सरकार ने लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए बनी संयुक्त समिति की बैठकों के नौ ऑडियो टेप सोमवार को जारी कर दिए। इन टेप के जरिए टीम अन्ना और पांच केंद्रीय मंत्रियों के बीच प्रस्तावित भ्रष्टाचार निरोधक कानून के दायरे में प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को रखने जैसे विभिन्न प्रावधानों को लेकर तीखे मतभेदों की बात जाहिर होती है। ये टेप आरटीआइ कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल को एक सीडी के जरिए मुहैया कराए गए हैं। बातचीत के एक अंश में मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को यह कहते सुना जा सकता है कि किसी मामले में प्रधानमंत्री के दोषी होने की बात जांच पूरी होने के बाद ही साबित हो पाएगी लेकिन जांच के दौरान उनके अंतरराष्ट्रीय रुतबे और जनता की नजर में उनके ओहदे के बारे में भी विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रधानमंत्री को अपना कार्यकाल पूरा करने दिया जाए और उनके खिलाफ कोई भी जांच या अभियोजन उनके पदमुक्त होने के बाद ही हो। सिब्बल की इस बात का टीम अन्ना के सदस्य और कर्नाटक के तत्कालीन लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने कड़ा विरोध किया और कहा, प्रधानमंत्री, उच्च न्यायपालिका और निचली नौकरशाही को बाहर रखने से भ्रष्टाचार निरोधी निकाय के पास काम करने लायक कोई क्षेत्र नहीं बचेगा। वकील प्रशांत भूषण ने कहा, न तो संविधान और न ही किसी कानून के तहत प्रधानमंत्री को रियायत प्राप्त है। भूषण ने बैठकों के दौरान कहा, अगर मामला बनता है तो जांच होगी। वर्तमान में भी सीबीआई जांच कर सकती है लेकिन व्यावहारिक रूप से ऐसा नहीं हो पाता और ऐसा नहीं किया जाता। ऑडियो टेप के अनुसार, बातचीत में केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद को हजारे पक्ष के सदस्यों से लोकपाल को अभियोजन के अधिकार दिए जाने के बारे में सवाल करते सुना गया है। वह सवाल कर रहे हैं कि अभियोजन की मंजूरी लोकपाल की पीठ देगी या जांच अधिकारी। खुर्शीद ने कहा, अगर ऐसा लोकपाल की पीठ करेगी तो यह एक अलग बात है। अगर ऐसा अधिकारी करेंगे तो यह अलग होगा। तो अभियोजन शुरू कौन करेगा? आरटीआई कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने जवाब दिया शुरुआत में हमने मंत्रिपरिषद, न्यायाधीशों, प्रधानमंत्री और संसद सदस्यों के बारे में यह कहा है कि अभियोजन की मंजूरी लोकपाल की पीठ देगी। यह लोकपाल की सात सदस्यीय पूर्ण पीठ होगी, लेकिन अन्य के लिए लोकपाल किसी एक अधिकारी से मंजूरी देने को कह सकेगा। इस पर सिब्बल ने सवाल किया, नौकरशाही काम नहीं कर पाएगी। आपको किसी न किसी तरह से अधिकारियों का संरक्षण करना होगा। टेप में हेगड़े को भ्रष्टाचार निरोधी कानून के प्रावधानों और उच्चतम न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए यह कहते सुना जा सकता है कि अभियोजन की मंजूरी देने वाला प्राधिकार यह देख सकता है कि क्या अपराध कर्तव्य निर्वहन के दौरान हुआ है। इस पर सिब्बल ने कहा,बुनियादी रूप से समस्या यही है कि हम यहां इस बात पर चर्चा नहीं कर रहे हैं। हम एक ऐसी समानांतर एजेंसी बनाने जा रहे हैं जो किसी के प्रति भी जवाबदेह नहीं रहेगी। टेप में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को यह कहते सुना जा सकता है, मैं चर्चा के लिए दोनों ही मसौदे पेश करूंगा, विचार के लिए नहीं। विचार संसद में ही होगा। सरकार को उसे पेश करने के लिए मंजूरी देने से पहले उस पर गौर करना होगा। इस पर केजरीवाल ने कहा, कैबिनेट इनमें से एक को चुनेगी। मुखर्जी ने कहा, या फिर दोनों के मिश्रण को।
