Saturday, June 23, 2012

कसौटी पर कट्टरता

भाजपा की विचारधारा एक बार फिर निशाने पर है। कट्टर हिंदूवादी छवि के कारण ही वर्ष 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार समर्थन नहीं जुटा सकी थी और गिर गई थी। उसी के बाद भाजपा ने अपनी उदारवादी छवि बनाने की कवायद शुरू की थी। पार्टी ने राम जन्मभूमि, समान नागरिक संहिता तथा कश्मीर में अनुच्छेद-370 के खात्मे की विवादस्पद मांगों को ठंडे बस्ते में डालने का फैसला किया था। तत्पश्चात, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) बना था। राजनीति में हुए इस अनोखे प्रयोग की बदौलत ही वह वर्ष 1998 में सत्ता में आई थी। यद्यपि 13 महीने में ही सरकार गिर गई लेकिन मध्यावधि चुनाव में वह पुन: सत्ता में आ गई थी। उस समय राजग को भानुमती का कुनबाकहने वाली कांग्रेस को भी करारा जवाब मिला था। गठबंधन राजनीति के इस सफल प्रयोग के लगभग डेढ़ दशक बाद भाजपा की विचारधारा पर पुन: सवाल उठाने लगे हैं। राजग के प्रमुख घटक जदयू के बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह कहकर हंगामा खड़ा कर दिया कि राजग के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार धर्मनिरपेक्ष छवि का होना चाहिए। आगामी आम चुनाव को देखते हुए नीतीश के बयान के राजनीतिक निहितार्थ खोजे जा रहे हैं। क्या भाजपा पर संघ के बढ़ते शिकंजे तथा विचारधारा पर वापसी की कवायद से जदयू असहज है? नीतीश का बयान भाजपा की अंदरूनी राजनीति का नतीजा तो नहीं है? अभी मुंबई में हुई भाजपा कार्यकारिणी की बैठक में जिस तरह से नरेंद्र मोदी की जिद पर संघ समर्थित संजय जोशी को अधिवेशन और फिर पार्टी से बाहर किया गया; उसके बावजूद संघ जिस तरह मोदी के पीछे खड़ा है, उससे जदयू परेशान है। उसे लगने लगा है कि संघ 2014 में मोदी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में देख रहा है। इसीलिए नीतीश ने यह बयान देकर संघ को चेताने की कोशिश की है कि उन्हें कट्टर हिंदूवादी छवि वाले नेता (मतलब मोदी) मंजूर नहीं हैं। नेता गठबंधन के सभी घटकों को स्वीकार्य होना चाहिए, जिसकी छवि धर्मनिरपेक्ष हो। यह और भी दिलचस्प है कि नीतीश के बयान का तत्पर जवाब भाजपा की ओर से नहीं बल्कि संघ से आया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत का नीतीश से सवाल है कि कोई हिंदूवादी प्रधानमंत्री क्यों नहीं हो सकता? इसे मोदी के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है, जिसे लेकर जदयू आगबबूला है। इसलिए राष्ट्रपति चुनाव में उसने कांग्रेस प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी का समर्थन कर अपने इरादे का इजहार कर दिया है। उसने तो धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर राजग से बाहर जाने की बात कही है। ऐसे में क्या संघ मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाकर राजग के बड़े सहयोगी को नाराज करने का खतरा मोल लेगा, जबकि बिहार में इस गठबंधन की सरकार है? वैसे भाजपा के साथ न रहने पर भी जदयू की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मोदी से जदयू की चिढ़ पुरानी है। जदयू का मानना है कि गोधरा कांड के बाद अगर वाजपेयी जी गुजरात में मोदी सरकार को बर्खास्त कर देते तो 2004 में राजग चुनाव नहीं हारता। इतना ही नहीं लगभग दो वर्ष पूर्व पटना में भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान मोदी के साथ हाथ मिलाते अपनी तस्वीर छपने से नीतीश इतने नाराज हुए थे कि भाजपा नेताओं के सम्मान में आयोजित भोज तक रद्द कर दिया था। साथ ही साथ कोसी के बाढ़ पीड़ितों के लिए गुजरात से मिली पांच करोड़ की सहायता राशि तक लौटा दी थी। यहां तक कि बिहार विधानसभा चुनाव में भी नीतीश कुमार ने मोदी को प्रचार के लिए न बुलाने की शर्त रखी थी, जिसे मजबूर होकर भाजपा को मानना पड़ा था। अब जब संघ के इशारे पर भाजपा सत्ता के लिए डग भर रही है तो वह चौकन्ने हो उठे हैं। वह बिहार की सत्ता में बने रहने के लिए अति पिछड़ों, महादलित वोट बैंक के साथ मुसलमानों के गठजोड़ में किसी तरह की दरार नहीं चाहते। इसके इतर, भाजपा जिसका 2009 के लोकसभा चुनाव में भी खराब प्रदर्शन रहा था; उससे सबक लेने की जगह आज आपस में लड़ रही है। उसके घटक दल अपनी अलग पहचान के साथ वृहत्तर स्वीकार्यता बनाने की कोशिश में है। नीतीश के बयान को उसी दिशा में बढ़ा हुआ कदम माना जा रहा है। उन्हें उम्मीद है कि 2014 में राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व होगा। इसीलिए उनकी पार्टी ने राष्ट्रपति चुनाव में गठबंधन की परवाह किए बगैर कांग्रेस प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी का समर्थन करने का फैसला किया है। वह 2014 में त्रिशंकु संसद की स्थिति में अपने विकल्प खुले रखने के लिए कांग्रेस से रिश्ते बिगाड़ना नहीं चाहते। इसी तरह, राजग की दूसरी महत्त्वपूर्ण सहयोगी शिवसेना पहले ही प्रणब दा के समर्थन का ऐलान कर चुकी है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार नवीन पटनायक की तरह भाजपा को झटका देंगे, जो 2009 चुनाव के ठीक पहले राजग छोड़ गए थे? यह आनेवाला समय ही बताएगा। भाजपा अपनों के बीच विचार युद्ध की लड़ाई लड़ रही है। वर्ष 2004 के चुनाव में हार और जिन्ना प्रकरण के बाद पार्टी की दूसरी पीढ़ी के नेताओं ने पार्टी को ज्यादा उदारवादी बनाने की कोशिश की। उस समय भी भाजपा का एक वर्ग पार्टी की मूल विचारधारा में लौटने की वकालत करता था। किंतु 2009 के चुनाव में हार के बाद संघ ने अब भाजपा की कमान अपने हाथ में ले ली है। संघ ने नितिन गडकरी को दूसरी बार अध्यक्ष बनाकर भविष्य का संकेत दे दिया है। ऐसे में पार्टी में उदारवादी चेहरे की वकालत करने वालों को डर सता रहा है कि क्या संघ ने अगले प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को पेश करने का मन बना लिया है? उन्हें आशंका है कि गुजरात में चंद महीनों के बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में चौथी बार भाजपा की सरकार बनाने के पश्चात मोदी दिल्ली का रुख करेंगे। उनकी नजर 2014 के चुनाव पर है। इसके पीछे संघ का तर्क है कि अकेले मोदी ही भाजपा में जनाधार वाले नेता हैं। उन्हें आगे करने से पार्टी के पक्ष में ध्रुवीकरण होगा। आम चुनाव में अधिक सीटें मिलने के बाद गठबंधन तैयार करने में आसानी होगी। क्या यह इतना आसान है? क्या मोदी के सहारे संघ भगवा लहर (हिंदुत्व की लहर) चला सकेगा? यह फिलहाल मुंगेरीलाल के हसीन सपनेजैसा ही लगता है; क्योंकि लालकृष्ण आडवाणी को 2004 में चुनावी हार के बाद यह लगने लगा था कि उनकी कट्टर हिंदूवादी छवि राजग के सर्वमान्य नेता बनने की राह में सबसे बड़ी बाधा है। इसी सोच के तहत उन्होंने अपनी पुरानी छवि तोड़ने और नई उदारवादी इमेज गढ़ने की पूरी कोशिश की। पाकिस्तान जाकर जिन्ना को सेक्युलर होने का प्रमाण इसी के तहत दिया गया था, जिसके चलते उन्हें संघ का कोपभाजन बनना पड़ा था। फिर भी उन्हें 2009 में संघ ने प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया था किंतु भाजपा को कोई खास सफलता नहीं मिली। ऐसे में मोदी पर संघ का दांव लगाना काफी जोखिम भरा लगता है। ऐसे में देखना होगा कि विचारधारा की कशमकश भाजपा को कहां ले जाती है? राष्ट्रपति चुनाव में प्रत्याशी चयन को लेकर अनिश्चय के भंवर में फंसी भाजपा की खूब फजीहत हो रही है। पार्टी अपने घटक दलों के साथ मिलकर इस संबंध में पहले कोई आम राय नहीं बना सकी। इसी बीच, कांग्रेस ने प्रणब दा को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाकर बाजी मार ली; क्योंकि भाजपा इस अहम सवाल पर कांग्रेस की कमजोरी में अपनी सफलता तलाश रही थी। ममता बनर्जी के साथ समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को खड़े देखकर उसे लगा कि उसका काम बन गया। किंतु मुलायम को शीघ्र ही उनका यह खेल समझ में आ गया और सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए उन्हें प्रणब दा का समर्थन करने में तनिक देर नहीं लगी। परिणामस्वरूप भाजपा के मंसूबे पर पानी फिर गया। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की उम्मीदवारी भाजपा की दूसरी उम्मीद थी। इसी बहाने, वह राजग का कुनबा बढ़ाने का भी सपना देख रही थी किंतु कलाम के इनकार से भाजपा को और बड़ा झटका लगा है। अब भाजपा पीए संगमा को समर्थन देकर हारी हुई लड़ाई लड़ने जा रही है। तो क्या संघ राष्ट्रपति चुनाव में राजग के सहयोगियों के रुख को देखते हुए अपनी भावी रणनीति (कट्टर हिंदूवादी छवि पर जोर देने वाली) पर पुनर्विचार करेगा?

