अन्ना हजारे भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए एक मजबूत लोकपाल की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन लोकसभा में सरकार ने जो लोकपाल विधेयक पारित कराया है, उससे ऐसी उम्मीद नहीं है। हालांकि लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने का उसका प्रस्ताव गिर गया है। इसलिए अब उसे नए सिरे से लोकपाल विधेयक को फिर लोकसभा में लाना पड़ेगा। अन्ना चाहते हैं कि सरकार ऐसा मजबूत लोकपाल कानून बनाए, जिसके तहत आम जनता भ्रष्टाचार की शिकायत कर सके और लोकपाल भ्रष्ट कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई कर सके। अन्ना यह भी चाहते हैं कि इन कर्मचारियों में लेखपाल, ग्राम विकास अधिकारी और थाने के पुलिसकर्मियों के स्तर तक के कर्मचारियों को भी शामिल किया जाए ताकि जनता को उनके भ्रष्टाचार से बचाया जा सके। आमतौर पर जनता का सरकार के छोटे कर्मचारियों और बाबुओं से पाला पड़ता है और जब भी वह किसी काम से इनके पास जाता है तो बिना रिश्वत के उसका काम नहीं होता है, लेकिन सरकार इन कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में नहीं लाना चाहती है। सरकार यह भी नहीं चाहती है कि सीबीआइ को लोकपाल के अधीन लाया जाए या लोकपाल की कोई स्वतंत्र जांच एजेंसी हो। सरकार लोकपाल की नियुक्ति और उसे हटाने का अधिकार भी किसी पारदर्शी व्यवस्था के बजाय अपने हाथ में रखना चाहती है। अन्ना हजारे और सरकार के बीच टकराव का यही मूल कारण है। अब उन्होंने कहा कि वह आगामी पांच राज्यों के विधानसभा के चुनावों में जनता के पास जाएंगे और लोकपाल का विरोध करने वाले जनप्रतिनिधियों को हराने की अपील करेंगे। लेकिन संप्रग सरकार के मंत्री और नेता मजबूत और अधिकार संपन्न लोकपाल लाने के बजाए एक कमजोर लोकपाल बिल को लोकसभा से पास कराया है, जिसकी बागडोर हमेशा सरकार के हाथ में रहेगी। ऐसे लोकपाल से मंत्रियों के भ्रष्टाचार की जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती है। कांगे्रस के नेता शुरू से ही भ्रम पैदा करने वाले बयान देते रहे हैं। कभी वह अन्ना को ही भ्रष्ट, भगौड़ा या संघ का एजेंट बताते हैं तो कभी उनकी टीम के सदस्यों पर लांछन लगाते हैं। कांग्रेस के नेता कहते हैं कि अन्ना कर्नाटक या उत्तर प्रदेश अथवा मध्य प्रदेश सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ जाकर आंदोलन क्यों नहीं करते हैं? पर अन्ना जिस लोकपाल कानून की मांग कर रहे हैं, अगर वह लागू कर दिया जाए तो केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्तों को वह अधिकार मिल जाएगा, जिससे भ्रष्टाचार पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकती है। इस कानून को राज्य नहीं, बल्कि केंद्र सरकार को बनाना है। इसलिए अन्ना केंद्र सरकार से यह मांग कर रहे हैं। वह लोकशाही में जनता जनार्दन को ही सबसे ऊपर मानते हैं। इसीलिए वह जनांदोलन के जरिये सरकार पर कानून बनाने के लिए दबाव बना रहे हैं। पर सरकार तरह-तरह के बहाने करके मजबूत लोकपाल बनाने से बचना चाहती है। संप्रग की सरकार लोकपाल बिल की ड्रॉफ्टिंग से लेकर उसके निर्माण की सारी प्रक्रियाओं में जनता की मांग की उपेक्षा करती रही है। यहां तक कि संसद में पारित प्रस्तावों को भी स्थाई समिति में कांग्रेस के सदस्यों ने विरोध किया है। लोकसभा में पेश विधेयक में सीबीआइ को लोकपाल के दायरे से बाहर रखना दर्शाता है कि विधेयक कितना बेकार है। कमजोर सरकारी विधेयक भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में