Monday, May 28, 2012

काले धन के खिलाफ खोखली पहल


अपने वादे के मुताबिक सरकार ने काले धन पर संसद में श्वेत पत्र पेश तो कर दिया है, लेकिन यह कदम महज औपचारिकता भरा लग रहा है। इसमें काले धन की आधी हकीकत भी सामने नहीं आ पाई। कुल 97 पेज के इस श्वेत पत्र में न तो यह बताया गया है कि भारतीयों का कितना काला धन देश या विदेश में जमा है और न ही जमाकर्ताओं के नाम का खुलासा है। हां, इसमें काले धन की समस्या से निजात पाने के लिए लोकपाल और लोकायुक्त के गठन की पुरजोर पैरवी जरूर की गई है। यह दावा भी किया गया है कि स्विस बैंकों में जमा काले धन में कमी आई है। हालांकि श्वेत पत्र में धन का ब्यौरा न देने की वजह इसका कोई एक आंकड़ा और इसके बारे में पता लगाने के लिए कोई सर्वमान्य विधि का नहीं होना बताया गया है। श्वेत पत्र में कहा गया है कि काले धन को लेकर कोई विश्वसनीय आंकड़ा नहीं है और न ही इसका पता लगाने के लिए कोई सर्वमान्य विधि है। अब तक जो भी आकलन आए हैं, सभी अलग-अलग तरह के हैं। ऐसे में अगर इसे केंद्र सरकार की एक पहल मानी जाए तो भी सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर विदेशों में जमा काला धन कब वापस आ पाएगा? क्या श्वेत पत्र से आगे भी सरकार कार्रवाई कर पाएगी और अगर सरकार ऐसी कोई कार्रवाई करेगी भी तो देश को इसके लिए और कितना इंतजार करना होगा। श्वेत पत्र का स्याह पहलू श्वेत पत्र में वित्तीय अपराध से तेजी से निपटने के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों का जिक्र है और अपराधियों को कडे़ दंड देने की बात कही गई है। कुल 97 पेज के इस दस्तावेज में इस धारणा को गलत साबित करने की कोशिश की गई है कि सरकार काले धन की समस्या से निपटने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रही है। काले धन की समस्या से निपटने के लिए श्वेत पत्र की प्रस्तावना में प्रणब मुखर्जी ने कहा कि उनकी सरकार ने पांच विधेयक पेश किए, जो लोकपाल विधेयक, न्यायिक जवाबदेही विधेयक, व्हिसल ब्लोअर विधेयक, शिकायत निपटान विधेयक और सार्वजनिक खरीद विधेयक हैं। ये विधेयक संसद में विभिन्न स्तरों पर विचाराधीन हैं। श्वेत पत्र में यह जरूर बताया गया है कि रियल एस्टेट, शेयर बाजार, सर्राफा, सार्वजनिक खरीदारी, एनजीओ आदि क्षेत्रों में सबसे ज्यादा काला धन बनाया जाता है। मगर विदेशी बैंकों में जमा काले धन को वापस लाने की कोई स्पष्ट नीति सरकार ने नहीं बताई है। भाजपा ने भी इस श्वेत पत्र को निराशा करने वाला बताते हुए खारिज किया, जबकि भाजपा के वरिष्ठ नेता जसंवत सिंह ने तो यहां तक कह दिया कि यह श्वेत पत्र बिकनी के जैसा है, जो आवश्यक चीजों को ढक लेती है। श्वेत पत्र में बताया गया है कि काले धन के मामले में दुनिया भर में भारत 15वें स्थान पर है। इस सूची के आधार पर पहले नंबर पर चीन है, जबकि दूसरे स्थान पर रूस। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के अध्यक्ष की अगुवाई में आठ सदस्य वाली टीम ने यह रिपोर्ट पेश की है। पर अहम सवाल यह है कि सरकार काले धन को लेकर वास्तव में सक्रिय है या फिर सक्रिय होने का स्वांग कर रही है। यह सवाल आए दिन सुर्खियां बटोर रहा है। पर काले धन को लेकर सरकार का रवैया क्या है, यह अभी पूरी तरह साफ नहीं है। ऐसे में लोगों में यह धारणा बन रही है कि सरकार जान-बूझकर लोगों का नाम छुपा रही है। भले सरकार यह कहे कि वह काले धन की समस्या को गंभीरता से ले रही है, लेकिन ताज्जुब होता है कि इस समय देश जिन समस्याओं का सामना कर रहा है, उनमें भ्रष्टाचार और काले धन से जुड़े मामले सबसे अहम हैं। फिर भी सरकार इन मामलों पर आक्रामक रुख अपनाने के बजाय बचाव की मुद्रा अपना रही है और कर क्षमादान जैसे नब्बे के दशक में अपनाए जा चुके घिसे-पिटे टोटकों को