Friday, June 22, 2012

सरकारी तंत्र भी हिस्सेदार


पूरे देश में पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है। प्यास बुझाने के लोगों को स्वच्छ पानी मुहैया नहीं हो पा रहा है। दिल्ली और एनसीआर में पानी की भारी किल्लत हो रही है, जिसकी मुख्य वजह है पानी की ब्लैक मार्केटिंग। गर्मी के मौसम में पानी की ब्लैक मार्केटिंग करने के लिए कई कंपनियां सक्रिय हो जाती हैं और भूजल का अधिकतर हिस्सा चोरी करती हैं। हाल ही में किए गए एक सर्वे के मुताबिक, लगभग 100 करोड़ रुपये के भूजल की सालाना चोरी हो रही है। इस बात से सभी वाकिफ हैं कि जल ही जीवन है, फिर इसकी तरफ से हम इतने बेपरवाह क्यों हैं? क्यों इसका अथाह दोहन किया जा रहा है। अगर यह सिलसिला यों ही जारी रहा तो हम जिंदगी की इस सबसे अहम जरूरत से महरूम हो जाएंगे और बूंद-बूंद पानी के लिए तरसेंगे। पानी की मौजूदा किल्लत यह संकेत देने के लिए काफी है कि आने वाले समय में स्वच्छ जल की भयावह किल्लत उत्पन्न होने वाली है। सालों से दिल्ली सरकार पानी के निजीकरण के पक्ष में हैं। उसका तर्क है कि पानी को निजी हाथों में देने से जल संकट को दूर किया जा सकता है, लेकिन अगर ऐसा हुआ तो वह दिन दूर नहीं होगा, जब पानी भी तेल की कीमत में बिकेगा। साथ ही इससे पानी की ब्लैक मार्केटिंग और बोतलबंद पानी के कारोबार को बढ़ावा मिलेगा। शहर के लोग मजबूरी में बोतलबंद पानी पी रहे हैं। उनके घरों में नल के जरिये जो पानी आता है, वह पीने के लायक ही नहीं है। इसके पीछे भी सरकार की कलाकारी है। कभी पानी में सुपरबग होने का प्रचार किया जाता है ताकि लोग खरीदकर पानी पिएं, जिससे निजी कंपनियों और सरकार दोनों का फायदा हो। हमारे पास जितना पानी उपलब्ध है, उसकी धड़ल्ले से काला बाजारी हो रही है। ऐसा नहीं कि सरकार को इस बात की भनक नहीं है। सरकार खुद पानी को बड़ी-बड़ी कंपनियों को बेच रही है। कुछ साल पहले जहां एक बोतल पानी की कीमत चार या पांच रुपये हुआ करती थी, वहीं अब इन बोतलों की कीमत 12 से 15 रुपये तक जा पहुंची है। दुनिया के कई प्रमुख शहरों की तुलना में देश की राजधानी दिल्ली में जल की उपलब्धता बहुत कम है। यहां प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन जल की उपलब्धता करीब 327 लीटर है। अनुमानित तौर पर सिर्फ दिल्ली में ही सैकड़ों एमजीडी पानी की कमी महसूस की जा रही है। इस शहर में पानी की किल्लत पहले इतनी नहीं थी, लेकिन जब से यमुना किनारे बने ताल-तालाब और कुएं पाटे गए हैं तथा उनके स्थान पर बड़ी-बड़ी इमारतों का निर्माण कराया गया है, पेयजल संकट की समस्या बढ़ी है। यमुना के किनारे जहां कभी बरसात का पानी इकट्ठा होता था, उस जगह पर राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के दौरान रिहायशी खेलगांव बना दिया गया है। यमुना के तट पर अब बड़ी-बड़ी पहाड़ जैसी इमारतें खड़ी दिखाई दे रही हैं। जाहिर है, हम खुद पानी को अपने आप से दूर करते जा रहे हैं। आज दिल्ली में प्रतिदिन पेयजल आपूर्ति सिर्फ 750 मिलियन गैलेन (एमजीडी) रह गई है। इसकी भरपाई होना भविष्य में नामुमकिन दिखता है। पानी की कमी का यह आंकड़ा प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। समय रहते अगर इस समस्या पर काबू नहीं पाया गया तो पूरा देश पेयजल के लिए तरसेगा। दिन प्रतिदिन गहराते जा रहे जल संकट ने पूरी मानव जाति को हिलाकर रख दिया है। खुद हमारे अपने देश में तो नौबत यहां तक आ गई है कि नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर कई राज्यों में हमेशा ठनी रहती है। इन हालात को देखकर यह अवधारणा चरितार्थ होती प्रतीत हो रही है कि संभवत: अगला विश्वयुद्ध जल को लेकर होगा। देश के कई जलाशय तो ऐसे हैं, जो पिछले कुछ सालों से लगातार पानी की कमी के कारण लक्ष्य से भी कम विद्युत उत्पादन कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के रिहंद जिले के जलाशय की स्थापित क्षमता 399 मेगावाट है। इसके लिए अप्रैल 2005 से जनवरी 2006 तक 938 मिलियन यूनिट विद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन वास्तविक उत्पादन 847 मिलियन यूनिट ही हो सका। मध्य प्रदेश के गांधी सागर बांध में भी इसी अवधि के लक्ष्य 235 मिलियन यूनिट की तुलना में मात्र 128 मिलियन यूनिट और राजस्थान के राणा प्रताप सागर से 271 मिलियन यूनिट के लक्ष्य की तुलना में सिर्फ 203 मिलियन यूनिट विद्युत का उत्पादन हो सका। अगर अब इन तकनीकों का गंभीरता से मूल्यांकन करके सुधार नहीं किया गया तो पूरे देश को जल और बिजली संकट का सामना करना पड़ेगा, जिनसे निपटना इंसान के बस की बात नहीं रह जाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

