदी है कि पानी हमारा होगा, सप्लाई प्रणाली एवं उपकरण भी हमारे होंगे और उसकी पंपिंग कर देसी या विदेशी कंपनियां देश से भारी भरकम मुनाफा कमाकर अपने खजाने भरेंगी। कर्नाटक की राजधानी बेंगलूर का नगर निगम अपने नागरिकों को जल आपूर्ति का काम ठीक से नहीं कर पा रहा है। अब वह जल आपूर्ति के लिए फ्रांस की दो फर्मो विवेंडी और इसकी सहयोगी ओंदियो के साथ समझौता करने जा रहा है। अगर यह समझौता हो गया तो बेंगलूर नगर निगम को इन फर्मो को पांच साल तक प्रतिवर्ष 135 करोड़ रुपये शुल्क देना होगा, जबकि नगर निगम की वार्षिक आय मात्र 276 करोड़ रुपये है। सितंबर 2000 में बेंगलूर वाटर बोर्ड ने विवेंडी वॉटर ग्रुप तथा नार्थम्बेरियन वाटर ग्रुप को प्रयोग के तौर पर अपने एक वाटर सप्लाई प्रोजेक्ट का कार्य सौंपा था। इसमें 10 लाख लोगों को पेयजल की आपूर्ति की जानी है। अगर यह योजना सफल हो जाती है तो इसके बाद इन विदेशी कंपनियों से 30 साल तक समझौता किया जाएगा। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विदेशी संस्थानों के हाथ में पेयजल आपूर्ति का कार्य पूरी तरह आ गया तो फिर जल शुल्क तीन गुने हो जाएंगे। पैसे नहीं तो प्यासे रहिए भारत में मीठे जल का भी सबसे बड़ा भंडार है। पिछले कई वर्षो से कॉरपोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नजर इसी जल पर लगी हुई है। वे जानते हैं कि इसकी मार्केटिंग में कमाई की अपार संभावना है। उनकी नजर में यह नीला सोना है और आने वाले दिनों में इसका महत्व जमीन के नीचे से निकलने वाले कच्चे तेल से भी ज्यादा होगा। इसलिए 70 के दशक से शुरू हुए इस प्रयास में पहले जल वितरण की टेक्नोलॉजी से कमाई की गई। फिर जल शोधन के यंत्र बेचे गए। अब पानी के अधिकार पर उनकी निगाहें लगी हैं, लेकिन सरकारें पानी की आपूर्ति को बिजली या टेलीफोन की तरह निजी हाथों में नहीं सौंप सकतीं और न ही उस तरह से इसकी लागत और खर्च के हिसाब जोड़ सकती हैं। लोकतांत्रिक सरकारें तो बिल्कुल ही नहीं। बहुराष्ट्रीय कंपनियां पानी को जीवन के लिए आवश्यक मानती हैं, लेकिन उनकी नजर में किसी चीज का जीवन के लिए आवश्यक होने का मतलब यह नही है कि उसका व्यापार नहीं हो सके और उससे मुनाफा न कमाया जा सके। पानी जीवन के लिए आवश्यक है, तब भी वह बाजार का माल होगा। इसी प्रस्ताव से स्वयंसेवियों के कान खड़े हुए हैं। वे पानी को हर व्यक्ति का बुनियादी अधिकार मानते हैं। उसे खरीदने और बेचने का मतलब है, जिसके पास खरीदने की ताकत नहीं है, उसका पानी से वंचित होना। क्या किसी सरकार या व्यवस्था को ऐसा करने का अधिकार है? क्या सरकारें हवा और पानी जैसे नैसर्गिक संसाधनों का स्वामित्व किसी को सौंपने का अधिकार रखती हैं? क्या ऐसे प्राकृतिक संसाधनों पर हर प्राणी का बुनियादी हक नहीं है? असल में तो यह सारी खुराफात ही बाजारवादी ताकतों की है। अब अगर एक गरीब परिवार की आय तीन हजार रुपये मासिक हो तो वह एक हजार या 900 रुपये तक पानी का बिल कहां से भरेगा और फिर बिल देने के बाद उनके पास क्या बचेगा। यदि कोई लोक कल्याणकारी राज्य अपने नागरिकों को