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Sunday, January 16, 2011
बेरुखी का शिकार बेघर
हमारा संविधान हर नागरिक को जीने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। इसके अंतर्गत हर नागरिक को खाने के अलावा रहने के लिए सिर पर छत होनी चाहिए। घर के अभाव में गरीब, बेघर और फुटपाथ पर जिंदगी बसर करने वालों के लिए रात गुजारने के लिए कम से कम रैन बसेरा तो होना ही चाहिए। मई 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में बाकायदा सभी सूबों के मुख्य सचिवों को आदेश जारी किए थे कि जनसंख्या के आधार पर विभिन्न शहरों में रात्रिकालीन आश्रय स्थलों का निर्माण किया जाए। और इन स्थलों पर कंबल, दवाइयां, पानी, शौचालय और बिजली आदि भी नि:शुल्क मुहैया कराई जाए। लेकिन हमारी लोकतांत्रिक और कथित कल्याणकारी सरकारें इस दिशा में कोई कारगर कदम नहीं उठातीं। बेघर लोगों की जरूरतों की प्रति वे हमेशा उदासीन ही बनी रहती हैं। ऐसी ही उदासीनता का एक मामला अभी हाल ही में महाराष्ट्र में सामने आया है। बेघरों को आश्रय मुहैया कराने के लिए जब एक गैर सरकारी संगठन पीयूसीएल के कार्यकर्ता महाराष्ट्र के पूर्व सचिव जेज़े. डांगे के पास पहुंचे तो उन्होंने बड़ी ही बेरूखी से यह कहकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लिया कि बेघर लोग बाहर के हैं, वे महाराष्ट्र के नहीं हैं। लिहाजा उन्हें अपने सूबों में वापस लौट जाना चाहिए। नागरिकों के प्रति यह संवेदनहीनता उस वक्त सामने आई, जब सुप्रीम कोर्ट बेघरों को आश्रय मुहैया कराने के एक मामले में सुनवाई कर रहा था। अदालत ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए न सिर्फ अपनी नाराजगी जताई, बल्कि इस बाबत राज्य सरकार से जबाव-तलब करते हुए कहा कि कोई सरकार किसी नागरिक को बाहरी कैसे कह सकती है। यह मुल्क सभी का है और हर एक को मुल्क में समान अधिकार हैं। गौरतलब है कि महाराष्ट्र में घरेलू और बाहरी के नाम पर विवाद नया नहीं है। लेकिन यह शायद पहला मौका है जब किसी शीर्ष ओहदे पर बैठे अफसर ने बाहरी लोगों पर इस तरह की गैर जिम्मेदाराना टिप्पणी की है। यह हमारे सर्वोच्च अदालत के आदेश की अवमानना है। जिसे किसी भी हाल में माफ नहीं किया जाना चाहिए। जब हमारे प्रशासनिक अधिकारी भी लीडरों की तरह बर्ताव करने लगेगें तो आम अवाम अपनी गुहार लेकर कहां जाएगा। आधुनिक समाज में कोई भी संवेदनशील सरकार नागरिकों के साथ इस तरह का बर्ताव नहीं कर सकती। सरकारों के इस गैर जिम्मेदाराना रवैये के खिलाफ हालांकि हमारी अदालतें सख्त रहीं हैं फिर भी मुल्क में आए दिन इस तरह के मामले सामने आते रहते हैं। हर साल अदालत सरकारों को फटकार सुनाती है। पर फिर भी बेघर-बेबस लोगों को ठंड से बचाने के लिए कोई माकूल इंतजाम नहीं हो पाते। कभी राजनीतिक तो कभी प्रशासनिक उदासीनता के चलते जरूरतमंदों को फायदा नहीं मिल पाता। नियमों के मुताबिक हर एक लाख की आबादी पर एक रैन बसेरा होना चाहिए। लेकिन जमीनी स्तर पर देखें तो मुल्क में कहीं भी आबादी के हिसाब से रैन बसेरे नहीं हैं। कुल मिलाकर लोकतंत्र में यह स्थिति किसी भी हाल ठीक नहीं। लोकतंत्र तभी जिंदा रह सकता है, जब उसके नागरिकों के मौलिक अधिकार बहाल हों। साथ ही कहीं भी नागरिकों के बीच आपस में भेद न हो।
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