पानी को बोतल में बंद करने की साजिश


उदारीकरण ने भले ही मोबाइल-बाइक को घर-घर तक पहुंचाया, लेकिन महज दो दशकों में ही इसने लाखों कुओं और बावडि़यों को इतिहास के पन्नों में दफन कर दिया। इसी का नतीजा है कि कभी विलासिता की सामग्री समझी जाने वाली पानी की बोतल अब गुमटी से लेकर झुग्गी-झोपड़ी तक में अपनी पहुंच बना चुकी है। यह बोतलबंद पानी भारत के बारे में प्रचलित कहावत कोस-कोस पर बदले पानी, चार-कोस पर बदले बानी को झुठला रहा है। कभी हर जगह मुफ्त में मिलने वाला पानी आज कारोबार का रूप ले चुका है तो इसके लिए बढ़ती बीमारियों, जल प्रदूषण, शहरीकरण के साथ-साथ रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, पर्यटन केंद्रों आदि पर दुर्लभ होता पानी भी जिम्मेदार है। सबसे बड़ी समस्या है पानी की गुणवत्ता में आ रही तेज गिरावट। एक अध्ययन के मुताबिक, भारत पानी की गुणवत्ता के मामले में 122 देशों में से 120वें स्थान पर है। यहां तक कि राजधानी दिल्ली का पानी दुनिया के कई बड़े शहरों से भी गंदा है। खुद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, दिल्ली के नलों से आने वाले पानी में जहरीले तत्व इस पैमाने तक मौजूद हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय किए गए मानकों की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। यही परिस्थितियां बोतलबंद पानी को खाद-पानी मुहैया करा रही हैं। आज भारत में हर साल 1500 करोड़ रुपये का बोतलबंद पानी बिकता है। पानी के इस धंधे में ब्रांडेड से लेकर लोकल कंपनियां तक लगी हुई हैं। इसके बावजूद यदि पश्चिमी देशों से तुलना करें तो भारत में बोतलबंद पानी का कारोबार नगण्य लगेगा। उदाहरण के लिए जहां मेक्सिको में एक आदमी साल भर में औसतन 164 लीटर बोतलबंद पानी पी जाता है, वहीं भारत में यह अनुपात महज आधा लीटर है। लेकिन यदि कुल आबादी को देखें तो यह बहुत बड़ी मात्रा हो जाती है। फिर यह कारोबार 30 फीसद सालाना की रफ्तार से बढ़ रहा है। कमाई का खेल भले ही देश में बोतलबंद पानी का कारोबार तेजी से फल-फूल रहा है, लेकिन इसका अर्थशास्त्र आम आदमी के पक्ष में कतई नहीं है, क्योंकि लगभग सभी प्लांट भूजल पर आधारित होते हैं। इसलिए उनके दोहन से स्थानीय निवासियों के लिए पानी दुर्लभ हो जाता है। आगे चलकर इसका दुष्परिणाम स्थानीय लोगों और प्लांट के बीच संघर्ष के रूप में सामने आता है। निजी कंपनियां बेइमानी का खेल खेलते हुए मुफ्त में मिलने वाले पानी को बेचकर अकूत मुनाफा कमा रही हैं। इसके लिए देश की नीतियां भी जिम्मेदार हैं, जिसके तहत जमीन पर अधिकार रखने वाले को भूजल दोहन का अधिकार स्वत: मिल जाता है। इसका मतलब है कि यदि कोई व्यक्ति एक वर्ग मीटर जमीन खरीदता है तो वह उसके नीचे मिलने वाले समस्त पानी का दोहन कर सकता है। इसी कानून का लाभ कंपनियां उठा रही हैं। उदाहरण के लिए जयपुर के समीप काला डेरा स्थित कोका कोला प्लांट को जमीन खरीदते ही मुफ्त में पानी मिल गया। बस, उसे प्रदूषित पानी बहाने के लिए राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कुछ पैसे देने थे। यह दर भी नाम मात्र की थी यानी 14 पैसे प्रति हजार लीटर। इसी प्रकार किनले की जो बोतल बाजार में 15 रुपये में बिकती है, उसके पानी के लिए कंपनी महज 2 पैसे चुकाती है। एक लीटर बोतलबंद पानी तैयार करने के लिए 2-3 लीटर भूजल की जरूरत पड़ती है। कोका कोला के वाराणसी के निकट मेहदीगंज स्थित प्लांट का ग्रामीण विरोध कर रहे हैं, क्योंकि इससे आसपास का भूजल नीचे गिरता जा रहा है। देखा जाए तो बोतलबंद पानी की सफलता नल के पानी को बदनाम करने की साजिश में निहित है। जैसे-जैसे यह साजिश परवान चढ़ रही है, बोतलबंद पानी की खपत बढ़ती जा रही है। 1990 से 2005 के बीच बोतलबंद पानी की खपत चार गुना से भी अधिक हो गई। एक अनुमान के अनुसार, दुनिया में हर साल 200 अरब बोतल की खपत होती है। वर्ष 2006 के आंकड़ों के मुताबिक, हर साल 60 अरब डॉलर का बोतलबंद पानी बिक रहा है। सच्चाई यह है कि बाजार में 15 रुपये में बिकने वाली पानी की एक बोतल की वास्तविक लागत 25 पैसे आती है। फिर 40 फीसदी बोतलबंद पानी नल का पानी ही होता है, लेकिन वह ब्रांडेड पानी के रूप में सैकड़ों गुना कीमत पर बेचा जाता है। सबसे विडंबनापूर्ण स्थिति यह है कि जिन इलाकों में नल का पानी साफ है, वहां भी बोतलंद पानी का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। औद्योगिक क्षेत्रों में तो बोतलबंद पानी भी नल के पानी के बराबर है। इसके बावजूद लोग 10,000 गुना महंगे बोतलबंद पानी को खरीद रहे हैं। सेहत का सत्यानाश जेब हल्की करने के साथ-साथ बोतलबंद पानी सेहत का भी बंटाधार कर रहा है। शुद्धता और स्वच्छता के नाम पर बोतलों में भरकर बेचा जा रहा पानी भी सेहत के लिए किसी भी दृष्टि से खरा नहीं उतरता है। यह बात कई अध्ययनों में उभरकर सामने आई है। अमेरिका की एक संस्था नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल ने अपने अध्ययन के आधार पर यह नतीजा निकाला है कि बोतलबंद पानी और नल के पानी में कोई खास फर्क नहीं है। मिनरल वाटर के नाम पर बेचे जाने वाले बोतलबंद पानी की बोतलों को बनाने के दौरान एक खास रसायन पैथलेट्स का इस्तेमाल किया जाता है, जिसकी वजह से प्रजनन क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ता है। यह रसायन उस वक्त बोतल के पानी में घुलने लगता है, जब बोतल सामान्य से थोड़ा अधिक तापमान पर रखा जाता है। ऐसी स्थिति में बोतल में से खतरनाक रसायन पानी मिलते हैं और उसे जहरीला बनाने का काम करते हैं। इसी प्रकार बोतल बनाने में एंटीमनी नामक रसायन का भी इस्तेमाल किया जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, बोतलबंद पानी जितना पुराना होता जाता है, उसमें एंटीमनी की मात्रा उतनी ही बढ़ती जाती है। यदि यह रसायन किसी व्यक्ति के शरीर में जाता है तो उसे जी मिचलाने, उल्टी और डायरिया जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। सेहत का बंटाधार करने के साथ-साथ बोतलबंद पानी पर्यावरण का भी दुश्मन है। पानी की बोतल बनाने के लिए सामान्यत: पॉलिथिलीन टेरेफ्थलेट (पीईटी) का इस्तेमाल किया जाता है, जो कच्चे तेल से मिलता है। अकेले अमेरिका में पानी की बोतल बनाने के लिए 17 करोड़ बैरल तेल की खपत होती है। यह तेल 10 लाख कारों को साल भर चलाने के लिए पर्याप्त है। तेल खपत के अलावा हर साल अरबों बोतल जमींदोज होकर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं, क्योंकि 20 फीसदी बोतलें ही रिसाइकिल हो पाती हैं। बाकी 80 फीसद समुद्र, नदी, कचराघर आदि में ठिकाना पाती हैं। पैसिफिक इंस्टीट्यूट के मुताबिक, 2009 में पानी की बोतल बनाने से 25 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित हुई। नल के पानी की तुलना में बोतलबंद पानी लंबी दूरी तय करता है, जिससे जीवाश्मा ईधन का उपयोग होता है। हर चार में से एक बोतल राष्ट्रीय सीमाओं से पार कर बिकती है, जैसे यूरोप से अरब तक की यात्रा। यद्यपि अमेरिका में खपत होने वाला 94 फीसद बोतलबंद पानी वहीं पैक होता है, लेकिन वहां के धनाड्य लोग फैशन के लिए 9,000 किमी दूर फिजी के बोतलबंद पानी को पसंद करते हैं। फिर बोतलबंद पानी की सबसे बड़ी कमी यह है कि यह स्थानीय लोगों के लिए जल अकाल की स्थिति लाता है। यही कारण है कि यूरोप-अमेरिका से लेकर तीसरी दुनिया तक के देशों में इसका विरोध हो रहा है। बोतलबंद पानी के बढ़ते आधिपत्य को देखते हुए यही लगता है कि यदि इस पर लगाम न लगाई गई तो आज जो दशा तेल की है, वही भविष्य में पानी की होगी। आज कच्चे तेल के उत्खनन-परिष्करण से लेकर उसकी बिक्री तक पर बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां आधिपत्य जमा चुकी हैं। ये कंपनियां अकूत मुनाफा कमा रही हैं और संबंधित देशों के हिस्से उसका अल्पांश ही आ रहा है। स्पष्ट है, अगर हम अब भी नहीं चेते तो बहुत देर हो जाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
ewf � a " �� �ף -font-family:Mangal; color:black'>, जब स्वयं आग कैसे बुझाए यही जानकारी नहीं हो। तो संकट दिनोंदिन ज्यादा गंभीर हो रहा है, पर समाधान के रास्ते नदारद हैं और यह संकट मूल अर्थव्यवस्था के संकट से ज्यादा गंभीर है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

