Tuesday, July 10, 2012

समानता का अधूरा सपना


अनेक ऐसी बातें हैं जो महात्मा गांधी को उनके समकालीन स्वतंत्रता सेनानियों तथा नेताओं से अलग करती हैं। इनमें से एक बात यह है कि उन्होंने आजादी के संघर्ष के साथ-साथ एक अन्य चीज को बराबर का महत्व दिया और यह थी समाज में नीचे के स्तर पर समझी जाने वाली जातियों के लोगों को बराबरी पर लाने का प्रयास। अस्पृश्यता के खिलाफ गांधीजी का कार्य हमारी आजादी के पांच दशक पहले दक्षिण अफ्रीका से ही आरंभ हो गया था। जब वह भारत लौटे तो उनसे जुड़ी एक घटना ही यह बताने के लिए काफी है कि उन्होंने समानता के विचार को कितना महत्व दिया। यह वर्ष 1915 की बात है। गांधीजी के एक निकट सहयोगी ठक्कर बप्पा ने एक दलित दुधा भाई को आश्रम में रहने के लिए भेजा। कस्तूरबा समेत हर कोई उन्हें आश्रम में रखने के खिलाफ था। गांधीजी ने यह साफ कर दिया कि दुधा भाई आश्रम नहीं छोड़ेंगे और जो लोग इससे सहमत नहीं हैं वे खुद आश्रम छोड़कर जाने के लिए स्वतंत्र हैं। उन्हें यह भी बताया गया कि कोई भी उनकी बात से सहमत नहीं होगा और यहां तक कि आश्रम को मिलने वाली आर्थिक सहायता भी बंद हो सकती है। इसका भी गांधीजी पर कोई असर नहीं पड़ा। गांधीजी ने कहा कि वह अपने आश्रम को किसी दलित बस्ती में ले जाने के लिए तैयार हैं-भले ही इसका यह अर्थ हो कि आश्रम में केवल दो लोग-गांधीजी और दुधा भाई ही बचें। अंतत: गांधीजी की बहन गोकीबेन को छोड़कर सभी लोग राजी हो गए। गोकीबेन आश्रम छोड़कर चली गईं और फिर कभी नहीं लौटीं। क्यों गांधीजी ने अस्पृश्यता अथवा जातिगत आधार पर होने वाले भेदभाव को मिटाने के काम को इतना अधिक महत्व दिया? मुझे लगता है कि वह जिस आजादी के लिए लड़ रहे थे उसका अर्थ केवल राजनीतिक आजादी नहीं था। वह केवल यह नहीं चाहते थे कि अंग्रेज भारत छोड़कर चले जाएं और दूसरी तरह के लोग सत्ता के गलियारों में आकर जम जाएं। उनके लिए आजादी का अर्थ था-देश के प्रत्येक नागरिक की वास्तविक आजादी। एक ऐसी आजादी जो केवल मौलिक समानता और प्रत्येक नागरिक की गरिमा की रक्षा के जरिये आ सकती है। अस्पृश्यता निश्चित ही उनके इस महान उद्देश्य में बाधक थी। आज हममें से अनेक लोगों के पास यह दृष्टि है कि हमारा देश किस तरह का होना चाहिए, यह क्या हो सकता है और विश्व में इसका सही स्थान क्या है? हममें से अनेक लोग यह सपना देखते हैं कि भारत विश्व की महाशक्ति बनेगा, लेकिन क्या एक ऐसा देश यह स्थान पा सकता है जहां समाज विभाजित हो, दीवारें हमें अपने ही लोगों से अलग करती हों? अगर हम एक साझी सामाजिक संपत्ति पर विश्वास नहीं करते हैं तो क्या हम अपने उद्देश्य को हासिल कर सकते हैं? साझी सामाजिक संपत्ति से मेरा आशय सार्वजनिक संपत्ति से है। एक गली या सड़क साझी सामाजिक संपत्ति है। हमारा सरकारी स्वास्थ्य ढांचा साझी सामाजिक संपत्ति है। दुर्भाग्य से हम इतने विभाजित हैं कि इस सबको हम अपनी संपत्ति नहीं मानते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि हम अपनी सड़कों पर कूड़ा-करकट फेंक देते हैं, क्योंकि इन्हें हम अपनी संपत्ति नहीं मानते हैं। हम अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे के प्रति इसलिए इच्छुक नहीं, क्योंकि उसे हम अपनी संपत्ति के रूप में नहीं देखते। हम तभी एक साझा लक्ष्य तय कर सकते हैं या साझा दृष्टिकोण उत्पन्न कर सकते हैं जब हम सभी खुद को एक मानते हों। डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में संविधान की रचना करने वाले हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने हमारे लिए अपना दृष्टिकोण एकदम स्पष्ट कर दिया था। वह दृष्टिकोण था सभी को बराबरी के साथ देखने का और बराबरी वाला व्यवहार करने का। हमारे नेताओं ने हमें राह दिखा दी है और उस पर चलना अब हमारी जिम्मेदारी है। उन्होंने ऐसे कानूनों की रचना की है जो हमें निर्देश देते हैं कि जातिगत और मजहबी आधार पर भेदभाव करना अपराध है। हमें यह भी समझना होगा कि लोगों के बीच भेदभाव करना मानवता के मूल विचार के खिलाफ है। साझा दृष्टिकोण रखने, सभी को एक रूप में देखने का अपना मकसद पूरा करने के लिए हमें सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि हमारे बीच मतभेद हैं, दीवारें हैं। फिर इसके बाद हमें इन मतभेदों और दीवारों को मिटाने की दिशा में काम करना होगा। उदाहरण के लिए पूरे देश में ऐसी अनगिनत हाउसिंग सोसाइटी हैं जो दलितों अथवा मुस्लिमों या हिंदुओं या इसाइयों अथवा सिखों को घर नहीं बेचती हैं। इस प्रकार की संकीर्ण सोच को पूरी तरह समाप्त करना होगा। शायद सुधार का सबसे अच्छा तरीका होगा इस संदर्भ में अपने बच्चों को शिक्षित करना। आइए हम अपने बच्चों में विभाजन के बीज न बोएं। हम उन्हें भेदभाव के वे पाठ न पढ़ाएं जो हमें पढ़ाए गए हैं। हम अपने सामान्य जीवन में कई तरह से भेदभाव की इस प्रवृत्ति को समाप्त कर सकते हैं और इसका हमारे बच्चों पर बहुत सही असर होगा। मुझे भेदभाव के मामले में अपनी कमजोरियों की भी याद आ रही है। अपने शो में मैं बेजवादा विल्सन की बातों को सुनकर स्तब्ध रह गया जो बता रहे थे कि किस तरह आज भी लोगों को दूसरों की गंदगी साफ करने के लिए विवश होना पड़ता है। 46 साल की उम्र में आकर मैं यह जान और समझ सका कि अपने देश में इस प्रथा का अस्तित्व है। कितना अमानवीय है यह सब। मैं 46 साल तक यह सब क्यों स्वीकार करता रहा। शायद इसलिए कि अपने आसपास यह सब देखने की आदत हो गई है। मैं खुद को भयभीत और दोषी महसूस कर रहा हूं। अपनी असंवेदनशीलता के लिए मुझे ग्लानि हो रही है। आइए अस्पृश्यता, भेदभाव और अमानवीयता को मिटाने के लिए हम सब संकल्प लें। जय हिंद, सत्यमेव जयते। 12श्चश्रल्ल2@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