उन गरीबों की मदद नहीं करेगा, जो रिश्वतखोरी से सबसे ज्यादा पीडि़त हैं, जिन्हें कोई भी काम कराने के एवज में घूस देनी पड़ती है। सरकार सीबीआइ को नियंत्रण से इसलिए मुक्त नहीं करना चाहती, क्योंकि ऐसा करते ही कई मंत्री जेल की हवा खाने लगेंगे। इस बिल में 90 फीसदी नेताओं और 95 फीसदी सरकारी कर्मचारियों, राजनीतिक दलों और कंपनियों को बाहर रखा गया है, लेकिन मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे, महिला मंडल, रामलीला कमेटियां, दुर्गा पूजा कमेटियां, युवा क्लब, खेल क्लब, प्रेस क्लब, मजदूर, किसान संगठन आदि इसके तहत रख दिए गए हैं। लोकपाल सदस्यों को हटाने और निलंबित करने पर सरकार का ही नियंत्रण होगा। बिल के प्रावधान सीबीआइ को भी कमजोर करने वाले हैं। सीबीआइ से पूछताछ और अभियोजन का अधिकार छीनकर उसे टुकडे़-टुकड़े कर निष्कि्रय किया जा रहा है। सीबीआइ निदेशक की चयन समिति में पीएम, नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश को रखा गया है। दोनों ही नेताओं के खिलाफ सीबीआइ से जांच की उम्मीद कैसे की जाएगी। ऐसे में वे क्यों चाहेंगे कि कोई सशक्त व्यक्ति इस पद पर आए। जैसा बिल बनाया गया है, उससे लगता है कि जान-बूझकर भ्रष्टाचारियों को बचाने की पूरी व्यवस्था की गई है। लोकसभा में पारित विधेयक के कानून बन जाने के बाद सीबीआइ पूरी तरह से निष्कि्रय हो जाएगी। आज सीबीआइ पूछताछ, जांच, अभियोजन खुद करती है। अब सीबीआइ से पूछताछ और अभियोजन को छीना जा रहा है तो सीबीआइ के टुकड़े-टुकड़े करके उसे निष्कि्रय बनाया जा रहा है। ग्रुप सी और डी कर्मचारी पूरी तरह से लोकपाल के दायरे के बाहर है। ग्रुप सी और डी कर्मचारियों के मामले में लोकपाल केवल पोस्ट ऑफिस की तरह सारी शिकायतें सीवीसी को भेजेगा। सीवीसी पर लोकपाल का किसी भी तरह से नियंत्रण नहीं होगा। नियंत्रण के नाम पर सीवीसी लोकपाल को केवल त्रैमासिक रिपोर्ट भेजेगा। सीवीसी के 232 कर्मचारी 57 लाख ग्रुप डी के भ्रष्टाचार की तहकीकात कैसे करेंगे? यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है? इस बिल की एक बड़ी विडंबना यह है कि ग्रुप सी और डी के अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन कौन करेगा, इस पर बिल मौन है। आजादी के बाद पहली बार भ्रष्टाचार के मुकदमे में भ्रष्टाचारी अफसरों और नेताओं को मुफ्त में वकील सरकार मुहैया कराएगी और उन्हें हर तरह की कानूनी सलाह देगी। शिकायतकर्ता के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के लिए आरोपी अधिकारी और नेता को सरकार मुफ्त में वकील मुहैया कराएगी। भ्रष्ट अधिकारी के खिलाफ तो शिकायत होने के बाद जांच होगी और शिकायत के लगभग दो साल बाद मुकदमा होगा, लेकिन शिकायतकर्ता के खिलाफ मुकदमा शिकायत करने के अगले दिन ही जारी हो जाएगा। भ्रष्ट अधिकारियों को निकालने की ताकत लोकपाल को नहीं, बल्कि उसी विभाग के मंत्री की होगी। आज तक जो मंत्री भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच के आदेश नहीं देते थे, क्या वे भ्रष्ट अधिकारियों को नौकरी से निकालेंगे? अगर लोकपाल के कर्मचारी भ्रष्ट हो गए तो क्या होगा? सरकारी बिल कहता है कि लोकपाल खुद ऐसे मामलों की जांच करेगा। प्रश्न उठता है कि क्या लोकपाल खुद अपने ही कर्मचारियों के खिलाफ एक्शन लेगा? जन लोकपाल में सुझाव दिया गया था कि लोकपाल के कर्मचारियों की शिकायत के लिए एक स्वतंत्र शिकायत प्राधिकरण बनाया जाए। सरकार ने इसे नामंजूर कर दिया है। टीम अन्ना ने