देश में घटी रईसों की तादाद


अब सबसे ज्यादा करोड़पति अमेरिका या यूरोप में नहीं रहते। मंदी और कर्ज संकट की मार झेल रहे इन महाद्वीपों ने अपना यह रुतबा खो दिया है। इनकी तुलना में ज्यादा तेजी से विकास कर रहे एशिया में करोड़पतियों की तादाद अब सबसे ज्यादा हो गई है। इसके उलट देश में दौलतमंदों की संख्या में 20 फीसदी की कमी आई है। इस वजह से भारत सबसे ज्यादा रईसों वाले शीर्ष 12 मुल्कों की सूची से बाहर हो गया है। इस सूची में अमेरिका, जापान व जर्मनी क्रमश: पहले, दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। रिसर्च फर्म कैपजेमिनी और आरबीसी की व‌र्ल्ड वेल्थ रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। रिपोर्ट में दस लाख डॉलर (करीब 5.6 करोड़ रुपये) से ज्यादा निवेश योग्य संपत्ति रखने वालों को ही एचएनआइ (रईस) माना गया है। इसके मुताबिक, वर्ष 2011 में दुनियाभर में इन रईसों की दौलत 1.7 फीसद घटी है। उनकी कुल संपत्ति 42 लाख करोड़ डॉलर रह गई। इस दौरान एचएनआइ की संख्या 0.8 फीसद बढ़कर 1.1 करोड़ हो गई। यह दीगर है कि भारत में करोड़पतियों की संख्या पिछले साल 18 फीसद घट गई। बीते साल शेयर बाजार में आई 33 फीसद से ज्यादा की गिरावट के चलते रईसों की संपत्ति को बड़ी चपत लगी। इससे बड़ी संख्या में लोगों ने अपना एचएनआइ का दर्जा गंवाया। नतीजतन शीर्ष 12 देशों की सूची में भारत का स्थान दक्षिण कोरिया ने ले लिया। वर्ष 2010 में देश इस सूची में शामिल हुआ था।