पानी भी मुहैया नहीं करा सकता है तो उसके सत्ता में होने का क्या मतलब हो सकता है? हमारे देश में पानी को लेकर दोहरा संकट है। एक तो कई इलाकों में पानी की कमी है। दूसरे, जो पानी उपलब्ध है, वह भी पीने लायक नहीं है। पेयजल का संकट धीरे-धीरे गंभीर रूप धारण करता जा रहा है। इसका अंदाजा चुनाव के दौरान अनेक निर्वाचन क्षेत्रों में पानी का सवाल उठने से भी लगाया जा सकता है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में पानी को लेकर जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। पश्चिम बंगाल में भी यही हाल है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में भी विधानसभा के चुनाव का प्रमुख मुद्दा पानी और बिजली ही रहा है। राजस्थान में भी सूखे और अकाल से न निपट पाने के मुद्दे पर सरकारें चली जाती हैं। आज यह कहना मुश्किल है कि कौन-सा क्षेत्र जल संकट से मुक्त है। सच तो यह है कि अभी तक न तो केंद्र और न ही राज्य सरकारों ने इस पर गंभीरता से ध्यान दिया है। उधर कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियां पानी को व्यापार की वस्तु बनाने में जुट गई हैं। पिछले साल मार्च में क्योटो में हुए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में पानी को जीवन के लिए आवश्यक वस्तु कहा गया। तीसरी दुनिया के देशों में विकसित देशों की तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी अपने कचरों को नदियों में बहाकर जल को प्रदूषित कर रही हैं। यह एक साजिश भी हो सकती है और खतरनाक लापरवाही भी, लेकिन इसका नतीजा भारत जैसे देशों में रहने वाले लोगों को भुगतना पड़ रहा है। पानी की गुणवत्ता के मामले में दुनिया के 122 देशों में भारत का नाम तीन सबसे प्रदूषित पानी वाले देशों में शामिल है। विषैली होती नदियां गंगा सहित देश की तमाम नदियां प्रदूषण के कारण खतरनाक रोगों का स्रोत बनती जा रही हैं। दिल्ली में यमुना का पानी इस कदर जहरीला हो चुका है कि उसमें मछलियां तो दूर, वनस्पतियां तक जिंदा नहीं रह सकतीं। हर रोज दिल्ली के पास गुजरते समय एक अरब लीटर तरल कचरा यमुना में घुल जाता है। भारतीय जल के नमूनों में आर्सेनिक, बेंजीन और सीसे की खतरनाक मात्रा पाई जाती है। इन रसायनों के यौगिक उपभोक्ता की आयु कम करने के अलावा कैंसर जैसी बीमारियों को जन्म दे सकते हैं। हैजा, पेचिस जैसी साधारण बीमारियों के साथ-साथ वे दिमागी और अनुवांशिक रोगों को भी जन्म दे सकते हैं। देश में जितने बच्चों की मौत प्रदूषित पानी के कारण होती है, उतनी किसी और पदार्थ के उपभोग से नहीं होती है। सरकार द्वारा साफ और सुरक्षित पेयजल की आपूर्ति नहीं करने के कारण ही आज उपभोक्ता पानी स्वच्छ करने वाले उपकरणों, बोतलबंद पेयजल और शीतलपेय पर पैसा खर्च करने के लिए मजबूर हुआ है। सत्ता में आने से पहले हर सरकार पानी की समस्या को हल करने का दावा करती है, पर समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। कल-कारखानों के कचरे के पानी में मिल जाने के कारण पानी में क्लोरीन डालकर उसे साफ करने का तरीका अब बेकार ही