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Friday, June 22, 2012

सरकारी तंत्र भी हिस्सेदार


पूरे देश में पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है। प्यास बुझाने के लोगों को स्वच्छ पानी मुहैया नहीं हो पा रहा है। दिल्ली और एनसीआर में पानी की भारी किल्लत हो रही है, जिसकी मुख्य वजह है पानी की ब्लैक मार्केटिंग। गर्मी के मौसम में पानी की ब्लैक मार्केटिंग करने के लिए कई कंपनियां सक्रिय हो जाती हैं और भूजल का अधिकतर हिस्सा चोरी करती हैं। हाल ही में किए गए एक सर्वे के मुताबिक, लगभग 100 करोड़ रुपये के भूजल की सालाना चोरी हो रही है। इस बात से सभी वाकिफ हैं कि जल ही जीवन है, फिर इसकी तरफ से हम इतने बेपरवाह क्यों हैं? क्यों इसका अथाह दोहन किया जा रहा है। अगर यह सिलसिला यों ही जारी रहा तो हम जिंदगी की इस सबसे अहम जरूरत से महरूम हो जाएंगे और बूंद-बूंद पानी के लिए तरसेंगे। पानी की मौजूदा किल्लत यह संकेत देने के लिए काफी है कि आने वाले समय में स्वच्छ जल की भयावह किल्लत उत्पन्न होने वाली है। सालों से दिल्ली सरकार पानी के निजीकरण के पक्ष में हैं। उसका तर्क है कि पानी को निजी हाथों में देने से जल संकट को दूर किया जा सकता है, लेकिन अगर ऐसा हुआ तो वह दिन दूर नहीं होगा, जब पानी भी तेल की कीमत में बिकेगा। साथ ही इससे पानी की ब्लैक मार्केटिंग और बोतलबंद पानी के कारोबार को बढ़ावा मिलेगा। शहर के लोग मजबूरी में बोतलबंद पानी पी रहे हैं। उनके घरों में नल के जरिये जो पानी आता है, वह पीने के लायक ही नहीं है। इसके पीछे भी सरकार की कलाकारी है। कभी पानी में सुपरबग होने का प्रचार किया जाता है ताकि लोग खरीदकर पानी पिएं, जिससे निजी कंपनियों और सरकार दोनों का फायदा हो। हमारे पास जितना पानी उपलब्ध है, उसकी धड़ल्ले से काला बाजारी हो रही है। ऐसा नहीं कि सरकार को इस बात की भनक नहीं है। सरकार खुद पानी को बड़ी-बड़ी कंपनियों को बेच रही है। कुछ साल पहले जहां एक बोतल पानी की कीमत चार या पांच रुपये हुआ करती थी, वहीं अब इन बोतलों की कीमत 12 से 15 रुपये तक जा पहुंची है। दुनिया के कई प्रमुख शहरों की तुलना में देश की राजधानी दिल्ली में जल की उपलब्धता बहुत कम है। यहां प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन जल की उपलब्धता करीब 327 लीटर है। अनुमानित तौर पर सिर्फ दिल्ली में ही सैकड़ों एमजीडी पानी की कमी महसूस की जा रही है। इस शहर में पानी की किल्लत पहले इतनी नहीं थी, लेकिन जब से यमुना किनारे बने ताल-तालाब और कुएं पाटे गए हैं तथा उनके स्थान पर बड़ी-बड़ी इमारतों का निर्माण कराया गया है, पेयजल संकट की समस्या बढ़ी है। यमुना के किनारे जहां कभी बरसात का पानी इकट्ठा होता था, उस जगह पर राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के दौरान रिहायशी खेलगांव बना दिया गया है। यमुना के तट पर अब बड़ी-बड़ी पहाड़ जैसी इमारतें खड़ी दिखाई दे रही हैं। जाहिर है, हम खुद पानी को अपने आप से दूर करते जा रहे हैं। आज दिल्ली में प्रतिदिन पेयजल आपूर्ति सिर्फ 750 मिलियन गैलेन (एमजीडी) रह गई है। इसकी भरपाई होना भविष्य में नामुमकिन दिखता है। पानी की कमी का यह आंकड़ा प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। समय