दिल्ली में मोदी की दावेदारी


नरेंद्र मोदी का उल्लेख होते ही विवाद खड़े हो जाते हैं। उनके प्रशंसकों की मानें तो आज भारत को नरेंद्र मोदी जैसे नेता की ही जरूरत है। निर्णय लेने की क्षमता, उद्देश्यपरक नेतृत्व, अपने राज्य में बेहद लोकप्रिय और ईमानदार मोदी को गुजरात को विकास के रास्ते पर ले जाने का श्रेय जाता है। उनके विरोधियों के लिए मोदी अधिसत्तात्मक प्रवृत्ति वाले और विभाजनकारी हैं तथा भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए सर्वथा अनुपयुक्त हैं। मोदी और उनके नेतृत्व के तौर-तरीकों पर बहस गुजरात के संदर्भ में उठती है। हालांकि अब जब भारतीय जनता पार्टी उन्हें 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में उतारने पर गंभीरता से विचार कर रही है, मोदी की क्षमता पर विवाद राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींच रहा है। दिल्ली की गद्दी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता हासिल करने के लिए मोदी को पहले तो अपने गृह राज्य में मजबूती दिखानी होगी। गुजरात में इस साल के अंत में होने वाले चुनाव का महत्व इस बात से पता चलता है कि इस पर भारत ही नहीं, पूरे विश्व की निगाहें लगी हैं। अगर मोदी तीसरी बार गुजरात का चुनाव जीत ले जाते हैं तो देश के शीर्ष पद के लिए दावेदारी में भाजपा नेतृत्व के लिए उनकी अनदेखी करना असंभव हो जाएगी। अगर वह हार जाते हैं तो भारत के प्रमुख विपक्षी दल में नेतृत्व का सवाल नए सिरे से खड़ा हो जाएगा। 2002 और 2007 में गुजरात विधानसभा चुनाव में दो बिंदुओं पर मोदी का विरोध हुआ था-2002 के दंगों से निपटने में उनकी भूमिका और शक्तिशाली पटेल समुदाय से तथाकथित मनमुटाव। मोदी ने क्षेत्रीय गौरव के मुद्दे पर अपने विरोधियों को किनारे कर दिया और 2007 में अपनी उपलब्धियों के नाम पर जीत हासिल की। आगामी चुनाव के लिए उनके विरोधियों ने पैंतरा बदल लिया है। पटेल समुदाय की शिकायतें एक बार फिर सतह पर आ रही हैं। केशुभाई पटेल ने मोदी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और तीसरे मोर्चे की बात करनी शुरू कर दी है। दूसरी तरफ कांग्रेस भी उन्हें घेरने के नए तरीके खोज रही है। वह विकास के नए मसीहा की मोदी की छवि पर चोट कर रही है। लगता है कि इस बार के चुनाव में 2002 के दंगे और सांप्रदायिकता का मुद्दा खड़ा नहीं होगा। कांग्रेस गुजरात के दंगों के घाव कुरेदना नहीं चाहती। इससे मोदी को घाटा होने के बजाय फायदा होता है। लगता है कि गुजरात दो कारणों से 2002 के दु:स्वप्न को भूलना चाहता है। एक तो यह मुद्दा एक दशक पुराना हो चुका है और दूसरे समृद्धि के कारण गुजरात में स्थिरता और सुशासन की स्थापना हो गई है। मोदी पर दो बिंदुओं पर हमला होने की संभावना है। एक तो यह कहा जा रहा है कि नाजुक मोर्चो पर गुजरात का प्रदर्शन कमजोर रहा है। विकास के नाम पर मोदी हवा ज्यादा बांधते हैं, जबकि जमीनी धरातल पर काम बहुत कम हुआ है। दूसरा हमला अधिक जटिल है और इसके माध्यम से मतदाताओं को आश्वस्त किया जाएगा कि मोदी के हटने के बाद गुजरात में विकास की गति तेज होगी। कहा जा रहा है कि गुजरात में विकास का मोदी से कोई संबंध नहीं है। मुख्यमंत्री तो पहले से ही विकास की राह पर अग्रसर गुजरात की पीठ पर सवार हो गए हैं। गुजरात की उच्च विकास दर का श्रेय इसकी भौगोलिक स्थिति और गुजरातियों की उद्यमिता को जाता है। मोदी सत्ता में हों या नहीं हों, गुजरात विकास के पथ पर आगे बढ़ता रहेगा। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल ही में कहा था कि पहले से विकसित राज्य के विकास में कोई बड़ी बात नहीं है। गुजरात में विकास की गति को आंकड़ों में नापा जा सकता है। योजना आयोग के आंकड़ों के आधार पर 1990 के बाद से गुजरात की औसत विकास दर में बढ़ोतरी हुई है, किंतु समान रूप से नहीं। 1985-90 के बीच गुजरात की विकास दर 6.1 फीसदी, 1992-97 के बीच 12.9 फीसदी, 1997-02 के बीच 2.8 फीसदी, 2002-07 के बीच 10.9 प्रतिशत तथा 2007-12 के बीच अनुमानित 11.2 फीसदी है। यद्यपि इससे राजनीतिक निष्कर्षो पर पहुंचना गलत होगा, फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं कि मोदी के कार्यकाल में गुजरात की विकास दर दोहरे अंकों में बनी हुई है। कर्नाटक को छोड़कर, जिसकी 11वीं पंचवर्षीय योजना में विकास दर गुजरात के बराबर रही, भारत के बड़े राज्यों में से किसी ने भी पिछले दशक में गुजरात जितना विकास नहीं किया है। मोदी के आलोचक कहते हैं कि विकास दर के मुद्दे पर बिहार, दिल्ली और पांडिचेरी ने गुजरात को पछाड़ दिया है, किंतु यह तो ऐसा ही हुआ कि कोई यह कहे कि भारत की छह फीसदी की लड़खड़ाती विकास दर अमेरिका के दो फीसदी विकास से बेहतर है। सवाल उठता है कि पिछले एक दशक में गुजरात में हुए विकास का क्या राजनीति और सुशासन से कोई लेना-देना नहीं है? अगर यह सही है तो इससे प्रतीत होगा कि मोदी राजनीतिक अर्थव्यवस्था को नई दिशा में ले गए हैं और अर्थव्यवस्था को राजनीति के कलुषित प्रभाव से बचाने में भी सफल रहे हैं। यह स्वायत्तता तो भारतीय उद्योग जगत का पुराना सपना रही है। सार्वजनिक जीवन का यह नियम है कि किसी राज्य के जैसे लोग होंगे वैसा ही वह प्रदर्शन करेगा। मोदी ने छोटे-छोटे लक्ष्य निर्धारित किए और उनके सफल क्रियान्वयन पर पूरा जोर लगा दिया। यह गुजरातियों की उद्यमिता के अनुरूप है। हालांकि यह सवाल अब भी अनुत्तरित है कि क्या केवल उद्यमिता के बल पर तीव्र विकास हो सकता है या फिर आर्थिक संवृद्धि में राज्य उत्प्रेरक की भूमिका निभाते हैं? पिछले दशक में गुजरात ने ढांचागत सुविधाओं के विकास पर ध्यान केंद्रित किया, खासतौर पर सड़कों और बंदरगाहों के निर्माण पर। साथ ही सरकार ने बेहतर सुविधाओं और शर्तो के बल पर उद्योगपतियों को राज्य में निवेश करने के लिए आकर्षित किया है। यह टाटा मोटर्स के पश्चिम बंगाल के सिंगुर से हटकर गुजरात में कारखाना लगाने के प्रसंग से स्पष्ट हो जाता है, किंतु यह संभव नहीं था अगर राज्य में भ्रष्टाचार का स्तर कम नहीं होता, त्वरित निर्णय नहीं लिए जाते और ढांचागत सुविधाएं न होतीं। यह सही है कि मोदी को पहले से ही मजबूत गुजरात का लाभ मिला, किंतु अगर मुख्यमंत्री गैरजिम्मेदार, लापरवाह और नासमझ होता तो क्या आज भारत गुजरात के चमत्कार की बात कर रहा होता? भारत में बहुत से लोगों की मोदी को लेकर जायज आपत्ति है। उनका मानना है कि भावी प्रधानमंत्री को समग्र भारत की भावनाओं के प्रति समान रूप से संवेदनशील होना चाहिए। कुछ लोगों का कहना है कि प्रधानमंत्री को अधिक सहमतिजन्य होना चाहिए, किंतु इन आपत्तियों के आधार पर यह दावा नहीं किया जा सकता है कि नरेंद्र मोदी की सफलता फर्जी है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 12श्चश्रल्ल2@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे

ई-बुक्स के बाजार में पिछड़ते हिंदी लेखक


पिछले करीब तीन महीनों से ईएल जेम्स की फिफ्टी शेड्स ट्रायोलॉजी यानी तीन किताबें- फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे, फिफ्टी शेड्स डार्कर, फिफ्टी शेड्स फ्रीड अमेरिका में प्रिंट और ई एडीशन दोनों श्रेणी में बेस्ट सेलर बनी हुई हैं। जेम्स की इन किताबों ने अमेरिका और यूरोप में इतनी धूम मचा दी है कि कोई इस पर फिल्म बना रहा है तो कोई उसके टेलीविजन अधिकार खरीद रहा है । फिफ्टी शेड्स ट्रायोलॉजी लिखे जाने की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। टीवी की नौकरी छोड़कर पारिवारिक जीवन और बच्चों की परवरिश के बीच एरिका ने शौकिया तौर पर फैनफिक्शन नाम के वेबसाइट पर मास्टर ऑफ यूनिवर्स के नाम से एक सिरीज लिखना शुरू किया। एरिका ने पहले तो स्टीफन मेयर की कहानियों की तर्ज पर प्रेम कहानियां लिखना शुरू किया जो काफी लोकप्रिय हुआ। लोकप्रियता के दबाव और ई-रीडर्स की मांग पर उसे बार-बार लिखने को मजबूर होना पड़ा। इस तरह शौकिया लेखन पेशेवर लेखन में तब्दील हो गया। पाठकों के दबाव में एरिका ने अपनी कहानियों का पुनर्लेखन किया और उसे फिर से ई-रीडर्स के लिए पेश कर दिया। पात्रों के नाम और कहानी के प्लॉट में बदलाव करके उसकी पहली किश्त वेबसाइट पर प्रकाशित हुई तो वह पूरे अमेरिका में वायरल बुखार की तरह फैल गई। चंद हफ्तों में एरिका लियोनॉर्ड का भी नाम बदल गया और वह बन गई ईएल जेम्स। उसकी इस लोकप्रियता को भुनाते हुए उसने ये ट्रायोलॉजी प्रकाशित करवा ली। इसके प्रकाशन के पहले ही प्री लांच बुकिंग से प्रकाशकों ने लाखों डॉलर कमाए। यह सब हुआ सिर्फ साल भर के अंदर। इस पूरे प्रसंग को लिखने का उद्देश्य यह बताना था कि ई-बुक्स की बढ़ती लोकप्रियता और उसके फायदों के मद्देनजर यूरोप और अमेरिका में लेखकों ने ज्यादा लिखना शुरू कर दिया है। उनकी पहली कोशिश यह होने लगी है कि वह अधीर ऐसे पाठकों की क्षुधा को शांत करें जो कि अपने प्रिय लेखक की कृतियां एक टच से या एक क्लिक से डाउनलोड कर पढ़ना चाहता है। ई-रीडिंग और ई-राइटिंग के पहले के दौर में लेखक साल में एक कृति की रचना कर लेते थे तो उसे बेहद सक्रिय लेखक माना जाता था। जॉन ग्रीशम जैसा लोकप्रिय लेखक भी साल में एक ही किताब लिखता था। पाठकों को भी साल भर अपने प्रिय लेखकों की कृति का इंतजार रहता था। पुस्तक छपने की प्रक्रिया में भी वक्त लगता था। पहले लेखकों के लिखे को टाइप किया जाता फिर उसकी दो-तीन बार प्रूफरीडिंग होती थी। कवर डिजायन होता था। कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि लेखन से लेकर पाठकों तक पहुंचने की प्रक्रिया में काफी वक्त लग जाता था। यह वह दौर था जब पाठकों और किताबों के बीच एक भावनात्मक रिश्ता होता था। पाठक जब एकांत में हाथ में लेकर किताब पढ़ता था तो किताब के स्पर्श से वह उस किताब के लेखक और उसके पात्रों से एक तादात्म्य बना लेता था। कई बार तो लेखक और पाठक के बीच का भावनात्मक रिश्ता इतना मजबूत होता था कि पाठक वर्षो तक अपने प्रिय लेखक की कृति के इंतजार में बैठा रहता था और जब उसकी कोई किताब बाजार में आती थी तो उसे वह हाथों हाथ खरीद लेता था, लेकिन वक्त बदला, स्टाइल बदला, लेखन और प्रकाशन की प्रक्रिया बदली। अब तो ई-लेखन का दौर आ गया है। ई-लेखन और ई-पाठक के इस दौर में पाठकों की रुचि में आधारभूत बदलाव देखने को मिल रहा है। पश्चिम के देशों में पाठकों की रुचि में इस बदलाव को रेखांकित किया जा सकता है। अब तो इंटरनेट के दौर में पाठकों का लेखकों से भावनात्मक संबंध की बजाय सीधा संवाद संभव हो गया है। लेखक ऑनलाइन रहते हैं तो पाठकों के साथ बातें भी करते हैं। ट्विटर पर सवालों के जवाब देते हैं। फेसबुक पर अपना स्टेटस अपडेट करते हैं। ईएल जेम्स की सुपरहिट ट्रायोलॉजी तो पाठकों के संवाद और सलाह का ही नतीजा है। दरअसल हमारे या विश्व के अन्य देशों के