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Wednesday, March 14, 2012

कितने सुरक्षित हैं हमारे बांध


केरल और तमिलनाडु में तीखा विवाद उत्पन्न करने वाले मुल्लापेरियार बांध का मुद्दा चाहे अदालती कार्यवाही के दौर में कुछ थम-सा गया है, पर इस बेहद असुरक्षित बांध की छाया में रह रहे संभवत: लाखों लोगों की दहशत में कोई कमी नहीं आई है। 116 वर्ष पहले बना व हाल में आए भूकंपों से क्षतिग्रस्त हुआ यह बांध अब बेहद कमजोर हो चुका है व कई विशेषज्ञ यह राय जाहिर कर चुके हैं कि इस क्षेत्र में संभावित 6.5 रिक्टर के पैमाने के भूकंप को यह कतई सहन नहीं कर सकेगा। यदि यह बांध टूट गया तो इस बांध और पेरियार नदी घाटी में इसके और अगले बांध इडुक्की के बीच रहने वाले 75 हजार लोग गंभीर संकट में आ जाएंगे। यदि आसन्न संकट के वक्त इडुक्की बांध भी क्षतिग्रस्त हुआ तो तीस लाख तक लोगों का जीवन संकटग्रस्त हो सकता है। वास्तव में यह मुद्दा मूलत: दो राज्यों के विवाद का मुद्दा है ही नहीं क्योंकि केरल ने स्पष्ट कहा है कि किसी वैकल्पिक तौर-तरीके से वह तमिलनाडु को उसके निर्धारित हिस्से का पानी उपलब्ध करवाने से पीछे नहीं हटेगा। ऐसे में इस मामले को मूलत: संकटग्रस्त लोगों के जीवन की रक्षा के रूप में ही उठाया जाना चाहिए था और चूंकि जीवन की रक्षा से बड़ा और कोई उद्देश्य नहीं है, इसलिए बहुत पहले ही इस असुरक्षित बांध को हटा कर कोई वैकल्पिक व्यवस्था कर दी जानी चाहिए थी। पर जिस तरह बड़ी संख्या में लोगों को दहशत में रहने को मजबूर किया जा रहा है, उससे एक बार फिर जाहिर हो गया है कि सरकारी स्तर पर बांध सुरक्षा का मुद्दा कितना उपेक्षित रहा है। कुछ समय पहले अगस्त, 2011 में संसद की स्थाई समिति ने संसद को प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में सरकार की इस बात के लिए तीखी आलोचना की थी कि बांध सुरक्षा विधेयक का प्रस्ताव आने के बाद उससे संबंधित बिल को तैयार करने में सरकार ने 25 वर्ष का समय लिया। साथ ही इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इतनी देरी के बाद जो बिल तैयार किया गया है वह बेहद कमजोर व अप्रभावी है। उसमें बांध के विफल होने या सुरक्षा के प्रावधानों की अवहेलना की स्थिति में समुचित दंड की व्यवस्था नहीं की गई है। बिल में प्रतिकूल प्रभावित या क्षतिग्रस्त लोगों के मुआवजे का प्रावधान नहीं है। किसी स्वतंत्र नियमन की व्यवस्था भी बिल में नहीं है। बांध सुरक्षा की अवहेलना विभिन्न परियोजनाओं संबंधी निर्णयों व निर्णय प्रक्रियाओं में भी नजर आती है। टिहरी बांध के संदर्भ में अब शायद कम लोगों को यह याद होगा कि केंद्रीय सरकार द्वारा ही नियुक्त की गई एक विशेषज्ञों की समिति (पर्यावरण मंत्रालय की नदी घाटी परियोजनाओं से संबद्ध समिति) ने कहा था कि इस परियोजना की सुरक्षा संबंधी चिंताएं असहनीय हद तक अधिक हैं और इन्हें ध्यान में रखते हुए इस परियोजना को त्याग देना चाहिए। इतनी स्पष्ट प्रतिकूल संस्तुति के बावजूद भी