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Sunday, May 15, 2011

जब रक्षक ही बन जाएं भक्षक


पुलिस बल प्रशिक्षित, शिक्षित और अनुशासन का पाठ पढ़ाए गए कुछ विशिष्ट शासकीय सेवकों का वह बल होता है, जो विधि और व्यवस्था के पहरेदार होते हैं। यह पुलिस बल की परिभाषा है। पुलिस बल की इस सुपरिभाषित भूमिका के बावजूद मुल्क में आए दिन ऐसे मामले सामने आते रहते हैं, जिसमें भारतीय पुलिस का एक दूसरा ही रूप उजागर होता है। विधि और व्यवस्था के पहरेदार खुद कानून को तोड़ते हैं और खुलकर मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हैं। गोया कि, जिनके हाथों में अवाम की हिफाजत का जिम्मा है, वे ही उन पर जुल्म ढाते हैं। भारतीय पुलिस की अमानवीयता और दरिंदगी का एक ऐसा ही मामला हाल ही में सामने निकलकर आया। पिछले दिनों 18 साल पहले हुई एक वारदात के मुकदमे का फैसला सुनाते हुए हमारे मुल्क की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीमकोर्ट ने एक बार फिर भारतीय पुलिस बल के कामकाज पर सवालिया निशान लगाया है। अदालत ने अपने फैसले में पुलिसकर्मियों को साफ-साफ चेतावनी देते हुए कहा है कि वे अपने तौर-तरीके को बदलें, अवाम की जानिब संवेदनशील बनें। भक्षक की बजाय रक्षक बनें। तमिलनाडु के अन्नामलाई नगर में एक औरत को थाने में निर्वस्त्र कर सरेआम घुमाने, उसके पति के सामने ही बलात्कार करने और बाद में पति को पीट-पीटकर मार डालने जैसे हैवानियत से भरे मामले की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत की जस्टिस मार्कडेय काटजू और ज्ञानसुधा मिश्रा की पीठ ने आरोपी पांचों पुलिसवालों की हाईकोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को बरकरार रखते हुए इस बात पर भी अपना अफसोस जताया कि इतने जघन्यतम अपराध के लिए इन अपराधियों पर आइपीसी की धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा क्यों नहीं चलाया गया? अदालत न सिर्फ पुलिसवालों की करतूतों से खफा थी, बल्कि उसने निचली अदालत के कामकाज पर भी अंगुली उठाते हुए कहा कि ट्रायल कोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट दोनों ने ही वहशी पुलिसवालों के खिलाफ हत्या का मुकदमा न चलाकर फरियादी के साथ घोर नाइंसाफी की है। पीठ ने अपने फैसले में मजबूरी जताते हुए आगे कहा कि अब सजा बढ़ाने के लिए सरकार को नोटिस देने का भी कोई औचित्य नहीं, क्योंकि गुनाहगारों के खिलाफ निचली अदालतों में हत्या का अभियोग तक निर्धारित नहीं हुआ। यह मामला इतना दरिंदगी भरा और शर्मनाक था कि लोगों के सिर शर्म से झुक जाएं। पुलिसवाले पहले तो नंदगोपाल नाम के शख्स को महज चोरी के शक में पकड़कर थाने ले गए। बाद में उन पुलिसवालों ने उसकी पत्नी को भी थाने बुला लिया और उसके बाद टूटा इन दोनों मजलूमों पर पुलिसिया कहर। पुलिसवालों ने न सिर्फ मुल्जिम की पत्नी को चार दिन तक अपनी हवस का शिकार बनाया, बल्कि उसकी आंखों के सामने ही उसके पति को पीट-पीटकर मार डाला। तिस पर इंसाफ की अजब तस्वीर देखिए कि इस खौफनाक अपराध के लिए ट्रायल कोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट में अपराधियों पर सिर्फ आत्महत्या के लिए उकसाने का मुकदमा चला, जबकि मामला साफ-साफ दफा-302 का था। गुनाहगारों के खिलाफ कायदे से हत्या का अभियोग निर्धारित होना था। जाहिर है, निचली अदालतों में जिस तरह से पहले ही केस को कमजोर कर दिया गया, उसमें सुप्रीमकोर्ट के लिए गुंजाइश ही कहां बची थी कि वह फरियादी को वाजिब इंसाफ दे सके? बावजूद इसके अदालत ने