समाज में जो इंटरनेट पीढ़ी सामने आ रही है उनके पास धैर्य की कमी है। कह सकते हैं कि वह सब कुछ इंस्टैंट चाहते हैं। उनको लगता है कि इंतजार का विकल्प समय की बर्बादी है। अमेजोन या किंडल पर किताबें पढ़ने वाला यह पाठक समुदाय बस एक क्लिक या एक टच पर अपने पसंदीदा लेखक की नई कृति चाहता है। इससे लेखकों पर जो दबाव बना है उसका नतीजा यह है कि बड़े से बड़ा लेखक अब साल में कई कृतियों की रचना करने लगा है। कई बड़े लेखक तो साल में दर्जनभर से ज्यादा किताबें लिखने लगे है, जो कि ई-रीडिंग और ई-राइटिंग के दौर के पहले असंभव हुआ करता था। जेम्स पैटरसन जैसे बड़े लेखकों की रचनाओं में बढ़ोतरी साफ देखी की जा सकती है। पिछले साल पैटरसन ने बारह किताबें लिखी और एक सहलेखक के साथ यानी कुल तेरह किताबें। एक अनुमान के मुताबिक अगर पैटरसन के लेखन की रफ्तार कायम रही तो इस साल वह तेरह किताबें अकेले लिख ले जाएंगें। पैटरसन की साल भर में इतनी किताबें बाजार में आने के बावजूद ई-पाठकों और सामान्य पाठकों के बीच उनका आकर्षण कम नहीं हुआ है, बल्कि उनकी लोकप्रियता में और इजाफा ही हुआ है, लेकिन जेम्स पैटरसन की इस रफ्तार से कई साथी लेखक सदमे में हैं। ई-रीडर्स की बढ़ती तादाद का फायदा प्रकाशक भी उठाना चाहते हैं, लिहाजा वह भी लेखकों पर ज्यादा से ज्यादा लिखने का दबाव बनाते हैं। प्रकाशकों को लगता है कि जो भी लेखक इंटरनेट की दुनिया में जितना ज्यादा चर्चित होगा वह उतना ही बड़ा स्टार होगा। जिसके नाम को किताबों की दुनिया में भुनाकर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है। इसके मद्देनजर प्रकाशकों ने अपनी तरह एक अलग ही रणनीति भी बनाई हुई है। अगर किसी बड़े लेखक की कोई अहम कृति प्रकाशित होने वाली होती है तो प्रकाशक लेखकों से आग्रह कर पुस्तक प्रकाशन के पहले ई-रीडर्स के लिए छोटी छोटी कहानियां लिखवाते हैं। जो कि सिर्फ डिजिटल फॉर्मेट में ही उपलब्ध होता है। इसका फायदा यह होता है कि छोटी कहानियों की लोकप्रियता से लेखक के पक्ष में एक माहौल बनता है और उसकी आगामी कृति के लिए पाठकवर्ग में एक उत्सुकता पैदा होती है। जब वह उत्सुकता अपने चरम पर होती है तो प्रकाशक बाजार में उक्त लेखक की किताब पेश कर देता है। उत्सुकता के उस माहौल का फायदा परोक्ष रूप से प्रकाशकों को होता है और वह मालामाल हो जाता है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है, क्योंकि कारोबार करने वाले अपने फायदे की रणनीति बनाते ही रहते हैं। मशहूर और बेहद लोकप्रिय ब्रिटिश थ्रिलर लेखक ली चाइल्ड ने भी अपने उपन्यास के पहले कई छोटी-छोटी कहानियां सिर्फ डिजिटल फॉर्मेट में लिखी। उन्होंने साफ तौर पर माना कि ये कहानियां वह अपने आगामी उपन्यास के लिए पाठकों के बीच एक उत्सुकता का माहौल बनाने के लिए लिख रहे हैं। इससे साफ पता चलता है कि प्रकाशक के साथ-साथ अब लेखक भी ज्यादा से ज्यादा लिखकर खुद को कारोबारी रणनीति का हिस्सा बना रहे हैं। चाइल्ड ने माना है कि पश्चिम की दुनिया में सभी लेखक कमोबेश ऐसा ही कर रहे हैं और उनके मुताबिक दौड़ में बने रहने के लिए ऐसा करना बेहद जरूरी भी है। इन स्थितियों की तुलना में अगर हम हिंदी लेखकों की बात करें तो उनमें से कई वरिष्ठ लेखकों को अब भी सोशल नेटवर्किग साइट्स से परहेज है। उनकी अपनी कोई वेबसाइट नहीं है। दो-चार प्रकाशकों को छोड़ दें तो हिंदी के प्रकाशकों की भी कोई वेबसाइट अभी तक नहीं है। हिंदी के वरिष्ठ लेखक अब भी फेसबुक और ट्विटर से परहेज करते नजर आते हैं। नतीजा यह कि हिंदी में लेखकों पर अब भी पाठकों का कोई दबाव नहीं और वह अपनी धीमी रफ्तार से लेखन करते आ रहे हैं। हालांकि वह रोना यही रोते हैं कि पाठक नहीं हैं। वक्त के साथ अगर नहीं चलेंगे तो वक्त भी आपका इंतजार नहीं करेगा और आगे निकल जाएगा। हिंदी के लेखकों के लिए यह वक्त चेतने का है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