टिहरी परियोजना के कार्य को तेजी से आगे बढ़ाया गया। आज परियोजना के पूर्ण होने के बाद यह स्पष्ट है कि इसके बड़े खतरे हमारे सामने आते जा रहे हैं जबकि इससे प्राप्त हो रहा वास्तविक लाभ इसके पूर्व प्रचारित लाभ से कहीं कम है। अब ऐसी ही सुरक्षा संबंधी अवहेलना कोसी बराह क्षेत्र बांध परियोजना के संदर्भ में भी नजर आ रही है। यह सच है कि कोसी नदी की बाढ़ का मामला काफी पेचीदा है, पर इसका अर्थ यह नहीं है कि इसका समाधान ऐसी परियोजना में खोजा जाए जिसकी सुरक्षा पर कई सवालिया निशान पहले ही लग चुके हैं। कुछ समय पहले भारत-नेपाल संयुक्त नदी आयोग की बैठक के बाद कोसी नदी पर बराह क्षेत्र में हाई डैम बनाने के लिए विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने की चर्चा ने जोर पकड़ा है। कहा जा रहा है कि प्रोजेक्ट रिपोर्ट अब शीघ्र ही तैयार होगी। इस बारे में मूल प्रस्ताव तो लगभग 65 वर्ष पुराना है जिसमें चतरा घाटी में बराह क्षेत्र (नेपाल) के पास 229 मीटर ऊंचा कंक्रीट बांध बनाने व उसके साथ 1200 मेगावाट क्षमता का पनिबजली घर बनाने की बात कही गई थी। ध्यान देने की बात है कि उस समय भी यह योजना टलने की एक मुख्य वजह यह थी कि बराह क्षेत्र तीव्र भूकंप आशंका वाले इलाके में आता है और डैम के क्षेत्र के नजदीक वर्ष 1934 के समान 8.3 की तीव्रता वाले भूकंप के आने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। इस परियोजना से जुड़े रहे एनबी गाडगिल ने 11 सितम्बर, 1954 को लोकसभा को बताया था, ‘एक समय मुझे भी कोसी प्रोजेक्ट का काम-धाम देखना पड़ा था। वहां जब जमीन के अंदर छेद करने के प्रयोग किए गए तब पता चला कि वह पूरा का पूरा इलाका ऐसा है जिस पर भूकंप के झटके लगते हैं, तब हम लोगों को सोचना पड़ा कि वहां जलाशय बने या कोई दूसरी व्यवस्था की जाए। या फिर जैसा कि पिछले हफ्ते अल्जीयर्स में हुआ, वैसा दुबारा भी होगा। वहां भूकंप की वजह से या तो बांधों में दरार पड़ गई या वह ढह गए और कई बांधों का तो नामोनिशान ही मिट गया।’
इसी समय के आसपास 22 सितम्बर, 1954 को बिहार विधान सभा में वित्त मंत्री अनुग्रह नारायण सिंह ने कहा, ‘अभी 2-3 वर्षो से इसकी जांच ही रही थी कि कोसी नदी पर एक बांध बांधा जाए जो कि 700 फीट ऊंचा हो, लेकिन बाद में इस बात पर विचार किया गया कि अगर वह 700 फीट का बांध फट जाए तो जो पानी उसमें जमा है उससे सारा बिहार और बंगाल बह जाएगा और सारा इलाका तबाह और बरबाद हो जाएगा।’
कोसी नदी में गाद की मात्रा बहुत अधिक होने के कारण प्रस्तावित जलाशय में वह बहुत तेजी से एकत्र होगी और इस कारण बांध की आयु और उसकी जल-संग्रहण क्षमता पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा। यदि बांध से बड़े पैमाने पर अचानक बहुत मात्रा में पानी छोड़ना पड़ा तो इससे नीचे के तटबंधों के बीच फंसे लोग पूरी तरह उजड़ सकते हैं। इतना ही नहीं, तेज वेग से आने वाले इस जल से तटबंध टूट भी सकते हैं और इस तरह एक बड़ा क्षेत्र विनाशकारी बाढ़ की चपेट में आ सकता है। अभी इस ओर अपेक्षाकृत बहुत कम ध्यान गया है कि हमारे देश के अनेक बांध पहले भी टूट चुके हैं व विफल हो चुके हैं। जैसे कि राजस्थान में जुलाई 2007 में जसवंत सागर बांध ऐसे समय टूटा जबकि बड़े बांध सुरक्षा परियोजना के अंतर्गत इसका सुरक्षा आकलन चल रहा था। राजस्थान में गरारदा बांध तो पहली बार ही भरने पर ही टूट गया जिससे दर्जन भर गांवों में पानी भर गया। चंबल नदी की एक सहायक नदी गरारदा पर बने इस बांध के ढहने की जांच की गई तो भ्रष्टाचार और लापरवाही के कारण हुआ घटिया निर्माण इसकी प्रमुख वजह के रूप में सामने आया। आंध्रप्रदेश में हाल के वर्षो में कई बांध टूटे हैं। इनमें पूर्वी गोदावरी में सुब्बारया सागर, खम्माम में पालमवगू बांध व वारंगल जिले में गुंडलावगु बांध शामिल हैं। पिछले 65 वर्षो में देश में लगभग 50 बांध टूट चुके हैं जिसमें गुजरात के मच्छू डैम जैसे उदाहरण भी हैं जिन्होंने बहुत भीषण तबाही मचाई। इसके अतिरिक्त लगभग प्रत्येक वर्ष ही बड़े बांधों से अचानक पानी छोड़ने के कारण जो अधिक पल्रयकारी बाढ़ आती है उसकी विनाशलीला अलग है। कुछ बांधों के बनने के बाद आसपास के क्षेत्र की भूकंपीयता बढ़ गई है, यह भी एक गंभीर समस्या है। चीन के थ्री गार्जिस बांध से तो यह चौंकाने वाला समाचार मिला है कि इसके जलाशय में पानी भरने के बाद यहां की भूकंपीयता 30 गुना बढ़ गई है व लगभग 3 हजार भूकंप दर्ज हुए हैं। इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए यह जरूरी है कि बांधों की सुरक्षा को तवज्जो दी जाए और इसके लिए बांध सुरक्षा कानून में जरूरी सुधार किए जाएं। बांध सुरक्षा के सभी पक्षों में पारदर्शिता लानी चाहिए और इसमें सरकारी तंत्र से अलग स्वतंत्र विशेषज्ञों और प्रभावित लोगों के विचारों की सुनवाई की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। खतरनाक नई बांध परियोजनाओं में सुरक्षा पक्ष को समुचित महत्व दिया जाए व यह निर्णय प्रक्रिया निहित स्वाथरे के असर से मुक्त हो, यह भी बहुत जरूरी है।

Sunday, May 15, 2011

पहली प्राथमिकता बने शुद्ध पेयजल


समय-समय पर सरकार की ओर से ऐसे दावे होते रहे हैं कि लगभग सभी गांवों में सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था हो चुकी है या बस होने ही वाली है। इसके बावजूद तमाम ग्रामीण इलाकों से सुरक्षित पेयजल न मिलने के समाचार क्यों मिलते रहते हैं? गर्मियों के दौरान बड़े क्षेत्र में पेयजल को लेकर त्राहि-त्राहि क्यों मचती है? सरकारी आंकड़े अपने-अपने स्तर पर यह दावे करते हैं कि अमुक गांवों में हैंडपंप या ट्यूबवेल आदि जल-स्त्रोतों की व्यवस्था हो गई है, लेकिन वे इस बात की गारंटी नहीं दे सकते हैं कि जल-स्तर नीचे चले जाने के बाद भी इन हैंडपंपों या ट्यूबवेल में पानी उपलब्ध होगा? सरकारी आंकडे़ यह भी सुनिश्चित नहीं कर सकते हैं कि जिस नदी या झरने से पाइप लाइन के जरिए पानी आता था, अब उस नदी-झरने के सूख जाने या प्रदूषित हो जाने पर वहां से पेयजल की सप्लाई होती