नहीं, घातक हो गया है। एक तो क्लोरीन अमीबा पेचिस के जीवाणु नष्ट नहीं कर सकती। दूसरे, यह औद्योगिक कचरे में मौजूद कार्बनिक रसायनों के साथ मिलकर क्लोरोफार्म सहित छह कैंसरजनक तत्व पैदा करती है। लिहाजा, नदियों में औद्योगिक कल-कारखानों और शहरों की आबादी का गंदा पानी नदियों में डालने की परंपरा बंद नहीं हुई तो देशवासियों का जीवन अगले तीस-चालीस सालों के भीतर ही घनघोर संकट में पड़ जाएगा। आज भारत में कोई नदी ऐसी नहीं है, जिसका जल प्रदूषित नहीं हो। वास्तव में इतना अधिक विदेशों से कर्ज लेने के बाद भी भारत अपने नागरिकों को पीने का साफ पानी भी उपलब्ध नहीं करा सका है। देश के नगरों में जगह-जगह शराब की दुकानें तो खुल गई हैं, लेकिन साफ पानी की हम व्यवस्था नहीं कर सके हैं। बल्कि पानी को गंदा कर हमने शराब तैयार की है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Thursday, December 29, 2011

कहां है मजबूत लोकपाल

अन्ना हजारे भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए एक मजबूत लोकपाल की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन लोकसभा में सरकार ने जो लोकपाल विधेयक पारित कराया है, उससे ऐसी उम्मीद नहीं है। हालांकि लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने का उसका प्रस्ताव गिर गया है। इसलिए अब उसे नए सिरे से लोकपाल विधेयक को फिर लोकसभा में लाना पड़ेगा। अन्ना चाहते हैं कि सरकार ऐसा मजबूत लोकपाल कानून बनाए, जिसके तहत आम जनता भ्रष्टाचार की शिकायत कर सके और लोकपाल भ्रष्ट कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई कर सके। अन्ना यह भी चाहते हैं कि इन कर्मचारियों में लेखपाल, ग्राम विकास अधिकारी और थाने के पुलिसकर्मियों के स्तर तक के कर्मचारियों को भी शामिल किया जाए ताकि जनता को उनके भ्रष्टाचार से बचाया जा सके। आमतौर पर जनता का सरकार के छोटे कर्मचारियों और बाबुओं से पाला पड़ता है और जब भी वह किसी काम से इनके पास जाता है तो बिना रिश्वत के उसका काम नहीं होता है, लेकिन सरकार इन कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में नहीं लाना चाहती है। सरकार यह भी नहीं चाहती है कि सीबीआइ को लोकपाल के अधीन लाया जाए या लोकपाल की कोई स्वतंत्र जांच एजेंसी हो। सरकार लोकपाल की नियुक्ति और उसे हटाने का अधिकार भी किसी पारदर्शी व्यवस्था के बजाय अपने हाथ में रखना चाहती है। अन्ना हजारे और सरकार के बीच टकराव का यही मूल कारण है। अब उन्होंने कहा कि वह आगामी पांच राज्यों के विधानसभा के चुनावों में जनता के पास जाएंगे और लोकपाल का विरोध करने वाले जनप्रतिनिधियों को हराने की अपील करेंगे। लेकिन संप्रग सरकार के मंत्री और नेता मजबूत और अधिकार संपन्न लोकपाल लाने के बजाए एक कमजोर लोकपाल बिल को लोकसभा से पास कराया है, जिसकी बागडोर हमेशा सरकार के हाथ में रहेगी। ऐसे लोकपाल से मंत्रियों के भ्रष्टाचार की जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती है। कांगे्रस के नेता शुरू से ही भ्रम पैदा करने वाले बयान देते रहे हैं। कभी वह अन्ना