फिर से आजमाने का इरादा जता रही है। कब खुलेगी कलई सरकार ने काले धन का आकलन करने के लिए तीन अलग-अलग संस्थाओं को जिम्मेदारी दी है। इन संस्थाओं के नाम हैं नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फाइनेंस एंड मैनेजमेंट और नेशनल काउंसिल फॉर अप्लायड इकोनॉमिक रिसर्च। उम्मीद है कि ये तीनों संस्थाएं सितंबर 2012 तक अपनी रिपोर्ट सौंप देगी। यह सच है कि भारत में काले धन के बारे में अलग-अलग अनुमान हैं और अलग आंकड़े दिए जा रहे हैं। बाबा रामदेव से लेकर सीबीआइ के निदेशक तक अपने-अपने आंकड़े दे चुके हैं, लेकिन उनके सत्यापन का कोई तरीका नहीं है। बता दें कि श्वेत पत्र में सरकार ने भी अपना अनुमान नहीं दिया है, पर सीबीआइ निदेशक के मुताबिक यह राशि करीब 500 अरब अमेरिकी डॉलर है, जबकि भाजपा टास्क फोर्स के मुताबिक यह राशि 500 अरब से 14 खरब अमेरिकी डॉलर है। दूसरी ओर अमेरिका की ग्लोबल फाइनेंशियल स्टडी के अर्थशास्त्री देवकार द्वारा किए गए एक अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया है कि 1948 से 2008 के बीच भारत से करीब 20 लाख करोड़ रुपये देश से बाहर भेजे गए हैं। इसमें करीब 50 प्रतिशत काला धन 1991 के बाद देश से बाहर गया है, जबकि 2000 से 2008 के बीच इसमें से करीब एक तिहाई राशि देश से बाहर भेजी गई है। यही नहीं, अमेरिकी संस्था ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी (जीएफआइ) की रिपोर्ट के मुताबिक 2002 से 2006 के दौरान भारत में हर साल करीब 22.7 अरब डॉलर धनराशि बाहर गई है। फिलहाल इन पैसों के खातेदारों के नाम अज्ञात हैं, लेकिन संभावना जताई जा रही है कि देर-सबेर इनके नामों का खुलासा हो जाएगा। यह कालाधन सिर्फ स्विट्जरलैंड, लिंचेस्टाइन में ही नहीं, बल्कि कैरेबियाई द्वीप केमैन आइलैंड, जिब्राल्टर, मोनाको, लक्जमबर्ग से लेकर दुबई तक के बैकों में जमा है। सवाल यह है कि काले धन के अंकाउट धारक डीटीए (डबल टैक्सेशन एवॉयडेंस एग्रीमेंट) की जद में आते हैं या नहीं? डीटीए इसलिए बना है कि अप्रवासी टैक्स की दोहरी मार से बचें या देश से धन लूटकर ले जाने वालों के लिए? भारत सरकार डीटीए के अनुच्छेद 26 के हवाले से यह तर्क देती है कि हम काले धन के खाताधारकों के नाम बता नहीं सकते। इससे सूचना देने वाली सरकारों से वादा खिलाफी होती है। दूसरी ओर देश की बहुसंख्यक जनता तो विदेशी बैंकों में गया काला धन वापस आते हुए देखना चाहती है, क्योंकि देश का पैसा विदेशों में जमा रखने वाले देश के गुनहगार है और देश की जनता को उन गुनहगारों के नाम जानने का हक है। इसके अलावा यह देश की अर्थव्यवस्था और सरकार की साख से जुड़ा मामला भी है। तो मिल जाती राहत जनवरी, 2011 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आइएमएफ की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया कि एशिया की उभरती आर्थिक ताकतों में भारत प्रमुख है, लेकिन मनी लॉन्डरिंग ओर चरमपंथियों तक आर्थिक सहायता पहुंचने का खतरा उसके लिए एक बड़ी चुनौती है। बात सिर्फ यही नहीं है, विदेशों में जमा काला धन वापस लाकर देश की आर्थिक रफ्तार के आड़े आ रही अंतराष्ट्रीय बाजार की मंदी को निष्प्रभावी किया जा सकता है। दूसरी तरफ देश के राजकोषीय घाटे को कम करने में भी इससे मदद मिल सकती है। काले धन और घोटालों का आकार बढ़ता जा रहा है, क्योंकि काले धन की जड़ पर प्रहार करने का हौसला कोई नहीं जुटा पा रहा। समाधान चाहिए तो बड़ी मछलियों को साफ करना होगा। महज दिखावा करने के बजाय दृढ़ इच्छाशक्ति दिखानी होगी। अन्यथा, संसद में यों ही श्वेत पत्र पेश होते रहेंगे। बहस भी होगी, लेकिन समस्या खत्म नहीं होगी। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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