नापाक इरादों की झलक


मायावती के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला कई सवाल खड़े करता है। केंद्रीय जांच ब्यूरो के अनुसार उसने ताज कॉरीडोर परियोजना में भ्रष्टाचार को लेकर 2003 में मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति रखने का मामला भी दर्ज किया था। नौ साल बाद सर्वोच्च न्यायालय ने यह पाया कि सीबीआइ को ऐसा करने का अधिकार ही नहीं था। शीर्ष अदालत की मानें तो उसने सीबीआइ को कभी भी मायावती के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज करने का आदेश नहीं दिया। इसका अर्थ है कि जांच एजेंसी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया। सीबीआइ की ओर से गफलत किए जाने से इन्कार नहीं, लेकिन आखिर इस भूल को पकड़ने में नौ साल कैसे लग गए? इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि सीबीआइ ने गलत एफआइआर दर्ज कर ली थी तो फिर सुप्रीम कोर्ट उसकी प्रगति रिपोर्टो पर विचार क्यों करता रहा? यह उल्लेखनीय है कि सीबीआइ ने इस मामले की जांच से जुड़ी एक-दो नहीं, छह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को दीं। सीबीआइ के मुताबिक इन सभी रिपोर्टो को स्वीकार करते हुए शीर्ष अदालत ने ताज कॉरीडोर और आय से अधिक संपत्ति के केस को अलग-अलग करने का फैसला सुनाया। आखिर यह क्या पहेली है और इसे कौन सुलझाएगा? मायावती ने समय-समय पर खुद ही अपनी आय घोषित की है। इसके अनुसार 2007 में 52 करोड़ की आय 2012 में 111 करोड़ रुपये हो गई। यह कोई नया-अनोखा अथवा इकलौता मामला नहीं। देश में ज्यादातर नेताओं की आय इसी तरह दिन-दूनी रात चौगुनी गति से बढ़ती है। क्या कोई यह बताएगा कि नेताओं के साथ ही ऐसा क्यों होता है? हमारे ज्यादातर नेता न तो किसी लाभ के पद पर होते हैं और न ही किसी व्यवसाय को सीधे संचालित कर रहे होते हैं, लेकिन उनकी आय में इजाफा बाजार के सभी नियमों को मुंह चिढ़ाते हुए होता रहता है। क्या भारत की राजनीति किसी अलग किस्म के अर्थशास्त्र से चलती है? यह ठीक नहीं कि नेतागण अपनी आय में असामान्य वृद्धि दर्शाते रहें और फिर भी हमारे नीति-नियंताओं में कहीं कोई हलचल न हो। यदा-कदा वे तब संकट में आते हैं जब किसी विवाद या घोटाले के चलते उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज हो जाता है। इसके बावजूद बहुत कुछ सीबीआइ और उसे कठपुतली की तरह नियंत्रित करने वाली केंद्रीय सत्ता पर निर्भर करता है। इसकी ताजा मिसाल आंध्र प्रदेश के सांसद जगनमोहन रेड्डी हैं। जगनमोहन ने कांग्रेस से निकलकर जैसे ही नई पार्टी बनाई, केंद्रीय सत्ता को यह नजर आ गया कि उन्होंने अनुचित तरीके से करोड़ों की संपत्ति बनाई है। वर्तमान में उनके खिलाफ सीबीआइ एवं अन्य केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता देखते ही बनती है। यह किसी से छिपा नहीं कि मायावती के मामले में सीबीआइ ने किस तरह समय-समय पर सक्रियता और निष्कि्रयता दिखाई। मौजूदा राजनीतिक माहौल में यह लगभग तय है कि यदि मायावती के प्रकरण में सीबीआइ चाहेगी तो भी उसे पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की अनुमति नहीं मिलने वाली। यदि इस मामले में भाजपा को सफाई देनी पड़ रही है तो इसके लिए एक हद तक वह भी जिम्मेदार है। यदि उसने केंद्रीय सत्ता का नेतृत्व करते समय सीबीआइ को वास्तव में स्वायत्त बनाने के लिए कोई ठोस पहल की होती तो आज दूसरी ही स्थिति होती।

Thursday, July 5, 2012

अहम है शिक्षा में बुनियादी सुधार