इस पूरे मामले में फरियादी के जानिब संवेदनशील और पुलिस व निचली अदालतों के खिलाफ जो कठोर रुख दिखलाया, वह काबिले तारीफ है। सर्वोच्च अदालत की दो सदस्यीय इस खंडपीठ ने भारतीय पुलिस बल को डीके बसु केस में पुलिसकर्मियों के लिए जारी दिशा-निर्देर्शो को याद दिलाते हुए कहा कि यह दिशा-निर्देश मुल्क के हर थाने में पट्टी पर लिखे रहते हैं, फिर भी इनका जानते-बूझते उल्लंघन होता है। दरअसल, यह कोई पहली बार नहीं है, जब हमारी सर्वोच्च अदालत ने पुलिस बल और निचली अदालतों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हों। अभी बमुश्किल कुछ ही दिन बीते हैं, जब अदालत ने इलाहाबाद, जबलपुर और पटना हाईकोर्ट के कुछ फैसलों पर अंगुली उठाई थी। शीर्ष अदालत ने अपराध के समय गैरहाजिर रहे व्यक्ति को भी आरोपी बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए उस वक्त कहा था कि कुछ अदालतों में फौजदारी मामलों की सुनवाई में उपेक्षापूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है। बहरहाल, जहां अदालतें अपना काम जिम्मेदारी से नहीं निभा रही हैं, वहीं हमारा पुलिस बल मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलें में तो जैसे कुख्यात ही हो गया है। विधि व व्यवस्था की पहरेदारी के अलावा पुलिस बल का काम मानव अधिकारों की हिफाजत करना भी है, लेकिन बीते कुछ सालों में ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जिससे मालूम चलता है कि वह अपनी जिम्मेदारियों को ठीक तरह से निभाने में पूरी तरह से नाकाम रहा है। बेकसूरों की जबरन धरपकड़ और उन पर झूठे मुकदमें लादना, हिरासत में भयानक उत्पीड़न, फर्जी मुठभेड़ व भ्रष्टाचार तो जैसे पुलिस के लिए रोज-ब-रोज की बात हो गई है। पुलिसकर्मियों के खिलाफ लगातार मानवाधिकारों के उल्लंघन की शिकायतें आती रहती हैं, लेकिन फिर भी सरकार के सिर जरा-सी भी जूं नहीं रेंगती। लाख घटनाएं होती रहें, मगर मजाल है कि पुलिस ढांचे में कोई सुधार हो? सत्ता में बैठे लोगों की दिलचस्पी इस बात में जरा-सी भी नहीं दिखाई देती कि कैसे पुलिस महकमे को अवाम के जानिब संवेदनशील और जबावदेह बनाया जाए। जैसा कि सब जानते हैं, एक लोकतांत्रिक और न्यायपूर्ण व्यवस्था में सजा देने का काम अदालत का है, न कि पुलिस का। लिहाजा, फर्जी मुठभेड़ और हिरासत में हुई मौतों के मामले में जवाबदेही तय की जाना बेहद जरूरी है और यह जवाबदेही दोषी पुलिसवालों को सजा देने से लेकर पीडि़तों को मुआवजा दिलवाने तक हो। तभी जाकर हालात सुधरेंगे। कुल मिलाकर हमारी सर्वोच्च अदालत ने अपने कई फैसलों में भारतीय पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं और हर बार पुलिस ढांचे में व्यापक सुधार की जरूरत को रेखांकित किया है। यही नहीं, पुलिस सुधार के लिए गठित कई समितियों ने अपनी रिपोर्ट में पुलिस की कार्यप्रणाली को सुधारने के लिए कई तजवीजें पेश की हैं, लेकिन सरकार ने अभी तक इन पर कोई सार्थक कदम नहीं उठाया है। पुलिस सुधार के लिए उच्चतम न्यायालय के निर्देशों को पांच साल होने को आए, लेकिन इस बाबत अभी तक कुछ भी नहीं हुआ है। सोराबजी समिति ने भारतीय पुलिस के अंदर बुनियादी सुधार के लिए अपनी रिपोर्ट में सरकार को कई महत्वपूर्ण सिफारिशें दी थीं, लेकिन अफसोस कि ज्यादातर सूबाई सरकारें इन सिफारिशों को अपने यहां लागू करने के लिए रजामंद नहीं हैं। मानवाधिकारों की बढ़-चढ़कर बात करने वाली संप्रग सरकार को अब तो इन सिफारिशों पर गंभीर होना चाहिए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)