नहीं चलेगा ग्रीस संकट का बहाना


मैक्सिको के लॉस केबोस से हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दुनिया के गंभीर संकट में होने का जो बयान दिया है, उसका खंडन होना संभव नहीं है। दुनिया के प्रमुख देशों के नेताओं को इस बात का अहसास है कि वे वाकई गंभीर संकट के दौर से गुजर रहे हैं। इसलिए प्रधानमंत्री ने जो कुछ कहा, वह केवल उन अहसासों का सार्वजनिक प्रकटीकरण है। किंतु इसके बाद उन्होंने जो कुछ कहा, उससे सहमत होने में काफी हिचक है। उन्होंने कहा कि इसका जल्द ही कोई हल ढूंढ़ना होगा और प्रमुख विकासशील एवं विकसित देशों से उम्मीद जाहिर की कि वह आर्थिक संकट का हल ढूंढ़ लेगा। आर्थिक संकट की गहराई, अब तक के प्रयासों की विफलताओं तथा नेताओं की सोच को आधार बनाएं तो यह मानने का कोई कारण नहीं है कि इसका कोई जल्दी में हल निकल सकता है और वाकई ऐसा हो जाएगा। प्रधानमंत्री का यह वक्तव्य विदेश की धरती से उस समय आया है, जब अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच ने अपनी नई रेटिंग यानी आकलन में साफ कर दिया है कि भारत की साख पर बट्टा लग चुका है। हालांकि फिच ने पहले भी भारत को बीबीबी नकारात्मक रेटिंग दी थी, जिसका अर्थ होता है कर्ज चुकता करने में विपरीत समस्याओं का सामना करना। यह बाहरी निवेश की उपयुक्तता की दृष्टि से न्यूनतम स्तर है। ध्यान रखिए, कुछ ही दिनों पहले स्टैंडर्ड एंड पुअर्स (एसएंडपी) ने भी कहा था कि अगर यही स्थिति रही तो वह भारत की रेटिंग घटाकर सीसी यानी जंक या कबाड़ कर देगी। सीसी का अर्थ है अत्यंत कमजोर अर्थव्यवस्था। यही बात फिच ने दूसरे शब्दों में कही है। रेटिंग पर सवाल सरकार ने दोनों रेटिंग एवं आकलनों को खारिज कर दिया है। हालांकि रेटिंग एजेंसियों की प्रासंगिकता, उनके आकलन के तरीकों से व्यापक असहमति की गुंजाइश है, पर वर्तमान आर्थिक ढांचे में उन्होंने जो कुछ कहा है, उसका अर्थ यह है कि संकट समझते हुए भी आप समाधान नहीं कर पा रहे और इससे यह ज्यादा गंभीर हो रहा है। एसएंडपी और फिच दोनों ने ऐसा करने के लिए धीमी विकास गति, बढ़ती महंगाई, खजाने का बढ़ता घाटा तथा फैसले लेने में राजनीतिक प्रतिष्ठान की सुस्ती को आधार बनाया है। सरकारी आंकड़ों के आधार पर आप इसके आकलन पर प्रश्न उठा सकते हैं, पर इनमें ऐसी कौन-सी बात है, जिसे आप पूरी तरह गलत बता देंगे? जरा इनके आकलनों के आधार को जो प्रधानमंत्री कह रहे हैं, उसके आलोक में विचार करिए। चूंकि जी-20 या इसके पहले ब्रिक्स बैठक का आयाम पूरी दुनिया है, इसलिए वहां जो कुछ कहा जाएगा, वह किसी एक देश के संदर्भ में नहीं होगा। प्रधानमंत्री एवं वित्तमंत्री दोनों कई बार कह चुके हैं कि देश गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है और इसके लिए कठोर फैसला लेना जरूरी है। हां, वे इसके पीछे वैश्विक संकट विशेषकर यूरोजोन संकट को भी प्रमुख कारण मानते हैं। मैक्सिको में भी योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा कि अगर यूरो जोन का संकट दूर नहीं हुआ तो भारत उससे गहरे प्रभावित होगा। प्रधानमंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने भी रेटिंग एजेंसियों से असहमति जाहिर की, पर यह भी कहा कि अगले छह महीने अर्थव्यवस्था के लिए अहम हैं और इस बीच पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए तो मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। यह बात केवल भारत के संदर्भ में हो, ऐसा नहीं है। दुनिया के प्रमुख देशों की यही स्थिति है। आखिर नई सदी में यूरो के आविर्भाव के बाद माना गया था कि सामूहिक रूप से विश्व की सबसे ज्यादा शक्तिशाली अर्थव्यवस्था की प्रतिनिधि मुद्रा होने के कारण यह डॉलर को चुनौती देगी। खुद अमेरिका भी यूरोपीय संघ की आर्थिक मांसपेशी के सामने कमजोर दिखेगा। स्थिति उसके उलट क्यों हो गई? अगर आप रेटिंग सहित दूसरी एजेंसियों के आकलनों को देखेंगे तो उनमें भी संकट की चुनौतियों के अनुरूप राजनीतिक नेतृत्व द्वारा उपयुक्त कदम न उठाए जाने या उठाए जाने में हिचक की बात कही गई है। इस संकट के दावानल में यूरोप की 11 सरकारें चलीं गई। कुछ जाने वाली हैं। अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी की पराजय हुई और अब ओबामा की लोकप्रियता