यह हमारे ही देश में संभव है कि शिक्षा में बुनियादी सुधारों की बजाय आरक्षण को हथियार बनाकर उसके दोहन के प्रयास किए जाते हैं। मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक बदलाव में जो उत्साह दिखा रहे हैं, उनकी पृष्ठभूमि में शिक्षा में गुणवत्ता की दृष्टि से सुधार लाना कम, शिक्षा का अंग्रेजीकरण और शिक्षा को निजी शिक्षा केंद्रों के टापुओं में बदलने की कवायद ज्यादा है। जबकि हमारे उद्देश्य ये होने चाहिए कि शिक्षा क्षेत्र से एक तो असमानता दूर हो, दूसरे वह केवल पूंजी से हासिल करने का आधार न रह जाए। इस नजरिये से आइआइटी परिषद ने आइआइटी में प्रवेश का जो पैमाना तय किया है, उसे सहमति से स्वीकार लेना चाहिए। परिषद के निर्णय के अनुसार छात्रों की योग्यता का मापदंड परीक्षा से उत्तीर्ण हुए शीर्ष 20 फीसद छात्रों को आइआइटी में प्रवेश के काबिल माना जाएगा। इससे एक तो अंग्रेजी और हिंदी दोनों ही माध्यमों से पास होने वाले छात्रों को प्रवेश मिलेगा। दूसरे ग्रामीण अंचलों में सरकारी पाठशाओं में पढ़ रहे छात्रों को भी सीधे आइआइटी में सरलता से प्रवेश कर लेने की सुविधा हासिल होगी। यह पैमाना आरक्षण और जातीय मसले से छुटकारे का कालांतर में एक उत्तम उपाय सबित हो सकता है। यह हल आइआइटी चेन्नई के संचालक मंडल के अध्यक्ष एएन शर्मा के सुझाव पर सर्वसम्मति से निकाला गया है। इस समझौते के मुताबिक 2013 में आइआइटी में दाखिला बोर्ड परीक्षा में प्राप्त प्राप्तांकों या रैंक के आधार पर होगा। साथ ही यह शर्त भी लागू होगी कि चयनित छात्र अपने राज्य या केंद्रीय बोर्ड के शीर्ष 20 फीसद छात्रों में ंसे हों। इससे पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा जिस साझा प्रवेश परीक्षा का प्रस्ताव रखा था, उसे आइआइटी दिल्ली और कानपुर के संचालक मंडलों ने प्रस्ताव लाकर निरस्त कर दिया। बोर्ड परीक्षा में शीर्ष 20 फीसद आने वाले छात्रों को आइआइटी की एक और परीक्षा से गुजरना होगा। इस एडवांस परीक्षा में केवल शीर्ष डेढ़ लाख सफल छात्रों को परीक्षा देने की इजाजत दी जाएगी। इस फैसले से अब अलग-अलग आइआइटी के लिए अलग-अलग प्रवेश परीक्षा आयोजित करने की जरूरत नहीं रह जाएगी। छात्रों को भी अलग-अलग आइआइटी के प्रवेश-पत्र भरने और फिर अलग-अलग स्थानों पर परीक्षा देने जाने के झंझट से मुक्ति मिलेगी। चूंकि इस पैमाने में सभी राज्यों के और केंद्रीय मंडलों के शीर्ष 20 फीसदी छात्रों को मुख्य परीक्षा में बैठने का अवसर मिलेगा, जाहिर है इससे सरकारी शिक्षा संस्थानों में पढ़कर आने वाले छात्रों को भी आइआइटी में प्रवेश का स्वर्णिम मौका हाथ लगेगा। वर्तमान परिदृश्य में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर छात्र मध्यम और निम्न आय वर्ग से तो हैं ही, पिछड़ी और अनुसूचित व अनुसूचित जनजाति के छात्रों की संख्या भी इन्हीं स्कूलों में ज्यादा है। आइआइटी में प्रवेश के इस नए आधार पर जब परिणाम की अंतिम सूची जारी होगी तो विश्वास है कि हम पाएंगे कि आरक्षित वर्ग के छात्रों की संख्या आरक्षण के तय प्रावधानों से कहीं अधिक होगी। यदि ऐसा होता है तो यह पैमाना आरक्षण मुक्त समान शिक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम होगा? हालांकि केंद्र सरकार जिस एकतरफा सोच के चलते शिक्षा में निजी क्षेत्र की भागीदारी और प्रतिस्पर्धा परीक्षाओं को कोचिंग-कक्षाओं से जोड़कर पूंजी आधारित प्रतिभा-विकास को प्रोत्साहित कर रही है, उस पर भी अंकुश लगाने की जरूरत है। क्योंकि यह सुविधा सिर्फ वे छात्र हासिल कर पा रहे हैं, जो जाति, पद और पूंजी के आधार पर आभिजात्य श्रेणी में आ गए हैं। निजी विद्यालय इस कुरीति को प्रोत्साहित कर शिक्षा को जबरदस्त मुनाफे का बाजार बनाने में लगे हैं। दोहरी पढ़ाई करने वाले ऐसे छात्रों को यदि प्रतिस्पर्धा परीक्षाओं से रोक दिया जाए तो अभावग्रस्त छात्रों का दाखिला इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में एकाएक बढ़ जाएगा। आरक्षण मुक्त शिक्षा में समानता की दृष्टि से यह भी एक अच्छी पहल होगी। आरक्षण को बढ़ावा देना ही है तो अब कोशिश यह होनी चाहिए कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों को प्रतिस्पर्धा परीक्षाओं में प्रात्रता हासिल करने के लिए आरक्षण दिया जाए। इस उपाय से वंचित और आर्थिक रूप से अभावग्रस्त तबके को महत्व तो मिलेगा ही, देश की हिंदी समेत सभी राजभाषाओं के महत्व को अंगीकार भी कर लेने का सिलसिला शुरू हो सकता है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