को ही भ्रष्ट, भगौड़ा या संघ का एजेंट बताते हैं तो कभी उनकी टीम के सदस्यों पर लांछन लगाते हैं। कांग्रेस के नेता कहते हैं कि अन्ना कर्नाटक या उत्तर प्रदेश अथवा मध्य प्रदेश सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ जाकर आंदोलन क्यों नहीं करते हैं? पर अन्ना जिस लोकपाल कानून की मांग कर रहे हैं, अगर वह लागू कर दिया जाए तो केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्तों को वह अधिकार मिल जाएगा, जिससे भ्रष्टाचार पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकती है। इस कानून को राज्य नहीं, बल्कि केंद्र सरकार को बनाना है। इसलिए अन्ना केंद्र सरकार से यह मांग कर रहे हैं। वह लोकशाही में जनता जनार्दन को ही सबसे ऊपर मानते हैं। इसीलिए वह जनांदोलन के जरिये सरकार पर कानून बनाने के लिए दबाव बना रहे हैं। पर सरकार तरह-तरह के बहाने करके मजबूत लोकपाल बनाने से बचना चाहती है। संप्रग की सरकार लोकपाल बिल की ड्रॉफ्टिंग से लेकर उसके निर्माण की सारी प्रक्रियाओं में जनता की मांग की उपेक्षा करती रही है। यहां तक कि संसद में पारित प्रस्तावों को भी स्थाई समिति में कांग्रेस के सदस्यों ने विरोध किया है। लोकसभा में पेश विधेयक में सीबीआइ को लोकपाल के दायरे से बाहर रखना दर्शाता है कि विधेयक कितना बेकार है। कमजोर सरकारी विधेयक भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में उन गरीबों की मदद नहीं करेगा, जो रिश्वतखोरी से सबसे ज्यादा पीडि़त हैं, जिन्हें कोई भी काम कराने के एवज में घूस देनी पड़ती है। सरकार सीबीआइ को नियंत्रण से इसलिए मुक्त नहीं करना चाहती, क्योंकि ऐसा करते ही कई मंत्री जेल की हवा खाने लगेंगे। इस बिल में 90 फीसदी नेताओं और 95 फीसदी सरकारी कर्मचारियों, राजनीतिक दलों और कंपनियों को बाहर रखा गया है, लेकिन मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे, महिला मंडल, रामलीला कमेटियां, दुर्गा पूजा कमेटियां, युवा क्लब, खेल क्लब, प्रेस क्लब, मजदूर, किसान संगठन आदि इसके तहत रख दिए गए हैं। लोकपाल सदस्यों को हटाने और निलंबित करने पर सरकार का ही नियंत्रण होगा। बिल के प्रावधान सीबीआइ को भी कमजोर करने वाले हैं। सीबीआइ से पूछताछ और अभियोजन का अधिकार छीनकर उसे टुकडे़-टुकड़े कर निष्कि्रय किया जा रहा है। सीबीआइ निदेशक की चयन समिति में पीएम, नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश को रखा गया है। दोनों ही नेताओं के खिलाफ सीबीआइ से जांच की उम्मीद कैसे की जाएगी। ऐसे में वे क्यों चाहेंगे कि कोई सशक्त व्यक्ति इस पद पर आए। जैसा बिल बनाया गया है, उससे लगता है कि जान-बूझकर भ्रष्टाचारियों को बचाने की पूरी व्यवस्था की गई है। लोकसभा में पारित विधेयक के कानून बन जाने के बाद सीबीआइ पूरी तरह से निष्कि्रय हो जाएगी। आज सीबीआइ पूछताछ, जांच, अभियोजन खुद करती है। अब सीबीआइ से पूछताछ और अभियोजन को छीना जा रहा है तो सीबीआइ के टुकड़े-टुकड़े करके उसे निष्कि्रय बनाया जा रहा है। ग्रुप सी और डी कर्मचारी पूरी तरह से लोकपाल के दायरे के बाहर