Tuesday, October 11, 2011
Saturday, October 8, 2011
एक करोड़ लोगों को नौकरी देने का लक्ष्य
सूचना प्रौद्योगिकी नीति का मसौदा जारी
सरकार ने शुक्रवार को सूचना प्रौद्योगिकी नीति, 2011 का मसौदा पेश किया। इसका मकसद 2020 तक एक करोड़ कुशल श्रमबल का विकास करना और वैिक आईटी शक्ति के रूप में भारत की स्थिति को और मजबूत करना है। संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने नीति का मसौदा पेश करते हुए कहा कि नीति के तहत 2020 तक 200 अरब डालर के निर्यात का भी लक्ष्य रखा गया है। साथ ही आईटी और आईटी संबद्ध उद्योगों से उस समय तक 300 अरब डालर की आमदनी का लक्ष्य तय किया गया है। फिलहाल आईटी निर्यात 59 अरब डालर और राजस्व 88 अरब डालर का है। सिब्बल ने बताया, ‘इस नीति के तहत हमारा उद्देश्य आईटी और आईटी संबद्ध सेवाओं से वर्तमान के 88 अरब डालर के राजस्व को 2020 तक 300 अरब डालर पर पहुंचाने का है। इसके लिए 2020 तक आईटी निर्यात को वर्तमान के 59 अरब डालर से 200 अरब डालर पर पहुंचाने का है। साथ ही इस दौरान आईटी क्षेत्र में एक करोड़ अतिरिक्त श्रमबल तैयार करना है।’
उन्होंने कहा कि भारतीय आईटी उद्योग को अपनी आमदनी का 80 प्रतिशत निर्यात से मिलता है। इस क्षेत्र में 25 लाख कुशल कर्मचारी कार्यरत हैं। सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार विभाग की वेबसाइट पर नीति के मसौदे पर विभिन्न पक्ष एक माह तक अपनी राय दे सकते हैं। कपिल सिब्बल ने कहा कि नीति के मसौदे का मकसद लघु एवं मध्यम उपक्र मों तथा नए वेंचर्स को आईटी को अपनाने के लिए वित्तीय लाभ मुहैया कराना है। उन्होंने कहा कि हम प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) के लागू होने का इंतजार कर रहे हैं और उसके बाद लघु एवं मध्यम आकार की आईटी कंपनियों को प्रोत्साहन देने का ढांचा तैयार किया जाएगा। मसौदे में क्लाउड आधारित प्रौद्योगिकी में वैिक बाजार में उल्लेखनीय हिस्सेदारी हासिल करने का भी लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा उच्च शिक्षा संस्थानों में सेंटर फार एक्सिलेंस के गठन पर भी नीति में जोर दिया गया है। इसके जरिए 2020 तक आईटी विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में कम से कम 3,000 पीएचडी पाने वाले लोगों को लाना है।
Friday, September 30, 2011
शिक्षा पर उदासीनता
शासन के शीर्ष पदों पर बैठे लोग अपने सामाजिक दायित्वों के निर्वहन को लेकर गंभीर नहीं, इसका एक नया प्रमाण यह है कि अभी कई राज्यों ने शिक्षा अधिकार कानून के संदर्भ में अधिसूचना तक जारी नहीं की है। अधिसूचना जारी न करने वाले राज्यों में महाराष्ट्र, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे बड़े राज्य तो हैं ही, केंद्रीय सत्ता की नाक के नीचे रहने वाला दिल्ली भी है। यह लेटलतीफी तब है जब छह से चौदह साल तक के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा देने का कानून बने हुए डेढ़ साल होने वाले हैं। इस कानून पर अमल महज सामाजिक दायित्व की पूर्ति ही नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया भी है। हालांकि सभी राज्य सरकारें शिक्षा की महत्ता का बखान करती रहती हैं, लेकिन जब इस दिशा में कुछ करने की बारी आती है तो वे तरह-तरह के बहाने से लैस हो जाती हैं। यह ठीक नहीं कि केंद्र सरकार इन बहानों को तवज्जो दे रही है। शिक्षा अधिकार कानून पर अमल में लापरवाही
