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Saturday, October 15, 2011

भूखे गरीबों का बढ़ता आंकड़ा

सरकार के तथाकथित गंभीर प्रयासों के बावजूद खाद्य पदाथरे की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। कई महीनों से इसकी महंगाई दर नौ प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है। उम्मीद थी कि बढ़िया मानसून और भारतीय रिजर्व बैंक के आर्थिक उपायों से कीमतें काबू में आएंगी, पर ऐसा नहीं हुआ। 24 सितम्बर को खत्म हुए सप्ताह में खाद्यों की मंहगाई दर 9.41 प्रतिशत के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गई। हालांकि ताजा आकड़ें मामूली गिरावट दर्शा रहे हैं। इस मुसीबत को बढ़ाने में ज्यादा योगदान सब्जियों और फलों का रहा। जैसे-जैसे खाद्यों की कीमतों में इजाफा होता जाता है, वैसे- वैसे गरीब की थाली सिकुड़ती जाती है। यह सिलसिला बहुत नया और केवल अपने देश तक सीमित नहीं है। यह आंच पूरी दुनिया में गरीबों को झुलसा रही है। इसीलिए यह मुद्दा वैिक स्तर पर गंभीर चिंता और बहस का विषय बन गया है। इस साल संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की पहल पर दुनिया भर में वि खाद्य दिवस के मौके पर बढ़ती खाद्य कीमतों को मुख्य विषय बनाया गया है। एफएओ की रिपोर्ट कहती है कि 1975 से 2000 के बीच अनाज की कीमतों में ज्यादा उछाल या उलट-फेर नहीं देखा गया। आबादी बढ़ने के बावजूद गरीबों की अनाज तक पहुंच बनी रही क्योंकि उत्पादन बढ़ता रहा। देश में हरित क्रांति के असर के कारण अनाज के गोदाम भरे रहे और कीमतें स्वाभाविक महंगाई के साथ लगभग अनुकूल स्तर पर बनी रहीं। परंतु, 2004 से खाद्य पदाथरे की कीमतें भारत समेत पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ने लगीं। इस दौरान कीमतों में लगभग 240 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई जो किसी पैमाने से तर्कसंगत नहीं कही जा सकती। इस उछाल से दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा भुखमरी की गिरफ्त में आ गया। लगभग 20 देशों में अनाज की कमी ने कलह की स्थिति बना दी। वि बैंक के अनुसार 2010-11 में खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी के कारण दुनिया के सात करोड़ से ज्यादा लोग भयंकर गरीबी का शिकार हो गये। दरअसल, किसी भी देश में अनाज उपलब्ध होना और अनाज तक गरीबों की पहुंच होना, दो अलग-अलग बातें हैं। अंतरराष्ट्रीय अनुमान है कि अगर किसी व्यक्ति की आय 1.25 अमेरिकी डॉलर (लगभग 60 रुपये) प्रतिदिन से कम हो तो अनाज की कीमतें बढ़ने पर उसे केवल एक समय का भोजन नसीब होगा। एक अनुमान है कि दुनिया के एक अरब से ज्यादा लोगों की आमदनी एक डॉलर प्रतिदिन से कम है और 80 करोड़ लोग भूख का शिकार हैं। दूसरी ओर अपने देश में कुछ दिन पहले ही सरकारी स्तर पर कहा गया कि 32 रुपये हर रोज कमाने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। हालांकि, इसका विरोध होने पर इस परिभाषा को वापस ले लिया गया। बहरहाल, देश में भुखमरी बढ़ती जा रही है। कृषि निवेशों की कीमत बढ़ने के कारण कृषि उत्पादों की लागत अपने-आप बढ़ जाती है। यही वजह है कि सरकार हर साल अनाज के समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी कर देती है। इससे भी अनाज की कीमतें बढ़ती हैं और गरीब की थाली कुछ और सिकुड़ जाती है। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (इफप्री) द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में खाद्य सुरक्षा खतरनाक स्तर पर है। संस्थान ने दुनिया के 81 विकासशील और गरीब देशों में अध्ययन कर वैिक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडैक्स) का आकलन किया जिसमें हमारा देश 67वें स्थान पर रहा, दुनिया के केवल 14 देश ही हमसे पीछे हैं। पाकिस्तान, नेपाल, रवांडा और सूडान जैसे देश भी इस कतार में हमसे आगे नजर आते हैं। रिपोर्ट कहती है कि पिछले दस सालों में देश में खाद्य सुरक्षा की स्थिति में विशेष सुधार नहीं हुआ। देश में गरीबी और अनाज की बढ़ती कीमतों के मद्देनजर खाद्य सुरक्षा कानून लागू किये जाने की योजना है। इसके तहत प्रत्येक परिवार को 35 किलोग्राम अनाज देने का प्रस्ताव है। इस कानून में गरीबी की रेखा से नीचे और ऊपर गुजर करने वाले लोगों के लिए अलग-अलग प्रावधान हैं। सरकार कहती है कि इसे शीत सत्र में प्रस्तुत किया जाएगा। गरीब की भूख से जुड़े मसलों का राजनीतिकरण गंभीर चिंता उत्पन्न कर रहा है, क्योंकि भूख तुरंत निदान चाहती है। दुनिया में जहां भी सरकार ने गंभीरता से भुखमरी खत्म करना चाही, वहां कामयाबी मिली। मैक्सिको में 2008 में खाद्य कीमतों में उछाल आया तो सरकार ने गरीबों को नकद सहायता देनी शुरू कर दी। लेकिन शर्त थी कि बच्चे स्कूल जाएं और परिवार के सदस्य स्वास्थ्य केंद्रों में नियमित जांच करायें। इससे खाद्य सुरक्षा के साथ ही पोषण और स्वास्थ्य सुरक्षा भी हुई और शिक्षा का स्तर भी सुधरा। अपने यहां ऐसा कदम उठाने से पहले हमें तमाम मुश्किल और अप्रिय सवालों से जूझना होगा। खाद्य कीमतें बढ़ाने का दोष आमतौर पर बढ़ती आबादी के सिर मढ़ दिया जाता है, परन्तु अपने देश के संदर्भ में इसमें ज्यादा सचाई नहीं दिखाई नहीं देती क्योंकि आबादी के साथ खाद्यान्न उत्पादन में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई। 1950-51 में महज पांच करोड़ टन से शुरू हुई यह यात्रा अब लगभग 24 करोड़ टन का आंकड़ा पार कर चुकी है। 2020 में देश को 28 करोड़ टन अनाज की जरूरत पड़ेगी जिसे पूरा करने के लिए देश के किसानों और कृषि वैज्ञानिकों, दोनों ने ही पूरी तैयारी कर रखी है। हमारे अनाज के गोदाम भरे पड़े हैं पर समस्या यह है कि अनाज के सुरक्षित भंडारण के लिए जगह की कमी है। आये दिन अनाज सड़ने की खबरें आती हैं। उच्चतम न्यायालय ने दखल देते हुए निर्देश दिया था कि अनाज को सड़ने के लिए छोड़ देने की बजाय गरीबों में बांट दिया जाए। दरअसल समस्या आबादी बढ़ने की नहीं बल्कि अनाज खरीदने की आर्थिक सामथ्र्य न होने की है। गरीबी और भुखमरी के बीच चोली-दामन का रिश्ता है। इस सिलसिले में मनरेगा से काफी आशाएं बंधी हैं क्योंकि इससे ग्रामीणों की आमदनी में इजाफा हुआ है और शहरी पलायन में कुछ हद तक कमी देखने में आई है। परंतु व्यापक गरीबी और अधिनियम की सीमाओं के मद्देनजर इस कार्यक्रम का अपेक्षित असर कम ही दिखाई दे रहा है। आज जरूरत इस बात की है कि खासतौर से ग्रामीण क्षेत्रों में आमदनी बढ़ाने के लिए समग्र कार्यक्रम विकसित कर लागू किये जाए। दरअसल, खेती से होने वाली आमदनी में गिरावट आती जा रही है जिससे गांवों में गरीबी और भुखमरी का जोर बढ़ता जा रहा है। जोत का आकार घटने के साथ आमदनी भी घटती गई है। यही वजह है कि खेती में खुद किसानों की दिलचस्पी कम होती जा रही है। राष्ट्रीय स्तर पर किया गया सव्रेक्षण बताता है कि देश के 40 प्रतिशत किसान खेती का ‘धंधा’ छोड़ने के लिए तैयार बैठे हैं। हाल में गांवों में भूमि अधिग्रहण के मामले को लेकर उठे विवाद में भी ज्यादातर किसानों की दिलचस्पी कृषि भूमि अधिग्रहण से मिलने वाले आकषर्क मुआवजे में थी। कृषि में घटती दिलचस्पी के कारण ही देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान घटकर लगभग 15 प्रतिशत के आसपास रह गया है, जो 1990-91 में 30 प्रतिशत था। ग्रामीण क्षेत्रों में आमदनी बढ़ाकर गरीबों को भुखमरी से बचाने का एक ही रास्ता है- कृषि के साथ कुछ ऐसे घटकों को भी जोड़ा जाए कि कुल आमदनी में इजाफा हो। अपने देश में गरीबी और भुखमरी पर अंकुश लगाने के लिए हमें कृषि क्षेत्र को और अधिक मजबूत तथा आर्थिक रूप से आकषर्क बनाने की जरूरत है। वि खाद्य दिवस इस संकल्प को दोहराने का अवसर है।