है। ग्रुप सी और डी कर्मचारियों के मामले में लोकपाल केवल पोस्ट ऑफिस की तरह सारी शिकायतें सीवीसी को भेजेगा। सीवीसी पर लोकपाल का किसी भी तरह से नियंत्रण नहीं होगा। नियंत्रण के नाम पर सीवीसी लोकपाल को केवल त्रैमासिक रिपोर्ट भेजेगा। सीवीसी के 232 कर्मचारी 57 लाख ग्रुप डी के भ्रष्टाचार की तहकीकात कैसे करेंगे? यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है? इस बिल की एक बड़ी विडंबना यह है कि ग्रुप सी और डी के अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन कौन करेगा, इस पर बिल मौन है। आजादी के बाद पहली बार भ्रष्टाचार के मुकदमे में भ्रष्टाचारी अफसरों और नेताओं को मुफ्त में वकील सरकार मुहैया कराएगी और उन्हें हर तरह की कानूनी सलाह देगी। शिकायतकर्ता के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के लिए आरोपी अधिकारी और नेता को सरकार मुफ्त में वकील मुहैया कराएगी। भ्रष्ट अधिकारी के खिलाफ तो शिकायत होने के बाद जांच होगी और शिकायत के लगभग दो साल बाद मुकदमा होगा, लेकिन शिकायतकर्ता के खिलाफ मुकदमा शिकायत करने के अगले दिन ही जारी हो जाएगा। भ्रष्ट अधिकारियों को निकालने की ताकत लोकपाल को नहीं, बल्कि उसी विभाग के मंत्री की होगी। आज तक जो मंत्री भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच के आदेश नहीं देते थे, क्या वे भ्रष्ट अधिकारियों को नौकरी से निकालेंगे? अगर लोकपाल के कर्मचारी भ्रष्ट हो गए तो क्या होगा? सरकारी बिल कहता है कि लोकपाल खुद ऐसे मामलों की जांच करेगा। प्रश्न उठता है कि क्या लोकपाल खुद अपने ही कर्मचारियों के खिलाफ एक्शन लेगा? जन लोकपाल में सुझाव दिया गया था कि लोकपाल के कर्मचारियों की शिकायत के लिए एक स्वतंत्र शिकायत प्राधिकरण बनाया जाए। सरकार ने इसे नामंजूर कर दिया है। टीम अन्ना ने यह भी कहा था कि लोकपाल की कार्यप्रणाली पूरी तरह पारदर्शी हो। इसके साथ ही हर मामले की जांच पूरी होने के बाद उससे संबंधित सभी रिकॉर्ड वेबसाइट पर डाले जाएं। ऐसा नहीं होने पर यह भ्रष्टाचार का अड्डा बन जाएगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को संरक्षण देने की बात इस बिल में कहीं नहीं की गई है। कांग्रेस के सांसद और प्रवक्ता यह बात कई बार कह चुके हैं कि सरकार एक सशक्त लोकपाल बिल जाएगी और भ्रष्टाचार के खिलाफ उसकी जंग जारी रहेगी, लेकिन संसद की स्थायी समिति में उसके सदस्यों ने जिस तरह से अपने रुख को बदला उससे उसके इरादों पर सवाल खड़े हो गए हैं। संसद ने अगस्त में सर्वसम्मति से जो प्रस्ताव पारित कराया था, उसमें समूची नौकरशाही को लोकपाल के दायरे में लाने की बात कही गई थी। उसी प्रस्ताव के बाद अन्ना हजारे ने अनशन खत्म करने का फैसला किया था, लेकिन स्थाई समिति में कांग्रेस के सदस्यों का व्यवहार एकदम उल्टा रहा है। समिति की आखिरी बैठक में आम राय से यह तय हुआ था कि ग्रुप सी के बाबुओं को लोकपाल के दायरे में रखा जाएगा, लेकिन इसके दूसरे ही दिन समिति के कांग्रेसी सदस्य इस बात से पलट गए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)