बरतने वाले राज्यों पर दबाव बनाने में केंद्र सरकार की यह दलील शायद ही काम आए कि इस कानून के हिसाब से अधिसूचना न जारी करने वाले राज्यों को नए स्कूलों के लिए धन नहीं दिया जाएगा। कोई आश्चर्य नहीं कि केंद्र सरकार की इस सख्ती के बावजूद राज्य सरकारें हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाएं। यह शिक्षा अधिकार कानून के प्रति राज्य सरकारों की उदासीनता ही है कि उन्होंने बार-बार याद दिलाए जाने के बाद अधिसूचना जारी की और कुछ राज्य तो अभी भी ऐसा करने में आनाकानी कर रहे हैं। इससे अधिक आश्चर्यजनक और कुछ नहीं हो सकता कि पिछले वित्तीय वर्ष के अंत तक सिर्फ 15 राज्यों ने शिक्षा अधिकार कानून पर अमल की अधिसूचना जारी की थी। जिस कानून को सामाजिक उत्थान के साथ-साथ राष्ट्र निर्माण की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया हो उसके संदर्भ में राज्य सरकारों का ढीला-ढाला रवैया सवाल खड़े करने वाला है। राज्य सरकारों के रवैये से यह स्पष्ट है कि इस कानून के अमल में अभी और देर होगी। ध्यान रहे कि अधिसूचना जारी करने मात्र से 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को स्कूलों में दाखिला नहीं मिलने वाला। ऐसा तो तब होगा जब पर्याप्त स्कूल, शिक्षक और अन्य संसाधन जुटा लिए जाएंगे। इस संदर्भ में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि संसाधनों के मामले में राज्य सरकारें आर्थिक तंगी का रोना रोती रहती हैं। हालांकि सर्वशिक्षा अभियान के तहत 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को शिक्षा प्रदान करने में खर्च होने वाले धन का बड़ा भाग केंद्र सरकार वहन कर रही है, फिर भी राज्य सरकारें अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति का हवाला देने से बाज नहीं आ रहीं। राज्य सरकारों के ऐसे आचरण को देखते हुए इसकी उम्मीद और भी कम है कि वे सर्वशिक्षा अभियान के तहत संचालित होने वाले स्कूलों की दशा सुधारने और उनमें गुणवत्ता प्रधान शिक्षा के लिए सचेत होंगी। इससे इंकार नहीं कि 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाना एक बड़ा काम है, लेकिन यह काम तब और दुरूह हो जाएगा जब राज्य सरकारें उसमें रुचि नहीं लेंगी। जब राज्य सरकारें इस मामले में उदासीनता का परिचय देंगी तब फिर यह लगभग तय है कि निजी क्षेत्र के स्कूल इस कार्य में सहयोग देने के लिए स्वेच्छा से तैयार होने वाले नहीं हैं।
Wednesday, September 28, 2011
इतराने को कुछ नहीं है हमारे पास