रहते अगर इस समस्या पर काबू नहीं पाया गया तो पूरा देश पेयजल के लिए तरसेगा। दिन प्रतिदिन गहराते जा रहे जल संकट ने पूरी मानव जाति को हिलाकर रख दिया है। खुद हमारे अपने देश में तो नौबत यहां तक आ गई है कि नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर कई राज्यों में हमेशा ठनी रहती है। इन हालात को देखकर यह अवधारणा चरितार्थ होती प्रतीत हो रही है कि संभवत: अगला विश्वयुद्ध जल को लेकर होगा। देश के कई जलाशय तो ऐसे हैं, जो पिछले कुछ सालों से लगातार पानी की कमी के कारण लक्ष्य से भी कम विद्युत उत्पादन कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के रिहंद जिले के जलाशय की स्थापित क्षमता 399 मेगावाट है। इसके लिए अप्रैल 2005 से जनवरी 2006 तक 938 मिलियन यूनिट विद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन वास्तविक उत्पादन 847 मिलियन यूनिट ही हो सका। मध्य प्रदेश के गांधी सागर बांध में भी इसी अवधि के लक्ष्य 235 मिलियन यूनिट की तुलना में मात्र 128 मिलियन यूनिट और राजस्थान के राणा प्रताप सागर से 271 मिलियन यूनिट के लक्ष्य की तुलना में सिर्फ 203 मिलियन यूनिट विद्युत का उत्पादन हो सका। अगर अब इन तकनीकों का गंभीरता से मूल्यांकन करके सुधार नहीं किया गया तो पूरे देश को जल और बिजली संकट का सामना करना पड़ेगा, जिनसे निपटना इंसान के बस की बात नहीं रह जाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

पानी को बोतल में बंद करने की साजिश


उदारीकरण ने भले ही मोबाइल-बाइक को घर-घर तक पहुंचाया, लेकिन महज दो दशकों में ही इसने लाखों कुओं और बावडि़यों को इतिहास के पन्नों में दफन कर दिया। इसी का नतीजा है कि कभी विलासिता की सामग्री समझी जाने वाली पानी की बोतल अब गुमटी से लेकर झुग्गी-झोपड़ी तक में अपनी पहुंच बना चुकी है। यह बोतलबंद पानी भारत के बारे में प्रचलित कहावत कोस-कोस पर बदले पानी, चार-कोस पर बदले बानी को झुठला रहा है। कभी हर जगह मुफ्त में मिलने वाला पानी आज कारोबार का रूप ले चुका है तो इसके लिए बढ़ती बीमारियों, जल प्रदूषण, शहरीकरण के साथ-साथ रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, पर्यटन केंद्रों आदि पर दुर्लभ होता पानी भी जिम्मेदार है। सबसे बड़ी समस्या है पानी की गुणवत्ता में आ रही तेज गिरावट। एक अध्ययन के मुताबिक, भारत पानी की गुणवत्ता के मामले में 122 देशों में से 120वें स्थान पर है। यहां तक कि राजधानी दिल्ली का पानी दुनिया के कई बड़े शहरों से भी गंदा है। खुद केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, दिल्ली के नलों से आने वाले पानी में जहरीले तत्व इस पैमाने तक मौजूद हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय किए गए मानकों की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। यही परिस्थितियां बोतलबंद पानी को खाद-पानी मुहैया करा रही हैं। आज भारत में हर साल 1500 करोड़ रुपये का बोतलबंद पानी बिकता है। पानी के इस धंधे में ब्रांडेड से लेकर लोकल कंपनियां तक लगी हुई हैं। इसके बावजूद यदि पश्चिमी देशों से तुलना करें तो भारत में बोतलबंद पानी का कारोबार नगण्य लगेगा। उदाहरण के लिए जहां मेक्सिको में एक आदमी साल