रहेगी या नहीं। इस तरह सरकारी आंकड़े अपनी जगह पर पेयजल उपलब्धियों का बखान करते रहते हैं और दूसरी ओर गांवों का पेयजल संकट भी अपनी जगह बना रहता है। साल के कुछ महीनों के लिए तो यह उग्र रूप धारण कर लेता है। आज भी हमारे देश में ऐसे कई इलाके हैं खासतौर से राजस्थान के कुछ हिस्से और बंुदेलखंड जहां लोगों को दूर-दूर से पानी ढोकर लाना पड़ता है या फिर जल संकट के कारण उस इलाके को छोड़ना पड़ता है। कुछ समय पहले यह लेखक राजस्थान में नमक बनाने के लिए मशहूर सांभर झील के पास ऐसे ही एक गांव में गया, जहां हवेलीनुमा बड़े मकान तो बने हुए थे, लेकिन बहुत खोजने पर चार-पांच लोग ही मिल पाए। शेष सब लोग पशुओं के साथ प्रवास कर चुके थे। दरअसल, यहां न तो पशुओं के लिए पानी उपलब्ध था और न ही मनुष्यों के लिए पेयजल। यहां के लोगों ने कितने प्रयत्न से इतने सुंदर मकान बनाए होंगे, लेकिन कहते हैं न कि बिन पानी सब सून। लिहाजा, जब जीवन की सबसे बुनियादी जरूरत पूरी न हुई तो उन्हें गांव ही छोड़ना पड़ा। अत: साफ और सुरक्षित पेयजल आपूर्ति को ग्रामीण विकास की सबसे बड़ी प्राथमिकता बनाना चाहिए। इस बारे में काफी व्यापक सहमति बनती तो है, लेकिन इसके अनुकूल आचरण नहीं किया जाता है। जगह-जगह पर बढ़ते प्रदूषण की ओर भंयकर लापरवाही के कारण कितनी ही नदियों और अन्य जल-स्त्रोतों का साफ पानी अब स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बन गया। कितने ही स्थानों पर दो-चार प्रदूषण फैलाने वाले बड़े कारखानों के मालिकों के हित साधने के लिए सैंकड़ों गांवों को पेयजल उपलब्ध करवाने वाले जल-स्त्रोतों को प्रदूषित होने दिया गया। जिस तरह जगह-जगह पर वनों और हरियाली को संकीर्ण स्वार्थो के लिए उजाड़ा गया, उससे स्पष्ट था कि इसका प्रतिकूल असर नदियों, झरनों, झीलों, तालाबों की जल ग्रहण क्षमता पर होगा और जब वन कट जाएंगे तो वर्षा के जल को संजोकर रखने की क्षमता बहुत कम हो जाएगी। इस समझ के बावजूद इस हरियाली को बचाने को समुचित महत्व नहीं दिया गया। इस तरह की लापरवाही का नतीजा यह है कि हैंडपंप और ट्यूबवेल व पाइप लाइन तो अपनी जगह पर मौजूद हैं, लेकिन उनमें पानी नहीं है। इसके अतिरिक्त हैंडपंप या पाइप लाइन के सही रख-रखाव की भी उचित व्यवस्था प्राय: नहीं हो पाती है। जब यह कार्य स्थानीय लोगों की भागीदारी से हो तो अच्छे परिणाम मिलते हैं, लेकिन यह भागीदारी कुछ चर्चित सफल प्रोजेक्टों तक ही सिमट कर रह गई है। जहां स्थानीय लोगों विशेषकर महिलाओं को हैंडपंप मिस्त्री का प्रशिक्षण दिया गया, वहां काफी उत्साहव‌र्द्धक परिणाम सामने आए हैं। पंचायतों की जन-भागीदारी प्राप्त करने में मूल भूमिका है, लेकिन सही अर्थो में इन्हें अधिकार नहीं मिले हैं तो कहीं उन्हें मौजूदा भ्रष्ट व्यवस्था से ही जोड़ दिया गया है। इस कारण पंचायती राज को जन-भागीदारी प्राप्त करने में वह लाभ नहीं मिल पा रहा है, जिसकी उम्मीद थी। कई स्थानों पर दलितों से पेयजल के मामले में भेदभाव करने का अन्याय आज तक बना हुआ है। हालांकि कई प्रोजेक्टों में विशेष तौर पर दलित और निर्धन आबादी की जरूरतों पर विशेष ध्यान देने को कहा जाता है, पर इसके बावजूद वे अनेक परियोजनाओं में न्यायोचित हिस्सेदारी से वंचित रखे जाते हैं। बड़े शहरी क्षेत्रों में तो जल वितरण की विषमता और भी स्पष्ट उभरती है। पॉश कालोनियों और बड़े होटलों में स्वीमिंग पूल, लॉन, गोल्फ कोर्स में सबसे गैरजरूरी कार्यो के लिए भी पानी की कोई कमी नहीं रहती है, जबकि स्लम बस्तियों में लोगों को बाल्टी भर पानी के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है। जल-वितरण की विषमता का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि गांवों की जरूरतों और पेयजल की आवश्यकता को नजरअंदाज करते हुए कई जल स्त्रोतों को बड़े उद्योगों और खदानों की ओर मोड़ दिया जाता है। हालांकि सरकारी नीतियों में पेयजल आपूर्ति को प्रमुखता देने की बात कही गई है, लेकिन अब ऐसी प्राथमिकताओं से मुंह मोड़ने के संकेत भी नजर आ रहे हैं। महानगरों की जलआपूर्ति के लिए गांवों की जरूरतों को पीछे करना तो काफी समय से चला आ रहा है। उत्तराखंड में गंगा के उद्गम स्थल के गांवों में पेयजल संकट की उपेक्षा होती है, जबकि गंगा के पानी को बड़े बांधों के माध्यम से महानगरों की ओर भेजा जाता है। इस तरह की अन्यायपूर्ण नीतियां जब बनती हैं, तब जन-भागीदारी को भी पीछे धकेला जाता है, क्योंकि लोग जो सवाल खड़े कर सकते हैं, उनका जवाब देना आसान नहीं है। जरूरत इस बात की है कि न्यायसंगत नीतियां बनें और उनके बेहतर क्रियान्वयन के लिए व्यापक जन-भागीदारी सुनिश्चित की जाए। पाइप लाइन तो सरकारी विभाग भी बिछा सकते हैं और हैंडपंप भी वे लगवा सकते हैं, पर उनका सही रख-रखाव तो जन-भागीदारी से ही हो सकेगा। सबसे जरूरी है जल संरक्षण और संग्रहण करते रहना, वर्षा की बहुमूल्य बूंदों को संजोना। यह तो जन-भागीदारी के बिना हो ही नहीं सकता है। सरकारी विभागों की अपनी सीमा है। उसके आगे जो जल संरक्षण का सबसे बुनियादी कार्य है, वह तो आम लोगों के व्यापक सहयोग से ही संभव है। जगह-जगह तालाबों, पोखरों आदि में वर्षा का जल संरक्षित रहेगा तो इससे कुएं, हैंडपंप में भी जल-स्तर बनाए रखने में मदद मिलेगी। कुछ समय पहले मैं जयपुर जिले के कोरसिना गांव में गया था। इस गांव में सरकारी ट्यूबवेल लगने के बावजूद एक समय यहां भीषण जल संकट पैदा हो गया था। इस स्थिति में सामाजिक कार्यकर्ताओं की सहायता से गांव समुदाय ने एक होकर पास की पहाड़ी पर जल संरक्षण का कार्य किया। इसका इतना लाभ मिला कि अनेक कुओं और हैंडपंपों में पानी की गुणवत्ता ठीक हो गई। खारापन कम हो गया। मीठा पानी मिलने लगा। आसपास के अनेक गांवों तक भी इस जल संरक्षण का लाभ पहुंचा। इस तरह के जन-भागीदारी के प्रयासों को अब मनरेगा जैसी सरकारी स्कीमों के माध्यम से देश में काफी स्तर पर अपनाया जा सकता है, पर इसके लिए निष्ठा व ईमानदारी से कार्य करने की जरूरत है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)