गिर रही है। आर्थिक संकट के दावानल ने दुनिया भर की राजनीति को झुलसा दिया, लेकिन समाधान नहीं निकला। आज इस बात पर आम सहमति है कि 2008 में उभरे संकट को जितना बड़ा माना गया, उससे आज का संकट कहीं बड़ा है। इसका अर्थ यह हुआ कि उस दौरान अर्थव्यवस्थाओं को संकट की अग्नि से बचाने के लिए राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर जो भी कदम उठाए गए, वे सफल नहीं हुए। भारत में हालांकि कहा गया कि संकट हमारे यहां नहीं है, पर इसके लिए सरकार ने अक्टूबर 2008 से मार्च 2009 तक कई आर्थिक पैकेज दिए। यानी इनमें भारत भी शामिल था। अगर वे सफल होते तो आज भारत सहित दुनिया के सभी प्रमुख देशों के नेतृत्व वर्ग के चेहरे पर हवाइयां नहीं उड़ रही होतीं। जिस किसी घटना या कदम से इसके समाधान की ओर बढ़ने की संभावना बताई जाती है, वह या तो उस अनुरूप घटित नहीं होता या फिर बेअसर हो जाती है। ग्रीस में दोबारा मतदान होने के बाद एंटोनियो समाराज की न्यू डेमोक्रेसी पार्टी भी पर्याप्त बहुमत से पीछे रह गई। यह पार्टी ग्रीस के कर्ज संकट के लिए यूरोपीय संघ के साथ बहुत हद तक सहमति बनाने का विचार रखती है। इसे जितनी भी बढ़त मिली, उससे जो सकारात्मक संदेश जाना चाहिए था, नहीं गया। दुनिया भर के शेयर बाजार लुढ़कते चले गए। यह ऐसा कोई पहला उदाहरण नहीं है। परेदस में माथापच्ची हमारे प्रधानमंत्री अर्थशास्त्र के मर्मज्ञ हैं और कहा जाता है कि दुनिया इससे संबंधित उनकी बातों को ध्यान से सुनती है। सवाल है कि क्या उन्होंने स्वयं अपने देश में उठाए गए कदमों और बाहर दिए गए सुझावों के जरिये ऐसे उपायों की ओर दुनिया का ध्यान खींचा है, जो वाकई गंभीर संकट का अंत कर सके या इसे कम करने में सहायक हो सके? नए वित्तीय वर्ष की तिमाही में भारत का औद्योगिक विकास 0.1 प्रतिशत रहा और इसके पूर्व वह नकारात्मक हो गया। इस वर्ष की विकास दर 6 प्रतिशत के आसपास ही रह सकता है। घाटा आसमान पर है और आपका मुद्रा डॉलर के सामने लगातार कमजोर बना हुआ है। जब आप अपने घर में लगी आग को बुझाने या इसकी ताप कम करने में कामयाब नहीं हुए तो फिर दुनिया को रास्ता कैसे दिखा सकते हैं। किंतु मौजूदा दुनिया ऐसी है, जहां आप यह कारनामा कर सकते हैं। भारत की ओर से मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी, अहलूवालिया, कौशिक बसु आदि की मंडली ने संकट की गंभीरता का तो अहसास कराया, लेकिन रास्ता सुझाया तो विश्व बैंक एवं अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के पास निवेश राशि में वृद्धि का, उसकी निर्णय लेने की प्रणाली में और सुधार का, डॉलर या यूरो की जगह आपस में स्थानीय मुद्राओं में कारोबार का। ये बातें हम लंबे समय से सुन रहे हैं और जी-20 व ब्रिक्स दोनों में यही विचार गूंज रहे हैं। ब्रिक्स ने आपसी मुद्रा में कारोबार का निश्चय किया, लेकिन इससे यूरो संकट या समग्र आर्थिक संकट के समाधान में क्या योगदान होगा? यह विचार आपसी लाभ के लिए ठीक है, क्योंकि विदेशी मुद्रा के मुकाबले आपके मुद्रा के मूल्यों की अस्थिरता इससे प्रभावित नहीं होगी, लेकिन यह एक प्रकार का आक्रामक आर्थिक क्षेत्रीयतावाद भी है। बेशक, डॉलर एवं यूरो ही लेन-देन की मुद्रा क्यों होनी चाहिए? यह अनुचित नहीं, पर अगर भूमंडलीकरण के सिद्धंातों के आलोक में विचार करें तो यह संरक्षणवाद है। यूरोपीय संघ बैकिंग संघ बनाने, बैंकों की कार्यप्रणाली का बेहतर पर्यवेक्षण विकसित करने, जमा पूंजी को गारंटी के तहत लाने तथा यूरो प्रबंधन को बेहतर करने आदि का सुझाव दे रहा है। इसका असर कितना होगा अभी कहना कठिन है, लेकिन डूबते बैंकों को बचाने भर से यूरो संकट का समाधान नहीं हो सकता है। आखिर यूरोप ही नहीं, दुनिया भर की वित्तीय प्रणाली ध्वस्त क्यों हुई इसका कोई सर्वमान्य विश्लेषण जब तक नहीं रखा जाएगा, संकट का मूल समझ में कहां आएगा। सरंक्षणवाद केवल कहने से नहीं रुकेगा, जब अपने घर में आग लगी हो तो कोई पड़ोसी की चिंता नहीं करता। वह भी उस हालत में, जब स्वयं आग कैसे बुझाए यही जानकारी नहीं हो। तो संकट दिनोंदिन ज्यादा गंभीर हो रहा है, पर समाधान के रास्ते नदारद हैं और यह संकट मूल अर्थव्यवस्था के संकट से ज्यादा गंभीर है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

छोटे कुनबे में बड़ी दरार


अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार को 1996 में जब बहुमत जुटाने के लिए समर्थन नहीं मिला तो लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि विचारधारा पर आधारित दल के विस्तार की सीमा होती है। उनका कहने का आशय था कि विचारधारा के आधार पर भाजपा के विस्तार की अब गुंजाइश नहीं बची है। तत्कालीन सरसंघ चालक प्रोफेसर राजेंद्र सिंह और लालकृष्ण आडवाणी की संघ और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से लंबी मंत्रणा के बाद तय हुआ कि भाजपा को केंद्र में सत्ता हासिल करने के लिए अपनी विचारधारा से समझौता करना पड़ेगा। उसके बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का जन्म हुआ। इसके लिए भाजपा ने रामजन्म भूमि, समान नागरिक आचार संहिता और कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने के मुद्दे छोड़ दिए और 1998 में सत्ता में आ गई। 1999 में सरकार गिरी तो मध्यावधि चुनाव में वापस आ गई। 2004 से भाजपा केंद्र की सत्ता से तो गई ही उसकी केंद्रीय सत्ता भी चली गई। सवाल है कि क्या भाजपा विचारधारा की ओर लौटेगी? क्या मोहन भागवत इसी बदलाव की ओर संकेत कर रहे हैं। उस समय विचारधारा से समझौता करने के बावजूद उसके पास चुनाव जिताने के लिए आवश्यक नेता, नीति, नीयत और संगठन साथ थे। वाजपेयी के सक्रिय राजनीति से हटने के बाद से भाजपा संभलने की बजाय गिरती ही गई। वाजपेयी के बाद स्वाभाविक रूप से नेतृत्व आडवाणी के हाथ आ गया। आडवाणी ने आडवाणी बने रहने की बजाय वाजपेयी बनने का प्रयास किया और पाकिस्तान जाकर जो किया उससे भाजपा नेता और नीति दोनों से महरूम हो गई। इसके बावजूद सत्ता की आस में पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नेता बदलने का साहस नहीं जुटा पाए। जिन्ना प्रकरण के बाद जिसे पार्टी से बाहर किया जा रहा था उन्हीं लालकृष्ण आडवाणी को 2009 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पेश किया गया। नतीजा यह हुआ कि 1991 के बाद भाजपा को लोकसभा की सबसे कम सीटें मिलीं। गुजरात के लोग भी इस बात से उत्साहित नहीं हुए कि उनके राज्य का प्रतिनिधि देश का प्रधानमंत्री हो सकता है। गुजरात में भी भाजपा की सीटें कम हो गईं। राष्ट्रपति चुनाव खत्म होते-होते भाजपा सहयोगी दलों की संख्या के लिहाज से 1996 की हालत में या उससे भी बुरी हालत में पहुंच जाए तो आश्चर्य नहीं। शिवसेना ने साफ कर दिया है कि वह राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का समर्थन करेगी। नीतीश कुमार ने एक इंटरव्यू में कहा है कि राजग का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार पंथनिरपेक्ष होना चाहिए। उन्होंने गुजरात के विकास संबंधी मोदी की उपलब्धियों पर यह कह कर सवाल उठाया है कि विकसित राज्य का विकास करने वाला व्यक्ति प्रधानमंत्री के रूप में नहीं चाहिए। नीतीश कुमार राष्ट्रपति चुनाव को मुद्दा बनाने की बजाय 2014 के लोकसभा चुनाव के मुद्दे उठा रहे हैं। पर भाजपा बड़ी तस्वीर देखने की बजाय छोटी-मोटी लड़ाइयों में उलझी है। नीतीश की बात का जवाब भाजपा की ओर से नहीं संघ की ओर से आया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि कोई हिंदुत्ववादी प्रधानमंत्री क्यों नहीं हो सकता। इसे नरेंद्र मोदी के लिए संघ के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। क्या संघ ने तय कर लिया है कि मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी होंगे, चाहे जनता दल (यूनाइटेड) राजग में रहे या न रहे। ऐसा निष्कर्ष निकालना शायद जल्दबाजी होगी। भागवत से पहले शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे मोदी के समर्थन में बोले पर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व चुप्पी साधे हुए है। भाजपा अपने आपसे जंग लड़ती नजर आ रही है। 2004 लोकसभा चुनाव में हार और जिन्ना प्रकरण के बाद दूसरी पीढ़ी के नेताओं ने पार्टी को ज्यादा उदारवादी और आधुनिक पहचान देने की कोशिश की। 2009 के लोकसभा चुनाव की हार ने पार्टी को दोराहे पर खड़ा कर दिया- वह पुरानी जड़ों की ओर लौटे या नए रास्ते पर चले। उसे पता नहीं है कि 2009 में मतदाताओं ने आडवाणी के नेतृत्व को नकारा या दोनों को। संघ ने 2009 की हार के बाद नितिन गडकरी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवाकर भविष्य की दिशा का एक संकेत दिया था, लेकिन भाजपा ने राष्ट्रपति चुनाव पर जो रवैया अपनाया है उससे लगता है कि दोराहे पर खड़ी पार्टी अब चौराहे पर आ गई है। राष्ट्रपति चुनाव के लिए उसके पास कोई अपना उम्मीदवार नहीं है। पार्टी ने अपनी ताकत बढ़ाने की बजाय कांग्रेस की कमजोरी पर दांव लगाया। ममता बनर्जी के साथ मुलायम जुड़े तो उसे लगा कि उसका खेल बन गया। किसी ने समझने की कोशिश नहीं की कि मुलायम भाजपा का खेल क्यों खेलेंगे। भाजपा के साथ जाकर उन्हें हासिल क्या होगा। मुलायम के प्रणब मुखर्जी का समर्थन करते ही भाजपा का हवाई किला ढह गया। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की उम्मीदवारी भाजपा की दूसरी उम्मीद थी। उनकी उम्मीदवारी के जरिए वह राजग के नए सहयोगी जोड़ सकती थी। उन्हें लड़ाने का राजनीतिक तर्क फिर भी समझ में आता था। कलाम के मना करने के साथ ही राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा की भूमिका खत्म हो गई। पर पार्टी यह समझने को तैयार नहीं है। जनतंत्र में चुनाव अच्छी बात है। पर कभी-कभी चुनाव के मैदान में न होना भी अच्छी रणनीति होती है। भाजपा नेताओं की यह समझ लगता है कन्नौज तक सीमित है। भाजपा में केंद्रीय नेतृत्व का अवसान हो गया है। पार्टी यह समझने को तैयार नहीं है कि उसकी ताकत की धुरी केंद्र से हटकर राज्यों में चली गई है। भाजपा कांग्रेस पर अकसर आरोप लगाती है कि वहां सब कुछ सोनिया गांधी तय करती हैं। इसके बावजूद सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार तय करने से पहले अपने मुख्यमंत्रियों और प्रदेश अध्यक्षों को मशविरे के लिए बुलाया। भाजपा ने अपने मुख्यमंत्रियों और प्रदेश अध्यक्षों को इस काबिल भी नहीं समझा। इसके बावजूद कि 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को सत्ता में लाने की जिम्मेदारी राज्यों पर ही होगी। राजग का छोटा-सा कुनबा 2009 की तुलना में ज्यादा बंटा हुआ नजर आ रहा है। नए सहयोगियों के जुड़ने की तो बात ही छोडि़ए। राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा ने अपनी ताकत दिखाने की बजाय अपना बंटा हुआ घर दिखाया है। पार्टी के ही नेता खुलेआम प्रणब मुखर्जी को समर्थन की घोषणा कर रहे हैं। जो अपना घर न संभाल सके उसे देश संभालने की जिम्मेदारी मतदाता कैसे देगा? चाहे वह हिंदुत्ववादी ही क्यों न हो! (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 12श्चश्रल्ल2@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