भर में औसतन 164 लीटर बोतलबंद पानी पी जाता है, वहीं भारत में यह अनुपात महज आधा लीटर है। लेकिन यदि कुल आबादी को देखें तो यह बहुत बड़ी मात्रा हो जाती है। फिर यह कारोबार 30 फीसद सालाना की रफ्तार से बढ़ रहा है। कमाई का खेल भले ही देश में बोतलबंद पानी का कारोबार तेजी से फल-फूल रहा है, लेकिन इसका अर्थशास्त्र आम आदमी के पक्ष में कतई नहीं है, क्योंकि लगभग सभी प्लांट भूजल पर आधारित होते हैं। इसलिए उनके दोहन से स्थानीय निवासियों के लिए पानी दुर्लभ हो जाता है। आगे चलकर इसका दुष्परिणाम स्थानीय लोगों और प्लांट के बीच संघर्ष के रूप में सामने आता है। निजी कंपनियां बेइमानी का खेल खेलते हुए मुफ्त में मिलने वाले पानी को बेचकर अकूत मुनाफा कमा रही हैं। इसके लिए देश की नीतियां भी जिम्मेदार हैं, जिसके तहत जमीन पर अधिकार रखने वाले को भूजल दोहन का अधिकार स्वत: मिल जाता है। इसका मतलब है कि यदि कोई व्यक्ति एक वर्ग मीटर जमीन खरीदता है तो वह उसके नीचे मिलने वाले समस्त पानी का दोहन कर सकता है। इसी कानून का लाभ कंपनियां उठा रही हैं। उदाहरण के लिए जयपुर के समीप काला डेरा स्थित कोका कोला प्लांट को जमीन खरीदते ही मुफ्त में पानी मिल गया। बस, उसे प्रदूषित पानी बहाने के लिए राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कुछ पैसे देने थे। यह दर भी नाम मात्र की थी यानी 14 पैसे प्रति हजार लीटर। इसी प्रकार किनले की जो बोतल बाजार में 15 रुपये में बिकती है, उसके पानी के लिए कंपनी महज 2 पैसे चुकाती है। एक लीटर बोतलबंद पानी तैयार करने के लिए 2-3 लीटर भूजल की जरूरत पड़ती है। कोका कोला के वाराणसी के निकट मेहदीगंज स्थित प्लांट का ग्रामीण विरोध कर रहे हैं, क्योंकि इससे आसपास का भूजल नीचे गिरता जा रहा है। देखा जाए तो बोतलबंद पानी की सफलता नल के पानी को बदनाम करने की साजिश में निहित है। जैसे-जैसे यह साजिश परवान चढ़ रही है, बोतलबंद पानी की खपत बढ़ती जा रही है। 1990 से 2005 के बीच बोतलबंद पानी की खपत चार गुना से भी अधिक हो गई। एक अनुमान के अनुसार, दुनिया में हर साल 200 अरब बोतल की खपत होती है। वर्ष 2006 के आंकड़ों के मुताबिक, हर साल 60 अरब डॉलर का बोतलबंद पानी बिक रहा है। सच्चाई यह है कि बाजार में 15 रुपये में बिकने वाली पानी की एक बोतल की वास्तविक लागत 25 पैसे आती है। फिर 40 फीसदी बोतलबंद पानी नल का पानी ही होता है, लेकिन वह ब्रांडेड पानी के रूप में सैकड़ों गुना कीमत पर बेचा जाता है। सबसे विडंबनापूर्ण स्थिति यह है कि जिन इलाकों में नल का पानी साफ है, वहां भी बोतलंद पानी का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। औद्योगिक क्षेत्रों में तो बोतलबंद पानी भी नल के पानी के बराबर है। इसके बावजूद लोग 10,000 गुना महंगे बोतलबंद पानी को खरीद रहे हैं। सेहत का सत्यानाश जेब हल्की करने के साथ-साथ बोतलबंद पानी सेहत का भी बंटाधार कर रहा है। शुद्धता और स्वच्छता के नाम पर बोतलों में भरकर बेचा जा रहा पानी भी सेहत के लिए किसी भी दृष्टि से खरा नहीं उतरता है। यह बात कई अध्ययनों में उभरकर सामने आई है। अमेरिका की एक संस्था नेचुरल रिसोर्सेज डिफेंस काउंसिल ने अपने अध्ययन के आधार पर यह नतीजा निकाला है कि बोतलबंद पानी और नल के पानी में कोई खास फर्क नहीं है। मिनरल वाटर के नाम पर बेचे जाने वाले बोतलबंद पानी की बोतलों को बनाने के दौरान एक खास रसायन पैथलेट्स का इस्तेमाल किया जाता है, जिसकी वजह से प्रजनन क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ता है। यह रसायन उस वक्त बोतल के पानी में घुलने लगता है, जब बोतल सामान्य से थोड़ा अधिक तापमान पर रखा जाता है। ऐसी स्थिति में बोतल में से खतरनाक रसायन पानी मिलते हैं और उसे जहरीला बनाने का काम करते हैं। इसी प्रकार बोतल बनाने में एंटीमनी नामक रसायन का भी इस्तेमाल किया जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, बोतलबंद पानी जितना पुराना होता जाता है, उसमें एंटीमनी की मात्रा उतनी ही बढ़ती जाती है। यदि यह रसायन किसी व्यक्ति के शरीर में जाता है तो उसे जी मिचलाने, उल्टी और डायरिया जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। सेहत का बंटाधार करने के साथ-साथ बोतलबंद पानी पर्यावरण का भी दुश्मन है। पानी की बोतल बनाने के लिए सामान्यत: पॉलिथिलीन टेरेफ्थलेट (पीईटी) का इस्तेमाल किया जाता है, जो कच्चे तेल से मिलता है। अकेले अमेरिका में पानी की बोतल बनाने के लिए 17 करोड़ बैरल तेल की खपत होती है। यह तेल 10 लाख कारों को साल भर चलाने के लिए पर्याप्त है। तेल खपत के अलावा हर साल अरबों बोतल जमींदोज होकर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती हैं, क्योंकि 20 फीसदी बोतलें ही रिसाइकिल हो पाती हैं। बाकी 80 फीसद समुद्र, नदी, कचराघर आदि में ठिकाना पाती हैं। पैसिफिक इंस्टीट्यूट के मुताबिक, 2009 में पानी की बोतल बनाने से 25 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित हुई। नल के पानी की तुलना में बोतलबंद पानी लंबी दूरी तय करता है, जिससे जीवाश्मा ईधन का उपयोग होता है। हर चार में से एक बोतल राष्ट्रीय सीमाओं से पार कर बिकती है, जैसे यूरोप से अरब तक की यात्रा। यद्यपि अमेरिका में खपत होने वाला 94 फीसद बोतलबंद पानी वहीं पैक होता है, लेकिन वहां के धनाड्य लोग फैशन के लिए 9,000 किमी दूर फिजी के बोतलबंद पानी को पसंद करते हैं। फिर बोतलबंद पानी की सबसे बड़ी कमी यह है कि यह स्थानीय लोगों के लिए जल अकाल की स्थिति लाता है। यही कारण है कि यूरोप-अमेरिका से लेकर तीसरी दुनिया तक के देशों में इसका विरोध हो रहा है। बोतलबंद पानी के बढ़ते आधिपत्य को देखते हुए यही लगता है कि यदि इस पर लगाम न लगाई गई तो आज जो दशा तेल की है, वही भविष्य में पानी की होगी। आज कच्चे तेल के उत्खनन-परिष्करण से लेकर उसकी बिक्री तक पर बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां आधिपत्य जमा चुकी हैं। ये कंपनियां अकूत मुनाफा कमा रही हैं और संबंधित देशों के हिस्से उसका अल्पांश ही आ रहा है। स्पष्ट है, अगर हम अब भी नहीं चेते तो बहुत देर हो जाएगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
ewf � a " �� �ף -font-family:Mangal; color:black'>, जब स्वयं आग कैसे बुझाए यही जानकारी नहीं हो। तो संकट दिनोंदिन ज्यादा गंभीर हो रहा है, पर समाधान के रास्ते नदारद हैं और यह संकट मूल अर्थव्यवस्था के संकट से ज्यादा गंभीर है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)