आइआइटी में आरक्षण का सवाल


प्रवेश परीक्षा को लेकर देश के आइआइटी और मानव संसाधन विकास मंत्री के बीच चले वाकयुद्ध के बाद पिछले दिनों उसके स्वरूप को लेकर एक सहमति बनी है, जिसे वर्ष 2013 से लागू किया जाएगा। सवाल उठता है कि आइआइटी बोर्ड की इस बैठक में क्या इस बात पर भी कुछ विचार हुआ कि आखिर इन अभिजात संस्थानों में किस तरह संविधान प्रदत्त आरक्षण के नियमों की खुल्लमखुल्ला अनदेखी चल रही है। मालूम हो कि ब्रांड वैल्यू बने आइआइटी जैसे संस्थान शिक्षकों की भर्ती के लिए सरकार द्वारा बनाए गए नियमों का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन किस तरह करते रहे हैं, किस तरह वे अति पिछड़ी जाति, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के उम्मीदवारों को आरक्षण से वंचित करने के लिए ऐसे नियमों को उद्धृत करते रहे हैं, जो उनके ऊपर लागू ही नहीं होते। यह मसला हाल में सुर्खियां बना है। पिछले दिनों चेन्नई में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग द्वारा आयोजित सुनवाई में आइआइटी मद्रास के प्रतिनिधि की तरफ से जो विस्फोटक स्वीकारोक्ति की गई, उसका अर्थ यही निकलता है। दरअसल, यह मसला आइआइटी मद्रास के पूर्व छात्र ई. मुरलीधरन की याचिका के चलते इस बार नए सिरे से सामने आया है। प्रस्तुत सुनवाई में आइआइटी की तरफ से उपस्थित डीन सी. श्रीराम ने मौखिक तौर पर स्वीकार किया कि आइआइटी में आरक्षण नियमों का पालन नहीं होता रहा है। इस संबंध में उन्होंने रिपोर्ट रखने के लिए छह दिन की मोहलत मांगी है। याद रहे कि आइआइटी में अपने उत्कृष्ट परफार्मेस के लिए पुरस्कृत मुरलीधरन ने वर्ष 1995 में अमेरिका और जापान में अकादमिक कार्यो को पूरा करने के बाद आठ दफा वहां फैकल्टी में स्थान पाने की कोशिश की थी, मगर उन्हें यह कहकर टरका दिया गया कि वहां आरक्षण के कोटा संबंधी नियम लागू नहीं होते हैं। अंतत: जनाब मुरलीधरन ने इस मसले को लेकर आयोग में शिकायत दर्ज की कि किस तरह आइआइटी एवं अन्य संस्थानों में अनुसूचित तबके के उच्च शिक्षा प्राप्त उम्मीदवारों को उनके लिए उचित नौकरियों से वंचित किया जा रहा है, जबकि दूसरी तरफ मानव संसाधन विकास मंत्री संसद में कह रहे हैं कि इन संस्थानों मे तीन हजार से अधिक रिक्तियां हैं और हम विदेशों से शिक्षक लाने की योजना बना रहे हैं। जातिगत भेदभाव आइआइटी द्वारा संविधान प्रदत्त अधिकारों से अनुसूचित तबकों को वंचित करने का यह मसला पहली दफा नहीं उठा है। आज से पांच साल पहले एक अंग्रेजी साप्ताहिक ने इस मसले पर एक लंबी स्टोरी की थी। चेन्नई स्थित आइआइटी पर केंद्रित उपरोक्त स्टोरी में यह प्रश्न उठाने की कोशिश की गई थी कि किस तरह आइआइटी आधुनिक युग का अग्रहरम में रूपांतरित हुई हैं। तमिलनाडु में ऊंची जातियों के आवास को अग्रहरम कहते हैं। लेखक ने आंकड़ों के सहारे बताया था कि उपरोक्त संस्थान में अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों के लिए आवंटित 22.5 प्रतिशत कोटा इन तबकों से आने वाले छात्रों से भरा नहीं जाता। वर्ष 2005 के आंकड़ों के मुताबिक वहां अनुसूचित जाति के छात्र महज 11.9 फीसद थे, जबकि वांछनीय था 15 फीसद। उच्च शिक्षा में यह अनुपात और कम हो जाता है, रिसर्च में महज 2.3 फीसद और पीएचडी में 5.8 फीसद। वहां मौजूद कुल 4,687 छात्रों में महज 559 अनुसूचित जाति के हैं। शिक्षकों की नियुक्ति में भी इसी किस्म का भेदभाव बरता जाता है, जहां 460 फैकल्टी सदस्यों में महज चार (.86 फीसद) दलित हैं। 50 अन्य पिछड़ी जाति के हैं और बाकी सब ब्राह्मण हैं। दलित अध्यापक भी मेरिट के आधार पर भर्ती किए गए हैं यानी संकाय में भर्ती के लिए अनुसूचित जाति के स्थान बिल्कुल रिक्त थे। यह अकारण नहीं कि चेन्नई आइआइटी में भर्ती संबंधी कई मुकदमे अदालत में लंबित पड़े हैं। चेन्नई आइआइटी की चर्चा में सबसे मर्मस्पर्शी कहानी दलित तबके से संबंधित सुजी टेप्पल नामक छात्रा की थी, जिसने नब्बे के दशक के उत्तरा‌र्द्ध में वहां एडमिशन लिया था। सुजी ने इंटरमीडिएट की परीक्षा में गणित, भौतिकी और रसायन में 94 फीसदी नंबर प्राप्त किए थे। दलित-आदिवासी तबके से आने वाले छात्रों के लिए आइआइटी में प्रीपरेटरी कोर्स चलाए जाते हंै। हालांकि सुजी के लिए ऐसे कोर्स की आवश्यकता नहीं थी। इसके बावजूद उसे यह प्रीपरेटरी कोर्स लेने के लिए मजबूर किया गया और एक साल बाद उसे फेल घोषित कर संस्थान से निकाल दिया गया। एक प्रतिभाशाली छात्रा के साथ हुए इस अन्याय के खिलाफ राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग भी सक्रिय हुआ और राज्य के तत्कालीन अनुसूचित जाति/जनजाति के मंत्री ने भी कोशिश की, लेकिन उसे वापस नहीं लिया गया। यह अकारण नहीं था कि तमिलनाडु के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मांग की थी कि आइआइटी चेन्नई अनुसूचित जाति-जनजाति की स्थिति पर एक श्वेतपत्र जारी करे। स्पष्ट है कि तमाम कोशिशों के बावजूद यह श्वेत पत्र जारी नहीं हुआ। तंत्र की खामोशी जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न की शिकायतों के मामले में आइआइटी चेन्नई ही नहीं, सभी आइआइटी में एक जैसी ही स्थितियां हैं। और यह भेदभाव अध्यापक-कर्मचारी पदों पर संविधान प्रदत्त आरक्षण की अवहेलना करने से लेकर आए दिन उनके साथ होने वाली प्रत्यक्ष-परोक्ष उत्पीड़न की घटनाओं से संबंधित है। पिछले दिनों आइआइटी मुंबई में भी दलित छात्रों ने उनके साथ किए जा रहे दु‌र्व्यवहार को लेकर विरोध दर्ज किया था। विडंबना यही कही जाएगी कि इन तबकों से आने वाले छात्रों को संविधान प्रदत्त आरक्षण प्रदान करने से वंचित करने से लेकर कर्मचारी तथा अध्यापक समुदाय में भी आरक्षित तबके से आने वाले लोगों को कम से कम रखने के बावजूद इन अग्रणी संस्थानों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने आइआइटी दिल्ली के प्रशासन को यह निर्देश दिया कि वह कमजोर प्रदर्शन के नाम पर अनुसूचित जाति और जनजाति के विद्यार्थियों को संस्थान से निष्कासित नहीं कर सकती। देश की शीर्ष अदालत का साफ कहना था कि जो छात्र-छात्राएं एक लंबी प्रवेश प्रक्रिया से संस्थान में दाखिला ले सके हैं, उनके बारे में आनन-फानन फैसला लेकर उन्हें बाहर करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है। दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय अविनाश बागड़ी और अनुसूचित श्रेणी के पांच अन्य छात्रों द्वारा दायर उस याचिका पर विचार कर रहा था, जिसके अंतर्गत याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि किस तरह कमजोर प्रदर्शन के नाम पर आइआइटी प्रशासन अनुसूचित श्रेणी के छात्रों को आगे की पढ़ाई करने से रोकता है। इसमें यह भी बताया गया कि प्रशासन की लापरवाही के चलते आरक्षण की व्यवस्था बेकार हो चली है, क्योंकि अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए न अनुसूचित श्रेणी के छात्रों को बेहतर अवरचना प्रदान की गई, न विशेष कोचिंग का इंतजाम किया गया, जिसका नतीजा था कि अनुसूचित श्रेणी के 90 फीसद छात्र या तो प्रथम वर्ष या द्वितीय वर्ष में फेल हो गए और संस्थान के बाहर हो गए या उन्हें निष्कासित किया गया। क्या ऐसी तमाम घटनाओं को मानवीय भूल कहा जा सकता है? निश्चित ही नहीं। दरअसल, यह एक सचेत कोशिश प्रतीत होती है ताकि इन तबकों से आने वाले लोगों को इन अहम अवसरों से वंचित किया जाए। सवाल उठता है कि द्रोणाचार्य का महिमामंडन करने वाले समाज में एकलव्यों को कब तक अपनी परीक्षा देती रहनी पड़ेगी? (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