दिल्ली होगा देश का पहला केरोसिन मुक्त शहर


दिल्ली मंत्रिमंडल ने राजधानी को केरोसिन मुक्त बनाने संबंधी योजना पर मुहर लगा दी है। अब दिल्ली में 15 अगस्त से रसोई के कार्यो के लिए केरोसिन का इस्तेमाल बंद हो जाएगा। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने दिल्ली विधानसभा में वर्ष 2012-13 के लिए दिल्ली का बजट पेश करते हुए सदन में इस आशय की घोषणा की थी। बुधवार को दिल्ली मंत्रिमंडल ने इस योजना को लागू करने के तौर-तरीकों को हरी झंडी दिखाई। इस योजना के लागू करने से शहर के लगभग 3.57 लाख परिवारों को केरोसिन के इस्तेमाल से मुक्ति मिल जाएगी। सरकार इस योजना को लागू करने पर 85.54 करोड़ रुपये खर्च करेगी। संबंधित परिवारों को सरकार एलपीजी सिलेंडर और रेग्यूलेटर के लिए धरोहर राशि देगी और दो चूल्हे वाला गैस स्टोव व रबड़ ट्यूब भी देगी। बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने बताया कि इस योजना के लागू होने के बाद दिल्ली देश का पहला महानगर होगा जहां रसोई में केरोसिन का प्रयोग पूरी तरह बंद हो जाएगा। उन्होंने बताया कि इस योजना का लाभ कुल 3 लाख, 56 हजार, 395 परिवारों को मिलेगा। शुरुआत में यह संख्या करीब पौने दो लाख ही बताई गई थी। सरकार के खाद्य आपूर्ति विभाग ने आंकड़ों को दुरुस्त करने के बाद कहा है कि ईपीडीएस-डेटाबेस के अनुसार 93,075 अंत्योदय अन्न योजना (एएवाई) के तहत आने वाले परिवार, 2, 32,019 गरीबी रेखा के नीचे गुजर बसर करने वाले परिवार (बीपीएल) तथा 31,301 गरीबी रेखा (एपीएल) से ऊपर के परिवार रसोई में केरोसिन का इस्तेमाल करते हैं। मुख्यमंत्री ने बताया कि इन सभी परिवारों को 14.83 रुपये प्रति लीटर की दर से हर महीने 12.5 लीटर करोसिन तेल दिया जाता है। इसके लिए खाद्य-आपूर्ति विभाग प्रतिमाह 4400 किलोलीटर करोसिन तेल जारी करता है। उन्होंने बताया कि केरोसिन की जगह एलपीजी के इस्तेमाल से केरोसिन की कालाबाजारी समाप्त हो जाएगी। विभाग के डेटाबेस में अपने आप केरोसिन प्राप्त करने वाले राशन कार्डधारकों के नाम गैस इस्तेमाल करने वाले धारकों में तब्दील हो जाएंगे और इसी मात्रा में संबंधित तेल डिपो को केरोसिन मिलना बंद हो जाएगा।