आंकड़े फिर से छलने के लिए आ गए हैं। फिजा को अनुकूल बनाने का हर उपाय आजमाया जा रहा है। जी, हां! पीपीपी यानी पर्चेजिंग पॉवर पैरिटी के आधार पर भारत दुनिया की शीघ्र ही तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। इंटरनेशनल मॉनीटरिंग फंड यानी आइएमएपफ का आकलन है कि भारत जापान को पछाड़कर इस साल दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का खिताब खुद हासिल कर सकता है। जापान अभी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। पहले और दूसरे स्थान पर क्रमश: अमेरिका और चीन का कब्जा है। कहने-सुनने में यह अच्छा लगता है। रोमांच भी महसूस होता है, लेकिन सोचने और एहसास करने की बात है कि भारत में एक तरफ जहां इतने बड़े पैमाने पर पर्चेजिंग पॉवर है कि वह जापान जैसे देश को पछाड़ने की कगार पर खड़ा है, वहीं दूसरी ओर विडंबना यह है कि भारत दुनिया के सबसे ज्यादा गरीब लोगों का निवास स्थान है। भारत में 40 करोड़ से ज्यादा लोग सरकारी पैमाने के हिसाब से ही गरीबी रेखा के नीचे हैं। क्या उनका जीडीपी से कोई रिश्ता नहीं होना चाहिए? अगर सकल घरेलू उत्पाद का मतलब सिर्फ देश के एक तबके का उत्पाद है यानी सकल घरेलू उत्पाद पर अगर एक तब्के का ही कब्जा है तो फिर इसे देश का सकल घरेलू उत्पाद क्यों कहते हैं? इसे क्यों नहीं ईमानदारी से कुछ भारतीयों का घरेलू उत्पाद कहते हैं। लोकतंत्र के कुछ पाखंड बहुत भयावह होते हैं। लोकतंत्र मर्यादा और लिहाज के नाम पर गेहूं के साथ घुन के पीस जाने को ज्यादती नहीं, मूल्य बताता है। यह खतरनाक है। बहरहाल, जो आइएमएफ का आकलन है, वह 2010 के आंकड़ों के आधार पर है, जिनके मुताबिक पिछले साल जापान की अर्थव्यवस्था 4.31 लाख करोड़ डॉलर की थी, जबकि भारत की अर्थव्यवस्था इसी दौरान 4.06 लाख करोड़ की थी। अब चूंकि इसी साल मार्च में जापान पर जबरदस्त सूनामी की मार पड़ी है, इसलिए विशेषज्ञों का आकलन है कि मोर्चे से अब जापान लगभग बाहर हो चुका है और नहीं हुआ तो हो जाएगा। दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के मुताबिक 2012 में भारतीय अर्थव्यवस्था के 7-8 फीसदी की दर से विकास की उम्मीद है। जब पूरे यूरोप की अर्थव्यवस्थाएं औसतन 2.5 की विकासदर से भी कुछ नीचे हों और अमेरिका एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ हो, जहां हर पल विकास के ठप होने की तलवार लटक रही हो, वहां भारत की अर्थव्यवस्था की यह गतिशीलता रोमांचित तो करती ही है, भारतीय होने के नाते गर्व भी दिलाती है। लेकिन सवाल है कि एक तरफ जहां भारतीय अर्थव्यवस्था आसमान चूमने की ओर बढ़ रही है, ठीक उसी समय बड़ी तादाद में गरीब भारतीय पाताल की तरफ क्यों धंसे जा रहे हैं? यह विचित्र विरोधभास है कि दुनिया एक पैमाने पर तो हमें अमेरिका, जापान और चीन के बराबर खड़ा करती है तो दूसरी तरफ हमारा शुमार अंगोला, हैती जैसे देशों में होता है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है? इसका साफ मतलब है कि भारत में लोकतंत्र का भले नाम हो, लेकिन यहां भी विकास एक खास तबका का ही हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के पूर्वानुमानों में भारत को चमकते सूरज के देश की संज्ञा दी गई है और उगते सूरज के देश पर हमारा वर्चस्व होगा, इसका अनुमान व्यक्त किया गया है। लेकिन यह अनुमान इस हकीकत पर नजर क्यों नहीं घुमाता कि चमकते सूरज के देश में एक बहुत बड़ी आबादी अंधकार के कुंए में क्यों धंसी जा रही है? क्या उसे रोशनी पसंद नहीं? क्या उसे चमकने में कोई रुचि नहीं? नहीं, ऐसा नहीं है। दरअसल, लोकतंत्र की ढाल ने मलाईदार तबके को यह सहूलियत और