विकास निधि का दुरुपयोग


उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रदेश के विधायकों को एक तोहफा देने की कोशिश की। उन्होंने दो लाख करोड़ रुपये के कर्ज वाले प्रदेश के माननीय विधायकों को विकास निधि से बीस लाख रुपये तक की कार खरीदने की छूट की घोषणा की। अखिलेश यादव से उनके समर्थकों को बहुत उम्मीद है और उनके विरोधियों को आशंका है कि वे उम्मीद पर खरे न उतर जाएं। सत्ता का एक स्वाभाविक अवगुण होता है वह जमीनी वास्तविकता से नेता को काट देती है। जनता के वोट से चुनकर सत्ता में आने वाले नेता को लगता है कि चुनाव के बाद जनतंत्र स्थगित हो जाता है और राजतंत्र शुरू हो जाता है। इसी मानसिकता के चलते सरकारों के मुखिया रेवड़ी बांटने को अपना वैधानिक अधिकार समझने लगते हैं। अखिलेश यादव को जिसने भी यह सलाह दी थी वह उनका हितैषी तो नहीं ही है। अपने फैसले को वापस लेकर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री ने संदेश दिया है कि वे गलतियों से सीखने और उन्हें सुधारने के लिए तैयार हैं। सांसद निधि की शुरुआत 1993 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहा राव ने की थी। सांसदों को सामूहिक रूप से भ्रष्ट करने की यह शुरुआत थी। सांसदों की खरीद-फरोख्त करके अपनी सरकार बचाने वाले नरसिंहा राव को सांसदों को खुश करने का यह नायाब तरीका नजर आया। उसके बाद कोई सरकार इसे खत्म करने का राजनीतिक साहस नहीं जुटा सकी। सांसद निधि के आधार राज्यों ने विधायक निधि की शुरुआत की। सांसद और विधायक निधियां उनके क्षेत्रों के बजाय उनके विकास का औजार बन गई हैं। हाल यह है कि जो ईमानदारी से अपने क्षेत्रों में काम कराते हैं और जो सिर्फ कमीशन को ध्यान में रखकर काम कराते हैं, दोनों के अपने-अपने ठेकेदारों की एक फौज तैयार हो गई है। जिस जनता के लिए काम होता है उसे पता है कि सांसद या विधायक महोदय का इसमें कितना हिस्सा होता है। इसके बाद भी किसी को भ्रष्टाचार के प्रमाण की जरूरत हो तो वह सीएजी की रिपोर्ट पढ़ ले। या सांसद और विधायक निधि के तहत होने वाले काम की दर और बाजार भाव पता कर ले, उसे सैकड़ों सुरेश कलमाडी मिल जाएंगे। ज्यादातर बड़े नेता सांसद निधि के पैसे का इस्तेमाल ही नहीं करते। सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक 2004 से 2009 के बीच सांसद निधि का आधा पैसा इस्तेमाल ही नहीं हुआ। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने सांसद निधि का पैसा सालाना दो करोड़ से बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये कर दिया है। सासंद निधि के इस्तेमाल का एक नायाब तरीका बिहार के एक बाहुबली सांसद ने बताया। उनका कहना था कि उनके पास हर समय पांच-छह लड़के रहते हैं जो उनके लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। अब उनके खर्चा पानी का इंतजाम करना तो बनता है न। सांसद महोदय सांसद निधि से दस से पंद्रह लाख रुपये के काम का जिम्मा इनमें से प्रत्येक को दे देते हैं। इस ताकीद के साथ कि इसमें आधा तुम्हारा और बाकी का काम करा देना। उनकी नजर में लूट का यह समतावादी सिद्धांत है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ। यह जितना महत्वपूर्ण है उससे ज्यादा अहम है अखिलेश यादव का मुख्यमंत्री बनना। राज्य के राजनीतिक दलों के नेतृत्व में लंबे समय से कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। वही-वही चेहरे देखकर लोग ऊब चुके हैं। अखिलेश का नेतृत्व एक ताजा हवा के झोंके की तरह आया जो पढ़ा-लिखा और सुसंस्कृत है, अपने विरोधियों से भी सम्मान से पेश आता है। लोगों को उम्मीद थी और अभी है कि समाजवादी पार्टी की कार्यसंस्कृति बदलेगी और उत्तर प्रदेश बदलेगा। लोगों को उम्मीद है कि राज्य के नए मुख्यमंत्री विकास के नए उपाय सुझाएंगे और उन पर अमल करेंगे। विधायकों को अपने क्षेत्र की बेहतर सेवा के लिए सुविधाएं मिलें इससे किसी को इनकार नहीं हो सकता, पर इसके लिए उन्हें बीस लाख की गाड़ी चाहिए, इससे कोई कैसे सहमत हो सकता है। राज्य में गेहूं सड़ने की जांच इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर हो रही है। जाहिर है प्रदेश के पास पर्याप्त भंडारण क्षमता नहीं है। देश में पैदा होने वाली सब्जियों और फलों का एक-तिहाई भंडारण क्षमता के अभाव में बर्बाद हो जाता है। ऐसे में क्या यह अच्छा नहीं होता कि राज्य सरकार तय करती कि विधायक निधि में जो बढ़ोतरी की जा रही है, पहले साल में उसका बढ़ा हुआ पैसा कोल्ड स्टोरेज बनाने पर खर्च किया जाएगा। उत्तर प्रदेश वित्त निगम दो करोड़ तक के कोल्ड स्टोरेज पर पच्चीस फीसदी सब्सिडी भी देता है। इस पैसे से प्रदेश के हर लोकसभा क्षेत्र में एक नया कोल्ड स्टोरेज खुल सकता है। इससे किसानों को अपने उत्पाद को ज्यादा समय तक रखने और बेहतर कीमत पाने का अवसर मिलता। रोजगार के अवसर बढ़ते। इससे सरकार का बेरोजगारी भत्ते का बिल घटता। जिस राज्य के पास संसाधनों की कमी हो उसे उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग के नए-नए तरीके खोजने चाहिए। अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री के तौर पर अपने पहले कार्यकाल में जैसा अवसर मिला है उनके पिता मुलायम सिंह यादव को कभी नहीं मिला। मुलायम सिंह यादव तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। तीनों बार उनकी ताकत सरकार चलाने से ज्यादा सरकार बचाने में खर्च हुई। अखिलेश यादव को सरकार की स्थिरता की बारे में सोचने की भी जरूरत नहीं है। चुनाव में उन्हें कमोबेश हर वर्ग का समर्थन मिला है। वह जातिवाद या सांप्रदायिकता के रथ पर सवार होकर सत्ता में नहीं आए हैं। उत्तर प्रदेश के इतिहास में मायावती के बाद अखिलेश यादव दूसरे मुख्यमंत्री होंगे जिसे पांच साल का पूरा कार्यकाल मिलेगा। प्रदेश कांग्रेस शरणागत है। भाजपा ने तय कर लिया है कि उत्तर प्रदेश में उसका मुकाबला कांग्रेस से ही रहेगा। मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी पिछले पांच साल में हुए भ्रष्टाचार के मुकदमों में उलझी रहेगी। अखिलेश को निष्कंटक राज मिला है। उन्हें कोई खतरा है तो अपनी ही पार्टी के लोगों से और ऐसे सलाहकारों से जो विधायकों को बीस लाख की गाड़ी जनता के पैसे से खरीदने की सलाह देते हैं। लखनऊ में चर्चा है कि अखिलेश के करीबी उन्हें अर्जुन बताते हैं जो कौरवों से घिरे हुए हैं। अगर ऐसा है तो उन्हें इस चक्रव्यूह से जल्दी निकलना होगा, क्योंकि उम्मीद के नाउम्मीदी में बदलने में ज्यादा समय नहीं लगता। राजनीति में सही फैसले से भी ज्यादा जरूरी होता है सही समय पर सही फैसला। समाजवादी पार्टी को 20 लाख की गाड़ी से ज्यादा जरूरत साइकिल की है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं) 12श्चश्रल्ल2@Aंॠ1ंल्ल.Yश्रे