यह भी कहा था कि लोकपाल की कार्यप्रणाली पूरी तरह पारदर्शी हो। इसके साथ ही हर मामले की जांच पूरी होने के बाद उससे संबंधित सभी रिकॉर्ड वेबसाइट पर डाले जाएं। ऐसा नहीं होने पर यह भ्रष्टाचार का अड्डा बन जाएगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को संरक्षण देने की बात इस बिल में कहीं नहीं की गई है। कांग्रेस के सांसद और प्रवक्ता यह बात कई बार कह चुके हैं कि सरकार एक सशक्त लोकपाल बिल जाएगी और भ्रष्टाचार के खिलाफ उसकी जंग जारी रहेगी, लेकिन संसद की स्थायी समिति में उसके सदस्यों ने जिस तरह से अपने रुख को बदला उससे उसके इरादों पर सवाल खड़े हो गए हैं। संसद ने अगस्त में सर्वसम्मति से जो प्रस्ताव पारित कराया था, उसमें समूची नौकरशाही को लोकपाल के दायरे में लाने की बात कही गई थी। उसी प्रस्ताव के बाद अन्ना हजारे ने अनशन खत्म करने का फैसला किया था, लेकिन स्थाई समिति में कांग्रेस के सदस्यों का व्यवहार एकदम उल्टा रहा है। समिति की आखिरी बैठक में आम राय से यह तय हुआ था कि ग्रुप सी के बाबुओं को लोकपाल के दायरे में रखा जाएगा, लेकिन इसके दूसरे ही दिन समिति के कांग्रेसी सदस्य इस बात से पलट गए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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Thursday, December 29, 2011
अल्पसंख्यक आरक्षण का असर
वामपंथियों और समाजवादियों के दबाव के कारण ही संप्रग-1 सरकार ने मुसलमान समाज की समस्या का अध्ययन करने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र सच्चर की अध्यक्षता में 9 मार्च, 2005 को एक आयोग का गठन किया। आयोग ने 17 नवंबर, 2006 को अपनी रिपोर्ट शासन को दी और शासन ने 30 नवंबर, 2006 को संसद के दोनों सदनों में रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट से मुस्लिम समाज के बारे में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए जैसे मुसलमानों की साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से पांच फीसदी कम है। छह वर्ष से लेकर 14 वर्ष के आयुवर्ग के मुस्लिम बच्चों में से 25 फीसदी कभी स्कूल गए ही नहीं। जो बच्चे स्कूल जाते भी हैं, वे जल्द ही स्कूल छोड़ देते हैं। हाईस्कूल तक जाते-जाते फेल होने वाले बच्चों में भी मुस्लिम लड़कियां अव्वल हैं। मुश्किल से चार फीसदी मुस्लिम बच्चे ग्रेजुएशन कर पाते हैं क्योंकि इनकी बस्तियों में या आस-पास अच्छे स्कूलों की कमी है। अधिकांश मुसलमान बच्चे सरकारी स्कूल की जगह मदरसे में जाना पसंद करते है। पढ़ाई-लिखाई के अभाव में स्वत: रोजगार तलाशना इनकी मजबूरी है। इसलिए पूरे देश में वेंडर अथवा हॉकर का काम करने वालों में 12 प्रतिशत मुस्लिम हैं। 16 प्रतिशत किसी दुकान में काम करते हैं और 70 फीसदी महिलाएं घरेलू कार्य में रत हैं। नियमित वेतन वाली नौकरियों में मुसलमानों की हिस्सेदारी न के बराबर है। इसीलिए ग्रामीण क्षेत्र में गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाली आबादी में 38 फीसदी और शहरी क्षेत्र में 27 फीसदी मुसलमान हैं। ग्रामीण हलकों में 40 प्रतिशत बड़ी मुस्लिम बस्तियों के आस-पास स्वास्थ्य सेवाएं नगण्य हैं। इतनी दुर्दशा के निदान का उपाय उसी सरकार द्वारा नियुक्त एक दूसरे कमीशन ने सुझाया। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस रंगनाथ मिश्रा ने संस्तुति की कि मुसलमानों की दशा सुधारने के लिए सरकारी नौकरियों में इनकी आबादी के समतुल्य आरक्षण किया जाए। उनका कहना है कि भारत के संविधान में सरकारी नौकरियों में 50 से अधिक आरक्षण की व्यवस्था पर प्रतिबंध है और अल्पसंख्यक के नाम से भारतीय संविधान के किसी वर्ग के लिए जगह आरक्षित करने की गुजांइश नहीं है। आरक्षण के लिए जो भी संवैधानिक प्रावधान हैं वे अनुसूचित जनजाति तथा पिछड़े वर्गो के लिए हैं। इसलिए अल्पसंख्यक वर्ग की दयनीय दशा को देखते हुए आरक्षण के विस्तार की आवश्यकता है जो संविधान में संशोधन करके ही दिया जा सकता है। कमीशन के अनुसार अल्पसंख्यकों का अलग से 15 फीसदी आरक्षण होना चाहिए, जिसमें 10 फीसदी मुसलमानों का हो। भारत के पांच प्रमुख राज्यों की चुनाव घोषणा की प्रथम संध्या पर सरकार ने सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लिए 27 फीसदी आरक्षण के ही कोटे से अल्पसंख्यक समाज के पिछडे़ वर्ग के लिए 4.5 फीसदी आरक्षण का आदेश प्रसारित कर दिया। यदि मंडल आयोग की संस्तुतियों को देखा जाए तो पिछड़ी जातियों की कुल संख्या संपूर्ण आबादी की 52 प्रतिशत है। इसमें हिंदू, मुसलमान, इसाई, सिख, बौद्ध, जैन, सभी वगरें की पिछड़ी जातियां शामिल हैं। उनकी संस्तुति में इन सभी वगरें के पिछड़ों को आरक्षण की परिधि में लाकर 27 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही गई थी। अब उसी आरक्षण में से 4.5 प्रतिशत आरक्षण अल्पसंख्यक समाज को दे देना समझ से परे है। इस आरक्षण का लाभ अत्यधिक पिछड़े मुस्लिम समाज के बच्चे कैसे उठा सकेंगे? इसका अधिकांश लाभ इसाइयों और बौद्धों को मिलेगा। सरकार ने बहुत ही चालाकी के साथ चुनाव की पूर्व संध्या पर मुस्लिम समाज को नए सिरे से ठगने का काम किया है ताकि वह पंजाब की चुनावी रैलियों आरक्षण को सिखों के लिए बता सके, उत्तर-प्रदेश के चुनावी भाषण में मुसलमान एजेंडे में रहेगा और गोवा में इसाई समाज के लिए आरक्षण की घोषणा की जाएगी। हमेशा की तरह कांग्रेस की यह बाजीगरी मुसलमान समाज को कभी राहत नहीं दे सकती। कांग्रेस ने इस समाज को हमेशा वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया है। 1990 में जब वीपी सिंह की सरकार ने सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गो के लिए 27 फीसदी आरक्षण का आदेश निकाला था, तो इसका सबसे जोरदार विरोध कांग्रेस ने ही किया था। राजीव गांधी ने संसद में विपक्ष के नेता की हैसियत से 6 सितंबर, 1990 को जोरदार भाषण दिया था और उसमें मंडल आयोग की संस्तुतियों को खत्म कर देने की मांग की थी। उन्होंने बार-बार इस बात पर बल दिया कि आरक्षण के कानून का मकसद केवल एक जाति है। आज के मंत्री राजीव गांधी के उन भाषणों को नए सिरे सुनें तो उन्हें शर्मिंदगी होगी कि हमारे नेता ने आरक्षण का विरोध किया। आज उनके शिष्यगण आज के अल्पसंख्यक समाज को ठगने के लिए मंडल कमीशन की संस्तुति को इस्तेमाल कर रहे हैं। 1977 में जनता पार्टी की उत्तर प्रदेश, बिहार की सरकारों ने 15 फीसदी आरक्षण का इंतजाम पिछड़े वगरें के लिए किया था, जिसमें मुस्लिम जातियां भी शामिल थीं। इस आरक्षण की व्यवस्था के बावजूद मुसलमानों की स्थिति लगातार बिगड़ती ही गई। यदि सरकार में इस बड़े अल्पसंख्यक समाज की तरक्की के लिए थोड़ी भी इच्छाशक्ति है तो सच्चर और मिश्रा कमीशन की संस्तुतियों के अनुसार कार्य करे। मंडल आयोग और छेदीलाल आयोग तो मूलत: पिछड़े वगरें के लिए बने थे। उन आयोगों की तरफ ताकने के बजाय सरकार मुस्लिमों के कल्याण के लिए कुछ ठोस उपाय करे। (लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं)
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