विशिष्टता दे दी है कि दूसरों के लिए मलाई में हिस्सेदारी का कोई विधान ही नहीं बन रहा। हम इसीलिए हंसी का पात्र भी बन रहे हैं कि एक तरफ तो हमसे दुनिया के बड़े से बड़े देश डर रहे हैं। हमारी अर्थव्यवस्था का आकार उनमें दहशत भर रहा है। दूसरी तरफ हमारी यह भारी-भरकम अर्थव्यवस्था अपने ही कुछ लोगों को बिल्कुल अनदेखा कर रही है। सिर्फ अनदेखा ही नहीं कर रही, बल्कि मौका पड़ने पर उनके ऊपर गिरकर अपने वजन से उनकी जान भी लेने पर उतारू है। समझ में नहीं आ रहा है कि जीडीपी के बढ़ने पर खुश हों या महंगाई के बढ़ने पर मातम मनाएं? भारत भले दुनिया के चुनिंदा देशों में अपनी हैसियत दर्शाने के लायक हो गया हो, लेकिन जब तक देश के बहुसंख्यक लोग इस स्थिति में नहीं पहंुच जाएंगे कि उन्हें भी फील गुड का एहसास हो, तब तक यह बिल्कुल बेकार की उपलब्धि होगी। जब तक जीडीपी का मतलब देश नहीं होगा, तब तक भारत की इस कामयाबी से सारे भारतीयों का दिल भी नहीं धड़केगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Tuesday, September 27, 2011
घट रही गरीबों की संख्या
योजना आयोग के सदस्य अरुण मैड़ा का दावा
शहरी गरीबी रेखा को 32 रुपए प्रति व्यक्ति खपत के आधार पर निर्धारित करने के लिए आलोचना के शिकार योजना आयोग ने सोमवार को कहा कि देश में गरीबों की संख्या कम हो रही है। योजना आयोग के सदस्य अरुण मैड़ा ने आज एसोचैम के समारोह में कहा कि आज गरीबों की संख्या कम हो रही है, चाहे आप (आंकने के लिए) तेंदुलकर पद्धति को अपनाएं या फिर इससे पूर्व अपनाई जाने वाली पद्धति को। यह बयान योजनाआयोग के हाल में तेंदुलकर पद्धति से आंकी गई गरीबी रेखा पर मचे हंगामे के बाद आया है। इस आकलन में कैलोरी के अलावा स्वास्थ्य और शिक्षा को भी ध्यान में रखा गया है। सर्वोच्च न्यायालय में दायर एक हलफनामे में योजना आयोग ने कहा कि शहरी इलाकों में 32 रुपए प्रति दिन की खपत करने वाले को गरीब माना जाएगा। ग्रामीण इलाकों में यह सीमा 26 रुपए प्रति दिन तय की गई है। मैड़ा ने कहा, ‘‘तेंदुलकर समिति को इसके आकलन के लिए पद्धति सुझाने के लिए कहा गया था कि सरकारी कार्यक्र मों से हालात सुधर रहे हैं या नहीं।’ उन्होंने कहा कि गरीब सापेक्ष अवधारणा है और आज की गरीबी की तुलना पिछले दिनों से करना गलत होगा। उन्होंने कहा, ‘मेरा मानना है कि जो व्यक्ति आज 15,000 रुपए प्रति माह कमाता है वह गरीब है। गरीबी बेहद सापेक्ष चीज है। इसलिए देश में क्या हो रहा है गरीबी का स्तर भी इसी के आधार पर परिभाषित किया जाता है।’ तेंदुलकर समिति की पद्धति के आधार पर योजना आयोग के आकलन के मुताबिक एक मार्च 2005 को 40.74 करोड़ लोग गरीब थे और 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की जनसंख्या 1.21 अरब हैं।परिभाषा नहीं, गरीबी का मजाक
सरकार ने गरीबी की नई परिभाषा तय की है। योजना आयोग की माने तो देश के शहरी इलाकों में खाने पर 32 रुपये व ग्रामीण इलाकों में 26 रुपये रोज खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं कहलाएगा। भले इतनी राशि में एक वक्त का खाना न आता हो लेकिन योजना आयोग की नजर में इतने रुपये गरीबी दूर करने के लिए काफी हैं। आयोग ने यह बताने की कोशिश की है कि शहरों हरेक महीने 965 रुपये और गांवों में 781 रुपये खर्च करने वाला व्यक्ति सरकार की नजर में गरीब नहीं है। प्रधानमंत्री के दस्तखत वाले योजना आयोग के इस हलफनामे पर सर्वोच्च न्यायालय 11 अक्टूबर को विचार करेगा। इस अजीबोगरीब आंकड़े को पेश करके योजना आयोग यह बताने की फिराक में है कि इस तरह के लोग बीपीएल कार्ड के दायरे में आने के हकदार नहीं हैं। दरअसल, गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिलता है। वर्तमान में 12 योजनाएं ऐसी हैं, जो बीपीएल को ध्यान में रखकर संचालित की जा रही हैं जबकि नौ कार्यक्रम उनके हितों की रक्षा के लिए संचालित हो रहे हैं। योजना आयोग गरीबी की नई परिभाषा देते समय यह भूल गया कि वि बैंक भी रोजाना एक डॉलर से कम खर्च करने वाले व्यक्ति को गरीबी रेखा से नीचे मानता है। फिर योजना आयोग का यह नया फामरूला कहां तक तर्कसंगत है? आयोग के इस हलफनामे पर पूरे देश में रोष है। विपक्ष ने भी सरकार पर हमला बोल दिया है तो कुछ मंत्री ने इस नये फामरूले पर आपत्ति जताई है। सरकार से बस एक ही सवाल है कि महंगाई के दौर में 26 रुपये में क्या मिलेगा? आज तो 1 किलो टोंड दूध का भी दाम बाजार में 27 रुपये है। इस राशि से 2 लीटर बोतल बंद पानी भी नहीं मिलता है। उसके लिए भी 30 रुपये चाहिए। आयोग ने गरीबी रेखा पर नया क्राइटीरिया सुझाते हुए कहा है कि गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले एक ग्रामीण को 26 रुपये और शहरी गरीब को 32 रुपये में 1776 कैलोरी मिल सकती है। आयोग की दलील है कि वि स्वास्थ्य संगठन ने भी एक व्यक्ति के लिए 1776 कैलोरी ही पर्याप्त मानी है। आयोग का कहना है कि दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई में चार सदस्यों वाला परिवार यदि महीने में 3866 रुपये खर्च करता है तो वह गरीब नहीं कहा जा सकता। आयोग ने गरीबी की यह नई परिभाषा 2010-11 के इंडस्ट्रियल वर्कर्स के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और तेंदुलकर कमेटी की रिपार्ट के आधार पर तैयार की गई है। हालांकि हलफनामे के अंत में कहा गया है कि गरीबी रेखा पर अंतिम रिपोर्ट एनएसएसओ सव्रेक्षण 2011-12 के बाद पेश की जाएगी। इसमें हास्यास्पद यह है कि शहरी और ग्रामीण गरीबी का यह निर्धारण 2004-05 की कीमतों के आधार पर किया गया है, जबकि आज कीमतें तब के मुकाबले लगभग दोगुनी-तिगुनी हो गई है। सरकारी बाबुओं की तनख्वाहों और भत्तों में कई बार बढ़ोतरी हुई है, संगठित और निजी क्षेत्र की भी आय में इजाफा होता गया है। सांसदों और विधायकों के वेतन-भत्ते कई गुने बढ़े हैं लेकिन गरीबों की बेहतरी के बारे में सोचने के बजाए आंकड़ों में उनकी संख्या जहां तक हो सके घटा कर दिखाने की कोशिश हो रही है। दरअसल, योजना द्वारा बनाई गई गरीबी मापने की यह कसौटी देश के गरीबों के साथ शर्मनाक मजाक है। यही वजह है कि श्रीमती सोनिया गांधी की एनएसी के सदस्य इस कसौटी को लेकर आग बबूला है। एनएसजी सदस्यों का आरोप है कि योजना आयोग वास्तविकता से दूर सोच रहा है। आज की महंगाई में 32 रुपये में आता ही क्या है? यदि 32 रुपए को आधार बनाया गया तो मुट्ठी भर लोग ही बीपीएल की श्रेणी में आएंगे। समाज का बड़ा गरीब तबका लाभ लेने से वंचित रह जायेगा। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य अरुणा राय ने योजना आयोग की आलोचना करते हुए कहा कि सरकार इस आकलन से गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या अवास्ताविक रूप से कम करना चाहती है ताकि गरीबों पर सरकारी खर्च कम किया जा सके। आखिर हमारे योजनाकार गरीबी की असली तस्वीर पर पर्दा क्यों डालना चाहते हैं? इसलिए कि वे ऐसा करके मौजूदा आर्थिक नीतियों की सार्थकता साबित करना और सरकार पर सब्सिडी का बोझ घटना चाहते हैं। वित्त मंत्रालय भी मानता है कि 35 करोड़ से ज्यादा लोगों को 2 रुपये प्रति किलो की दर से गेहूं और 3 रुपये प्रति किलो की दर से चावल दिया गया तो सरकार की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। इसलिए गरीबों की संख्या सीमित करने की कोशिश हो रही है ताकि सरकार पर अधिक बोझ न पड़े। आजादी के छह दशक से यह बहस का विषय बना हुआ है कि गरीबी की परिभाषा क्या है? गरीबों की वास्तविक संख्या कुल कितनी है? बहरहाल, आज देश के सामने गरीबी के कई आंकड़े हैं, जिसे लेकर केंद्र हमेशा से भ्रम की स्थितियां पैदा करता रहा है। गरीबी मापने की जो सरकारी पद्धति है, उसे तमाम अर्थशास्त्री नकारते रहे हैं। दरअसल, सरकार में बैठे योजनाकारों ने गरीबी मापने का जो पैमाना तय किया है, वह गरीबी को छिपाने का काम करता है। इसलिए ही गरीबी की परिभाषा पर योजना आयोग और एनएसी के बीच मतभेद बना रहा है। 2004- 05 में योजना आयोग ने बताया था कि देश में 27.5 फीसद लोग गरीब हैं। 2009 में सुरेश तेंदुलकर समिति ने इसे खारिज करते हुए बताया कि 37 फीसद भारतीय गरीब हैं। उसी दौरान, अजरुन सेनगुप्त समिति ने अपनी रिपोर्ट में कुल आबादी के 77 फीसद हिस्से के गरीबी होने का अनुमान पेश किया था जबकि एन.सी सक्सेना की अध्यक्षता वाली समिति ने आधी यानी 50 फीसद आबादी को गरीब माना। अब योजना आयोग ने गरीबी की जो परिभाषा दी है, वह सचमुच हैरान करने वाली है। बेशक, आज अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत का रुतबा है। इस साल अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस कौंसिल (एनआईसी) और यूरोपीय संघ की संस्था ईयूआईएसएस ने कहा है कि भारत अमेरिका और चीन के बाद वि का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र है लेकिन दुनिया के सबसे भूखे और कुपोषणग्रस्त लोग भारत में ही रहते हैं। अत्यधिक भुखमरी के शिकार हर पांचवां व्यक्ति भारतीय है। वही अंतराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान द्वारा जारी वैिक भुखमरी सूचकांक में भूख से लड़ रहे 84 देशों की सूची में चीन व पाकिस्तान से भी नीचे भारत का 67वां स्थान है। चीन नौंवे और पाकिस्तान 52वें स्थान पर है। इतना ही नहीं, भारत को कुपोषण और भरण-पोषण के मामले में महिलाओं की खराब स्थिति के चलते ही काफी नीचे स्थान मिला है। ऐसे में योजना आयोग की गरीबी की यह नई परिभाषा समझ से परे है। इसलिए सरकार और योजना आयोग को कृत्रिम आंकड़े गढ़ने के बजाए हकीकत स्वीकार करनी चाहिए। गरीबी की इस अजीबोगरीब परिभाषा का असली मकसद मौजूदा आर्थिक नीतियों की सार्थकता साबित करना और बीपीएल योजनाओं में सरकारी खर्च घटाना है। इसलिए गरीबों की संख्या सीमित करने की कोशिश हो रही है। वित्त मंत्रालय मानता है कि 35 करोड़ से ज्यादा लोगों को 2 रुपये किलो गेहूं और 3 रुपये किलो चावल देने से सरकार की मुश्किलें बढ़ जाएंगी
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